Harivamsha Purana
286
अध्याय 286 / 318

Parva 3, Adhyāya 103

10 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ10 श्लोक

अध्याय 286

श्लोक 1

हंसडिम्भकाभ्यां विषये जनमेजयस्य प्रश्नं भूय एव द्विजश्रेष्ठ शङ्खचक्रगदाभृतः ।चरितं श्रोतुमिच्छामि विस्तरेण तपोधन

haṃsaḍimbhakābhyāṃ viṣaye janamejayasya praśnaṃ bhūya eva dvijaśreṣṭha śaṅkhacakragadābhṛtaḥ | caritaṃ śrotumicchāmi vistareṇa tapodhana

हिन्दी अर्थ

नमो श्३०३ मोडध्याय: अाण यमें जनमेजयका प्रश्न जनमेजयने कहा—द्विजश्रेष्ठ! तपोधन! मैं श्धु, चक्र और गदा धारण करनेवाले भगवान्‌ श्रीकृष्णके चरित्रको पुन: विस्तारके साथ सुनना चाहता हूँ

अध्याय 286

श्लोक 2

न हि मे तृप्तिरस्तीह शृण्वतः कैशवीं कथाम् ।को नु नाम हरेर्विष्णोर्देवदेवस्य चक्रिणः

na hi me tṛptirastīha śṛṇvataḥ kaiśavīṃ kathām | ko nu nāma harerviṣṇordevadevasya cakriṇaḥ

श्लोक 2–3 का हिन्दी अर्थ

भगवान्‌ केशवकी कथा सुनते हुए यहाँ मुझे कभी तृप्ति नहीं होती। कौन ऐसा पुरुष होगा, जो देवाधिदेव चक्रपाणि विष्णु हरिके नाम और यशको दिन-रात सुनता और उसीमें रमण करता हुआ कभी तृप्तिका अनुभव करेगा? (उसे न सुनना चाहेगा?) भगवान्‌ श्रीहरिकी कथाका जो श्रवण है, यही एकमात्र पुरुषार्थ माना गया है

अध्याय 286

श्लोक 3

शृण्वंस्तथा रमन् वापि तृप्तिं याति दिवानिशम् ।पुरुषार्थोऽयमेवैको यत्कथाश्रवणं हरेः

śṛṇvaṃstathā raman vāpi tṛptiṃ yāti divāniśam | puruṣārtho'yamevaiko yatkathāśravaṇaṃ hareḥ

अर्थ श्लोक 2 के साथ

अध्याय 286

श्लोक 4

कथमासीज्जगद्धेतोर्हंसस्य डिम्भकस्य च ।समितिः सर्वभूतानां सदा विस्मयदायिनी

kathamāsījjagaddhetorhaṃsasya ḍimbhakasya ca | samitiḥ sarvabhūtānāṃ sadā vismayadāyinī

हिन्दी अर्थ

जगत्‌के लिये हंस और डिम्भककी कैसी समिति संगठित हुई थी, जो समस्त प्राणियोंको सदा ही विस्मय प्रदान करनेवाली थी ?

अध्याय 286

श्लोक 5

विचक्रस्य कथं युद्धं दानवस्य महात्मनः ।स तयोर्मित्रतां यात इत्येवमनुशुश्रुम

vicakrasya kathaṃ yuddhaṃ dānavasya mahātmanaḥ | sa tayormitratāṃ yāta ityevamanuśuśruma

हिन्दी अर्थ

महामनस्वी दानव विचक्रका युद्ध किस प्रकार हुआ था? सुननेमें आया है कि वह उन दोनोंका मित्र हो गया था

अध्याय 286

श्लोक 6

तौ सुतौ वीर्यसम्पन्नौ शिष्यौ भृगुसुतस्य ह ।सर्वास्त्रकुशलौ वीरौ हराल्लब्धवरौ किल

tau sutau vīryasampannau śiṣyau bhṛgusutasya ha | sarvāstrakuśalau vīrau harāllabdhavarau kila

हिन्दी अर्थ

वे दोनों राजकुमार बल-पराक्रमसे सम्पन्न तथा मुनिवर भार्गवके शिष्य थे। कहते हैं कि उन दोनोंने भगवान्‌ शड्टरसे वर प्राप्त किये थे। वे दोनों वीर सम्पूर्ण अस्त्रोंमें कुशल थे

अध्याय 286

श्लोक 7

सङ्ग्रामः सुमहानासीदित्युक्तं भवता पुरा ।तयोश्च नृपयोर्विप्र केशवस्य जगत्पतेः

saṅgrāmaḥ sumahānāsīdityuktaṃ bhavatā purā | tayośca nṛpayorvipra keśavasya jagatpateḥ

हिन्दी अर्थ

विप्रवर! आपने पहले कहा था कि जगदीश्वर श्रीकृष्णका उन दोनों राजाओं (हंस और डिम्भक)-के साथ बड़ा भारी संग्राम हुआ था

अध्याय 286

श्लोक 8

कस्य पुत्रौ समुत्पन्नौ यथाभूद् विग्रहो महान् ।अष्टाशीतिसहस्राणि दानवानां तरस्विनाम्

kasya putrau samutpannau yathābhūd vigraho mahān | aṣṭāśītisahasrāṇi dānavānāṃ tarasvinām

श्लोक 8–9 का हिन्दी अर्थ

वे दोनों किसके पुत्र होकर उत्पन्न हुए थे, जिससे उनके पाथ महान्‌ युद्ध हुआ। महाराज! सुना है कि विजयकी अभिलाषा रखनेवाले दानव विचक्रके पास युद्धके लिये भट्टासी हजार वेगशाली दानवोंकी सेनाएँ थीं। वे सब- फ्रे-सब दानव तीखे शूल धारण करते थे

अध्याय 286

श्लोक 9

बलान्यथ विचक्रस्य शितशूलधराणि च ।आसन् युद्धे महाराज दानवस्य जयैषिणः

balānyatha vicakrasya śitaśūladharāṇi ca | āsan yuddhe mahārāja dānavasya jayaiṣiṇaḥ

अर्थ श्लोक 8 के साथ

अध्याय 286

श्लोक 10

यदूनामन्तरं प्रेप्सुर्यदूनां युद्धकाङ्क्षया ।देवासुरे महायुद्धे देवाञ्जयति दुर्धरः ।तद्वधार्थं सदा यत्नमकरोच्चैव केशवः

yadūnāmantaraṃ prepsuryadūnāṃ yuddhakāṅkṣayā | devāsure mahāyuddhe devāñjayati durdharaḥ | tadvadhārthaṃ sadā yatnamakaroccaiva keśavaḥ

हिन्दी अर्थ

दानव वेचक्र दुर्जय वीर था। वह युद्धकी इच्छासे यादवोंकी त्रुटि पा दुर्बलता देखा करता था। देवताओं और असुरोंके हहायुद्धमें वह देवताओंपर विजय पाता था और भगवान्‌ श्रीकृष्ण उसके वधके लिये सदा प्रयत्रशील रहते थे

स्रोत: local proofread transcription: Sanskrit shlokas of the Harivamsa (Harivamsha, Vishnu and Bhavishya parvas) from sanskritdocuments.org. One chapter per adhyaya; verse numbers as printed in the source (restarting in each adhyaya). Appendix sections are not included. · प्राप्त 19/10/2026

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स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

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6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

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व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

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आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

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