Harivamsha Purana
272
अध्याय 272 / 318

Parva 3, Adhyāya 89

19 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ19 श्लोक

अध्याय 272

श्लोक 1

भगवता शङ्करेण ऋषिभ्यः श्रीकृष्णतत्त्वस्य उपदेशं इत्युक्त्वा देवदेवेशं मुनीनाह पुनः शिवः ।एवं जानीत हे विप्रा ये भक्ता द्रष्टुमागताः

bhagavatā śaṅkareṇa ṛṣibhyaḥ śrīkṛṣṇatattvasya upadeśaṃ ityuktvā devadeveśaṃ munīnāha punaḥ śivaḥ | evaṃ jānīta he viprā ye bhaktā draṣṭumāgatāḥ

हिन्दी अर्थ

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! देवदेवेधर श्रीकृष्णसे ऐसा कहकर भगवान्‌ शिवने पुन: मुनियोंसे कहा-'हे ब्राह्मणो! जो भक्तजन यहाँ श्रीहरिका दर्शन करनेके लिये आये हैं, वे सब यह जान लें

अध्याय 272

श्लोक 2

एतदेव परं वस्तु नैतस्मात् परमस्ति वः ।एतदेव विजानीध्वमेतद् वः परमं तपः

etadeva paraṃ vastu naitasmāt paramasti vaḥ | etadeva vijānīdhvametad vaḥ paramaṃ tapaḥ

हिन्दी अर्थ

ये श्रीकृष्ण ही परम वस्तु हैं, तुमलोगोंके लिये इनसे बढ़कर और कोई दूसरी वस्तु नहीं है। ये ही तुम्हारी तपस्याके सर्वोत्तम फल हैं, इस बातको तुमलोग अच्छी तरह जान लो

अध्याय 272

श्लोक 3

एतदेव सदा विप्रा ध्येयं सततमानसैः ।एतद् वः परमं श्रेय एतद् वः परमं धनम्

etadeva sadā viprā dhyeyaṃ satatamānasaiḥ | etad vaḥ paramaṃ śreya etad vaḥ paramaṃ dhanam

हिन्दी अर्थ

विप्रगण! सदा एकाग्रचित्त होकर नित्य-निरन्तर इन्हीं श्रीकृष्णका ध्यान करना चाहिये। ये ही तुम्हारे परम कल्याण हैं और ये ही तुम्हारे परम धन हैं

अध्याय 272

श्लोक 4

एतद् वो जन्मनः कृत्यमेतद् वस्तपसः फलम् ।एष वः पुण्यनिलय एष धर्मः सनातनः

etad vo janmanaḥ kṛtyametad vastapasaḥ phalam | eṣa vaḥ puṇyanilaya eṣa dharmaḥ sanātanaḥ

हिन्दी अर्थ

ये ही तुम्हारे जनम और जीवनकी सफलता हैं । ये ही तुम्हारी तपस्याके फल हैं। ये ही तुम्हारे पुण्योंके भण्डार हैं और ये ही सनातन धर्म हैं

अध्याय 272

श्लोक 5

एष वो मोक्षदाता च एष मार्ग उदाहृतः ।एष पुण्यप्रदः साक्षादेतत् च कर्मणः फलम्

eṣa vo mokṣadātā ca eṣa mārga udāhṛtaḥ | eṣa puṇyapradaḥ sākṣādetat ca karmaṇaḥ phalam

हिन्दी अर्थ

ये ही तुम्हें मोक्ष देनेवाले हैं और ये ही गन्तव्य मार्ग बताये गये हैं। ये ही साक्षात्‌ पुण्यदायक और ये ही तुम्हारे सत्कर्मोंके फल हैं

अध्याय 272

श्लोक 6

एतदेव प्रशंसन्ति विद्वांसो ब्रह्मवादिनः ।एष त्रयीगतिर्विप्राः प्रार्थ्यो ब्रह्मविदां सदा

etadeva praśaṃsanti vidvāṃso brahmavādinaḥ | eṣa trayīgatirviprāḥ prārthyo brahmavidāṃ sadā

हिन्दी अर्थ

ब्रह्मवादी विद्वान्‌ सदा इनकी ही प्रशंसा करते हैं। ये ही तीनों वेदोंकी गति (आश्रय) हैं। ब्राह्मणों! ब्रह्मवेत्ता पुरुष सदा इन्हींकी प्रासिके लिये प्रार्थना करते हैं

अध्याय 272

श्लोक 7

एतदेव प्रशंसन्ति साङ्ख्ययोगसमाश्रिताः ।एष ब्रह्मविदां मार्गः कथितो वेदवादिभिः

etadeva praśaṃsanti sāṅkhyayogasamāśritāḥ | eṣa brahmavidāṃ mārgaḥ kathito vedavādibhiḥ

हिन्दी अर्थ

सांख्य और योगका आश्रय लेनेवाले विद्वान्‌ इन्हींके गुण गाते हैं। वेदवादी विद्वानोंने इन्हींको ब्रह्मवेत्ताओंका मार्ग बताया है

अध्याय 272

श्लोक 8

एवमेव विजानीत नात्र कार्या विचारणा ।हरिरेकः सदा ध्येयो भवद्भिः सत्त्वमास्थितैः

evameva vijānīta nātra kāryā vicāraṇā | harirekaḥ sadā dhyeyo bhavadbhiḥ sattvamāsthitaiḥ

हिन्दी अर्थ

विप्रवरो! तुम सदा ऐसा ही जानो। इसमें विचार करनेकी आवश्यकता नहीं है । सत्त्वगुणका आश्रय लेनेवाले तुम-जैसे भक्तोंको सदा एकमात्र श्रीहरिका ही चिन्तन करना चाहिये

अध्याय 272

श्लोक 10

नान्यो जगति देवोऽस्ति विष्णोर्नारायणात्परः ।ओमित्येवं सदा विप्राः पठत ध्यात केशवम् ॥ ९॥।ततो निःश्रेयसप्राप्तिर्भविष्यति न संशयः ।एवं ध्यातो हरिः साक्षात्प्रसन्नो वो भविष्यति

nānyo jagati devo'sti viṣṇornārāyaṇātparaḥ | omityevaṃ sadā viprāḥ paṭhata dhyāta keśavam || 9||| tato niḥśreyasaprāptirbhaviṣyati na saṃśayaḥ | evaṃ dhyāto hariḥ sākṣātprasanno vo bhaviṣyati

हिन्दी अर्थ

ऐसा करनेसे तुम्हें परम कल्याणकी प्राप्ति होगी। इसमें संशय नहीं है। इस प्रकार ध्यान करनेपर साक्षात्‌ श्रीहरि तुमलोगोंपर प्रसन्न होंगे

अध्याय 272

श्लोक 11

भवनाशमयं देवः करिष्यति दृढं हरिः ।सदा ध्यात हरिं विप्रा यदीच्छ प्राप्तुमच्युतम्

bhavanāśamayaṃ devaḥ kariṣyati dṛḍhaṃ hariḥ | sadā dhyāta hariṃ viprā yadīccha prāptumacyutam

हिन्दी अर्थ

ये भगवान्‌ विष्णु तुम्हारे संसारबन्धनका दृढ़तापूर्वक नाश कर डालेंगे। ब्राह्मणो! यदि भगवान्‌ अच्युतको प्राप्त करनेकी इच्छा हो तो सदा ही इन श्रीहरिका ध्यान करो

अध्याय 272

श्लोक 12

एष संसारविभवं विनाशयति वो गुरुः ।स्मरध्वं सततं विष्णुं पठध्वं त्रिशरीरिणम्

eṣa saṃsāravibhavaṃ vināśayati vo guruḥ | smaradhvaṃ satataṃ viṣṇuṃ paṭhadhvaṃ triśarīriṇam

हिन्दी अर्थ

ये ही तुम्हारे गुरु हैं। ये संसार-बन्धनका विस्तार करनेवाली मूल अविद्याका नाश कर डालेंगे, अतः: तुमलोग ब्रह्मा, विष्णु एवं शिवरूप त्रिविध शरीर धारण करनेवाले श्रीहरिका सदा स्मरण एवं कीर्तन किया करो

अध्याय 272

श्लोक 13

मनःसंयमनं विप्राः कुरुध्वं यत्नतः सदा ।शुद्धेऽन्तःकरणे विष्णुः प्रसीदति तपोधनाः

manaḥsaṃyamanaṃ viprāḥ kurudhvaṃ yatnataḥ sadā | śuddhe'ntaḥkaraṇe viṣṇuḥ prasīdati tapodhanāḥ

हिन्दी अर्थ

ब्राह्मणों ! तुमलोग सदा यत्नपूर्वक मनका संयम करो। तपोधनो ! संयमसे अन्त:करण शुद्ध हो जानेपर भगवान्‌ विष्णु प्रसन्न होते हैं

अध्याय 272

श्लोक 14

ध्यात्वा मां सर्वयत्नेन ततो जानीत केशवम् ।उपास्योऽहं सदा विप्रा उपास्येऽस्मिन् हरी स्मृतः

dhyātvā māṃ sarvayatnena tato jānīta keśavam | upāsyo'haṃ sadā viprā upāsye'smin harī smṛtaḥ

हिन्दी अर्थ

ब्राह्मणो! तुम सम्पूर्ण यत्से मेरा चिन्तन करके फिर केशवका ज्ञान प्राप्त करो। इन उपास्यदेव श्रीहरिमें सदा मैं ही उपास्य माना गया हूँ

अध्याय 272

श्लोक 15

उपायोऽयं मया प्रोक्तो नात्र सन्देह इत्यपि ।अयं मायी सदा विप्रा यतध्वमघनाशने

upāyo'yaṃ mayā prokto nātra sandeha ityapi | ayaṃ māyī sadā viprā yatadhvamaghanāśane

हिन्दी अर्थ

विप्रगण! यह मैंने भगवान्‌की प्राप्तिका उपाय बताया, इसमें संदेह नहीं है। ये भगवान्‌ मायाके अधिपति हैं, तुम सब लोग इन पापहारी हरिकी प्राप्तिके लिये सदा प्रयत्न करते रहो

अध्याय 272

श्लोक 16

यथा वो बुद्धिरखिला शुद्धा भवति यत्नतः ।तथा कुरुत विप्रेन्द्रा यथा देवः प्रसीदति

yathā vo buddhirakhilā śuddhā bhavati yatnataḥ | tathā kuruta viprendrā yathā devaḥ prasīdati

हिन्दी अर्थ

विप्रवरो ! जिस प्रकारसे यत्र करनेपर तुम्हारी सारी बुद्धि शुद्ध हो जाय और जिससे भगवान्‌ प्रसन्न हो जायेँ, वैसा करो

अध्याय 272

श्लोक 17

एवमुक्तास्ततः सर्वे मुनयः पुण्यशीलिनः ।यथावदुपगृह्णाना निरसन् संशयं नृप

evamuktāstataḥ sarve munayaḥ puṇyaśīlinaḥ | yathāvadupagṛhṇānā nirasan saṃśayaṃ nṛpa

हिन्दी अर्थ

वैशम्पायनजी कहते हैं—नरेश्वर ! भगवान्‌ शड्रके ऐसा कहनेपर उन समस्त पुण्यशील मुनियोंने यथावत्‌ रूपसे उनके उपदेशको ग्रहण किया और अपने मनसे संशयको निकाल दिया

अध्याय 272

श्लोक 18

एवमेवेति तं विप्राः प्राहुः प्राञ्जलयो हरम् ।छिन्नो नः संशयः सर्वो गृहीतोऽर्थः स तादृशः

evameveti taṃ viprāḥ prāhuḥ prāñjalayo haram | chinno naḥ saṃśayaḥ sarvo gṛhīto'rthaḥ sa tādṛśaḥ

हिन्दी अर्थ

ध्याय: + १२७३ उन ब्राह्मणोंने हाथ जोड़कर महादेवजीसे कहा—भगवन्‌ ! आपने जैसा कहा है, ऐसी ही बात है। हमारा पारा संशय नष्ट हो गया और हमने वैसा ही सिद्धान्त 'वीकार कर लिया

अध्याय 272

श्लोक 19

एतदर्थं समायाता वयमद्य तवालयम् ।सङ्गमाद् युवयोः सर्वो नष्टो मोहो महानिह

etadarthaṃ samāyātā vayamadya tavālayam | saṅgamād yuvayoḥ sarvo naṣṭo moho mahāniha

हिन्दी अर्थ

प्रभो! हम इसीलिये आज भापके निवासस्थानपर आये थे। आप दोनोंके समागमसे हाँ हमारा सारा महान्‌ मोह नष्ट हो गया

अध्याय 272

श्लोक 20

यथा वदसि देवेश तथा नः श्रेयसे परम् ।यथाऽऽह भगवान् रुद्रो यतामः सततं हरौ ।इति ते मुनयः प्रीताः प्रणेमुः केशवं हरिम्

yathā vadasi deveśa tathā naḥ śreyase param | yathā''ha bhagavān rudro yatāmaḥ satataṃ harau | iti te munayaḥ prītāḥ praṇemuḥ keśavaṃ harim

हिन्दी अर्थ

देवे श्र ! भाप जैसा कहते हैं, वैसा करनेसे ही हमारा परम कल्याण होगा। आप भगवान्‌ रुद्रने जैसा कहा है, उसके अनुसार हम सदा श्रीहरिकी प्राप्तिके लिये यत्र करते हेंगे। ऐसा कहकर उन प्रसन्न हुए मुनियोंने श्रीकेशव हरिको प्रणाम किया

स्रोत: local proofread transcription: Sanskrit shlokas of the Harivamsa (Harivamsha, Vishnu and Bhavishya parvas) from sanskritdocuments.org. One chapter per adhyaya; verse numbers as printed in the source (restarting in each adhyaya). Appendix sections are not included. · प्राप्त 19/10/2026

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शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पाठ-भेद एवं संशोधनVariants & corrections

पाठ-भेद टिप्पणी (Alternative Reading / Variant Notes):

Collated with BORI Critical Edition of Mahabharata Khilaparvan.