Harivamsha Purana
308
अध्याय 308 / 318

Parva 3, Adhyāya 125

27 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ27 श्लोक

अध्याय 308

श्लोक 1

सात्यकिडिम्भकयोः युद्धं युद्धं चक्रतुरत्यर्थं ततो डिम्भकसात्यकी ।तावुभौ बलिनौ वीरौ विख्यातौ क्षत्रियेषु च

sātyakiḍimbhakayoḥ yuddhaṃ yuddhaṃ cakraturatyarthaṃ tato ḍimbhakasātyakī | tāvubhau balinau vīrau vikhyātau kṣatriyeṣu ca

हिन्दी अर्थ

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! तदनन्तर डिम्भक _ सात्यकि अत्यन्त घोर युद्ध करने लगे। वे दोनों वान्‌ वीर क्षत्रियोंमें विख्यात थे

अध्याय 308

श्लोक 2

कृतश्रमौ महायुद्धे सततं वृद्धसेविनौ ।सात्यकिर्दशभिर्वीरो डिम्भकं वेदपारगम्

kṛtaśramau mahāyuddhe satataṃ vṛddhasevinau | sātyakirdaśabhirvīro ḍimbhakaṃ vedapāragam

श्लोक 2–4 का हिन्दी अर्थ

उन्होंने महायुद्धमें परिश्रम किया था। वे दोनों सदा वृद्ध पुरुषोंका न करनेवाले थे। वीर सात्यकिने वेदोंके पारड़त न्‌ डिम्भकके स्तन, मुख और छातीमें दस पैने से प्रहार किया। उस बलवान्‌ वीरके द्वारा घायल ग गये क्षत्रियशिरोमणि डिम्भकने जिसे युद्धमें अपने कमपर बड़ा गर्व था, सात्यकिको पाँच हजार नाराचोंद्वारा पहुँचायी, परंतु वृष्णिवीर सात्यकिने उन नाराचोंको में ही गर्जना करके तथा बोलकर हुंकारमात्रसे ही डत कर दिया

अध्याय 308

श्लोक 3

अविध्यन्निशितैर्बाणैः स्तने वक्त्रे तथोरसि ।स तेन विद्धो बलिना डिम्भकः क्षत्रियोत्तमः

avidhyanniśitairbāṇaiḥ stane vaktre tathorasi | sa tena viddho balinā ḍimbhakaḥ kṣatriyottamaḥ

अर्थ श्लोक 2 के साथ

अध्याय 308

श्लोक 4

नाराचैः पञ्चसाहस्रैर्विव्याध युधि गर्वितः ।तानन्तरे वृष्णिवीरो निषिद्धन् निनदन् ब्रुवन्

nārācaiḥ pañcasāhasrairvivyādha yudhi garvitaḥ | tānantare vṛṣṇivīro niṣiddhan ninadan bruvan

अर्थ श्लोक 2 के साथ

अध्याय 308

श्लोक 5

अथ क्रुद्धो नृपवरो विद्धः सप्तभिराशुगैः ।पुनः शतसहस्रेण प्रत्यविध्यत सात्यकिम्

atha kruddho nṛpavaro viddhaḥ saptabhirāśugaiḥ | punaḥ śatasahasreṇa pratyavidhyata sātyakim

हिन्दी अर्थ

तब सात शीघ्रगामी बाणोंसे ल होकर कुपित हुए नृपश्रेष्ठ डिम्भकने पुन: एक तर बाणोंसे सात्यकिको क्षत-विक्षत कर दिया

अध्याय 308

श्लोक 6

सात्यकिस्त्वथ विक्रान्तो धनुश्चिच्छेद तस्य तत् ।अर्धचन्द्रेण तीक्ष्णेन डिम्भकस्य स यादवः

sātyakistvatha vikrānto dhanuściccheda tasya tat | ardhacandreṇa tīkṣṇena ḍimbhakasya sa yādavaḥ

हिन्दी अर्थ

थ्रात्‌ पराक्रमी यादव वीर सात्यकिने एक तीखे चन्द्राकार बाणसे डिम्भकके उस धनुषकों काट [

अध्याय 308

श्लोक 7

आजघ्ने डिम्भको वीरश्चापमादाय चापरम् ।क्षुरप्रेणाथ रौद्रेण तैलधौतेन विक्रमी

ājaghne ḍimbhako vīraścāpamādāya cāparam | kṣurapreṇātha raudreṇa tailadhautena vikramī

हिन्दी अर्थ

तब पराक्रमी वीर डिम्भकने दूसरा धनुष र तेलसे धुले हुए भयंकर क्षुरप्रके द्वारा सात्यकिको । चोट पहुँचायी

अध्याय 308

श्लोक 8

स तेन विद्धो बाणेन वमञ्छोणितकं नृप ।अतीव शुशुभे राजन् वसन्ते किंशुको यथा

sa tena viddho bāṇena vamañchoṇitakaṃ nṛpa | atīva śuśubhe rājan vasante kiṃśuko yathā

हिन्दी अर्थ

राजन्‌ ! उस बाणसे घायल हो -वमन करते हुए सात्यकि वसन्तमें खिले हुए शके समान बड़ी शोभा पाने लगे

अध्याय 308

श्लोक 9

धनुश्चिच्छेद भूयस्तु गृहीतं यत्पुनर्महत् ।ततोऽन्यद् धनुरादाय डिम्भको यादवेश्वरम्

dhanuściccheda bhūyastu gṛhītaṃ yatpunarmahat | tato'nyad dhanurādāya ḍimbhako yādaveśvaram

श्लोक 9–14 का हिन्दी अर्थ

तब उन्होंने डिम्भकके उस विशाल धनुषको काट डाला, को उसने दुबारा हाथमें लिया था । तदनन्तर डिम्भकने दूसरा धनुष हाथमें लेकर समस्त क्षत्रियोंके देखते- ते यादवेश्वर सात्यकिको पैने बाणोंसे घायल करना म्भ किया। सात्यकिने युद्धस्थलमें दुरात्मा डिम्भकके अत्यन्त भयंकर धनुषको तीखे पंखवाले बाणसे पुन: डाला। राजेन्द्र! फिर नृपश्रेष्ठ डिम्भकने तुरंत दूसरा धनुष र उसके द्वारा सात्यकिको पुन: बींधना आरम्भ किया। धिराज जनमेजय ! इस प्रकार सात्यकिने सब क्षत्रियोंके ने-देखते डिम्भकके एक सौ दस धनुष काटकर जोरसे गर्जना की । तब डिम्भक और सात्यकि दोनों अपने धनुषोंको त्यागकर अत्यन्त भयंकर खड्ग में ले परस्पर युद्धके लिये उपस्थित हुए। वे दोनों खड्गयुद्धके ज्ञाताओंमें श्रेष्ठ थे

अध्याय 308

श्लोक 10

जघान निशितैर्बाणैः सर्वक्षत्रस्य पश्यतः ।स धनुः पुनरत्युग्रं चिच्छेद युधि सात्यकिः

jaghāna niśitairbāṇaiḥ sarvakṣatrasya paśyataḥ | sa dhanuḥ punaratyugraṃ ciccheda yudhi sātyakiḥ

अर्थ श्लोक 9 के साथ

अध्याय 308

श्लोक 11

शरेण तीक्ष्णपुङ्खेन डिम्भकस्य दुरात्मनः ।ततोऽन्यद् धनुरादाय सत्वरं स नृपोत्तमः

śareṇa tīkṣṇapuṅkhena ḍimbhakasya durātmanaḥ | tato'nyad dhanurādāya satvaraṃ sa nṛpottamaḥ

अर्थ श्लोक 9 के साथ

अध्याय 308

श्लोक 12

धनुषा तेन राजेन्द्र सात्यकिं विव्यधे पुनः ।एवं धनूंषि राजेन्द्र शतं पञ्च च पञ्च च

dhanuṣā tena rājendra sātyakiṃ vivyadhe punaḥ | evaṃ dhanūṃṣi rājendra śataṃ pañca ca pañca ca

अर्थ श्लोक 9 के साथ

अध्याय 308

श्लोक 13

छित्त्वा ननाद शैनेयः सर्वक्षत्रस्य पश्यतः ।धनुषी तौ परित्यज्य वीरौ डिम्भकसात्यकी

chittvā nanāda śaineyaḥ sarvakṣatrasya paśyataḥ | dhanuṣī tau parityajya vīrau ḍimbhakasātyakī

अर्थ श्लोक 9 के साथ

अध्याय 308

श्लोक 14

खड्गौ प्रगृह्य चात्युग्रौ युद्धाय समुपस्थितौ ।तौ हि खङ्गविदां श्रेष्ठौ वीरौ डिम्भकसात्यकी

khaḍgau pragṛhya cātyugrau yuddhāya samupasthitau | tau hi khaṅgavidāṃ śreṣṭhau vīrau ḍimbhakasātyakī

अर्थ श्लोक 9 के साथ

अध्याय 308

श्लोक 15

दौःशासनिर्महाभागः सौमदत्तिस्तथैव च ।अभिमन्युश्च विक्रान्तो नकुलश्च तथैव च

dauḥśāsanirmahābhāgaḥ saumadattistathaiva ca | abhimanyuśca vikrānto nakulaśca tathaiva ca

श्लोक 15–24 का हिन्दी अर्थ

शततमो5ध्याय; * श्३५५ महाभाग दुःशासनकुमार, सोमदत्तपुत्र भूरिश्रवा, पराक्रमी अभिमन्यु तथा नकुल (और डिम्भक, सात्यकि)—अये युद्धस्थलके छ; श्रेष्ठतम वीर खड्गयुद्धके ज्ञाताओंमें उत्कृष्ट माने गये हैं। नृपश्रेष्ठ ! इन छहोंमें भी ये दोनों श्रेष्ठ नरेश सर्वोत्तम कहे गये हैं । वे ही दोनों युद्धकी लालसा लेकर खड्गद्वारा परस्पर जूझने लगे। भ्रान्त, उद्भ्रान्त, आविद्ध, प्रविद्ध, बाहुनि:सृत, आकर, विकर, भिन्न, निर्मयाद, अमानुष, संकोचित, कुलचित, सव्यजानु, विजानु, आहिक, चित्रक, क्षिपत, कुसुम्ब, लम्बन, धृत, सर्वबाहु, विनिर्बाहु, दक्षिण, उत्तर, त्रिबाहु, तुज़बाहु, सव्योन्नत, उदासि, पट्टिक, मौष्टिक, यौधिक और प्रथित—ये खड्गयुद्धके बत्तीस पैंतरे हैं। खड्गयुद्धमें लगे हुए उन दोनों वीरोंने ये सभी पैंतरे वहाँ प्रकट किये । वे बारम्बार प्रहार करते हुए भी थकते नहीं थे। महाराज! पुष्करमें रहकर उन दोनों वीरोंने युद्धके लिये दृढ़ निश्चय कर लिया था। जनमेजय! तदनन्तर देवता, गन्धर्व, सिद्ध और महर्षि विजयके लिये परिश्रम करनेवाले उन दोनों वीरोंकी भूरि-भूरि प्रशंसा करने लगे—। ' अहो! बाहुबलसे सुशोभित होनेवाले इन दोनों वीरोंका धैर्य और पराक्रम अद्भुत है। ये ही दोनों युद्धमें समर्थ हैं तथा खड्गविद्या और धनुर्वेदके पारड्त विद्वान हैं। इनमेंसे एक तो भगवान्‌ शड्डरका शिष्य है और दूसरा बुद्धिमान द्रोणाचार्यका

अध्याय 308

श्लोक 16

एते खङ्गविदां श्रेष्ठाः कीर्तिता युधि सत्तमाः ।एतेष्वेतौ नृपश्रेष्ठौ षट्सु वै नृपसत्तम

ete khaṅgavidāṃ śreṣṭhāḥ kīrtitā yudhi sattamāḥ | eteṣvetau nṛpaśreṣṭhau ṣaṭsu vai nṛpasattama

अर्थ श्लोक 15 के साथ

अध्याय 308

श्लोक 17

तावेतावसिना युद्धं चक्रतुर्युद्धलालसौ ।भ्रान्तमुद्भ्रान्तमाविद्धं प्रविद्धं बाहुनिःसृतम्

tāvetāvasinā yuddhaṃ cakraturyuddhalālasau | bhrāntamudbhrāntamāviddhaṃ praviddhaṃ bāhuniḥsṛtam

अर्थ श्लोक 15 के साथ

अध्याय 308

श्लोक 18

आकरं विकरं भिन्नं निर्मर्यादममानुषम् ।सङ्कोचितं कुलचितं सव्यजानु विजानु च

ākaraṃ vikaraṃ bhinnaṃ nirmaryādamamānuṣam | saṅkocitaṃ kulacitaṃ savyajānu vijānu ca

अर्थ श्लोक 15 के साथ

अध्याय 308

श्लोक 19

आहिकं चित्रकं क्षिप्तं कुसुम्बं लम्बनं धृतम् ।सर्वबाहु विनिर्बाहु सव्येतरमथोत्तरम्

āhikaṃ citrakaṃ kṣiptaṃ kusumbaṃ lambanaṃ dhṛtam | sarvabāhu vinirbāhu savyetaramathottaram

अर्थ श्लोक 15 के साथ

अध्याय 308

श्लोक 20

त्रिबाहु तुङ्गबाहुत्वं सव्योन्नतमुदासि च ।पट्टिकं मौष्टिकं चैव यौधिकं प्रथितं तथा

tribāhu tuṅgabāhutvaṃ savyonnatamudāsi ca | paṭṭikaṃ mauṣṭikaṃ caiva yaudhikaṃ prathitaṃ tathā

अर्थ श्लोक 15 के साथ

अध्याय 308

श्लोक 21

इति प्रकारान् द्वात्रिंशच्चक्रतुः खड्गयोधिनौ ।पुनः पुनः प्रहरन्तौ न च श्रममुपेयतुः

iti prakārān dvātriṃśaccakratuḥ khaḍgayodhinau | punaḥ punaḥ praharantau na ca śramamupeyatuḥ

अर्थ श्लोक 15 के साथ

अध्याय 308

श्लोक 22

पुष्करस्थौ महाराज युद्धाय कृतनिश्चयौ ।ततो देवाः सगन्धर्वाः सिद्धाश्च परमर्षयः

puṣkarasthau mahārāja yuddhāya kṛtaniścayau | tato devāḥ sagandharvāḥ siddhāśca paramarṣayaḥ

अर्थ श्लोक 15 के साथ

अध्याय 308

श्लोक 23

तुष्टुवुस्तौ महाराज जये कृतपरिश्रमौ ।अहो वीर्यमहो धैर्यमनयोर्बाहुशालिनोः

tuṣṭuvustau mahārāja jaye kṛtapariśramau | aho vīryamaho dhairyamanayorbāhuśālinoḥ

अर्थ श्लोक 15 के साथ

अध्याय 308

श्लोक 24

एतावेव रणे शक्तौ खड्गे धनुषि पारगौ ।एकः शिष्यो गिरीशस्य द्रोणस्यान्यो हि धीमतः

etāveva raṇe śaktau khaḍge dhanuṣi pāragau | ekaḥ śiṣyo girīśasya droṇasyānyo hi dhīmataḥ

अर्थ श्लोक 15 के साथ

अध्याय 308

श्लोक 25

अर्जुनः सात्यकिश्चैव वासुदेवो जगत्पतिः ।त्रय एते महावीराः प्रथिताः सङ्गरे सदा

arjunaḥ sātyakiścaiva vāsudevo jagatpatiḥ | traya ete mahāvīrāḥ prathitāḥ saṅgare sadā

हिन्दी अर्थ

अर्जुन, सात्यकि और जगदीश्वर भगवान्‌ वासुदेव—ये तीन सदा ही युद्धस्थलमें महावीर ' के नामसे विख्यात हैं

अध्याय 308

श्लोक 26

डिम्भकः शक्तिभृच्छर्वस्त्रय एते महारथाः ।प्रसिद्धाः सर्व एवैते वीर्येषु च बलेषु च

ḍimbhakaḥ śaktibhṛccharvastraya ete mahārathāḥ | prasiddhāḥ sarva evaite vīryeṣu ca baleṣu ca

हिन्दी अर्थ

डिम्भक, कुमार कार्तिकेय और भगवान्‌ शिव—ये तीन मुख्य *महारथी ' हैं। ये सभी बल और वीर्यमें विख्यात हैं '

अध्याय 308

श्लोक 27

इति ते देवगन्धर्वाः सिद्धा यक्षा महोरगाः ।दिविस्थिताः समं ब्रूयुर्युद्धदर्शनलालसाः

iti te devagandharvāḥ siddhā yakṣā mahoragāḥ | divisthitāḥ samaṃ brūyuryuddhadarśanalālasāḥ

हिन्दी अर्थ

इस प्रकार वे देवता, गन्धर्व, सिद्ध, यक्ष और बड़े-बड़े नाग पुद्ध देखनेकी इच्छासे खड़े होकर एक साथ उपर्युक्त त्रातें कर रहे थे

स्रोत: local proofread transcription: Sanskrit shlokas of the Harivamsa (Harivamsha, Vishnu and Bhavishya parvas) from sanskritdocuments.org. One chapter per adhyaya; verse numbers as printed in the source (restarting in each adhyaya). Appendix sections are not included. · प्राप्त 19/10/2026

धर्म ग्रंथ निःशुल्क और विज्ञापन-रहित है। Dharma Granth is free and has no ads. इसे ऐसा बनाए रखने में सहयोग करेंHelp keep it that way → How it is funded

शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पाठ-भेद एवं संशोधनVariants & corrections

पाठ-भेद टिप्पणी (Alternative Reading / Variant Notes):

Collated with BORI Critical Edition of Mahabharata Khilaparvan.