Harivamsha Purana
291
अध्याय 291 / 318

Parva 3, Adhyāya 108

19 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ19 श्लोक

अध्याय 291

श्लोक 1

हंसडिम्भकाभ्यां संन्यासस्य निन्दा, जनार्दनेन सन्न्यासाश्रमस्य मण्डनं हंसडिम्भकावूचतुः ज्ञानलेशाद्विहीनात्मन्किं ते व्यवसितं द्विज ।कश्चायमाश्रमो विप्र भवता यः समाश्रितः

haṃsaḍimbhakābhyāṃ saṃnyāsasya nindā, janārdanena sannyāsāśramasya maṇḍanaṃ haṃsaḍimbhakāvūcatuḥ jñānaleśādvihīnātmankiṃ te vyavasitaṃ dvija | kaścāyamāśramo vipra bhavatā yaḥ samāśritaḥ

हिन्दी अर्थ

डिम्भक बोले—ओ द्विज! यह तूने क्या करनेका निश्चय किया है? तेरा अन्तःकरण तो लेशमात्र ज्ञानसे भी शून्य जान पड़ता है। विप्र! तूने जिसका आश्रय लिया है, यह कौन-सा आश्रम है?

अध्याय 291

श्लोक 2

गृहमेधं परित्यज्य किं त्वया साधितं पदम् ।दम्भ एव भवान् व्यक्तं शङ्के नास्त्यत्र कारणम्

gṛhamedhaṃ parityajya kiṃ tvayā sādhitaṃ padam | dambha eva bhavān vyaktaṃ śaṅke nāstyatra kāraṇam

हिन्दी अर्थ

गृहस्थाश्रमको त्यागकर तूने किस अभिलषित वस्तुकी सिद्धि प्राप्त कर ली है; मुझे संदेह है कि “तू स्पष्ट ही मूर्तिमान्‌ दम्भ है', इसके सिवा इस त्यागमें दूसरा कोई कारण नहीं है

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श्लोक 3

लोकांश्चेमान्सदा मूढ नाशयिष्यसि निर्वृतः ।एतान् सर्वान् विनेतासि नरके पातयिष्यसि

lokāṃścemānsadā mūḍha nāśayiṣyasi nirvṛtaḥ | etān sarvān vinetāsi narake pātayiṣyasi

हिन्दी अर्थ

मूढ़! तू सदा इन सब लोगोंका नाश करेगा और इसीमें सुख मानेगा। इन सबका शिक्षक बना हुआ है, अत: अपने साथ इन्हें भी नरकमें गिरायेगा

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श्लोक 4

स्वयं नष्टः परान् मूर्ख नाशयिष्यसि यत्नतः ।अहो शान्ता कथं नास्ति तव मन्दमतेर्द्विज

svayaṃ naṣṭaḥ parān mūrkha nāśayiṣyasi yatnataḥ | aho śāntā kathaṃ nāsti tava mandamaterdvija

श्लोक 4–9 का हिन्दी अर्थ

मूढ़ ब्राह्मण! तू स्वयं तो नष्ट हो ही गया है, दूसरोंका भी यत्रपूर्वक नाश करेगा। अहो! तुझ मन्दबुद्धि द्विजका कोई शासन क्यों नहीं करता है? जिसने तुझे ऐसी शिक्षा दी है, वह भी सर्वथा पापी है; इसमें संशय नहीं है। विप्र! इस आश्रमको छोड़कर गृहस्थ हो जा और मनको संयममें रख। ब्रह्मन्‌! पाँच महायज्ञोंका अनुष्ठान कर और इसीके लिये निरन्तर प्रयलशील बना रह। तदनन्तर उत्तम स्वर्गलोकमें जाकर सुखी हो जा; क्योंकि स्वर्गलोकमें महान्‌ सुख प्राप्त होता है। बाबाजी ! यही कल्याणका मार्ग है; यदि तुझे जीनेकी इच्छा हो तो यही कर। धर्मात्मा ब्राह्मण जनार्दनने उन दोनोंकी कही हुई ऐसी बात सुनकर यति दुर्वासाकी ओर देखा और अत्यन्त विनीतकी भाँति उनके चरणोंमें प्रणाम करके अपने मित्रोंसे कहा—'राजाओ! तुम दोनोंकी बुद्धि और तेज दोनों मंद हो गये हैं। मित्रो! ऐसी बात मुँहसे न निकालो। ऐसा घोर अमड्लकारी वचन इहलोक और परलोकमें भी सुननेयोग्य नहीं है; कौन मन्दबुद्धि मानव यदि वह बन्धु-बान्धवोंसहित जीवित रहना चाहता हो तो ऐसी बात कह सकता है?

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श्लोक 5

सर्वथा त्वद्विनेता च पापो नास्त्यत्र संशयः ।त्यक्त्वेममाश्रमं विप्र गृही भव यतात्मवान्

sarvathā tvadvinetā ca pāpo nāstyatra saṃśayaḥ | tyaktvemamāśramaṃ vipra gṛhī bhava yatātmavān

अर्थ श्लोक 4 के साथ

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श्लोक 6

पञ्च यज्ञान् सदा विप्र कुरु यत्नपरो भव ।ततः स्वर्गं परं गत्वा स्वर्गे हि सुमहत्सुखम्

pañca yajñān sadā vipra kuru yatnaparo bhava | tataḥ svargaṃ paraṃ gatvā svarge hi sumahatsukham

अर्थ श्लोक 4 के साथ

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श्लोक 7

एष श्रेयः पथो विप्र जीविते चेत् स्पृहा तव ।इत्युक्तवन्तौ धर्मात्मा श्रुत्वा विप्रो जनार्दनः

eṣa śreyaḥ patho vipra jīvite cet spṛhā tava | ityuktavantau dharmātmā śrutvā vipro janārdanaḥ

अर्थ श्लोक 4 के साथ

अध्याय 291

श्लोक 8

उवाच च यतिं दृष्ट्वा प्रणम्यासौ सुनीतवत् ।मा ब्रूतामीदृशं वाक्यं राजानौ मन्दतेजसौ

uvāca ca yatiṃ dṛṣṭvā praṇamyāsau sunītavat | mā brūtāmīdṛśaṃ vākyaṃ rājānau mandatejasau

अर्थ श्लोक 4 के साथ

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श्लोक 9

अश्राव्यमीदृशं घोरं लोकयोरुभयोरपि ।को वक्तुमीशो मन्दात्मा यदि जीवेत् सबान्धवः

aśrāvyamīdṛśaṃ ghoraṃ lokayorubhayorapi | ko vaktumīśo mandātmā yadi jīvet sabāndhavaḥ

अर्थ श्लोक 4 के साथ

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श्लोक 10

सर्वथा काल एवायं युवयोर्मन्दचेतसोः ।समाप्त आयुषः शेषो ब्रह्मदण्डहतौ युवाम्

sarvathā kāla evāyaṃ yuvayormandacetasoḥ | samāpta āyuṣaḥ śeṣo brahmadaṇḍahatau yuvām

हिन्दी अर्थ

ये महात्मा तुम दोनों मन्दबुद्धि राजाओंके लिये सर्वथा कालरूप ही हैं! जान पड़ता है तुम्हारी शेष आयु भी आज समास हो गयी। तुम दोनों ब्रह्मदण्डद्वारा मारे गये

अध्याय 291

श्लोक 11

एते हि यतयः शुद्धा ज्ञानदीपितचेतसः ।ज्ञानाग्निदग्धकर्माणः प्राणान् प्राणेषु जुह्वति

ete hi yatayaḥ śuddhā jñānadīpitacetasaḥ | jñānāgnidagdhakarmāṇaḥ prāṇān prāṇeṣu juhvati

हिन्दी अर्थ

श्३१्३ “ये सब-के-सब शुद्ध हृदयवाले यति (संन्यासी ) हैं । इनका अन्त:करण ज्ञानके तेजसे प्रकाशित है । इन्होंने ज्ञानाय्िके द्वारा अपनी सारी संचित कर्मराशि दग्ध कर डाली है और ये अब अपने प्राणोंका ही प्राणस्वरूप अग्ियोंमें होम करते हैं

अध्याय 291

श्लोक 12

ऋते वामीदृशं वाक्यं कः समर्थो ह्यनुब्रुवन् ।सर्वथा ज्ञातमस्माभिः समाप्तमिह जीवितम्

ṛte vāmīdṛśaṃ vākyaṃ kaḥ samartho hyanubruvan | sarvathā jñātamasmābhiḥ samāptamiha jīvitam

हिन्दी अर्थ

ऐसे महात्माओंके प्रति तुम दोनोंको छोड़कर दूसरा कौन मनुष्य बारम्बार ऐसी अनुचित बात कहनेमें समर्थ है? हमने सर्वथा समझ लिया, तुम दोनोंकी जीवनलीला यहीं समाप्त हो गयी

अध्याय 291

श्लोक 13

चत्वार आश्रमाः पूर्वमृषिभिर्विहिता नृपौ ।ब्रह्मचारी गृहस्थश्च वानप्रस्थश्च भिक्षुकः

catvāra āśramāḥ pūrvamṛṣibhirvihitā nṛpau | brahmacārī gṛhasthaśca vānaprasthaśca bhikṣukaḥ

हिन्दी अर्थ

नरेश्वरो ! मन्त्रद्र्टा ऋषियोंने पूर्वकालसे ही चार आश्रमोंका विधान किया है। उनके नाम इस प्रकार हैं—ब्रह्मचारी, गृहस्थ, वानप्रस्थ. और भिक्षुक (संन्यासी )

अध्याय 291

श्लोक 14

तेषामग्रश्चतुर्थोऽयमाश्रमो भिक्षुकः स्मृतः ।आस्ते तस्मिन्महाबुद्धिः स हि पुण्यतरः स्मृतः

teṣāmagraścaturtho'yamāśramo bhikṣukaḥ smṛtaḥ | āste tasminmahābuddhiḥ sa hi puṇyataraḥ smṛtaḥ

हिन्दी अर्थ

इनमें सबसे श्रेष्ठ यह चौथा आश्रम, जिसका नाम भिक्षु या संन्यास है, माना गया है। उस आश्रममें जिसकी महत्त्वपूर्ण बुद्धि है, वह महान्‌ पुण्यात्मा बताया गया है

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श्लोक 15

नोपासिता भवद्भ्यां च वृद्धाः सम्यग् विनीतवत् ।ज्ञानं नाप्तं तपस्विभ्यस्तथा चैवं वदेत कः

nopāsitā bhavadbhyāṃ ca vṛddhāḥ samyag vinītavat | jñānaṃ nāptaṃ tapasvibhyastathā caivaṃ vadeta kaḥ

हिन्दी अर्थ

तुम दोनोंने भलीभाँति विनीत पुरुषके समान कभी वृद्ध पुरुषोंकी उपासना या पेवा नहीं की है तथा तपस्वी मुनियोंसे ज्ञान नहीं प्राप्त केया है, यह बात स्पष्ट हो गयी; अन्यथा उस प्रकार सत्सज्ञ एवं ज्ञान प्रात करनेवाला कौन पुरुष ऐसी बात कह सकता है ?

अध्याय 291

श्लोक 16

अश्राव्यमीदृशं घोरं मया प्राणभृता नृप ।किं करिष्यामि मन्दात्मन्मित्रत्वाद् भवतो नृप

aśrāvyamīdṛśaṃ ghoraṃ mayā prāṇabhṛtā nṛpa | kiṃ kariṣyāmi mandātmanmitratvād bhavato nṛpa

हिन्दी अर्थ

राजा हंस ! मैं प्राण रहते ऐसा पर अनुचित शब्द नहीं सुन सकता; किंतु क्या करूँ? न्दात्मन्‌ ! तू मेरा मित्र है, इसलिये कुछ करते नहीं ननता

अध्याय 291

श्लोक 17

ज्ञानं यदाप्तं भवता गुरुभ्यस्तदत्र दुःखाय हि केवलं नृप ।ज्ञानं हि धर्मप्रभवं यथेष्टं वलाद्धि पापस्य विधातृरूपम्

jñānaṃ yadāptaṃ bhavatā gurubhyastadatra duḥkhāya hi kevalaṃ nṛpa | jñānaṃ hi dharmaprabhavaṃ yatheṣṭaṃ valāddhi pāpasya vidhātṛrūpam

हिन्दी अर्थ

नरेश्वर ! तूने गुरुजनोंसे जो ज्ञान प्राप्त किया पा, वह तो यहाँ केवल दुःखका ही जनक हुआ। जो तन धर्माचरणसे प्राप्त होता है, वही यथेष्ट फलकी प्राप्ति ररानेवाला है। बल अथवा हटसे प्राप्त किया हुआ ज्ञान ली पापका ही विधायक होता है

अध्याय 291

श्लोक 18

युवां विहाय यास्ये वा पतेयं वा शिलातलम् ।पिबेयं वा विषं घोरं पतेयं वा महोर्मिषु

yuvāṃ vihāya yāsye vā pateyaṃ vā śilātalam | pibeyaṃ vā viṣaṃ ghoraṃ pateyaṃ vā mahormiṣu

हिन्दी अर्थ

मैं तुम दोनोंको ोड़कर चला जाऊँ या ऊँचेसे पत्थरपर कूद पड़ें अथवा पर विष पी लूँ किंवा महासागरकी तरक्रोंमें गिर ऊँ

अध्याय 291

श्लोक 19

आत्मानं वात्र सन्त्यक्ष्ये पश्यतां शृण्वतां पुनः ।इत्युक्त्वा विललापैवं मा ब्रूतमिति तौ वदन्

ātmānaṃ vātra santyakṣye paśyatāṃ śṛṇvatāṃ punaḥ | ityuktvā vilalāpaivaṃ mā brūtamiti tau vadan

हिन्दी अर्थ

अथवा तुम सबके देखते-सुनते आत्महत्या र लूँ।' ऐसा कहकर जनार्दन उन दोनों राजाओंसे ऐसी बात न कहो, न कहो' यह कहता हुआ इस कार विलाप करने लगा

स्रोत: local proofread transcription: Sanskrit shlokas of the Harivamsa (Harivamsha, Vishnu and Bhavishya parvas) from sanskritdocuments.org. One chapter per adhyaya; verse numbers as printed in the source (restarting in each adhyaya). Appendix sections are not included. · प्राप्त 19/10/2026

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शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पाठ-भेद एवं संशोधनVariants & corrections

पाठ-भेद टिप्पणी (Alternative Reading / Variant Notes):

Collated with BORI Critical Edition of Mahabharata Khilaparvan.