Harivamsha Purana
306
अध्याय 306 / 318

Parva 3, Adhyāya 123

22 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ22 श्लोक

अध्याय 306

श्लोक 1

श्रीकृष्णस्य विचक्रेण सह घोरं युद्धं, विचक्रस्य वधम् ।एतस्मिन्नन्तरे राजन् द्वन्द्वयुद्धमवर्तत ।विचक्रं योधयामास शार्ङ्गधन्वा गदाधरः

śrīkṛṣṇasya vicakreṇa saha ghoraṃ yuddhaṃ, vicakrasya vadham | etasminnantare rājan dvandvayuddhamavartata | vicakraṃ yodhayāmāsa śārṅgadhanvā gadādharaḥ

हिन्दी अर्थ

वैशम्पायनजी कहते हैं—राजन्‌! इसी बीचमें वहाँ न्द्युद्ध होने लगा । शार्धन्वा गदाधारी श्रीकृष्णने विचक्रके पाथ युद्ध आरम्भ कर दिया

अध्याय 306

श्लोक 2

बलभद्रोऽथ हंसेन डिम्भकेन च सात्यकिः ।वसुदेवोग्रसेनाभ्यां हिडिम्बः पुरुषादकः

balabhadro'tha haṃsena ḍimbhakena ca sātyakiḥ | vasudevograsenābhyāṃ hiḍimbaḥ puruṣādakaḥ

हिन्दी अर्थ

बलभद्रने हंसके साथ भर सात्यकिने डिम्भकके साथ लोहा लिया। नरभक्षी हेडिम्ब वसुदेव तथा उग्रसेनके साथ युद्ध करने लगा

अध्याय 306

श्लोक 3

शेषाश्च शेषै राजेन्द्र चकुर्युद्धमदीनगाः ।वासुदेवस्त्रिसप्तत्या दैत्यं वक्षस्यताडयत्

śeṣāśca śeṣai rājendra cakuryuddhamadīnagāḥ | vāsudevastrisaptatyā daityaṃ vakṣasyatāḍayat

हिन्दी अर्थ

जिन्द्र ! किसीके सामने दीनता न प्रकट करनेवाले शेष और शेष योद्धाओंके साथ जूझने लगे । भगवान्‌ श्रीकृष्णने रैत्यकी छातीमें तिहत्तर बाण मारे

अध्याय 306

श्लोक 4

शरैर्निशितधारात्रैर्विस्मयं दर्शयन् रणे ।दानवो देवदेवेशं दृढेन निशितेन च

śarairniśitadhārātrairvismayaṃ darśayan raṇe | dānavo devadeveśaṃ dṛḍhena niśitena ca

श्लोक 4–5 का हिन्दी अर्थ

उन बाणोंकी तार बड़ी तीखी थी। उन्होंने रणभूमिमें विस्मय प्रकट करते हुए उस दैत्यपर प्रहार किया था। तब उस दानवने मी अपने श्रेष्ठ धनुषको कानतक खींचकर एक सुदूढ़ और पैने बाणसे देवदेवेश्वर भगवान्‌ श्रीकृष्णकी छातीमें गचीपति इन्द्रके देखते-देखते प्रहार किया

अध्याय 306

श्लोक 5

शरेणाकर्णमाकृष्य धनुःप्रवरमीश्वरम् ।जघान स्तनमध्ये च पश्यतस्तु शचीपतेः

śareṇākarṇamākṛṣya dhanuḥpravaramīśvaram | jaghāna stanamadhye ca paśyatastu śacīpateḥ

अर्थ श्लोक 4 के साथ

अध्याय 306

श्लोक 6

तेन विद्धोऽथ भगवान् वक्षोदेशे जनार्दनः ।अवमच्छोणितं विष्णुरादिकाले यथा प्रजाः

tena viddho'tha bhagavān vakṣodeśe janārdanaḥ | avamacchoṇitaṃ viṣṇurādikāle yathā prajāḥ

हिन्दी अर्थ

मक्ष:स्थलमें उसके बाणकी चोट खाकर भगवान्‌ जनार्दन वेष्णु रक्त वमन करने लगे, ठीक उसी तरह जैसे पृष्टिके आदिकालमें उन्होंने प्रजावर्गको अपने मुखसे कट किया था

अध्याय 306

श्लोक 7

ततः क्रुद्धो हृषीकेशः क्षुरप्रेणाहनद् ध्वजम् ।अश्वांश्च चतुरो हत्वा सारथिं च शरैस्त्रिभिः

tataḥ kruddho hṛṣīkeśaḥ kṣurapreṇāhanad dhvajam | aśvāṃśca caturo hatvā sārathiṃ ca śaraistribhiḥ

श्लोक 7–12 का हिन्दी अर्थ

तदनन्तर कुपित हुए भगवान्‌ डषीकेशने एक क्षुरप्रसे उस दानवकी ध्वजा काट डाली, फेर उसके चारों घोड़ोंको मारकर तीन बाणोंसे सारधिको भी कालके गालमें डाल दिया। तदनन्तर तारकामय ंग्रामकी भाँति उन्होंने अपना महान्‌ शड्डा बजाया। तब क्रोधसे मूर््छित हुए उस दानवने सहसा रथसे उछलकर एक दु:सह शक्तिशालिनी एवं महाभयंकर गदा हाथमें ले नी और उसके द्वारा उस दैत्यराजने पहले तो श्रीकृष्णके केरीटपर आघात किया, फिर उनके ललागमें चोट हहुँचायी । तत्पश्चात्‌ वह जोर-जोरसे सिंहनाद करने लगा। सके बाद उस दानवने एक बहुत बड़ी शिला उठायी और उसे दस बार घुमाकर भगवान्‌ श्रीकृष्णकी छातीपर रे मारा। उस शिलाको अपनी ओर आते देख भगवान्‌ श्रीकृष्णने हाथसे पकड़ लिया और उसीसे उस दैत्यपर भाघात किया । उस प्रहारसे पीड़ित हो वह दैत्य प्राणहीन- पा हो गया और लम्बी साँस-सा खींचता हुआ पृथ्वीपर गर पड़ा

अध्याय 306

श्लोक 8

ततो दध्मौ महाशङ्खं यथा तारामये रणे ।रथादुत्प्लुत्य सहसा दानवः क्रोधमूर्च्छितः

tato dadhmau mahāśaṅkhaṃ yathā tārāmaye raṇe | rathādutplutya sahasā dānavaḥ krodhamūrcchitaḥ

अर्थ श्लोक 7 के साथ

अध्याय 306

श्लोक 9

गदां गृह्य महाघोरां दुःसहां वीर्यशालिनीम् ।तया जघान दैत्येन्द्रः किरीटे केशवस्य ह

gadāṃ gṛhya mahāghorāṃ duḥsahāṃ vīryaśālinīm | tayā jaghāna daityendraḥ kirīṭe keśavasya ha

अर्थ श्लोक 7 के साथ

अध्याय 306

श्लोक 10

ललाटे च पुनर्विष्णुं सिंहनादं व्यनीनदत् ।ततः शिलां च महतीं प्रगृह्य दनुजः किल

lalāṭe ca punarviṣṇuṃ siṃhanādaṃ vyanīnadat | tataḥ śilāṃ ca mahatīṃ pragṛhya danujaḥ kila

अर्थ श्लोक 7 के साथ

अध्याय 306

श्लोक 11

भ्रामयित्वा दशगुणं प्राहरत् केशवोरसि ।तामापतन्तीं सम्प्रेक्ष्य हस्तेनादाय केशवः

bhrāmayitvā daśaguṇaṃ prāharat keśavorasi | tāmāpatantīṃ samprekṣya hastenādāya keśavaḥ

अर्थ श्लोक 7 के साथ

अध्याय 306

श्लोक 12

जघान च तया दैत्यं स पपातार्दितः क्षितौ ।गतासुरिव सञ्जज्ञे श्वसन्निव पपात ह

jaghāna ca tayā daityaṃ sa papātārditaḥ kṣitau | gatāsuriva sañjajñe śvasanniva papāta ha

अर्थ श्लोक 7 के साथ

अध्याय 306

श्लोक 13

प्राप्य संज्ञां ततो दैत्यः क्रोधाद् द्विगुणमाबभौ ।आदाय परिघं घोरमिदमाह जनार्दनम्

prāpya saṃjñāṃ tato daityaḥ krodhād dviguṇamābabhau | ādāya parighaṃ ghoramidamāha janārdanam

हिन्दी अर्थ

तदनन्तर होशमें आकर वह दैत्य कुपित हो उठा। . | क्रोधसे उसकी आभा दुगुनी हो गयी । उसने भयंकर परिघ लेकर भगवान्‌ जनार्दनसे इस प्रकार कहा—

अध्याय 306

श्लोक 14

अनेन तव गोविन्द दर्पजातं निहन्म्यहम् ।विक्रमज्ञस्तदा चासि मम देवासुरे रणे

anena tava govinda darpajātaṃ nihanmyaham | vikramajñastadā cāsi mama devāsure raṇe

हिन्दी अर्थ

गोविन्द! इस परिघसे मैं तुम्हारा सारा घमंड चूर्ण किये | देता हूँ। उन दिनों जब देवासुर-संग्राम हो रहा था, तुम मेरा पराक्रम जान चुके हो

अध्याय 306

श्लोक 15

तावेव विपुलौ बाहू स एवास्मि जनार्दन ।तथापि युध्यसे वीर ज्ञात्वा त्वं मामकं बलम्

tāveva vipulau bāhū sa evāsmi janārdana | tathāpi yudhyase vīra jñātvā tvaṃ māmakaṃ balam

श्लोक 15–16 का हिन्दी अर्थ

जनार्दन! वे ही दोनों मेरी विशाल भुजाएँ हैं और वही मैं हूँ। वीर ! तुम मेरे बलको जान चुके हो तो भी मुझसे युद्ध करते हो। महाबाहो! मेरी भुजाओंसे छूटे हुए इस परिघको रोको तो सही। ऐसा कहकर उस दैत्यने सब लोगोंके देखते- देखते श्, चक्र और गदा धारण करनेवाले देवदेवेश्वर जगदीश्वर श्रीकृष्णपर वह परिघ चला दिया

अध्याय 306

श्लोक 16

वारयैनं महाबाहो परिघं बाहुनिःसृतम् ।इत्युक्त्वा देवदेवेशं शङ्खचक्रगदाधरम् ।चिक्षेप दैत्यो लोकेशं सर्वलोकस्य पश्यतः

vārayainaṃ mahābāho parighaṃ bāhuniḥsṛtam | ityuktvā devadeveśaṃ śaṅkhacakragadādharam | cikṣepa daityo lokeśaṃ sarvalokasya paśyataḥ

अर्थ श्लोक 15 के साथ

अध्याय 306

श्लोक 17

तं गृह्य बाहुना कृष्णो हतोऽसीति वदन् हरिः ।खण्डशः कारयामास खङ्गेन निशितेन ह

taṃ gṛhya bāhunā kṛṣṇo hato'sīti vadan hariḥ | khaṇḍaśaḥ kārayāmāsa khaṅgena niśitena ha

हिन्दी अर्थ

भगवान्‌ श्रीकृष्णने उस परिघको हाथसे पकड़ लिया और '* अब तू शीघ्र ही मारा जायगा' ऐसा कहते हुए उन्होंने अपनी तीखी तलवारसे उस परिघके टुकड़े- डुकड़े कर डाले

अध्याय 306

श्लोक 18

उत्पाट्य वृक्षं दैत्येशः शतशाखं महाशिखम् ।तेन सम्पोथयामास विष्टरश्रवसं विभुम्

utpāṭya vṛkṣaṃ daityeśaḥ śataśākhaṃ mahāśikham | tena sampothayāmāsa viṣṭaraśravasaṃ vibhum

हिन्दी अर्थ

तब उस दैत्यराजने सौ शाखा और बहुत ऊँची शिखावाले एक विशाल वृक्षको उखाड़कर उसे विस्तृत यशवाले भगवान्‌ श्रीकृष्णपर दे मारा

अध्याय 306

श्लोक 19

छित्त्वा तं चापि खड्गेन तिलशश्च चकार ह ।विक्रीड्य सुचिरं विष्णुस्तेन दैत्येन माधवः

chittvā taṃ cāpi khaḍgena tilaśaśca cakāra ha | vikrīḍya suciraṃ viṣṇustena daityena mādhavaḥ

श्लोक 19–20 का हिन्दी अर्थ

माधव श्रीकृष्णने अपनी तलवारसे उस वृक्षको भी तिल-तिल करके काट डाला। इस प्रकार उस दैत्यके साथ चिरकालतक क्रीड़ा करके भगवान्‌ महाविष्णुने उस समय उसे मार डालनेकी इच्छा की और एक तीखा बाण हाथमें लेकर उसे आग्रेयास्त्रसे संयुक्त करके उसके द्वारा उस दैत्यपर आघात किया

अध्याय 306

श्लोक 20

हन्तुमैच्छत् तदा दैत्यमादाय निशितं शरम् ।आग्नेयास्त्रेण संयोज्य जघानैनं महान् हरिः

hantumaicchat tadā daityamādāya niśitaṃ śaram | āgneyāstreṇa saṃyojya jaghānainaṃ mahān hariḥ

अर्थ श्लोक 19 के साथ

अध्याय 306

श्लोक 21

सन्दह्य स शरो दैत्यं सर्वलोकस्य पश्यतः ।यथापूर्वं जगामाशु करं भगवतः पुनः

sandahya sa śaro daityaṃ sarvalokasya paśyataḥ | yathāpūrvaṃ jagāmāśu karaṃ bhagavataḥ punaḥ

हिन्दी अर्थ

उस बाणने सब लोगोंके देखते-देखते दैत्यको जलाकर भस्म कर दिया और पहलेकी भाँति वह शीघ्र ही भगवान्‌के हाथमें चला गया

अध्याय 306

श्लोक 22

हतशिष्टास्ततो दैत्याः पलायन्तो दिशो दश ।अद्यापि न निवर्तन्ते गच्छन्तो वै महोदधिम्

hataśiṣṭāstato daityāḥ palāyanto diśo daśa | adyāpi na nivartante gacchanto vai mahodadhim

हिन्दी अर्थ

फिर मरनेसे बचे हुए दैत्य दसों दिशाओंगमें भागते हुए महासागरको चले गये। वे अब भी वहाँसे लौट नहीं रहे हैं

स्रोत: local proofread transcription: Sanskrit shlokas of the Harivamsa (Harivamsha, Vishnu and Bhavishya parvas) from sanskritdocuments.org. One chapter per adhyaya; verse numbers as printed in the source (restarting in each adhyaya). Appendix sections are not included. · प्राप्त 19/10/2026

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शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

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व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

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आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

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Collated with BORI Critical Edition of Mahabharata Khilaparvan.