Harivamsha Purana
305
अध्याय 305 / 318

Parva 3, Adhyāya 122

25 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ25 श्लोक

अध्याय 305

श्लोक 1

उभयपक्षयोः सैन्यानां घोरयुद्धं द्वे सेने सङ्गते राजन् सध्वजे सपरिच्छदे ।महापरिघसङ्कीर्णे गदाशक्तिसमाकुले

ubhayapakṣayoḥ sainyānāṃ ghorayuddhaṃ dve sene saṅgate rājan sadhvaje saparicchade | mahāparighasaṅkīrṇe gadāśaktisamākule

हिन्दी अर्थ

वैशम्पायनजी कहते हैं—राजन्‌! वे दोनों ओरकी ाएँ वहाँ एक-दूसरीसे मिल गयीं । वे ध्वज तथा अन्य करणोंसे सम्पन्न थीं। दोनों ही दलोंमें बड़े-बड़े परिघ ख्रत थे। दोनों ही सेनाएँ गदा और शक्तियोंसे भरी- | थीं

अध्याय 305

श्लोक 2

भेरीझर्झरसम्पूर्णे डिण्डिमारावसङ्कुले ।प्रगृहीतमहाशस्त्रशूलासिवरकार्मुके

bherījharjharasampūrṇe ḍiṇḍimārāvasaṅkule | pragṛhītamahāśastraśūlāsivarakārmuke

हिन्दी अर्थ

दोनोंमें भेरी और झाँझकी ध्वनि हो रही थी। ऐं ही डिंडिम-घोषसे व्याप्त थीं। दोनों ही दलोंके नेकोंने बड़े-बड़े शस्त्र, शूल, खड्ग और श्रेष्ठ धनुष रखे थे

अध्याय 305

श्लोक 3

परस्परकृतोत्साहे चक्राते युद्धमुल्बणम् ।ते शराः कार्मुकोत्सृष्टा निर्भिद्याथ शरीरिणाम्

parasparakṛtotsāhe cakrāte yuddhamulbaṇam | te śarāḥ kārmukotsṛṣṭā nirbhidyātha śarīriṇām

श्लोक 3–6 का हिन्दी अर्थ

महाराज! दोनों सेनाएँ एक-दूसरीको तनेका उत्साह रखती थीं। दोनों भयंकर युद्ध करने हीं। उनके धनुषोंसे छूटे हुए सहस्त्रों बाण देहधारियोंके रोंको विदीर्ण करके दूरतक चले जाते थे। राजन्‌! द्वाओंकी भुजाओंसे छूटे हुए खड्ग शत्रुकी छातीमें घाव के जब उछलते, तब उनके सिर काटकर आकाशमें ने जाते । क्षत्रियोंकी भुजाओंद्वारा फेंके गये परिघ राजाओं ा राक्षसोंके अनुपम शरीरकों तिल-तिल करके काट नते थे तथा एक-दूसरेके वधकी इच्छासे गर्जना करनेवाले पके भी टुकड़े-टुकड़े कर डालते थे

अध्याय 305

श्लोक 4

शरीराणि महाराज जग्मुर्दूरं सहस्रशः ।भटबाहुविनिर्मुक्ताः खड्गा निर्भिद्य वक्षसि

śarīrāṇi mahārāja jagmurdūraṃ sahasraśaḥ | bhaṭabāhuvinirmuktāḥ khaḍgā nirbhidya vakṣasi

अर्थ श्लोक 3 के साथ

अध्याय 305

श्लोक 5

स्फुरन्तश्च तथा राजञ्छिरांस्याहृत्य खं ययुः ।परिघाश्च तथा राज्ञां बाहुभिः परिचोदिताः

sphurantaśca tathā rājañchirāṃsyāhṛtya khaṃ yayuḥ | parighāśca tathā rājñāṃ bāhubhiḥ paricoditāḥ

अर्थ श्लोक 3 के साथ

अध्याय 305

श्लोक 6

तिलशश्चक्रुरतुलं शरीरं नृपरक्षसाम् ।दैत्यानां कुर्वतां नादमन्योन्यवधकाङ्क्षिणाम्

tilaśaścakruratulaṃ śarīraṃ nṛparakṣasām | daityānāṃ kurvatāṃ nādamanyonyavadhakāṅkṣiṇām

अर्थ श्लोक 3 के साथ

अध्याय 305

श्लोक 7

दैत्या रक्षांसि राजेन्द्र राजानश्च समन्ततः ।अन्योन्यं परिघैर्जघ्नुश्चापमुक्तैः शिलाशितैः

daityā rakṣāṃsi rājendra rājānaśca samantataḥ | anyonyaṃ parighairjaghnuścāpamuktaiḥ śilāśitaiḥ

श्लोक 7–11 का हिन्दी अर्थ

राजेन्द्र ! पर, राक्षस और राजा लोग सब ओर एक-दूसरेपर घोंद्वारा प्रहार करते थे तथा अन्य महाबली वीर लापर तेज करके धनुषसे छोड़े गये सर्पाकार बाणोंद्वारा रा आघात करते थे । राजन्‌ ! मतवाले हाथियोंके समान क्रमी राक्षस और अन्य दानव धनुषसे छोड़े गये महान्‌ गोंद्वारा परस्पर चोट पहुँचाते थे। महाराज! वहाँ सब र हाथी हाथियोंसे, घोड़े घोड़ोंसे, रथ रथोंसे और भार सवारोंसे भिड़ गये। पट्टिश, खड्ग, बाणसमूह, यकोंको भी काट गिरानेवाले कुन्त, शक्ति, परिघ, प्रास र फरसोंसहित महाभयंकर भिन्दिपाल आदि अस्त्र- त्रोंद्वारा सभी योद्धा रणभूमिमें एक-दूसरेको मारने ॥ ७—अ

अध्याय 305

श्लोक 8

शरैश्च भोगिभोगाभैस्तीक्ष्णमन्ये महाबलाः ।राक्षसा दानवाश्चान्ये मत्तमातङ्गविक्रमाः

śaraiśca bhogibhogābhaistīkṣṇamanye mahābalāḥ | rākṣasā dānavāścānye mattamātaṅgavikramāḥ

अर्थ श्लोक 7 के साथ

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श्लोक 9

अन्योन्यं जघ्निरे राजंश्चापमुक्तैर्महाशरैः ।नागा नागैर्महाराज हया अश्वैः समन्ततः

anyonyaṃ jaghnire rājaṃścāpamuktairmahāśaraiḥ | nāgā nāgairmahārāja hayā aśvaiḥ samantataḥ

अर्थ श्लोक 7 के साथ

अध्याय 305

श्लोक 10

रथा रथैः समाजग्मुः सादिनः सादिभिस्तथा ।पट्टिशासिशरव्रातैः कुन्तैः सायककर्षणैः

rathā rathaiḥ samājagmuḥ sādinaḥ sādibhistathā | paṭṭiśāsiśaravrātaiḥ kuntaiḥ sāyakakarṣaṇaiḥ

अर्थ श्लोक 7 के साथ

अध्याय 305

श्लोक 11

सशक्तिपरिघपासपरश्वधसमाकुलैः ।भिन्दिपालैर्महारौद्रैर्जघ्नुरन्योन्यमाहवे

saśaktiparighapāsaparaśvadhasamākulaiḥ | bhindipālairmahāraudrairjaghnuranyonyamāhave

अर्थ श्लोक 7 के साथ

अध्याय 305

श्लोक 12

अन्योन्यं जघ्निरे राजंश्चापमुक्तैः शिलाशितैः ।राक्षसा दानवा राजन् क्षत्रियाश्च समन्ततः ।इतश्चेतश्च धावन्तः कुर्वन्तो विस्वरं रवम्

anyonyaṃ jaghnire rājaṃścāpamuktaiḥ śilāśitaiḥ | rākṣasā dānavā rājan kṣatriyāśca samantataḥ | itaścetaśca dhāvantaḥ kurvanto visvaraṃ ravam

हिन्दी अर्थ

राजन्‌ ! इधर-उधर दौड़ते और विकट ना करते हुए राक्षस, दानव तथा क्षत्रिय शिलापर तेज ्‌ धनुषसे छोड़े गये बाणोंद्वारा सब ओर परस्पर प्रहार ते थे

अध्याय 305

श्लोक 13

हताः केचिन्महाराज पेतुरुर्व्यां महासिभिः ।केचिन्मथितमस्तिष्का गदाभिर्वीर्यवत्तमाः

hatāḥ kecinmahārāja petururvyāṃ mahāsibhiḥ | kecinmathitamastiṣkā gadābhirvīryavattamāḥ

हिन्दी अर्थ

महाराज! कोई बड़ी-बड़ी तलवारोंसे [ जाकर पृथ्वीपर गिर पड़े। कितने ही महापराक्रमी दंके मस्तक गदाओंके आघातसे चूर-चूर हो गये

अध्याय 305

श्लोक 14

भिन्नग्रीवा महाराज परिघैः परिघायुधैः ।यमराष्द्रं गताः केचित् केचित् स्वर्गं समाययुः

bhinnagrīvā mahārāja parighaiḥ parighāyudhaiḥ | yamarāṣdraṃ gatāḥ kecit kecit svargaṃ samāyayuḥ

हिन्दी अर्थ

श्३४९ कवि वनिििविधिधिद महाराज! कितने ही परिघधारी योद्धाओंने अपने रिघोंद्वारा शन्ुओंकी गर्दनें तोड़ डालीं, उन मारे शत्रुओं ेंसे कुछ तो यमराजके राज्यमें गये और कुछ स्वर्गलोकमें ना पहुँचे

अध्याय 305

श्लोक 15

अप्सरोभिः समासेदुः पश्यन्तः स्वं कलेवरम् ।केचित्स्वांश्च परांश्चैव हत्वा भ्रान्ता इवाभवन्

apsarobhiḥ samāseduḥ paśyantaḥ svaṃ kalevaram | kecitsvāṃśca parāṃścaiva hatvā bhrāntā ivābhavan

हिन्दी अर्थ

वे अपने मृत शरीरको देखते हुए भप्सराओंसे जा मिले। कितने ही योद्धा परायों तथा पपनोंको भी मारकर श्रान्त-से हो गये थे

अध्याय 305

श्लोक 16

एतस्मिन्नन्तरे राजञ्छङ्खा भेर्यः सहस्रशः ।सस्वनुः सर्वतः सैन्ये मृदङ्गा बहवस्तथा

etasminnantare rājañchaṅkhā bheryaḥ sahasraśaḥ | sasvanuḥ sarvataḥ sainye mṛdaṅgā bahavastathā

हिन्दी अर्थ

राजन्‌ ! सी बीचमें सहस्रों शड्ढों और भेरियोंकी ध्वनि होने गी । सेनामें सब ओर बहुत-से मृदज़ बजने लगे

अध्याय 305

श्लोक 17

मध्यन्दिनगते सूर्ये तापं दधति घोरवत् ।ततः पिशाचा विकृताः करालविततोदराः

madhyandinagate sūrye tāpaṃ dadhati ghoravat | tataḥ piśācā vikṛtāḥ karālavitatodarāḥ

श्लोक 17–18 का हिन्दी अर्थ

र्य मध्याहककालमें पहुँचकर जब घोर ताप देने लगे, उस मय विशाल एवं विकराल पेटवाले विकृताकार पिशाच और महाघोर राक्षस आकर बड़ी प्रसन्नताके साथ बहुत- । रक्त पीने और केशयुक्त मांस खाने लगे

अध्याय 305

श्लोक 18

राक्षसाश्च महाघोराः पिशितं केशशाद्बलम् ।मुदिता भक्षयामासुः पिबन्तः शोणितं वहु

rākṣasāśca mahāghorāḥ piśitaṃ keśaśādbalam | muditā bhakṣayāmāsuḥ pibantaḥ śoṇitaṃ vahu

अर्थ श्लोक 17 के साथ

अध्याय 305

श्लोक 19

सञ्चितानि शवान्यासन् कबन्धाः खड्गपातिताः ।विभज्य देशं बहुशो युद्धभूमौ शवाशिनः

sañcitāni śavānyāsan kabandhāḥ khaḍgapātitāḥ | vibhajya deśaṃ bahuśo yuddhabhūmau śavāśinaḥ

हिन्दी अर्थ

हाँ ढेर-की-ढेर लाशें पड़ी थीं, खड्गोंद्वारा गिराये हुए ना सिरके धड़ एकत्र हो गये थे। वे शवका भक्षण रनेवाले पिशाच युद्धभूमिमें परस्पर बहुत-से देशका 'भाजन करके मृतकोंके मांस खाते थे

अध्याय 305

श्लोक 20

अथ श्येना मृगाश्चैव कङ्का गृध्रास्तथा परे ।तुण्डैः शवान् विनिष्कृष्य भक्षयन्ति ततस्ततः

atha śyenā mṛgāścaiva kaṅkā gṛdhrāstathā pare | tuṇḍaiḥ śavān viniṣkṛṣya bhakṣayanti tatastataḥ

हिन्दी अर्थ

तदनन्तर हुत-से बाज, हिंसक जन्तु, कंक, गृध्र तथा अन्य पक्षी पर-उधरसे आकर अपनी चोंचोंसे मुर्दोको खींच- ंचिकर खाने लगे

अध्याय 305

श्लोक 21

सप्ताशीतिसहस्राणि हता नागा नृपोत्तम ।त्रिंशत्सहस्रमयुतं निहता हयसत्तमाः

saptāśītisahasrāṇi hatā nāgā nṛpottama | triṃśatsahasramayutaṃ nihatā hayasattamāḥ

हिन्दी अर्थ

नृपश्रेष्ठ ! उस युद्धमें सत्तासी जार हाथी मारे गये तथा तीस करोड़ अच्छे घोड़ोंका हार हुआ

अध्याय 305

श्लोक 22

हतं लक्षं महाराज रथानां रथिभिः सह ।त्रिंशत्कोट्यो हतास्तत्र सादिनः सायुधा भृशम्

hataṃ lakṣaṃ mahārāja rathānāṃ rathibhiḥ saha | triṃśatkoṭyo hatāstatra sādinaḥ sāyudhā bhṛśam

हिन्दी अर्थ

महाराज! रथियोंसहित एक लाख रथ ट हुए तथा वहाँ तीस करोड़ शस्त्रधारी घुड़सवार री चोट खाकर मारे गये थे

अध्याय 305

श्लोक 23

मध्यन्दिनगते सूर्ये हताः केचन निर्गताः ।केचिच्च तृषिता राजन् विविशुः पुष्करं सरः

madhyandinagate sūrye hatāḥ kecana nirgatāḥ | kecicca tṛṣitā rājan viviśuḥ puṣkaraṃ saraḥ

हिन्दी अर्थ

राजन्‌! सूर्यके याह्ककालमें पहुँचते-पहुँचते कितने ही योद्धा घायल कर रणभूमिसे निकल गये और कितने ही प्याससे ड्ति हो पुष्कर-सरोवरमें घुस गये

अध्याय 305

श्लोक 24

केचिद् भूमिं समालिङ्ग्य भीता इत्यब्रुवन् रणे ।मुक्तकेशाः पतन्ति स्म रथान् सन्त्यज्य केचन

kecid bhūmiṃ samāliṅgya bhītā ityabruvan raṇe | muktakeśāḥ patanti sma rathān santyajya kecana

हिन्दी अर्थ

कितने ही नेक पृथ्वीका आलिज्न करके पड़ गये और रणभूमिमें ननेको भयभीत बताने लगे। कितने ही योद्धा केश ले हुए रथोंको छोड़कर पृथ्वीपर गिर पड़ते थे

अध्याय 305

श्लोक 25

सन्दष्टौष्ठपुटाः केचित् सादिनः पुरतो हताः ।अत्यद्भुतं महायुद्धमासीत् पुष्करतीर्थके ।यथा देवासुरं युद्धमासीत् पूर्वं नृपोत्तम

sandaṣṭauṣṭhapuṭāḥ kecit sādinaḥ purato hatāḥ | atyadbhutaṃ mahāyuddhamāsīt puṣkaratīrthake | yathā devāsuraṃ yuddhamāsīt pūrvaṃ nṛpottama

हिन्दी अर्थ

तने ही घुड़सवार दाँतोंसे ओठ दबाये सामने मारे गये। श्रेष्ठ! इस प्रकार पुष्करतीर्थमें अत्यन्त अद्भुत महान्‌ द हुआ। पूर्वकालमें जिस प्रकार देवासुर-संग्राम हुआ वैसा ही वह भी था

स्रोत: local proofread transcription: Sanskrit shlokas of the Harivamsa (Harivamsha, Vishnu and Bhavishya parvas) from sanskritdocuments.org. One chapter per adhyaya; verse numbers as printed in the source (restarting in each adhyaya). Appendix sections are not included. · प्राप्त 19/10/2026

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शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

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व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

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पाठ-भेद एवं संशोधनVariants & corrections

पाठ-भेद टिप्पणी (Alternative Reading / Variant Notes):

Collated with BORI Critical Edition of Mahabharata Khilaparvan.