Harivamsha Purana
299
अध्याय 299 / 318

Parva 3, Adhyāya 116

9 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ9 श्लोक

अध्याय 299

श्लोक 1

श्रीकृष्णेन जनार्दनं सन्देशं दत्त्वा प्रत्यागमनाय निर्देशं हासं कुर्वत्सु तेष्वेवं केशवः केशिसूदनः ।उवाच वचनं दूतं गच्छ मद्वचनाद् द्विज

śrīkṛṣṇena janārdanaṃ sandeśaṃ dattvā pratyāgamanāya nirdeśaṃ hāsaṃ kurvatsu teṣvevaṃ keśavaḥ keśisūdanaḥ | uvāca vacanaṃ dūtaṃ gaccha madvacanād dvija

हिन्दी अर्थ

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! जब यादव इस प्रकार उपहास कर रहे थे, उस समय केशिहन्ता भगवान्‌ केशवने दूतसे इस प्रकार कहा—' ब्रह्मनू! आप मेरा संदेश लेकर जाइये

अध्याय 299

श्लोक 2

तावित्थं हंसडिम्भकौ ब्रूहि त्वरितविक्रमः ।बाणैर्दास्यामि निशितैः शार्ङ्गमुक्तैः शिलाशितैः

tāvitthaṃ haṃsaḍimbhakau brūhi tvaritavikramaḥ | bāṇairdāsyāmi niśitaiḥ śārṅgamuktaiḥ śilāśitaiḥ

हिन्दी अर्थ

शीघ्रगतिसे वहाँ जाकर उन हंस और डिम्भकसे इस प्रकार कहिये-मैं शारद्ध धनुषद्वारा छोड़े गये और शिलापर तेज किये गये पैने बाणोंद्वारा तुम दोनोंको कर दूँगा

अध्याय 299

श्लोक 3

असिना वाथ दास्यामि निशितेन महात्मनोः ।शिरो वा छेत्स्यते चक्रं मत्करप्रहितं बलिम्

asinā vātha dāsyāmi niśitena mahātmanoḥ | śiro vā chetsyate cakraṃ matkaraprahitaṃ balim

हिन्दी अर्थ

अथवा उन महामनस्वी राजाओंको अपनी तीखी तलवारसे कर समर्पित करूँगा। अथवा मेरे हाथसे छोड़ा गया चक्र उनका सिर काट लेगा और उसीको करके रूपमें समर्पित करेगा

अध्याय 299

श्लोक 4

यो वरं दत्तवान् रुद्रो युवयोर्धार्ष्ट्यकारणम् ।स एव रक्षिता वां स्यात्तं जित्वा वां निहन्म्यहम्

yo varaṃ dattavān rudro yuvayordhārṣṭyakāraṇam | sa eva rakṣitā vāṃ syāttaṃ jitvā vāṃ nihanmyaham

हिन्दी अर्थ

भगवान्‌ रुद्रने तुम दोनोंको जो वर दिया है, वही तुम दोनोंकी ढिठाईका कारण है। यदि वे रुद्रदेव ही तुम दोनोंके रक्षक हो जायेँ तो मैं उनको भी जीतकर तुम दोनोंको मार डालूँगा

अध्याय 299

श्लोक 5

देशोऽयं संविधातव्यो यत्र नः सङ्गतिर्भवेत् ।तत्र गन्ता तथा चास्मि सबलः सहवाहनः

deśo'yaṃ saṃvidhātavyo yatra naḥ saṅgatirbhavet | tatra gantā tathā cāsmi sabalaḥ sahavāhanaḥ

हिन्दी अर्थ

राजाओ ! कोई ऐसा स्थान निश्चित कर लेना चाहिये, जहाँ हमलोगोंका समागम हो। मैं सेना और सवारियोंसहित वहाँ उस स्थानमें आ जाऊँगा

अध्याय 299

श्लोक 6

भवन्तौ निर्भयौ भूत्वा गच्छेतां सबलौ नृपौ ।पुष्करे वा प्रयागे वा मथुरायामथापि वा

bhavantau nirbhayau bhūtvā gacchetāṃ sabalau nṛpau | puṣkare vā prayāge vā mathurāyāmathāpi vā

श्लोक 6–8 का हिन्दी अर्थ

नरेश्वरो! तुम दोनों वीर भी निर्भय होकर सेनासहित वहाँ आ जाना। पुष्करमें या प्रयागमें अथवा मथुरामें जहाँ तुम्हारी इच्छा हो, वहीं मैं सेनासहित आ जाऊँगा, इसमें अन्यथा विचार करनेकी आवश्यकता नहीं । अथवा मित्रताके नाते आपसे ऐसी बात कहलाना उचित न होगा। आप जिसे नहीं कह सकेंगे, उसे आपके साथ जाकर यह सात्यकि कहेंगे। ब्रह्मनू! आप केवल साक्षी बने रहें

अध्याय 299

श्लोक 7

तत्राहं सबलो याता नात्र कार्या विचारणा ।अथवा मित्रभावाच्च वक्तुमेवं न ते क्षमम्

tatrāhaṃ sabalo yātā nātra kāryā vicāraṇā | athavā mitrabhāvācca vaktumevaṃ na te kṣamam

अर्थ श्लोक 6 के साथ

अध्याय 299

श्लोक 8

न शक्यं यत् त्वया वक्तुं तच्च वक्ष्यति सात्यकिः ।त्वया सह ततो गत्वा साक्षिभूतो भव द्विज

na śakyaṃ yat tvayā vaktuṃ tacca vakṣyati sātyakiḥ | tvayā saha tato gatvā sākṣibhūto bhava dvija

अर्थ श्लोक 6 के साथ

अध्याय 299

श्लोक 9

इदं च जाने विप्रेन्द्र स्नेहो मयि सदा तव ।तेन त्वं विजयी भूत्वा संसारे दुःखसङ्कुले ।मत्कथापरमो नित्यं सदा भव जनार्दन

idaṃ ca jāne viprendra sneho mayi sadā tava | tena tvaṃ vijayī bhūtvā saṃsāre duḥkhasaṅkule | matkathāparamo nityaṃ sadā bhava janārdana

हिन्दी अर्थ

विप्रेन्द्र ! मैं यह भी जानता हूँ कि आपका सदा मेरे ऊपर स्नेह बना रहता है। अत: जनार्दनजी! आप दु:खोंसे भरे हुए इस संसारमें विजयी होकर सदा नित्य-निरन्तर मेरी कथा-वातमिं लगे रहिये

स्रोत: local proofread transcription: Sanskrit shlokas of the Harivamsa (Harivamsha, Vishnu and Bhavishya parvas) from sanskritdocuments.org. One chapter per adhyaya; verse numbers as printed in the source (restarting in each adhyaya). Appendix sections are not included. · प्राप्त 19/10/2026

धर्म ग्रंथ निःशुल्क और विज्ञापन-रहित है। Dharma Granth is free and has no ads. इसे ऐसा बनाए रखने में सहयोग करेंHelp keep it that way → How it is funded

शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पाठ-भेद एवं संशोधनVariants & corrections

पाठ-भेद टिप्पणी (Alternative Reading / Variant Notes):

Collated with BORI Critical Edition of Mahabharata Khilaparvan.