दौःशासनिर्महाभागः सौमदत्तिस्तथैव च ।अभिमन्युश्च विक्रान्तो नकुलश्च तथैव च॥ 15 ॥
dauḥśāsanirmahābhāgaḥ saumadattistathaiva ca | abhimanyuśca vikrānto nakulaśca tathaiva ca
श्लोक 15–24 का हिन्दी अर्थ
शततमो5ध्याय; * श्३५५ महाभाग दुःशासनकुमार, सोमदत्तपुत्र भूरिश्रवा, पराक्रमी अभिमन्यु तथा नकुल (और डिम्भक, सात्यकि)—अये युद्धस्थलके छ; श्रेष्ठतम वीर खड्गयुद्धके ज्ञाताओंमें उत्कृष्ट माने गये हैं। नृपश्रेष्ठ ! इन छहोंमें भी ये दोनों श्रेष्ठ नरेश सर्वोत्तम कहे गये हैं । वे ही दोनों युद्धकी लालसा लेकर खड्गद्वारा परस्पर जूझने लगे। भ्रान्त, उद्भ्रान्त, आविद्ध, प्रविद्ध, बाहुनि:सृत, आकर, विकर, भिन्न, निर्मयाद, अमानुष, संकोचित, कुलचित, सव्यजानु, विजानु, आहिक, चित्रक, क्षिपत, कुसुम्ब, लम्बन, धृत, सर्वबाहु, विनिर्बाहु, दक्षिण, उत्तर, त्रिबाहु, तुज़बाहु, सव्योन्नत, उदासि, पट्टिक, मौष्टिक, यौधिक और प्रथित—ये खड्गयुद्धके बत्तीस पैंतरे हैं। खड्गयुद्धमें लगे हुए उन दोनों वीरोंने ये सभी पैंतरे वहाँ प्रकट किये । वे बारम्बार प्रहार करते हुए भी थकते नहीं थे। महाराज! पुष्करमें रहकर उन दोनों वीरोंने युद्धके लिये दृढ़ निश्चय कर लिया था। जनमेजय! तदनन्तर देवता, गन्धर्व, सिद्ध और महर्षि विजयके लिये परिश्रम करनेवाले उन दोनों वीरोंकी भूरि-भूरि प्रशंसा करने लगे—। ' अहो! बाहुबलसे सुशोभित होनेवाले इन दोनों वीरोंका धैर्य और पराक्रम अद्भुत है। ये ही दोनों युद्धमें समर्थ हैं तथा खड्गविद्या और धनुर्वेदके पारड्त विद्वान हैं। इनमेंसे एक तो भगवान् शड्डरका शिष्य है और दूसरा बुद्धिमान द्रोणाचार्यका