Harivamsha Purana
309
अध्याय 309 / 318

Parva 3, Adhyāya 126

47 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ47 श्लोक

अध्याय 309

श्लोक 1

वसुदेवोग्रसेनौ च वृद्धौ युद्धे सुनिर्वृतौ ।जराजरितसर्वाङ्गौ पलिताङ्गशिरोरुहौ

vasudevograsenau ca vṛddhau yuddhe sunirvṛtau | jarājaritasarvāṅgau palitāṅgaśiroruhau

हिन्दी अर्थ

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! वसुदेव और उग्रसेन बूढ़े होनेपर भी युद्धमें परम सुख माननेवाले थे। उनके सारे अड्भ जरासे जीर्ण हो गये थे, शरीरमें झुर्रियाँ पड़ गयी थीं और सिरके बाल सफेद हो गये थे

अध्याय 309

श्लोक 2

ज्ञानविज्ञानसम्पन्नौ राजमार्गविशारदौ ।युयुधाते महारङ्गे राक्षसेन दुरात्मना

jñānavijñānasampannau rājamārgaviśāradau | yuyudhāte mahāraṅge rākṣasena durātmanā

हिन्दी अर्थ

वे ज्ञान-विज्ञानसे सम्पन्न तथा राजमार्ग ( क्षत्रियधर्म—युद्ध) -में चतुर थे। ये दोनों उस महासमरमें दुरात्मा राक्षस हिडिम्बके साथ युद्ध करने लगे

अध्याय 309

श्लोक 3

शरैरनेकसाहस्रैरर्दयामासतू रणे ।राक्षसेन्द्रं दुरात्मानं हिडिम्बं पुरुषादकम्

śarairanekasāhasrairardayāmāsatū raṇe | rākṣasendraṃ durātmānaṃ hiḍimbaṃ puruṣādakam

हिन्दी अर्थ

उन दोनोंने अनेक सहस्त्र बाणोंद्वारा रणभूमिमें नरभक्षी राक्षसराज दुरात्मा हिडिम्बको पीडित कर दिया

अध्याय 309

श्लोक 4

हिडिम्बो राक्षसेन्द्रस्तु भक्षयन्सर्वतो नरान् ।अतिप्रवृद्धो दुष्टात्मा लम्बबाहुर्महाहनुः

hiḍimbo rākṣasendrastu bhakṣayansarvato narān | atipravṛddho duṣṭātmā lambabāhurmahāhanuḥ

श्लोक 4–5 का हिन्दी अर्थ

राक्षसराज हिडिम्ब सब ओरसे मनुष्योंको खाता हुआ अत्यन्त दृष्ट-पुष्ट हो गया था। उसकी भुजाएँ बड़ी- बड़ी और ठोड़ी विशाल थी। वह बड़ा दुष्टात्मा था। उसका पेट लम्बा और नेत्र विकराल थे। सिरके बाल पिंगल वर्णके दिखायी देते थे। उसकी आँखें विकृत थीं। नासिका बाजकी चोंचके समान जान पड़ती थी। वह महाभयंकर और विशाल भुजाओंसे युक्त था। उसके रोम ऊपरको उठे हुए थे

अध्याय 309

श्लोक 5

लम्बोदरो विरूपाक्षः पिङ्गकेशो विलोचनः ।श्येननासो महारौद्र ऊर्ध्वरोमा महाभुजः

lambodaro virūpākṣaḥ piṅgakeśo vilocanaḥ | śyenanāso mahāraudra ūrdhvaromā mahābhujaḥ

अर्थ श्लोक 4 के साथ

अध्याय 309

श्लोक 6

पर्वताकारवर्ष्मा च दीर्घदंष्ट्रः शिवाननः ।लम्बोदरो दीर्घदन्तो जगद्ग्रासपरस्तथा

parvatākāravarṣmā ca dīrghadaṃṣṭraḥ śivānanaḥ | lambodaro dīrghadanto jagadgrāsaparastathā

हिन्दी अर्थ

शरीर पर्वताकार दिखायी देता था। दाढ़ें बड़ी-बड़ी थीं और मुँह गीदड़के समान प्रतीत होता था। लम्बे पेट और बड़े-बड़े दाँतोंवाला वह राक्षस सम्पूर्ण जगत्‌को अपना ग्रास बना लेनेके लिये तत्पर जान पड़ता था

अध्याय 309

श्लोक 7

उत्तुङ्गांसो महोरस्को दीर्घग्रीवो गजोपमः ।भक्षयन् मांसपिटकं पिबञ्शोणितसञ्चयम्

uttuṅgāṃso mahorasko dīrghagrīvo gajopamaḥ | bhakṣayan māṃsapiṭakaṃ pibañśoṇitasañcayam

हिन्दी अर्थ

उसके कंधे ऊँचे, छाती चौड़ी और गर्दन लम्बी थी। वह देखनेमें हाथी-जैसा जान पड़ता था। वह पिटारी भर मांस खाता और संचित करके रखे हुए घड़ों रक्त पी जाता था

अध्याय 309

श्लोक 8

गजान् नागैः समाहत्य हयैरश्वान् नृपोत्तम ।रथान् रथैः समाहृत्य सादिनः सादिभिस्तथा

gajān nāgaiḥ samāhatya hayairaśvān nṛpottama | rathān rathaiḥ samāhṛtya sādinaḥ sādibhistathā

हिन्दी अर्थ

नृपश्रेष्ठ ! वह हाथियोंसे हाथियोंको, घोड़ोंसे घोड़ोंको, रथोंसे रथोंको और सवारोंसे सवारोंको मारकर कुचल देता था

अध्याय 309

श्लोक 9

मनुष्यान् स पुरो दृष्ट्वा नास्यग्रासं चकार सः ।कांश्चिद्धत्वा महाराज वृष्णिपालान्समन्ततः

manuṣyān sa puro dṛṣṭvā nāsyagrāsaṃ cakāra saḥ | kāṃściddhatvā mahārāja vṛṣṇipālānsamantataḥ

श्लोक 9–10 का हिन्दी अर्थ

वह मनुष्योंको अपने सामने देखकर उन्हें नासिकाका ग्रास बना लेता था—नसकी तरह श्वासमार्गसे भीतर खींच लेता था। महाराज! नरभक्षी हिडिम्बने सब ओरसे आक्रमण करके कुछ वृष्णिपालक योद्धाओंको मारकर सहसा अपना आहार बना लिया। उस विकराल रूपधारी राक्षसने जिन्हें सामने देखा, उन्हींका वध कर डाला

अध्याय 309

श्लोक 10

भक्षयामास सहसा हिडिम्बः पुरुषादकः ।यान् पश्यन् पुरतो रक्षस्ताञ्जघान विरूपधृक्

bhakṣayāmāsa sahasā hiḍimbaḥ puruṣādakaḥ | yān paśyan purato rakṣastāñjaghāna virūpadhṛk

अर्थ श्लोक 9 के साथ

अध्याय 309

श्लोक 11

भक्षयन्नपरान् वृष्णीन्यादवान्राक्षसेश्वरः ।चिक्षेप सहसा कांश्चिद्धिडिम्बः पुरुषादकः

bhakṣayannaparān vṛṣṇīnyādavānrākṣaseśvaraḥ | cikṣepa sahasā kāṃściddhiḍimbaḥ puruṣādakaḥ

हिन्दी अर्थ

पुरुषभक्षी राक्षसराज हिडिम्बने कितने ही वृष्णियों और यादवोंको खाते हुए उनमेंसे कुछको उठाकर सहसा दूर फेंक दिया

अध्याय 309

श्लोक 12

अन्तकाले यथा क्रुद्धो रुद्रः प्राणभृतो नृप ।क्षणेनैकेन सर्वांस्तान् भक्षयामास राक्षसः

antakāle yathā kruddho rudraḥ prāṇabhṛto nṛpa | kṣaṇenaikena sarvāṃstān bhakṣayāmāsa rākṣasaḥ

हिन्दी अर्थ

कशततमो 5ध्याय: + १३५७ नरेथ्रर! जैसे कुपित हुए रुद्रदेव अन्तकालमें प्राणियोंका संहार कर डालते हैं, उसी प्रकार उस राक्षसने एक ही क्षणमें उन सबका भक्षण कर लिया

अध्याय 309

श्लोक 13

केचिद् भीता दिशः प्रापुर्वृष्णयो वीर्यशालिनः ।केचित् तु भक्षितास्तेन रक्षसा वृष्णिपुङ्गवाः

kecid bhītā diśaḥ prāpurvṛṣṇayo vīryaśālinaḥ | kecit tu bhakṣitāstena rakṣasā vṛṣṇipuṅgavāḥ

हिन्दी अर्थ

कुछ पराक्रमशाली वृष्णिवंशी भयभीत हो विभिन्न दिशाओंमें भाग गये तथा कितने ही वृष्णिवंशके श्रेष्ठ योद्धा उस राक्षसके आहार बन गये

अध्याय 309

श्लोक 14

कुम्भकर्णो यथा राजन् भक्षयामास वानरान् ।निःशेषं वृष्णिसैन्यं तु चकार पुरुषादकः

kumbhakarṇo yathā rājan bhakṣayāmāsa vānarān | niḥśeṣaṃ vṛṣṇisainyaṃ tu cakāra puruṣādakaḥ

हिन्दी अर्थ

राजन्‌ ! जैसे कुम्भकर्ण वानरोंको खा गया था। उसी प्रकार उस नरभक्षी निशाचरने वृष्णिवंशकी सेनाको समाप्त-सी कर दिया

अध्याय 309

श्लोक 15

एतस्मिन्नन्तरे क्रुद्धौ वृद्धौ यादवपुङ्गवौ ।धनुर्गृह्य महाघोरं राक्षसस्य पुरः स्थितौ

etasminnantare kruddhau vṛddhau yādavapuṅgavau | dhanurgṛhya mahāghoraṃ rākṣasasya puraḥ sthitau

श्लोक 15–18 का हिन्दी अर्थ

इसी बीचमें बूढ़े यादवशिरोमणि वसुदेव और उग्रसेन कुपित हो महाभयंकर धनुष हाथमें लेकर उस राक्षसके सामने खड़े हुए, मानो क्रोधमें भरे हुए । सिंहके समक्ष दो अत्यन्त वृद्ध मृग आ गये हैं। उस समय वह महाराक्षस मुँह बाकर उन दोनों बूढ़ोंको खा जानेकी इच्छासे उनकी ओर दौड़ा। उसके नेत्र बड़े भयंकर थे। वह अपने खुले हुए मुखसे पाताल-तलके समान प्रतीत होता था। नरेश्वर! तदनन्तर मनुष्यके शरीरको बारम्बार चबाता हुआ वह राक्षस उन दोनोंकी ओर वेगपूर्वक दौड़ा। उस समय उन युद्धश्रेष्ठ वीरोंने अपने बाणोंद्वारा हिडिम्बके महाभयंकर खुले हुए मुखको, जो मुँह बाये हुए यमराजके समान जान पड़ता था, अपने बाणोंसे भर दिया

अध्याय 309

श्लोक 16

यथा क्रुद्धस्य सिंहस्य मृगौ वृद्धतमाविव ।व्यादायास्यं महारक्षस्तौ वृद्धावभ्यधावत

yathā kruddhasya siṃhasya mṛgau vṛddhatamāviva | vyādāyāsyaṃ mahārakṣastau vṛddhāvabhyadhāvata

अर्थ श्लोक 15 के साथ

अध्याय 309

श्लोक 17

चिखादिषुर्विरूपाक्षः पातालतलसन्निभः ।ततो रक्षः पर्यधावत् खादत् खादत्कलेवरम्

cikhādiṣurvirūpākṣaḥ pātālatalasannibhaḥ | tato rakṣaḥ paryadhāvat khādat khādatkalevaram

अर्थ श्लोक 15 के साथ

अध्याय 309

श्लोक 18

पूरयामासतुर्वीरौ शरैर्यदुवृषौ नृप ।हिडिम्बस्य महाघोरं व्यादितास्यमिवान्तकम्

pūrayāmāsaturvīrau śarairyaduvṛṣau nṛpa | hiḍimbasya mahāghoraṃ vyāditāsyamivāntakam

अर्थ श्लोक 15 के साथ

अध्याय 309

श्लोक 19

सर्वांस्तान् वारयामास देवशत्रुर्विरूपधृक् ।धावति स्म ततो रक्षो व्यादितास्यं भयानकम्

sarvāṃstān vārayāmāsa devaśatrurvirūpadhṛk | dhāvati sma tato rakṣo vyāditāsyaṃ bhayānakam

हिन्दी अर्थ

तब उस विकराल रूपधारी देवद्रोही भयानक राक्षसने उन सब बाणोंका निवारण कर दिया और पुन: मुँह फैलाकर उनपर धावा किया

अध्याय 309

श्लोक 20

तयोर्गृहीत्वा धनुषी बभञ्ज युधि सत्वरम् ।बाहू प्रसार्य दुष्टात्मा राक्षसो विकृताननः

tayorgṛhītvā dhanuṣī babhañja yudhi satvaram | bāhū prasārya duṣṭātmā rākṣaso vikṛtānanaḥ

श्लोक 20–21 का हिन्दी अर्थ

उसने उन दोनोंके धनुष छीनकर तुरंत उस युद्धस्थलमें ही तोड़ डाले; फिर वह विकराल मुखवाला दुष्टात्मा राक्षस अपनी दोनों बाहें फैलाकर वृद्धसेवी भूपाल राजा वसुदेवको उस राजसमाजमें ही पकड़नेकी चेष्टा करने लगा। वह राक्षसोंमें श्रेष्ठ समझा जाता था

अध्याय 309

श्लोक 21

वसुदेवं महीपालं राजानं वृद्धसेविनम् ।ग्रहीतुं राक्षसश्रेष्ठो यतते नृपसंसदि

vasudevaṃ mahīpālaṃ rājānaṃ vṛddhasevinam | grahītuṃ rākṣasaśreṣṭho yatate nṛpasaṃsadi

अर्थ श्लोक 20 के साथ

अध्याय 309

श्लोक 22

एष वां भक्षयिष्यामि वसुदेवं त्वया सह ।उग्रसेन किमर्थ त्वं तिष्ठसे मत्पुरोगमः

eṣa vāṃ bhakṣayiṣyāmi vasudevaṃ tvayā saha | ugrasena kimartha tvaṃ tiṣṭhase matpurogamaḥ

हिन्दी अर्थ

हिडिम्ब बोला—उग्रसेन! तुम किस लिये मेरे सामने खड़े हो। मैं अभी तुम दोनोंको खा जाऊँगा। तुम्हारे साथ वसुदेवको भी चट कर जाऊँगा

अध्याय 309

श्लोक 23

आगच्छ प्रविशास्यं मे ग्रासभूतौ तु वां मम ।विधिना निर्मितो वृद्धो वसुदेवो हरेः पिता

āgaccha praviśāsyaṃ me grāsabhūtau tu vāṃ mama | vidhinā nirmito vṛddho vasudevo hareḥ pitā

श्लोक 23–24 का हिन्दी अर्थ

आओ ! मेरे मुखमें प्रवेश करो । तुम दोनों मेरे ग्रासस्वरूप हो। जिसे विधाताने श्रीकृष्णका पिता बना दिया है, वह बूढ़ा वसुदेव भूखसे पीड़ित है, परिश्रमसे कष्ट पाता है और युद्धमें शीघ्रतापूर्वक पराक्रम प्रकट करता है। अब तुम दोनों मेरे मुँहसे छूटकर नहीं जा सकते, तुरंत ही मेरे मुखके भीतर प्रवेश करो

अध्याय 309

श्लोक 24

बुभुक्षितः श्रमार्तश्च युद्धे त्वरितविक्रमः ।मन्मुखान्नैव गच्छेतां प्रविशेतां त्वरान्वितौ

bubhukṣitaḥ śramārtaśca yuddhe tvaritavikramaḥ | manmukhānnaiva gacchetāṃ praviśetāṃ tvarānvitau

अर्थ श्लोक 23 के साथ

अध्याय 309

श्लोक 25

युवयोः शोणितं पीत्वा तृप्तिं यास्यामि निर्वृतः ।खादामि च पुनर्मांसं वृद्धयोर्युवयोः सुखम्

yuvayoḥ śoṇitaṃ pītvā tṛptiṃ yāsyāmi nirvṛtaḥ | khādāmi ca punarmāṃsaṃ vṛddhayoryuvayoḥ sukham

हिन्दी अर्थ

तुम दोनोंका रक्त पीकर मैं तृप्त होऊँगा और संतोष प्राप्त करूँगा। इसके बाद तुम दोनों वृद्धोंके मांसको मैं सुखपूर्वक खाऊँगा

अध्याय 309

श्लोक 26

इति ब्रुवंस्तथा रक्षो व्यादितास्यो महाहनुः ।धावति स्म तदा क्षिप्रं हिडिम्बो राक्षसेश्वरः

iti bruvaṃstathā rakṣo vyāditāsyo mahāhanuḥ | dhāvati sma tadā kṣipraṃ hiḍimbo rākṣaseśvaraḥ

हिन्दी अर्थ

ऐसा कहता हुआ विशाल ठोड़ीवाला राक्षसराज नेशाचर हिडिम्ब उस समय मुँह बाकर उनकी ओर गौड़ा

अध्याय 309

श्लोक 27

वसुदेवोग्रसेनौ च भीतौ विप्रेक्ष्य सर्वतः ।दिशोऽभ्यभजतां राजन्निःशस्त्रौ वृष्णिपुङ्गवौ

vasudevograsenau ca bhītau viprekṣya sarvataḥ | diśo'bhyabhajatāṃ rājanniḥśastrau vṛṣṇipuṅgavau

हिन्दी अर्थ

राजन्‌ ! तब शस्त्रहीन हुए वृष्णिशिरोमणि ससुदेव और उग्रसेन भयभीत हो सब ओर देखकर विभिन्न दिशाओंमें भागने लगे

अध्याय 309

श्लोक 28

एतस्मिन्नन्तरे दृष्ट्वा बलभद्रः प्रतापवान् ।दृष्ट्वा च तौ तथाभूतौ वसुदेवोग्रसेनकौ

etasminnantare dṛṣṭvā balabhadraḥ pratāpavān | dṛṣṭvā ca tau tathābhūtau vasudevograsenakau

श्लोक 28–29 का हिन्दी अर्थ

इसी बीचमें प्रतापी लभद्रने वसुदेव और उग्रसेनको वैसी अवस्थामें पड़ा देख, जूझते हुए हंसका भार बलवान्‌ श्रीकृष्णको सौंप देया और स्वयं वे उस दुरात्मा राक्षसके बीचमें आकर स॒ प्रकार बोले-

अध्याय 309

श्लोक 29

वासुदेवे समादिश्य हंसं युध्यन्तमीश्वरे ।निर्गत्य चान्तरं तस्य राक्षसस्य दुरात्मनः

vāsudeve samādiśya haṃsaṃ yudhyantamīśvare | nirgatya cāntaraṃ tasya rākṣasasya durātmanaḥ

अर्थ श्लोक 28 के साथ

अध्याय 309

श्लोक 30

मा कृथाः साहसं रक्षो मुञ्चैतौ राजसत्तमौ ।स्थितोऽस्मि युध्यतां रक्षो मया शत्रूञ्जिघांसता

mā kṛthāḥ sāhasaṃ rakṣo muñcaitau rājasattamau | sthito'smi yudhyatāṃ rakṣo mayā śatrūñjighāṃsatā

श्लोक 30–32 का हिन्दी अर्थ

ओ राक्षस! ऐसा साहस न कर। इन दोनों भूपशिरोमणियोंको छोड़ दे । ं खड़ा हूँ। शत्रुओंके वधकी इच्छासे यहाँ आये हुए मुझ लभद्रके साथ तू युद्ध कर। केवल मैं ही तुझे मार डालूँगा, यह क्या तेरी विभीषिका है !' इस तरह बोलते ुए हलधरकी बात सुनकर हिडिम्बने उस महासमरमें ससुदेव और उग्रसेनको तो छोड़ दिया और सोचा-*यह हहानू दुष्ट है, अत: पहले इसीको खा जाऊँ' ऐसा वचारकर पूर्ववत्‌ मुँह फैलाये हुए उसने बलभद्रपर वा किया

अध्याय 309

श्लोक 31

अहमेव हनिष्ये त्वां का चेयं तव भीषिका ।इति ब्रुवाणं हलिनं तौ विसृज्य महारणे

ahameva haniṣye tvāṃ kā ceyaṃ tava bhīṣikā | iti bruvāṇaṃ halinaṃ tau visṛjya mahāraṇe

अर्थ श्लोक 30 के साथ

अध्याय 309

श्लोक 32

महानयमसौ दुष्टो भक्षयाम्येनमग्रतः ।विदार्य पूर्ववद् वक्त्रं बलभद्रमुपाद्रवत्

mahānayamasau duṣṭo bhakṣayāmyenamagrataḥ | vidārya pūrvavad vaktraṃ balabhadramupādravat

अर्थ श्लोक 30 के साथ

अध्याय 309

श्लोक 33

विसृज्य सशरं चापं राक्षसस्य पुरः स्थितः ।मुष्टिं प्रगृह्य बलवान्स्फोटयन् बाहुमुत्तमम्

visṛjya saśaraṃ cāpaṃ rākṣasasya puraḥ sthitaḥ | muṣṭiṃ pragṛhya balavānsphoṭayan bāhumuttamam

हिन्दी अर्थ

बलवान्‌ बलभद्र बाणसहित पनुषको त्यागकर अपनी उत्तम भुजापर ताल ठॉंकते हुए स राक्षसके आगे मुट्ठी बाँधकर खड़े हो गये

अध्याय 309

श्लोक 34

हिडिम्बस्त्वथ दुष्टात्मा मुष्टिं कृत्वा भयानकम् ।जघान वक्षो रामस्य व्यादितास्य इवान्तकः

hiḍimbastvatha duṣṭātmā muṣṭiṃ kṛtvā bhayānakam | jaghāna vakṣo rāmasya vyāditāsya ivāntakaḥ

हिन्दी अर्थ

ष्ठात्मा हिडिम्बने भी मुँह बाये हुए यमराजकी भाँति पयंकर मुट्टी बाँधकर बलरामके वक्ष:स्थलपर प्रहार किया

अध्याय 309

श्लोक 35

कुद्धोऽथ बलभद्रस्तु मुष्टिना तेन ताडितः ।जघान मुष्टिना तेन राक्षसेशमनिन्दितः

kuddho'tha balabhadrastu muṣṭinā tena tāḍitaḥ | jaghāna muṣṭinā tena rākṣaseśamaninditaḥ

हिन्दी अर्थ

उसके मुक्केकी मार खाकर अनिन्द्य [लशाली बलभद्रजी कुपित हो उठे। फिर उन्होंने भी स राक्षसराजको मुक्केसे मारा

अध्याय 309

श्लोक 36

मुष्टियुद्धं समभवन्नरराक्षसवीरयोः ।युद्ध्यतोर्युद्धरङ्गेऽथ नरराक्षससिंहयोः

muṣṭiyuddhaṃ samabhavannararākṣasavīrayoḥ | yuddhyatoryuddharaṅge'tha nararākṣasasiṃhayoḥ

श्लोक 36–39 का हिन्दी अर्थ

फिर तो उन नर गौर निशाचर-वीरोंमें मुक्केसे ही युद्ध होने लगा। युद्धकी ड्रभूमिमें जूझते हुए नरसिंह बलभद्र और राक्षससिंह हैडिम्बके मुक्कोंका भयंकर चट-चट शब्द प्रकट होने गा। तदनन्तर राक्षसराज हिडिम्बने समराद्भणमें बलरामके क्ष:स्थलपर मुक्केसे प्रहार किया, मानो देवराज इन्द्रने कसी पर्वतपर वज़से आघात किया हो। इसके बाद गाक्षात्‌ बलवान्‌ बलरामने यत्रपूर्वक मुट्ठी बाँधकर वद्रोही हिडिम्बके वक्ष:स्थलपर बड़े जोरसे आघात कया । तत्पश्चात्‌ उन्होंने उस राक्षसके मुँहपर दो तमाचे ड़ दिये

अध्याय 309

श्लोक 37

तयोश्चटचटाशब्दः प्रादुरासीद् भयानकः ।अथ राक्षसराजस्तु मुष्टिना राममाहवे

tayoścaṭacaṭāśabdaḥ prādurāsīd bhayānakaḥ | atha rākṣasarājastu muṣṭinā rāmamāhave

अर्थ श्लोक 36 के साथ

अध्याय 309

श्लोक 38

जघान वक्षोदेशे तु वज्रेणेव पुरन्दरः ।अथ रामो बली साक्षान्मुष्टिं संवर्त्य यत्नतः

jaghāna vakṣodeśe tu vajreṇeva purandaraḥ | atha rāmo balī sākṣānmuṣṭiṃ saṃvartya yatnataḥ

अर्थ श्लोक 36 के साथ

अध्याय 309

श्लोक 39

हिडिम्बं ताडयामास वक्षस्यमरविद्विषम् ।तलाभ्यामथ रामस्तु वक्त्रे हत्वा स राक्षसम्

hiḍimbaṃ tāḍayāmāsa vakṣasyamaravidviṣam | talābhyāmatha rāmastu vaktre hatvā sa rākṣasam

अर्थ श्लोक 36 के साथ

अध्याय 309

श्लोक 40

आहतस्तलघातेन हिडिम्बो राक्षसेश्वरः ।जानुभ्यामपतद् भूमौ गतासुर्वीरराक्षसः

āhatastalaghātena hiḍimbo rākṣaseśvaraḥ | jānubhyāmapatad bhūmau gatāsurvīrarākṣasaḥ

हिन्दी अर्थ

उनके तमाचेकी मार खाकर वीर नेशाचर राक्षसराज हिडिम्ब प्राणहीन-सा होकर घुटनोंके लल पृथ्वीपर गिर पड़ा

अध्याय 309

श्लोक 41

तत उत्पत्य रामस्तु दोर्भ्यां सङ्गृह्य राक्षसम् ।आदाय बहुवेगेन भ्रामयित्वा पदात्पदम्

tata utpatya rāmastu dorbhyāṃ saṅgṛhya rākṣasam | ādāya bahuvegena bhrāmayitvā padātpadam

श्लोक 41–43 का हिन्दी अर्थ

पतसाजद्लाय, ने ९२५६ फिर बलरामजीने उछलकर उस राक्षसको दोनों थोंसे पकड़ लिया और उसे उठाकर पग-पगपर बड़े गसे घुमाया। इस तरह अपना बल दिखाते हुए लरामजी देरतक उसे घुमाते रहे। फिर सब लोगोंके व्रते-देखते हलधरने उस राक्षसराजको उछालकर हाँसे दो कोस दूर फेंक दिया। इस प्रकार राक्षस- तर हिंडिम्ब प्राणशून्य होकर उस स्थानसे दूर निकल था *

अध्याय 309

श्लोक 42

व्याविध्यत् सुचिरं रामो दर्शयन्नात्मनो बलम् ।उत्क्षिप्य राक्षसेन्द्रं तं सर्वलोकस्य पश्यतः

vyāvidhyat suciraṃ rāmo darśayannātmano balam | utkṣipya rākṣasendraṃ taṃ sarvalokasya paśyataḥ

अर्थ श्लोक 41 के साथ

अध्याय 309

श्लोक 43

गव्यूतिमात्रं चिक्षेप ततो देशाद्धलायुधः ।गतासू राक्षसश्रेष्ठस्ततो देशान्निराक्रमत्

gavyūtimātraṃ cikṣepa tato deśāddhalāyudhaḥ | gatāsū rākṣasaśreṣṭhastato deśānnirākramat

अर्थ श्लोक 41 के साथ

अध्याय 309

श्लोक 44

ये केचिद् राक्षसास्तत्र हतशेषा महारणे ।बलभद्रात् ततो भीता जग्मुश्चैवं दिशो दश

ye kecid rākṣasāstatra hataśeṣā mahāraṇe | balabhadrāt tato bhītā jagmuścaivaṃ diśo daśa

हिन्दी अर्थ

उस महासमरमें जो कोई भी राक्षस हाँ मरनेसे बचे हुए थे, वे बलभद्रजीसे भयभीत हो हाँसे दसों दिशाओंमें भाग गये

अध्याय 309

श्लोक 45

अथांशुमाली भगवान् दिनेशः संहृत्य तेजांसि सहस्ररश्मिः ।अस्तं ययौ चक्षुरपि प्रजानामीषत्तमश्चापि समाविवेश

athāṃśumālī bhagavān dineśaḥ saṃhṛtya tejāṃsi sahasraraśmiḥ | astaṃ yayau cakṣurapi prajānāmīṣattamaścāpi samāviveśa

हिन्दी अर्थ

तदनन्तर हस्रों किरणोंसे सुशोभित दिनके स्वामी अंशुमाली गवान्‌ सूर्य अपने तेज समेटकर अस्ताचलको चले पे और प्रजाजनोंके नेत्रोंमें कुछ-कुछ अन्धकारका मावेश हो गया

अध्याय 309

श्लोक 46

तस्मिन् प्रविष्टेऽथ समुद्रतोयं प्रजापतौ विश्वमुखे जगद्गुरौ ।नक्षत्रनाथः समुपाजगाम सन्ध्यातमोऽपि व्यनशन्नृपोत्तम

tasmin praviṣṭe'tha samudratoyaṃ prajāpatau viśvamukhe jagadgurau | nakṣatranāthaḥ samupājagāma sandhyātamo'pi vyanaśannṛpottama

हिन्दी अर्थ

नृपश्रेष्ठ जनमेजय! सम्पूर्ण श्रके मुखस्वरूप प्रजापालक जगदूगुरु सूर्यदेवके मुद्रके जलमें प्रवेश कर जानेपर नक्षत्रनाथ चन्द्रमाका र्य हुआ, जिससे संध्याकालका अन्धकार भी नष्ट गया

अध्याय 309

श्लोक 47

प्रभातकाले नृप सत्तमो रणो गोवर्धने किन्नरगीतनादिते ।इति ब्रुवन्तो नृपसत्तमास्तदा व्युपारमंस्तत्र रणोत्सवे नृप

prabhātakāle nṛpa sattamo raṇo govardhane kinnaragītanādite | iti bruvanto nṛpasattamāstadā vyupāramaṃstatra raṇotsave nṛpa

हिन्दी अर्थ

जनमेजय! उस समय हंसकी सेनामें श्रेष्ठ नरेश थे, वे यह कहते हुए वहाँ समरोत्सवसे रत हो गये कि 'राजन्‌! कल प्रात:कालका युद्ध न्नरोंके गीतसे गूँजते हुए गोवर्धनपर्वतपर हो तो अच्छा गा' (ऐसा कहकर वे सब नरेश वहाँसे भागकर वर्धनपर्वतपर चले गये)

स्रोत: local proofread transcription: Sanskrit shlokas of the Harivamsa (Harivamsha, Vishnu and Bhavishya parvas) from sanskritdocuments.org. One chapter per adhyaya; verse numbers as printed in the source (restarting in each adhyaya). Appendix sections are not included. · प्राप्त 19/10/2026

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शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पाठ-भेद एवं संशोधनVariants & corrections

पाठ-भेद टिप्पणी (Alternative Reading / Variant Notes):

Collated with BORI Critical Edition of Mahabharata Khilaparvan.