Harivamsha Purana
71
अध्याय 71 / 318

Parva 2, Adhyāya 16

45 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ45 श्लोक

अध्याय 71

श्लोक 1

श्रीकृष्णेन गिरियज्ञ एवं गोपूजनस्य प्रस्तावं, शरद् ऋतु वर्णनं गोपवृद्धस्य वचनं श्रुत्वा शक्रपरिग्रहे ।प्रभावज्ञोऽपि शक्रस्य वाक्यं दामोदरोऽब्रवीत्

śrīkṛṣṇena giriyajña evaṃ gopūjanasya prastāvaṃ, śarad ṛtu varṇanaṃ gopavṛddhasya vacanaṃ śrutvā śakraparigrahe | prabhāvajño'pi śakrasya vākyaṃ dāmodaro'bravīt

हिन्दी अर्थ

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! इन्द्र- महोत्सवको स्वीकार करनेके सम्बन्धमें उस बड़े-बूढ़े गोपका वचन सुनकर इन्द्रके प्रभावको जानते हुए भी श्रीकृष्णने यह बात कही—

English

Hearing the words of the intelligent Dantavakra, Sālwa, the foremost of speakers, said to the kings (25).

अध्याय 71

श्लोक 2

वयं वनचरा गोपाः सदा गोधनजीविनः ।गावोऽस्मद्दैवतं विद्धि गिरयश्च वनानि च

vayaṃ vanacarā gopāḥ sadā godhanajīvinaḥ | gāvo'smaddaivataṃ viddhi girayaśca vanāni ca

हिन्दी अर्थ

आर्य! हमलोग वनमें रहनेवाले गोप हैं और सदा गोधनसे अपनी जीविका चलाते हैं; अत: आपको मालूम होना चाहिये कि गौएँ, पर्वत और वन—ये ही हमारे देवता हैं

English

Hearing the words of the intelligent Dantavakra, Sālwa, the foremost of speakers, said to the kings (25).

अध्याय 71

श्लोक 3

कर्षुकाणां कृषिर्वृत्तिः पण्यं विपणिजीविनाम् ।गावोऽस्माकं परा वृत्तिरेतत् त्रैविद्यमुच्यते

karṣukāṇāṃ kṛṣirvṛttiḥ paṇyaṃ vipaṇijīvinām | gāvo'smākaṃ parā vṛttiretat traividyamucyate

हिन्दी अर्थ

किसानोंकी जीविका है खेती, व्यापारसे जीवननिर्वाह करनेवाले वैश्योंकी जीविका-वृत्ति है खरीद-विक्री और हमलोगोंकी सर्वोत्तम वृत्ति है गौओंका पालन। ये वार्तारूप विद्याके तीन भेद कहलाते हैं

अध्याय 71

श्लोक 4

विद्यया यो यया युक्तस्तस्य सा दैवतं परम् ।सैव पूज्यार्चनीया च सैव तस्योपकारिणी

vidyayā yo yayā yuktastasya sā daivataṃ param | saiva pūjyārcanīyā ca saiva tasyopakāriṇī

हिन्दी अर्थ

जो जिस विद्यासे युक्त है, उसके लिये वही सर्वोत्तम देवता है, वही पूजा-अचकि योग्य है और वही उसके लिये उपकारिणी है

अध्याय 71

श्लोक 5

योऽन्यस्य फलमश्नानः करोत्यन्यस्य सत्क्रियाम् ।द्वावनर्थौ स लभते प्रेत्य चेह च मानवः

yo'nyasya phalamaśnānaḥ karotyanyasya satkriyām | dvāvanarthau sa labhate pretya ceha ca mānavaḥ

हिन्दी अर्थ

जो मनुष्य एक व्यक्तिसे फल पाकर उसे भोगता है और दूसरेकी पूजा ( आदर-सत्कार) करता है, वह इस लोक और परलोकमें दो अनर्थोका भागी होता है

अध्याय 71

श्लोक 6

कृष्यन्ता प्रथिता सीमा सीमान्तं श्रूयते वनम् ।वनान्ता गिरयः सर्वे ते चास्माकं गतिर्ध्रुवा

kṛṣyantā prathitā sīmā sīmāntaṃ śrūyate vanam | vanāntā girayaḥ sarve te cāsmākaṃ gatirdhruvā

हिन्दी अर्थ

जहाँ- तक खेती होती है, वहाँतक बव्रजकी सीमा विख्यात है। सीमाके अन्तमें वन सुना जाता है और वनके अन्तमें समस्त पर्वत हैं। वे पर्वत ही हमारे अविचल आश्रय हैं

अध्याय 71

श्लोक 7

श्रूयन्ते गिरयश्चापि वनेऽस्मिन् कामरूपिणः ।प्रविश्य तास्तास्तनवो रमन्ते स्वेषु सानुषु

śrūyante girayaścāpi vane'smin kāmarūpiṇaḥ | praviśya tāstāstanavo ramante sveṣu sānuṣu

हिन्दी अर्थ

सुना जाता है कि इस वनमें रहनेवाले पर्वत भी इच्छानुसार रूप धारण करनेवाले हैं । वे भिन्न-भिन्न शरीरोंमें प्रवेश करके अपने शिखरॉपर मौजसे घूमते-फिरते हैं

English

Hearing the words of the intelligent Dantavakra, Sālwa, the foremost of speakers, said to the kings (25).

अध्याय 71

श्लोक 8

भूत्वा केसरिणः सिंहा व्याघ्राश्च नखिनां वराः ।वनानि स्वानि रक्षन्ति त्रासयन्तो वनच्छिदः

bhūtvā kesariṇaḥ siṃhā vyāghrāśca nakhināṃ varāḥ | vanāni svāni rakṣanti trāsayanto vanacchidaḥ

हिन्दी अर्थ

वे ही अयालॉंसे विभूषित सिंह और नखधारी जन्तुओंमें श्रेष्ठ व्याप्र बनकर वनको काटने या हानि पहुँचानेवाले लोगोंको त्रास देते हुए अपने-अपने वनोंकी रक्षा करते हैं

English

Hearing the words of the intelligent Dantavakra, Sālwa, the foremost of speakers, said to the kings (25).

अध्याय 71

श्लोक 9

यदा चैषां विकुर्वन्ति ते वनालयजीविनः ।घ्नन्ति तानेव दुर्वृत्तान् पौरुषादेन कर्मणा

yadā caiṣāṃ vikurvanti te vanālayajīvinaḥ | ghnanti tāneva durvṛttān pauruṣādena karmaṇā

हिन्दी अर्थ

जब वनके आश्रयमें रहकर जीवननिर्वाह करनेवाले लोग इन वनों या वनदेवताओंको हानि पहुँचाते हैं, तब वे कामरूपी देवता राक्षसोचित हिंसा-कर्मके द्वारा उन दुराचारी मनुष्योंको निश्चय ही मार डालते हैं

English

Hearing the words of the intelligent Dantavakra, Sālwa, the foremost of speakers, said to the kings (25).

अध्याय 71

श्लोक 10

मन्त्रयज्ञपरा विप्राः सीतायज्ञाश्च कर्षुकाः ।गिरियज्ञास्तथा गोपा इज्योऽस्माभिर्गिरिर्वने

mantrayajñaparā viprāḥ sītāyajñāśca karṣukāḥ | giriyajñāstathā gopā ijyo'smābhirgirirvane

हिन्दी अर्थ

ब्राह्मणलोग मन्त्रयज्ञमें तत्पर रहते हैं, किसान सीतायज्ञ करते हैं अर्थात्‌ खेतोंको अच्छी तरह जोतते और हल जोतनेसे जो रेखा बन जाती है, उसकी तथा हलकी पूजा करते हैं तथा गोपगण गिरियज्ञ करते हैं; अत: हमलोगोंको इस वनमें गिरियज्ञ करना चाहिये

अध्याय 71

श्लोक 11

तन्मह्यं रोचते गोपा गिरियज्ञः प्रवर्तताम् ।कर्म कृत्वा सुखस्थाने पादपेष्वथवा गिरौ

tanmahyaṃ rocate gopā giriyajñaḥ pravartatām | karma kṛtvā sukhasthāne pādapeṣvathavā girau

श्लोक 11–12 का हिन्दी अर्थ

गोपगण! मुझे तो यही अच्छा लगता है कि गिरियज्ञका आरम्भ हो। स्वस्तिवाचन आदि कर्म करके वृक्षोंके नीचे अथवा पर्वतके समीप किसी सुखद स्थानपर पवित्र पशुओंको एकत्र करके उनके पास जाकर उनका विस्तारपूर्वक पूजन किया जाय और एक शुभ मन्दिसमें सारे ब्रजके दूधका संग्रह कर लिया जाय। इस विषयमें आपलोग क्या विचार कर रहे हैं

अध्याय 71

श्लोक 12

तत्र हत्वा पशून् मेध्यान् वितत्यायतने शुभे ।सर्वघोषस्य सन्दोहः क्रियतां किं विचार्यते

tatra hatvā paśūn medhyān vitatyāyatane śubhe | sarvaghoṣasya sandohaḥ kriyatāṃ kiṃ vicāryate

अर्थ श्लोक 11 के साथ

अध्याय 71

श्लोक 13

तं शरत्कुसुमापीडाः परिवार्य प्रदक्षिणम् ।गावो गिरिवरं सर्वास्ततो यान्तु पुनर्व्रजम्

taṃ śaratkusumāpīḍāḥ parivārya pradakṣiṇam | gāvo girivaraṃ sarvāstato yāntu punarvrajam

हिन्दी अर्थ

फिर शरदू-ऋतुके फूलोंसे जिनके मस्तकका श्रृज्धार किया गया हो, ऐसी समस्त गौएँ गिरिवर गोवर्धनकी दक्षिणावर्त परिक्रमा करके पुन: ब्रजमें जायँ

English

Hearing the words of the intelligent Dantavakra, Sālwa, the foremost of speakers, said to the kings (25).

अध्याय 71

श्लोक 14

प्राप्ता किलेयं हि गवां स्वादुतोयतृणा गुणैः ।शरत् प्रमुदिता रम्या गतमेघजलाशया

prāptā kileyaṃ hi gavāṃ svādutoyatṛṇā guṇaiḥ | śarat pramuditā ramyā gatameghajalāśayā

हिन्दी अर्थ

इस समय प्रमोदपूर्ण रमणीय शरद्‌-ऋतु आ गयी है, जबकि जल और घास गौओंके लिये स्वादुताके गुणोंसे सम्पन्न हो जाते हैं । अब जलाशयोंमें पानी बरसानेवाले बादल छँट गये

English

Hearing the words of the intelligent Dantavakra, Sālwa, the foremost of speakers, said to the kings (25).

अध्याय 71

श्लोक 15

प्रियकैः पुष्पितैर्गौरं श्याम बाणासनैः क्वचित् ।कठोरतृणमाभाति निर्मयूररुतं वनम्

priyakaiḥ puṣpitairgauraṃ śyāma bāṇāsanaiḥ kvacit | kaṭhoratṛṇamābhāti nirmayūrarutaṃ vanam

हिन्दी अर्थ

खिले हुए कदम्ब-पुष्पोंके कारण वन गौर- वर्णका प्रतीत होता है। कहीं -कहीं बाणासनों—झाड़- झंखाड़ोंके कारण वह श्याम रंगका दिखायी देता है। अब घासें कोमल नहीं रहीं—कुछ कठोर हो गयी हैं। वनमें मोरोंकी मधुर वाणी नहीं सुनायी देती है

अध्याय 71

श्लोक 16

विजला विमला व्योम्नि विबलाका विविद्युतः ।विवर्धन्ते जलधरा विदन्ता इव कुञ्जराः

vijalā vimalā vyomni vibalākā vividyutaḥ | vivardhante jaladharā vidantā iva kuñjarāḥ

हिन्दी अर्थ

आकाशमें जल, मल, बलाका और विद्युत्से रहित बादल दन्तहीन हाथियोंके समान बढ़ रहे हैं

अध्याय 71

श्लोक 17

पटुना मेघवातेन नवतोयानुकर्षिणा ।पर्णोत्करघनाः सर्वे प्रसादं यान्ति पादपाः

paṭunā meghavātena navatoyānukarṣiṇā | parṇotkaraghanāḥ sarve prasādaṃ yānti pādapāḥ

हिन्दी अर्थ

(वर्षा-ऋतुमें) नूतन जलको खींच लानेवाले शक्तिशाली मेघयुक्त वायुसे अभिषिक्त होनेके कारण जो पत्तोंके बाहुल्यसे घने दिखायी देते थे, वे सभी वृक्ष अब पत्तोंके बिरल हो जानेसे प्रसादको प्राप्त हो रहे हैं (पहले वहाँ अन्धकार छाया रहता था अब प्रकाश हो गया है)

अध्याय 71

श्लोक 18

सितवर्णाम्बुदोष्णीषं हंसचामरवीजितम् ।पूर्णचन्द्रामलच्छत्रं साभिषेकमिवाम्बरम्

sitavarṇāmbudoṣṇīṣaṃ haṃsacāmaravījitam | pūrṇacandrāmalacchatraṃ sābhiṣekamivāmbaram

हिन्दी अर्थ

इस समय आकाश मूर्धाभिषिक्त राजाके समान जान पड़ता है। सफेद बादल ही उसकी श्रेत पगड़ी या उज्चल मुकुट हैं, हंसरूपी श्वेत चँवरके द्वारा मानो उसके लिये हवा की जाती है तथा पूर्ण चन्द्रमा ही उसका निर्मल छत्र बनकर शोभा पाता है

English

Hearing the words of the intelligent Dantavakra, Sālwa, the foremost of speakers, said to the kings (25).

अध्याय 71

श्लोक 19

हंसैः प्रहसितानीव समुत्कृष्टानि सारसैः ।सर्वाणि तनुतां यान्ति जलानि जलदक्षये

haṃsaiḥ prahasitānīva samutkṛṣṭāni sārasaiḥ | sarvāṇi tanutāṃ yānti jalāni jaladakṣaye

हिन्दी अर्थ

वर्षाकाल बीत जानेपर सारे जलाशयोंके जल क्रमश: क्षीण होते जा रहे हैं, मानो हंसोंने उनकी हँसी उड़ायी हो और सारसोंने उनकी निन्‍्दा की हो (इसी खेदसे उनमें कृशता आ गयी है)

अध्याय 71

श्लोक 20

चक्रवाकस्तनतटाः पुलिनश्रोणिमण्डलाः ।हंसलक्षणहासिन्यः पतिं यान्ति समुद्रगाः

cakravākastanataṭāḥ pulinaśroṇimaṇḍalāḥ | haṃsalakṣaṇahāsinyaḥ patiṃ yānti samudragāḥ

हिन्दी अर्थ

समुद्रगामिनी नदियाँ हंसरूपी हाससे सुशोभित हो अपने पति (समुद्र) -के पास जा रही हैं। चक्रवाकके जोड़े उनके युगल उरोज-से जान पड़ते हैं और दोनों तट नितम्ब-मण्डलकी शोभा धारण करते हैं'

English

Hearing the words of the intelligent Dantavakra, Sālwa, the foremost of speakers, said to the kings (25).

अध्याय 71

श्लोक 21

कुमुदोत्फुल्लमुदकं ताराभिश्चित्रमम्बरम् ।सममभ्युत्स्मयन्तीव शर्वरीष्वितरेतरम्

kumudotphullamudakaṃ tārābhiścitramambaram | samamabhyutsmayantīva śarvarīṣvitaretaram

हिन्दी अर्थ

5ध्याय: + ३३५ 'रातके समय (जलाशयोंके) जलमें अगणित कुमुद खिल उठते हैं और आकाश असंख्य तारिकाओंसे चित्रित हो जाता है। वे दोनों मानो एक-दूसरेके प्रति गर्व-सा प्रकट करते हुए कहते हैं कि ' मेरी शोभा तुमसे कम नहीं है'

अध्याय 71

श्लोक 22

मत्तक्रौञ्चावघुष्टेषु कलमापक्वपाण्डुषु ।निर्विष्टरमणीयेषु वनेषु रमते मनः

mattakrauñcāvaghuṣṭeṣu kalamāpakvapāṇḍuṣu | nirviṣṭaramaṇīyeṣu vaneṣu ramate manaḥ

हिन्दी अर्थ

जिनमें मदमत्त पुरुषोंकी भाँति क्रौज् पक्षियोंकी मधुर बोली गूँज रही है, जहाँ पके हुए धानकी बालें पीली साड़ीमें सजी हुई सुन्दरी बालाओंकी भाँति अपनी श्रेत-पीत प्रभा बिखेर रही हैं और इस प्रकार जो विवाहित स्त्री-पुरुषोंके कौतुकागारोंके सदूश रमणीयता धारण करते हैं, उन वनोंमें मनको अधिक आनन्दका अनुभव होता है

English

Hearing the words of the intelligent Dantavakra, Sālwa, the foremost of speakers, said to the kings (25).

अध्याय 71

श्लोक 23

पुष्करिण्यस्तडागानि वाप्यश्च विकचोत्पलाः ।केदाराः सरितश्चैव सरांसि च श्रियाज्वलन्

puṣkariṇyastaḍāgāni vāpyaśca vikacotpalāḥ | kedārāḥ saritaścaiva sarāṃsi ca śriyājvalan

हिन्दी अर्थ

पोखरियाँ, पोखरे, खिले हुए कमलॉंसे सुशोभित बावड़ियाँ, खेतोंकी क्यारियाँ, नदियाँ और सरोवर—ये सब-के-सब अनुपम शोभा- सम्पत्तिसे प्रकाशित हो उठे हैं

English

Hearing the words of the intelligent Dantavakra, Sālwa, the foremost of speakers, said to the kings (25).

अध्याय 71

श्लोक 24

पङ्कजानि च ताम्राणि तथान्यानि सितान्यपि ।उत्पलानि च नीलानि भेजिरे वारिजां श्रियम्

paṅkajāni ca tāmrāṇi tathānyāni sitānyapi | utpalāni ca nīlāni bhejire vārijāṃ śriyam

हिन्दी अर्थ

लाल कमल, अन्यान्य श्रेत-पीत आदि कमल तथा नील उत्पल भी जलजनित शोभाके भागी हुए हैं

अध्याय 71

श्लोक 25

मदं जहुः सितापाङ्गा मन्दं ववृधिरेऽनिलाः ।अभवद् व्यभ्रमाकाशमभूच्च निभृतोऽर्णवः

madaṃ jahuḥ sitāpāṅgā mandaṃ vavṛdhire'nilāḥ | abhavad vyabhramākāśamabhūcca nibhṛto'rṇavaḥ

हिन्दी अर्थ

मोरोंका मद उतर गया है। वायु मन्दगतिसे आगे बढ़ रही है। आकाश बादलोंसे शून्य हो गया है और समुद्र भरा-पूरा दिखायी देता है

English

Hearing the words of the intelligent Dantavakra, Sālwa, the foremost of speakers, said to the kings (25).

अध्याय 71

श्लोक 27

ऋतुपर्यायशिथिलैर्वृत्तनृत्यसमुज्झितैः ।मयूराङ्गरुहैर्भूमिर्बहुनेत्रेव लक्ष्यते २६॥ स्वपङ्कमलिनैस्तीरैः काशपुष्पलताकुलैः ।हंससारसविन्यासैर्यमुना भाति शोभना

ṛtuparyāyaśithilairvṛttanṛtyasamujjhitaiḥ | mayūrāṅgaruhairbhūmirbahunetreva lakṣyate 26|| svapaṅkamalinaistīraiḥ kāśapuṣpalatākulaiḥ | haṃsasārasavinyāsairyamunā bhāti śobhanā

हिन्दी अर्थ

जो अपने ही पड़े मलिन हो रहे हैं, जहाँ काश खिले हुए हैं और लता-बेलें फैली हुई हैं तथा जिनपर यत्र-तत्र हंसों और सारसोंके बैठनेके स्थान हैं, ऐसे तटोंसे यमुनाकी बड़ी शोभा हो रही है

English

Hearing the words of the intelligent Dantavakra, Sālwa, the foremost of speakers, said to the kings (25).

अध्याय 71

श्लोक 28

कलमापाकरम्येषु केदारेषु जलेषु च ।सस्यादा जलजादाश्च मत्ता विरुरुवुः खगाः

kalamāpākaramyeṣu kedāreṣu jaleṣu ca | sasyādā jalajādāśca mattā viruruvuḥ khagāḥ

हिन्दी अर्थ

धानकी बालोंके पक जानेसे रमणीय दिखायी देनेवाली खेतोंकी क्यारियोंमें अनाजके दाने बीनकर खानेवाले सारस आदि पक्षी तथा जलाशयोंके जलोंमें मत्स्य आदि जलजन्तुओंका भक्षण करनेवाले बक आदि पक्षी कलरव कर रहे हैं

अध्याय 71

श्लोक 29

सिषिचुर्यानि जलदा जलेन जलदागमे ।तानि सस्यानि बालानि कठिनत्वं गतानि वै

siṣicuryāni jaladā jalena jaladāgame | tāni sasyāni bālāni kaṭhinatvaṃ gatāni vai

हिन्दी अर्थ

वर्षाकालमें बादलोंने अपने जलसे जिन्हें सींचा था, वे अनाजके कोमल पौधे बाल्यावस्थासे प्रौढावस्थामें आकर कठोर हो गये हैं

अध्याय 71

श्लोक 30

त्यक्त्वा मेघमयं वासः शरद्गुणविदीपितः ।एष वै विमले व्योम्नि हृष्टो वसति चन्द्रमाः

tyaktvā meghamayaṃ vāsaḥ śaradguṇavidīpitaḥ | eṣa vai vimale vyomni hṛṣṭo vasati candramāḥ

हिन्दी अर्थ

ये चन्द्रदेव बादलरूपी वस्त्र उतारकर शरद्‌-कऋतुके गुणोंसे और भी प्रकाशित हो इस निर्मल आकाशमें हर्षो्लासके साथ निवास करते हैं

English

Hearing the words of the intelligent Dantavakra, Sālwa, the foremost of speakers, said to the kings (25).

अध्याय 71

श्लोक 31

क्षीरिण्यो द्विगुणं गावः प्रमत्ता द्विगुणं वृषाः ।वनानां द्विगुणा लक्ष्मीः सस्यैर्गुणवती मही

kṣīriṇyo dviguṇaṃ gāvaḥ pramattā dviguṇaṃ vṛṣāḥ | vanānāṃ dviguṇā lakṣmīḥ sasyairguṇavatī mahī

हिन्दी अर्थ

शरदू-ऋतुमें गौएँ पहलेसे दूना दूध देने लगी हैं। साँड़ दुगुने मतवाले हो उठे हैं। वनोंकी शोभा-सम्पत्ति दुगुनी बढ़ गयी है और पकी हुई खेतीके कारण यह पृथ्वी अनन्त गुणोंसे सम्पन्न हो गयी है'

English

Hearing the words of the intelligent Dantavakra, Sālwa, the foremost of speakers, said to the kings (25).

अध्याय 71

श्लोक 32

ज्योतींषि घनमुक्तानि पद्मवन्ति जलानि च ।मनांसि च मनुष्याणां प्रसादमुपयान्ति वै

jyotīṃṣi ghanamuktāni padmavanti jalāni ca | manāṃsi ca manuṣyāṇāṃ prasādamupayānti vai

हिन्दी अर्थ

मण्डित जल तथा मनुष्योंके मन प्रसाद (स्वच्छता एवं प्रसन्नता ) -को प्राप्त हो रहे हैं

English

Hearing the words of the intelligent Dantavakra, Sālwa, the foremost of speakers, said to the kings (25).

अध्याय 71

श्लोक 33

असृजत्सविता व्योम्नि निर्मुक्तो जलदैर्भृशम् ।शरत्प्रज्वलितं तेजस्तीक्ष्णरश्मिर्विशोषयन्

asṛjatsavitā vyomni nirmukto jaladairbhṛśam | śaratprajvalitaṃ tejastīkṣṇaraśmirviśoṣayan

हिन्दी अर्थ

आकाशमें मेघयुक्त हुआ सूर्य शरदू-ऋतुके प्रभावसे अधिक प्रज्वलित तेज (धूप) -की सृष्टि करता है तथा अपनी किरणोंको और भी तीखी करके वसुधाके रसका शोषण कर रहा है

अध्याय 71

श्लोक 34

नीराजयित्वा सैन्यानि प्रयान्ति विजिगीषवः ।अन्योन्यराष्ट्राभिमुखाः पार्थिवाः पृथिवीक्षितः

nīrājayitvā sainyāni prayānti vijigīṣavaḥ | anyonyarāṣṭrābhimukhāḥ pārthivāḥ pṛthivīkṣitaḥ

हिन्दी अर्थ

भूतलके नरेश अपने सैनिकोंसे उनके अस्त्रोंका मार्जन करवाकर (उन्हें साथ ले) विजयकी इच्छासे एक-दूसरेके राष्ट्रकी ओर जा रहे हैं

English

Hearing the words of the intelligent Dantavakra, Sālwa, the foremost of speakers, said to the kings (25).

अध्याय 71

श्लोक 35

बन्धुजीवाभिताम्रासु बद्धपङ्कवतीषु च ।मनस्तिष्ठति कान्तासु चित्रासु वनराजिषु

bandhujīvābhitāmrāsu baddhapaṅkavatīṣu ca | manastiṣṭhati kāntāsu citrāsu vanarājiṣu

हिन्दी अर्थ

बन्धुजीव (बन्धूक)-के लाल फूलोंसे सुशोभित हो जो सब ओरसे लाल-लाल दिखायी देती हैं तथा जिनकी कीचड़ सूख गयी है, ऐसी विचित्र एवं कमनीय वनश्रेणियोंमें (उनकी शोभा निहारनेके लिये) मन आसक्त हो रहा है'

English

Hearing the words of the intelligent Dantavakra, Sālwa, the foremost of speakers, said to the kings (25).

अध्याय 71

श्लोक 36

वनेषु च विराजन्ते पादपा वनशोभिनः ।असनाः सप्तपर्णाश्च कोविदाराश्च पुष्पिताः

vaneṣu ca virājante pādapā vanaśobhinaḥ | asanāḥ saptaparṇāśca kovidārāśca puṣpitāḥ

श्लोक 36–37 का हिन्दी अर्थ

वनकी शोभा बढ़ानेवाले असन, छितवन, कोविदार, वाणासन, निकुम्भ, प्रियक और स्वर्णक नामवाले वृक्ष वनोंमें फूलोंसे लदकर अधिक शोभा पा रहे हैं। केतकी (केवड़े)-के वृक्ष भी सब ओर खिले हुए हैं। सृमर (एक प्रकारके मृग) और उल्लू भी सर्वत्र सानन्द विचरते हैं

English

Hearing the words of the intelligent Dantavakra, Sālwa, the foremost of speakers, said to the kings (25).

अध्याय 71

श्लोक 37

इषुसाह्वा निकुम्भाश्च प्रियकाः स्वर्णकास्तथा ।सृमराः पेचकाश्चैव केतक्यश्च समन्ततः

iṣusāhvā nikumbhāśca priyakāḥ svarṇakāstathā | sṛmarāḥ pecakāścaiva ketakyaśca samantataḥ

अर्थ श्लोक 36 के साथ

अध्याय 71

श्लोक 38

व्रजेषु च विशेषेण गर्गरोद्गारहासिषु ।शरत्प्रकाशयोषेव गोष्ठेष्वटति रूपिणी

vrajeṣu ca viśeṣeṇa gargarodgārahāsiṣu | śaratprakāśayoṣeva goṣṭheṣvaṭati rūpiṇī

हिन्दी अर्थ

दूध-दहीके माटों या घड़ोंसे जो माखन आदि ढाले जाते हैं, वे ही जिनकी हँसी हैं, उन ब्रजों एवं गोषठोंमें तो यह शरदू-ऋतु मूर्तिमती सुन्दरी युवतीकी भाँति घूम रही है

अध्याय 71

श्लोक 39

नूनं त्रिदशभूयिष्ठं मेघकालसुखोषितम् ।पतत्त्रिकेतनं देवं बोधयन्ति दिवौकसः

nūnaṃ tridaśabhūyiṣṭhaṃ meghakālasukhoṣitam | patattriketanaṃ devaṃ bodhayanti divaukasaḥ

हिन्दी अर्थ

निश्चय ही देवतालोग इस समय देवश्रेष्ठ भगवान्‌ गरुडध्वजको, जो वर्षाकालमें सुखपूर्वक शयन कर चुके हैं, जगा रहे हैं

अध्याय 71

श्लोक 40

शरद्येवं सुसस्यायां प्राप्तायां प्रावृषः क्षये ।नीलचन्द्रार्कवर्णैश्च रचितं बहुभिर्द्विजैः

śaradyevaṃ susasyāyāṃ prāptāyāṃ prāvṛṣaḥ kṣaye | nīlacandrārkavarṇaiśca racitaṃ bahubhirdvijaiḥ

श्लोक 40–42 का हिन्दी अर्थ

वर्षा बीत जानेपर ऐसी सुन्दर खेतीसे सुशोभित शरदू-ऋतुका शुभागमन हुआ है। इस समय (मेघके समान) नीले, चन्द्रमाके प्रमान श्रेत तथा सूर्यके सदृश सुनहरे रंगवाले बहुत- पे पक्षियोंने जिसे बहुरंगा बना दिया है, जो विविध प्रकारके फलों और नूतन पत्लवोंसे घना हो रहा है और इसलिये जो इन्द्रधनुषसे युक्त श्याम मेघकी-सी शोभा धारण करता है, जिसके वृक्षोंकी एक-एक शाखा त्ररके समान जान पड़ती है, जो लता और वल्लरियोंसे भलीभाँति अलंकृत है, जिसका विशाल मूलभाग बहुत दूरतक फैला हुआ है तथा जो वायुके विस्तारसे पुशोभित होता है, वह गोवर्धन पर्वत ही हमारा देवता है। हम उसकी तथा इन गौओंकी विशेषरूपसे पूजा करें

English

Hearing the words of the intelligent Dantavakra, Sālwa, the foremost of speakers, said to the kings (25).

अध्याय 71

श्लोक 41

फलैः प्रवालैश्च घनमिन्द्रचापघनोपमम् ।भवनाकारविटपं लतापरममण्डितम्

phalaiḥ pravālaiśca ghanamindracāpaghanopamam | bhavanākāraviṭapaṃ latāparamamaṇḍitam

अर्थ श्लोक 40 के साथ

अध्याय 71

श्लोक 42

विशालमूलावनतं पवनाभोगमण्डितम् ।अर्चयामो गिरिं देवं गाश्चैव च विशेषतः

viśālamūlāvanataṃ pavanābhogamaṇḍitam | arcayāmo giriṃ devaṃ gāścaiva ca viśeṣataḥ

अर्थ श्लोक 40 के साथ

अध्याय 71

श्लोक 43

सावतंसैर्विषाणैश्च बर्हापीडैश्च दंशितैः ।घण्टाभिश्च प्रलम्बाभिः पुष्पैः शारदिकैस्तथा

sāvataṃsairviṣāṇaiśca barhāpīḍaiśca daṃśitaiḥ | ghaṇṭābhiśca pralambābhiḥ puṣpaiḥ śāradikaistathā

श्लोक 43–44 का हिन्दी अर्थ

5ध्याय: + ३३७ 'गायोंके सींगोंमें मुकुट और मोरपंखके समान बने हुए आभूषण बाँधे जायँ। उनके गलेमें बड़ी घंटियाँ लटका दी जायँँ और ब्रजके कल्याणके लिये शरदूमें सुलभ होनेवाले पुष्पोंद्वारा गौओंकी पूजा की जाय। साथ ही ' गिरियज्ञ' आरम्भ कर दिया जाय। देवतालोग इन्द्रकी पूजा करें और हमलोग गिरिराज गोवर्धनकी

English

Hearing the words of the intelligent Dantavakra, Sālwa, the foremost of speakers, said to the kings (25).

अध्याय 71

श्लोक 44

शिवाय गावः पूज्यन्तां गिरियज्ञः प्रवर्त्यताम् ।पूज्यतां त्रिदशैः शक्रो गिरिरस्माभिरिज्यताम्

śivāya gāvaḥ pūjyantāṃ giriyajñaḥ pravartyatām | pūjyatāṃ tridaśaiḥ śakro girirasmābhirijyatām

अर्थ श्लोक 43 के साथ

अध्याय 71

श्लोक 45

कारयिष्यामि गोयज्ञं बलादपि न संशयः ।यद्यस्ति मयि वः प्रीतिर्यदि वा सुहृदो वयम् ।गावो हि पूज्याः सततं सर्वेषां नात्र संशयः

kārayiṣyāmi goyajñaṃ balādapi na saṃśayaḥ | yadyasti mayi vaḥ prītiryadi vā suhṛdo vayam | gāvo hi pūjyāḥ satataṃ sarveṣāṃ nātra saṃśayaḥ

हिन्दी अर्थ

यदि आपलोगोंका मुझपर प्रेम है और यदि हमलोग एक- दूसरेके हितैषी सुहद्‌ हैं तो मैं आपके द्वारा हठ एवं बलपूर्वक गोयज्ञ कराऊँगा। गौएँ सदा ही सबके लिये पूजनीय हैं—इसमें संशय नहीं है

अध्याय 71

श्लोक 46

यदि साम्ना भवेत् प्रीतिर्भवतां वैभवाय च ।एतन्मम वचस्तथ्यं क्रियतामविचारितम्

yadi sāmnā bhavet prītirbhavatāṃ vaibhavāya ca | etanmama vacastathyaṃ kriyatāmavicāritam

हिन्दी अर्थ

यदि मेरे समझानेसे आपको प्रसन्नता होती हो तो आपलोग अपने ही वैभव (अभ्युदय)-के लिये मेरी इस सच्ची बातको बिना विचारे मान लें और इसके अनुसार कार्य करें

स्रोत: local proofread transcription: Sanskrit shlokas of the Harivamsa (Harivamsha, Vishnu and Bhavishya parvas) from sanskritdocuments.org. One chapter per adhyaya; verse numbers as printed in the source (restarting in each adhyaya). Appendix sections are not included. · प्राप्त 19/10/2026

धर्म ग्रंथ निःशुल्क और विज्ञापन-रहित है। Dharma Granth is free and has no ads. इसे ऐसा बनाए रखने में सहयोग करेंHelp keep it that way → How it is funded

शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पाठ-भेद एवं संशोधनVariants & corrections

पाठ-भेद टिप्पणी (Alternative Reading / Variant Notes):

Collated with BORI Critical Edition of Mahabharata Khilaparvan.