Harivamsha Purana
271
अध्याय 271 / 318

Parva 3, Adhyāya 88

67 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ67 श्लोक

अध्याय 271

श्लोक 1

भगवता शिवेन श्रीविष्णोः स्तुतिः ततो वृषध्वजो देवः शूली साक्षादुमापतिः ।करं करेण संस्पृश्य विष्णोश्चक्रधरस्य ह

bhagavatā śivena śrīviṣṇoḥ stutiḥ tato vṛṣadhvajo devaḥ śūlī sākṣādumāpatiḥ | karaṃ kareṇa saṃspṛśya viṣṇoścakradharasya ha

श्लोक 1–2 का हिन्दी अर्थ

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! तदनन्तर अपनी ध्वजामें वृषभका चिह्न धारण करनेवाले देवता, त्रिशूलधारी साक्षात्‌ उमावल्लभ भगवान्‌ रुद्र चक्रधारी श्रीकृष्णका हाथ अपने हाथमें लेकर समस्त देवताओं तथा पवित्र अन्तःकरणवाले मुनियोंके सुनते हुए गरुड़्ध्वज केशवसे इस प्रकार बोले—

अध्याय 271

श्लोक 2

प्रोवाच भगवान् रुद्रः केशवं गरुडध्वजम् ।शृण्वतां सर्वदेवानां मुनीनां भावितात्मनाम्

provāca bhagavān rudraḥ keśavaṃ garuḍadhvajam | śṛṇvatāṃ sarvadevānāṃ munīnāṃ bhāvitātmanām

अर्थ श्लोक 1 के साथ

अध्याय 271

श्लोक 3

किमिदं देवदेवेश चक्रपाणे जनार्दन ।तपश्चर्या किमर्थं ते प्रार्थना तव का विभो

kimidaṃ devadeveśa cakrapāṇe janārdana | tapaścaryā kimarthaṃ te prārthanā tava kā vibho

हिन्दी अर्थ

देवदेवेश्वर! चक्रपाणे! जनार्दन ! आप यह क्या कर रहे हैं ? आपकी यह तपश्चर्या किसलिये हो रही है? प्रभो ! आपकी प्रार्थना क्या है?

अध्याय 271

श्लोक 4

स्वयं विष्णुर्भवान्नित्यस्तपस्त्वं तपसां हरे ।पुत्रार्थं यदि ते देव तपश्चर्या जनार्दन

svayaṃ viṣṇurbhavānnityastapastvaṃ tapasāṃ hare | putrārthaṃ yadi te deva tapaścaryā janārdana

श्लोक 4–5 का हिन्दी अर्थ

हरे ! आप स्वयं नित्य-स्वरूप भगवान्‌ विष्णु हैं, तपस्याओंकी भी तपस्या हैं। देव! जनार्दन! जगत्पते! यदि आपकी यह तपस्या पुत्रके लिये हो रही है तो मैंने पहलेसे ही. आपको पुत्र दे रखा है। देव! भगवन्‌! कारणात्मक नारायण! इसमें जो कारण है, उसे आप सुनिये

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श्लोक 5

पुत्रो दत्तो मया देव पूर्वमेव जगत्पते ।शृणु तत्रापि भगवन् कारणं कारणात्मक

putro datto mayā deva pūrvameva jagatpate | śṛṇu tatrāpi bhagavan kāraṇaṃ kāraṇātmaka

अर्थ श्लोक 4 के साथ

अध्याय 271

श्लोक 6

तपश्चर्तुं प्रवृत्तोऽहं कुतश्चित् कारणाद्धरे ।वर्षायुतं महाघोरं पुरा कृतयुगे तदा

tapaścartuṃ pravṛtto'haṃ kutaścit kāraṇāddhare | varṣāyutaṃ mahāghoraṃ purā kṛtayuge tadā

हिन्दी अर्थ

हरे ! प्राचीन कालके कृतयुगकी बात है कि मैं उन दिनों किसी कारणवश दस हजार वर्षोके लिये महाघोर तपस्यामें संलग्न हुआ था

अध्याय 271

श्लोक 7

भवानी तत्र मे देव परिचर्तुं तदाभवत् ।पित्रा नियुक्ता देवेश उमैषा वरवर्णिनी

bhavānī tatra me deva paricartuṃ tadābhavat | pitrā niyuktā deveśa umaiṣā varavarṇinī

हिन्दी अर्थ

देव ! देवेध्र ! उस समय वहाँ यह मेरी धर्मपत्नी परम सुन्दरी उमा अपने पिताकी आज्ञासे मेरी सेवा करती थी

अध्याय 271

श्लोक 8

भीत इन्द्रस्तदा देव मारं मां प्रैषयत्तदा ।मधुना सह संयुक्तो मारो मामागतस्तदा

bhīta indrastadā deva māraṃ māṃ praiṣayattadā | madhunā saha saṃyukto māro māmāgatastadā

हिन्दी अर्थ

देव! मेरी उस तपस्यासे इन्द्रको भय हुआ, अतः उस समय उन्होंने कामदेवको मेरे पास भेजा। तब कामदेव अपने सखा वसन्तको साथ लेकर मेरे समीप आया

अध्याय 271

श्लोक 9

लक्ष्यं मामकरोत् तत्र बाणस्य प्रेषितस्य ह ।एष मां सेवते तत्र दानात् पुष्पादिनां हरे

lakṣyaṃ māmakarot tatra bāṇasya preṣitasya ha | eṣa māṃ sevate tatra dānāt puṣpādināṃ hare

हिन्दी अर्थ

हरे! वहाँ पहुँचते ही कामदेवने मुझे अपने चलाये हुए बाणका निशाना बनाया। यह पार्वती वहाँ फूल आदि जुटानेके द्वारा मेरी सेवा करती थी

अध्याय 271

श्लोक 10

ततः क्रुद्धोऽहमभवं दृष्ट्वा मारं तथाविधम् ।क्रुद्ध्यतो मम देवेश नेत्रादग्निः पपात ह

tataḥ kruddho'hamabhavaṃ dṛṣṭvā māraṃ tathāvidham | kruddhyato mama deveśa netrādagniḥ papāta ha

हिन्दी अर्थ

देवेश्वर ! कामदेवको अपने ऊपर बाण चलाते देख मैं उसके ऊपर कुषपित हो उठा। क्रोध करनेपर मेरे ललाटस्थ नेत्रसे सहसा अग्रिका प्रादुर्भाव हुआ

अध्याय 271

श्लोक 11

सोऽयमग्निस्तदा मारं भस्मसात्कृतवान् हरे ।अचिन्तयं तदा विष्णो शक्रस्यैतच्चिकीर्षितम्

so'yamagnistadā māraṃ bhasmasātkṛtavān hare | acintayaṃ tadā viṣṇo śakrasyaitaccikīrṣitam

हिन्दी अर्थ

सर्वव्यापी हरे! उस अग्रिने उस समय कामदेवको जलाकर भस्म कर दिया, तब मेरे ध्यानमें यह बात आयी कि यह सारी करतूत इन्द्रकी थी

अध्याय 271

श्लोक 12

ततः प्रभृति देवेश दया तं प्रति वर्तते ।ब्रह्मणा च नियुक्तोऽस्मि प्रीतस्तत्र जनार्दन

tataḥ prabhṛti deveśa dayā taṃ prati vartate | brahmaṇā ca niyukto'smi prītastatra janārdana

हिन्दी अर्थ

देवेश्वर! जनार्दन! तभीसे कामदेवके प्रति मुझे बड़ी दया आती है। मैं मन-ही- मन उसपर प्रसन्न हूँ। ब्रह्माजीने भी मुझे प्रेरित किया है कि मैं उसके लिये नूतन शरीर-धारणका अवसर दूँ

अध्याय 271

श्लोक 13

नियुक्तः पुत्ररूपेण स ते देव जगत्पते ।ज्येष्ठस्तव सुतो देव प्रद्युम्नेत्यभिविश्रुतः

niyuktaḥ putrarūpeṇa sa te deva jagatpate | jyeṣṭhastava suto deva pradyumnetyabhiviśrutaḥ

श्लोक 13–17 का हिन्दी अर्थ

देव ! जगत्पते ! अत: मैंने कामदेवको आपके पुत्ररूपसे नियुक्त किया है। देव! वह प्रद्युप्न नामसे विख्यात आपका ज्येष्ठ पुत्र होगा। देवेश्वर ! आप उसे कामदेव ही समझें, इसमें अन्यथा विचार करनेकी कोई आवश्यकता नहीं है' ऐसा कहकर श्रीहरिके यथार्थ स्वरूपको सुननेकी इच्छावाले मुनियोंके समक्ष उनके यथावत्‌ स्वरूपका परिचय देते हुए-से सत्पुरुषशिरोमणि सर्वेश्वर भगवान्‌ शड्र उमादेवीके साथ श्रीकृष्णके लिये हाथ जोड़कर फिर इस प्रकार बोलने-'उनकी यथात्मताका प्रतिपादन करनेको उद्यत हुए। कुरुश्रेष्ठ वहाँ महादेवजीके इस प्रकार हाथ जोड़नेपर दूसरे-दूसरे मुनि, देवता, गन्धर्व, सिद्ध तथा किन्नरोंने भी उन सर्वव्यापी देवदेवेश्वर श्रीहरिके समीप हाथ जोड़ लिये

अध्याय 271

श्लोक 14

स्मरं तं विद्धि देवेश नात्र कार्या विचारणा ।इत्युक्त्वा पुनराहेदं याथात्म्यं दर्शयन्निव

smaraṃ taṃ viddhi deveśa nātra kāryā vicāraṇā | ityuktvā punarāhedaṃ yāthātmyaṃ darśayanniva

अर्थ श्लोक 13 के साथ

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श्लोक 15

मुनीनां श्रोतुकामानां याथात्म्यं तत्र सत्तमः ।अञ्जलिं सम्पुटं कृत्वा विष्णुमुद्दिश्य शङ्करः

munīnāṃ śrotukāmānāṃ yāthātmyaṃ tatra sattamaḥ | añjaliṃ sampuṭaṃ kṛtvā viṣṇumuddiśya śaṅkaraḥ

अर्थ श्लोक 13 के साथ

अध्याय 271

श्लोक 16

उमया सार्धमीशानो याथात्म्यं वक्तुमैहत ।हरे कुर्वति तत्रैवमञ्जलिं कुरुसत्तम

umayā sārdhamīśāno yāthātmyaṃ vaktumaihata | hare kurvati tatraivamañjaliṃ kurusattama

अर्थ श्लोक 13 के साथ

अध्याय 271

श्लोक 17

मुनयो देवगन्धर्वाः सिद्धाश्च सह किन्नराः ।अञ्जलिं चक्रिरे विष्णौ देवदेवेश्वरे हरौ

munayo devagandharvāḥ siddhāśca saha kinnarāḥ | añjaliṃ cakrire viṣṇau devadeveśvare harau

अर्थ श्लोक 13 के साथ

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श्लोक 18

यत्तत्कारणमाहुस्तत्साङ्ख्याः प्रकृतिसंज्ञकम् ।ततो महान् समुत्पन्नः प्रकृतिर्यस्य कारणम्

yattatkāraṇamāhustatsāṅkhyāḥ prakṛtisaṃjñakam | tato mahān samutpannaḥ prakṛtiryasya kāraṇam

हिन्दी अर्थ

महेश्वर बोले—सांख्यशास्त्रके विद्वान्‌ जिस प्रकृतिसंज्ञक कारणतत्त्वका वर्णन करते हैं, उससे * महान्‌' (महत्तत्त्व या समष्टि बुद्धि) उत्पन्न हुआ, जिसका उपादान कारण प्रकृति है

अध्याय 271

श्लोक 19

त्रिधा भूतं जगद्योनिं प्रधानं कारणात्मकम् ।सत्त्वं रजस्तमो विष्णो जगदण्डं जनार्दन

tridhā bhūtaṃ jagadyoniṃ pradhānaṃ kāraṇātmakam | sattvaṃ rajastamo viṣṇo jagadaṇḍaṃ janārdana

श्लोक 19–20 का हिन्दी अर्थ

सर्वव्यापी जनार्दन! कारणस्वरूप जो प्रधान (प्रकृति) है, वही इस जगत्‌की योनि है। इसके तीन भेद हैं—सत्त्व, रज और तम। इस त्रिगुणमयी प्रकृतिसे ही यह विश्व-ब्रह्माण्ड उत्पन्न हुआ है। इसका कारणभूत जो सांख्य-प्रकृति है, उसे विद्वान्‌ पुरुष आपका ही स्वरूप बताते हैं। विष्णो! उसके रूपमें आप ही परिणामको प्राप्त होकर उसके अधिष्ठाता बने रहते हैं

अध्याय 271

श्लोक 20

तस्य कारणमाहुस्त्वां साङ्ख्यप्रकृतिसंज्ञकम् ।तद्रूपेण भवान् विष्णो परिणम्याधितिष्ठति

tasya kāraṇamāhustvāṃ sāṅkhyaprakṛtisaṃjñakam | tadrūpeṇa bhavān viṣṇo pariṇamyādhitiṣṭhati

अर्थ श्लोक 19 के साथ

अध्याय 271

श्लोक 21

तस्मात्तु महतो घोरादहङ्कारो महानभूत् ।स त्वमादौ जगन्नाथ परिणामस्तथा हि सः

tasmāttu mahato ghorādahaṅkāro mahānabhūt | sa tvamādau jagannātha pariṇāmastathā hi saḥ

हिन्दी अर्थ

उस घोर महान्‌ (महत्तत्त्व)-से महान्‌ (समष्टिभूत अहड्ार प्रकट हुआ। जगन्नाथ ! आदिकालमें प्रकट हुआ वह महत्तत्वका वैसा ( अहंकारात्मक) परिणाम आप ही हैं

अध्याय 271

श्लोक 22

अहङ्कारात् प्रभो देव करणानि महान्ति च ।तन्मात्राणि तथा पञ्च भूतानि प्रभवन्त्युत

ahaṅkārāt prabho deva karaṇāni mahānti ca | tanmātrāṇi tathā pañca bhūtāni prabhavantyuta

हिन्दी अर्थ

प्रभो ! देव ! अहड्डारसे ' तन्मात्र' नामक महान्‌ कारण उत्पन्न हुए, जिनसे पश्नमहाभूतोंका प्राकट्य हुआ है

अध्याय 271

श्लोक 23

तानि त्वामाहुरीशानं भूतानीह जगत्पते ।पृथिवी वायुराकाशमापो ज्योतिश्च पञ्चमम्

tāni tvāmāhurīśānaṃ bhūtānīha jagatpate | pṛthivī vāyurākāśamāpo jyotiśca pañcamam

हिन्दी अर्थ

जगत्पते! इस जगतमें जो वे पाँचों महाभूत हैं, उन्हें भी आप सर्वेश्वरका ही स्वरूप बताते हैं । उनके नाम ये हैं—पृथ्वी, वायु आकाश, जल और पाँचवाँ भूत अग्ि

अध्याय 271

श्लोक 24

चक्षुर्घ्राणं तथा स्पर्शो रसनं श्रोत्रमेव च ।मनः षष्ठं तथा देव प्रेरकं तत्र तत्र ह

cakṣurghrāṇaṃ tathā sparśo rasanaṃ śrotrameva ca | manaḥ ṣaṣṭhaṃ tathā deva prerakaṃ tatra tatra ha

हिन्दी अर्थ

देव! नेत्र, नासिका, त्वचा, रसना और कान—ये पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ हैं । इन्हींके साथ छठा मन है, जो उन इन्द्रियोंको विभिन्न विषयोंमें जानेके लिये प्रेरित करता है

अध्याय 271

श्लोक 25

कर्मेन्द्रियाणि चान्यानि वागादीनि जनार्दन ।त्वमेव तानि सर्वाणि करोषि नियतात्मवान्

karmendriyāṇi cānyāni vāgādīni janārdana | tvameva tāni sarvāṇi karoṣi niyatātmavān

श्लोक 25–26 का हिन्दी अर्थ

जनार्दन! वाक्‌ आदि पाँच कर्मन्द्रियाँ और हैं । जगन्नाथ! हरे ! अपने मनको संयममें रखनेवाले आप परमात्मा ही उन सब इन्द्रियोंको अपने-अपने विषयोंमें नियुक्त करते हैं। देवेधर! आप ही योग्य इन्द्रिय-मार्गकी स्थापना करते हैं

अध्याय 271

श्लोक 26

स्वेषु स्वेषु जगन्नाथ विषयेषु तथा हरे ।निवेशयसि देवेश योग्यामिन्द्रियपद्धतिम्

sveṣu sveṣu jagannātha viṣayeṣu tathā hare | niveśayasi deveśa yogyāmindriyapaddhatim

अर्थ श्लोक 25 के साथ

अध्याय 271

श्लोक 27

यदा त्वं रजसा युक्तस्तदा भूतानि सृष्टवान् ।यदाच सत्त्वयुक्तोऽसि तदा पाता जगत्त्रयम्

yadā tvaṃ rajasā yuktastadā bhūtāni sṛṣṭavān | yadāca sattvayukto'si tadā pātā jagattrayam

श्लोक 27–30 का हिन्दी अर्थ

जब आप रजोगुणसे संयुक्त हुए, तब आपने समस्त प्राणियोंकी सृष्टि की। जब आप सत्त्वगुणसे युक्त होते हैं, तब तीनों लोकोंका पालन करते हैं और जब तमोगुणसे आकृष्ट होते हैं, तब जगत्‌का संहार करते हैं । इस प्रकार आप नियतात्मा परमेश्वर तीनों ही गुणोंसे युक्त होकर अपनी त्रिविध ऐश्वर्य (शक्ति) -को साथ रखते हुए सृष्टि, रक्षा और संहारके कार्यमें सदा संलग्न रहते हैं। माधव! जगद्‌गुरो ! आप प्राणियोंके अन्त:करणमें स्थित होकर उनके उपभोगके लिये इन्द्रियोंको विषयोंमें लगाते हैं । इसलिये सम्पूर्ण भूतोंगें आप ही समस्त भोगोंसे सम्पन्न हैं

अध्याय 271

श्लोक 28

यदा त्वं तमसाऽऽकृष्टस्तदा संहरसे जगत् ।त्रिभिरेव गुणैर्युक्तः सृष्टिरक्षाविनाशने

yadā tvaṃ tamasā''kṛṣṭastadā saṃharase jagat | tribhireva guṇairyuktaḥ sṛṣṭirakṣāvināśane

अर्थ श्लोक 27 के साथ

अध्याय 271

श्लोक 29

वर्तसे त्रिविधां भूतिमादाय नियतात्मवान् ।इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेषु नियोजयसि माधव

vartase trividhāṃ bhūtimādāya niyatātmavān | indriyāṇīndriyārtheṣu niyojayasi mādhava

अर्थ श्लोक 27 के साथ

अध्याय 271

श्लोक 30

प्राणिनामुपभोगार्थमन्तः स्थित्वा जगद्गुरो ।तस्मात् सर्वत्र भूतेषु वर्तते सर्वभोगवान्

prāṇināmupabhogārthamantaḥ sthitvā jagadguro | tasmāt sarvatra bhūteṣu vartate sarvabhogavān

अर्थ श्लोक 27 के साथ

अध्याय 271

श्लोक 31

ब्रह्मा त्वं सृष्टिकाले तु स्थितौ विष्णुरसि प्रभो ।संहारे रुद्रनामासि त्रिधामा त्वमसि प्रभो

brahmā tvaṃ sṛṣṭikāle tu sthitau viṣṇurasi prabho | saṃhāre rudranāmāsi tridhāmā tvamasi prabho

हिन्दी अर्थ

प्रभो! सृष्टिकालमें आप ही ब्रह्मा हैं, पालनकालमें विष्णु कहलाते हैं तथा संहारकालमें रुद्र नाम धारण करते हैं। भगवन्‌ ! इस प्रकार आप तीन धामवाले हैं

अध्याय 271

श्लोक 32

भूमिरापोऽनलो वायुः खं मनो बुद्धिरेव च ।एताः प्रकृतयो देव भिन्नाः सर्वत्र ते हरे

bhūmirāpo'nalo vāyuḥ khaṃ mano buddhireva ca | etāḥ prakṛtayo deva bhinnāḥ sarvatra te hare

हिन्दी अर्थ

हरे! देव! पृथ्वी, जल, अग्रि, वायु, आकाश, मन, बुद्धि (और अहड्लार)—ये सर्वत्र उपलब्ध होनेवाली आठ भिन्न-भिन्न प्रकृतियाँ आपकी ही हैं

अध्याय 271

श्लोक 33

सहस्रशीर्षा पुरुषः सहस्राक्षः सहस्रपात् ।सहस्रधारः साहस्री सहस्रात्मा दिवस्पतिः

sahasraśīrṣā puruṣaḥ sahasrākṣaḥ sahasrapāt | sahasradhāraḥ sāhasrī sahasrātmā divaspatiḥ

हिन्दी अर्थ

आप सहसखों मस्तकोंसे सुशोभित विराट पुरुष हैं। आपके सहसों नेत्र और सहस््रों पैर हैं, धारण करनेवाली भुजाएँ भी सहस्रों हैं। आपकी सभी वस्तुएँ सहस्रोंकी संख्यामें सुशोभित होती हैं । आपके सहस्रों रूप हैं और आप ही स्वर्गलोकके अधिपति इन्द्र हैं

अध्याय 271

श्लोक 34

भूमिं सर्वामिमां प्राप्य सप्तद्वीपां ससागराम् ।अणुः सर्वत्रगो भूत्वा अत्यतिष्ठद् दशाङ्गुलम्

bhūmiṃ sarvāmimāṃ prāpya saptadvīpāṃ sasāgarām | aṇuḥ sarvatrago bhūtvā atyatiṣṭhad daśāṅgulam

हिन्दी अर्थ

सातों द्वीपों और समुद्रॉंसे युक्त इस सारी पृथ्वीको व्याप्त करके आप सूक्ष्म एवं सर्वव्यापी होकर इस ब्रह्माण्डसे दस अज़्ुल ऊपर उठे हुए हैं

अध्याय 271

श्लोक 35

त्वमेवेदं जगत् सर्वं यद् भूतं यद् भविष्यति ।त्वत्तो विराट् प्रादुरभूत् संराट् चैव जनार्दन

tvamevedaṃ jagat sarvaṃ yad bhūtaṃ yad bhaviṣyati | tvatto virāṭ prādurabhūt saṃrāṭ caiva janārdana

हिन्दी अर्थ

पोडध्याय: + १२६९ जो हुआ है और जो होनेवाला है, वह यह सम्पूर्ण जगत्‌ू आप ही हैं। जनार्दन! आपसे ही विराट और सम्राटू (विराट्के अधिष्ठाता पुरुष)-की उत्पत्ति हुई है

अध्याय 271

श्लोक 36

तव वक्त्राज्जगन्नाथ ब्राह्मणो लोकरक्षकः ।प्रादुरासीत्पुराणात्मन् षट्कर्मनिरतः सदा

tava vaktrājjagannātha brāhmaṇo lokarakṣakaḥ | prādurāsītpurāṇātman ṣaṭkarmanirataḥ sadā

हिन्दी अर्थ

पुराणात्मन्‌! जगन्नाथ! आपके मुखसे यजन- याजन आदि छ: कर्मोमें सदा तत्पर रहनेवाला लोकरक्षक ब्राह्मण प्रकट हुआ है

अध्याय 271

श्लोक 37

राजन्यस्तु तथा बाह्वोरासीत् संरक्षणे रतः ।ऊर्वोर्वैश्यस्तथा विष्णो पादाच्छूद्र उदाहृतः

rājanyastu tathā bāhvorāsīt saṃrakṣaṇe rataḥ | ūrvorvaiśyastathā viṣṇo pādācchūdra udāhṛtaḥ

हिन्दी अर्थ

विष्णो ! आपकी भुजाओंसे रक्षाकर्ममें रत रहनेवाले क्षत्रियकी, दोनों जाँघोंसे वैश्यकी तथा पैरोंसे शूद्रकी उत्पत्ति हुई बतायी गयी है

अध्याय 271

श्लोक 38

एवं वर्णा जगन्नाथ तव देहाज्जनार्दन ।मनसस्तव देवेश चन्द्रमाः समपद्यत

evaṃ varṇā jagannātha tava dehājjanārdana | manasastava deveśa candramāḥ samapadyata

श्लोक 38–40 का हिन्दी अर्थ

जगदीश्वर! जनार्दन! इस प्रकार चारों वर्ण आपके शरीरसे प्रकट हुए हैं। देवेध्वर! आपके मनसे समस्त प्राणियोंको सुख देनेवाले अमित कान्तिमान्‌ शीतरशिम चन्द्रमाकी उत्पत्ति हुई है। आपके नेत्रोंसे समस्त प्राणियोंके नेत्रस्वरूप वे भानुमान्‌ (अंशुमाली) सूर्य उत्पन्न हुए हैं, जिनकी प्रभासे सारा जगत्‌ प्रकाशित होता है। आपके मुखसे इन्द्र और अग्रि तथा प्राणसे वायुदेवका प्राकट्य हुआ है

अध्याय 271

श्लोक 39

सुखकृत् सर्वभूतानां शीतांशुरमितप्रभः ।अक्ष्णोः सूर्यः समुत्पन्नः सर्वप्राणिविलोचनः

sukhakṛt sarvabhūtānāṃ śītāṃśuramitaprabhaḥ | akṣṇoḥ sūryaḥ samutpannaḥ sarvaprāṇivilocanaḥ

अर्थ श्लोक 38 के साथ

अध्याय 271

श्लोक 40

यस्य भासा जगत् सर्वं भासते भानुमानसौ ।मुखादिन्द्रश्च अग्निश्च प्राणाद् वायुरजायत

yasya bhāsā jagat sarvaṃ bhāsate bhānumānasau | mukhādindraśca agniśca prāṇād vāyurajāyata

अर्थ श्लोक 38 के साथ

अध्याय 271

श्लोक 41

नाभेरभूदन्तरिक्षं तव देव जनार्दन ।द्यौरासीत् तु महाघोरा शिरसस्तव गोपते

nābherabhūdantarikṣaṃ tava deva janārdana | dyaurāsīt tu mahāghorā śirasastava gopate

हिन्दी अर्थ

देव! जनार्दन ! आपकी नाभिसे अन्तरिक्ष प्रकट हुआ। गोपते! आपके मस्तकसे महाघोर द्युलोकका आविर्भाव हुआ है

अध्याय 271

श्लोक 42

पद्भ्यां भूमिः समुत्पन्ना दिशः श्रोत्राज्जगत्पते ।एव सृष्ट्वा जगत्सर्वं व्याप्य सर्वं व्यवस्थितः

padbhyāṃ bhūmiḥ samutpannā diśaḥ śrotrājjagatpate | eva sṛṣṭvā jagatsarvaṃ vyāpya sarvaṃ vyavasthitaḥ

हिन्दी अर्थ

जगत्पते! आपके पैरोंसे पृथ्वी और कानोंसे दिशाएँ उत्पन्न हुई हैं। इस प्रकार सम्पूर्ण जगत्‌की सृष्टि करके आप सबको व्याप्त करके स्थित हैं

अध्याय 271

श्लोक 43

व्याप्य सर्वानिमाँल्लोकान् स्थितः सर्वत्र केशव ।ततश्च विष्णुनामासि धातोर्व्याप्तेश्च दर्शनात्

vyāpya sarvānimā~llokān sthitaḥ sarvatra keśava | tataśca viṣṇunāmāsi dhātorvyāpteśca darśanāt

हिन्दी अर्थ

केशव! इन सम्पूर्ण लोकोंमें व्याप्त होकर आप सर्वत्र विराजमान हैं। इसलिये ' विष्‌' धातुके व्यासिरूप अर्थका दर्शन होनेसे आप 'विष्णु' नाम धारण करते हैं

अध्याय 271

श्लोक 44

नारा आपः समाख्यातास्तासामयनमादितः ।यतस्त्वं भूतभव्येश तन्नारायणशब्दितः

nārā āpaḥ samākhyātāstāsāmayanamāditaḥ | yatastvaṃ bhūtabhavyeśa tannārāyaṇaśabditaḥ

हिन्दी अर्थ

भूत, वर्तमान और भविष्यके स्वामी विष्णुदेव ! जलको नार कहते हैं, उस नारके आप आदिकालसे ही अयन (आश्रय) हैं, इसलिये 'नारायण' कहलाते हैं

अध्याय 271

श्लोक 45

हरसि प्राणिनो देव ततो हरिरिति स्मृतः ।शङ्करोऽसि सदा देव ततः शङ्करतां गतः

harasi prāṇino deva tato haririti smṛtaḥ | śaṅkaro'si sadā deva tataḥ śaṅkaratāṃ gataḥ

हिन्दी अर्थ

देव! आप प्राणियों (-के पाप-ताप)-का हरण करते हैं, इसलिये 'हरि' कहे गये हैं। देव! आप सदा सबका 'शम्‌' (कल्याण) करते हैं, इसलिये *शड्र' नामसे प्रसिद्ध हुए हैं

अध्याय 271

श्लोक 46

बृहत्त्वाद् बृंहणत्वाच्च तस्माद् ब्रह्मेति शब्दितः ।मधुरिन्द्रियनामेति ततो मधुनिषूदनः

bṛhattvād bṛṃhaṇatvācca tasmād brahmeti śabditaḥ | madhurindriyanāmeti tato madhuniṣūdanaḥ

हिन्दी अर्थ

बृहत्‌ तथा वर्धनशील होनेके कारण आपको ' ब्रह्म' कहते हैं । मधु नाम है इन्द्रियोंका, उनका दमन करनेके कारण आप ' मधुसूदन' कहलाते हैं

अध्याय 271

श्लोक 47

हृषीकाणीन्द्रियाण्याहुस्तेषामीशो यतो भवान् ।हृषीकेशस्ततो विष्णो ख्यातो देवेषु केशव

hṛṣīkāṇīndriyāṇyāhusteṣāmīśo yato bhavān | hṛṣīkeśastato viṣṇo khyāto deveṣu keśava

हिन्दी अर्थ

केशव! विष्णो ! हषीक कहते हैं इन्द्रियोंको । आप उनके ईश (स्वामी अथवा प्रेरक) हैं, इसलिये देवताओंमें “हषीकेश' नामसे विख्यात हैं

अध्याय 271

श्लोक 48

क इति ब्रह्मणो नाम ईशोऽहं सर्वदेहिनाम् ।आवां तवाङ्गसम्भूतौ तस्मात्केशवनामवान्

ka iti brahmaṇo nāma īśo'haṃ sarvadehinām | āvāṃ tavāṅgasambhūtau tasmātkeśavanāmavān

हिन्दी अर्थ

क'—यह ब्रह्माजीका नाम है और मैं समस्त देहधारियोंका 'ईश' हूँ। हम दोनों आपके शरीरसे उत्पन्न हुए हैं, इसलिये आप ' केशव! नाम धारण करते हैं

अध्याय 271

श्लोक 49

मा विद्या च हरे प्रोक्ता तस्या ईशो यतो भवान् ।तस्मान्माधवनामासि धवः स्वामीतिब्दितः

mā vidyā ca hare proktā tasyā īśo yato bhavān | tasmānmādhavanāmāsi dhavaḥ svāmītibditaḥ

हिन्दी अर्थ

हरे! 'मा' कहते हैं विद्याको। आप उसके ' धव' (ईश्वर या स्वामी) हैं, इसलिये *माधव' नामसे प्रसिद्ध हैं। धव-शब्द स्वामीका वाचक है

अध्याय 271

श्लोक 50

गौरेषा तु यतो वाणी तां च वेद यतो भवान् ।गोविन्दस्तु ततो देव मुनिभिः कथ्यते भवान्

gaureṣā tu yato vāṇī tāṃ ca veda yato bhavān | govindastu tato deva munibhiḥ kathyate bhavān

हिन्दी अर्थ

देव! यह वाणी *गौ' नामसे प्रसिद्ध है। उसे आप जानते हैं, इसलिये मुनिलोग आपको 'गोविन्द' कहते हैं

अध्याय 271

श्लोक 51

त्रिरित्येव त्रयो वेदाः कीर्तिता मुनिसत्तमैः ।क्रमते तांस्तथा सर्वांस्त्रिविक्रम इति श्रुतः

trirityeva trayo vedāḥ kīrtitā munisattamaiḥ | kramate tāṃstathā sarvāṃstrivikrama iti śrutaḥ

हिन्दी अर्थ

श्रेष्ठ मुनियोंने तीनों वेदोंको 'त्रि' नाम दिया है, आप उन तीनोंको क्रान्त (व्याप्त) करके स्थित हैं; इसलिये 'त्रिविक्रम' नामसे विख्यात हैं

अध्याय 271

श्लोक 52

अणुर्वामननामासि यतस्त्वं वामनाख्यया ।मननान्मुनिरेवासि यमनाद् यतिरुच्यसे

aṇurvāmananāmāsi yatastvaṃ vāmanākhyayā | mananānmunirevāsi yamanād yatirucyase

हिन्दी अर्थ

आप सूक्ष्म या लघु होनेसे ' वामन' नाम धारण करते हैं । आपके वामन नामसे प्रसिद्ध होनेका यही हेतु है। आप मनन करनेसे 'मुनि' हैं और यमका पालन करनेसे 'यति' कहलाते हैं

अध्याय 271

श्लोक 53

तपश्चरसि यस्मात्त्वं तपस्वीति च शब्दितः ।वसन्ति त्वयि भूतानि भूतावासस्ततो हरे

tapaścarasi yasmāttvaṃ tapasvīti ca śabditaḥ | vasanti tvayi bhūtāni bhūtāvāsastato hare

हिन्दी अर्थ

अत: आप तपस्या करते हैं, इसलिये ' तपस्वी ' नामसे प्रसिद्ध हैं। हरे! सम्पूर्ण भूत आपमें निवास करते हैं, इसलिये आप ' भूतावास' कहलाते हैं

अध्याय 271

श्लोक 54

ईशस्त्वं सर्वभूतानामीश्वरोऽसि ततो हरे ।प्रणवः सर्ववेदानां गायत्री छन्दसां प्रभो

īśastvaṃ sarvabhūtānāmīśvaro'si tato hare | praṇavaḥ sarvavedānāṃ gāyatrī chandasāṃ prabho

हिन्दी अर्थ

हरे! आप सम्पूर्ण भूतोंके ईश हैं, इसीलिये 'ईश्वर' कहे गये हैं । प्रभो ! आप समस्त वेदौंमें प्रणव और सम्पूर्ण छन्दों- में 'गायत्री ' हैं

अध्याय 271

श्लोक 55

अक्षराणामकारस्त्वं स्फोटस्त्वं वर्णसंश्रयः ।रुद्राणामहमेवासि वसूनां पावको भवान्

akṣarāṇāmakārastvaṃ sphoṭastvaṃ varṇasaṃśrayaḥ | rudrāṇāmahamevāsi vasūnāṃ pāvako bhavān

हिन्दी अर्थ

आप अक्षरोंमें अकार हैं । वर्णोके आश्रित रहनेवाले स्फोट'* हैं । रुद्रोंमें मैं अर्थात्‌ श्र हैं और वसुओंमें आप पावक हैं

अध्याय 271

श्लोक 56

अश्वत्थो वृक्षजातीनां ब्रह्मा लोकगुरुर्भवान् ।मेरुस्त्वं पर्वतेन्द्राणां देवर्षीणां च नारदः

aśvattho vṛkṣajātīnāṃ brahmā lokagururbhavān | merustvaṃ parvatendrāṇāṃ devarṣīṇāṃ ca nāradaḥ

हिन्दी अर्थ

आप वृक्ष- जातियोंमें अश्वत्थ हैं । समस्त लोकोंके गुरु ब्रह्मा हैं । श्रेष्ठ पर्वतोंमें मेरा और देवर्षियोंमें नारद हैं

अध्याय 271

श्लोक 57

दानवानां भवान् दैत्यः प्रह्रादो भक्तवत्सलः ।सर्पाणामेव सर्वेषां भवान् वासुकिसंज्ञितः

dānavānāṃ bhavān daityaḥ prahrādo bhaktavatsalaḥ | sarpāṇāmeva sarveṣāṃ bhavān vāsukisaṃjñitaḥ

हिन्दी अर्थ

आप दानवोंमें दैत्यनन्दन भक्तवत्सल प्रह्माद हैं। समस्त सर्पोंमें आप ही वासुकि हैं

अध्याय 271

श्लोक 58

गुह्यकानां च सर्वेषां भवान् धनद एव च ।वरुणो यादसां राजा गङ्गा त्रिपथभाग् भवान्

guhyakānāṃ ca sarveṣāṃ bhavān dhanada eva ca | varuṇo yādasāṃ rājā gaṅgā tripathabhāg bhavān

हिन्दी अर्थ

आप समस्त गुह्मकोंमें धनदाता कुबेर हैं । जल-जन्तुओंके राजा वरुण और त्रिपथगामिनी गज़ा भी आप ही हैं

अध्याय 271

श्लोक 59

आदिस्त्वं सर्वभूतानां मध्यमन्तस्तथा भवान् ।त्वत्तः समभवद् विश्वं त्वयि सर्वं प्रलीयते

ādistvaṃ sarvabhūtānāṃ madhyamantastathā bhavān | tvattaḥ samabhavad viśvaṃ tvayi sarvaṃ pralīyate

हिन्दी अर्थ

आप समस्त भूतोंके आदि, मध्य और अन्त हैं। आपसे इस विश्वका प्रादुर्भाव हुआ है और अन्तमें सारा जगत्‌ आपमें ही लीन हो जाता है

अध्याय 271

श्लोक 60

अहं त्वं सर्वगो देव त्वमेवाहं जनार्दन ।आवयोरन्तरं नास्ति शब्दैरर्थैर्जगत्पते

ahaṃ tvaṃ sarvago deva tvamevāhaṃ janārdana | āvayorantaraṃ nāsti śabdairarthairjagatpate

हिन्दी अर्थ

जनार्दन! देव! मैं ही आप सर्वव्यापी देवता हैं और आप ही मैं हूँ। जगत्पते! शब्द और अर्थसे भी हम दोनोंमें कोई अन्तर नहीं है

अध्याय 271

श्लोक 61

नामानि तव गोविन्द यानि लोके महान्ति च ।तान्येव मम नामानि नात्र कार्या विचारणा

nāmāni tava govinda yāni loke mahānti ca | tānyeva mama nāmāni nātra kāryā vicāraṇā

हिन्दी अर्थ

गोविन्द ! लोकमें जो आपके महान्‌ नाम हैं, वे ही मेरे भी नाम हैं । इसमें अन्यथा विचार नहीं करना चाहिये

अध्याय 271

श्लोक 62

त्वदुपासा जगन्नाथ सैवास्ति मम गोपते ।यश्च त्वां द्वेष्टि देवेश स मां द्वेष्टि न संशयः

tvadupāsā jagannātha saivāsti mama gopate | yaśca tvāṃ dveṣṭi deveśa sa māṃ dveṣṭi na saṃśayaḥ

हिन्दी अर्थ

जगन्नाथ! पते! आपकी जो उपासना है, वही मेरी भी है। रेवेश्वर! जो आपसे द्रेष करता है, वह मुझसे भी ट्वेष करता है, इसमें संशय नहीं

अध्याय 271

श्लोक 63

त्वद्विस्तारो यतो देव अहं भूतपतिस्ततः ।न तदस्ति विना देव यत् ते विरहितं हरे

tvadvistāro yato deva ahaṃ bhūtapatistataḥ | na tadasti vinā deva yat te virahitaṃ hare

हिन्दी अर्थ

के अर्थका ज्ञान होता है, जैसे कमल शब्दमें क, म और ल—जये य नहीं निकलता, परंतु तीनों वर्णोंका साथ-साथ उच्चारण करनेपर छ लोग इसी स्फोट (नित्य शब्द)-को संसारका कारण मानते हैं । + १२७१ देव! आपका ही विस्तार मैं हूँ, अत: आपहीकी भाँति मैं भी सम्पूर्ण भूतोंका अधिपति कहलाता हूँ। देव! हरे! ऐसी कोई वस्तु नहीं, जो आपके बिना या आपसे रहित हो

अध्याय 271

श्लोक 64

यदासीद् वर्तते यच्च यच्च भावि जगत्पते ।सर्वे त्वमेव देवेश विना किञ्चित्त्वया न हि

yadāsīd vartate yacca yacca bhāvi jagatpate | sarve tvameva deveśa vinā kiñcittvayā na hi

हिन्दी अर्थ

जगत्पते! देवेधर! जो कुछ था, जो है और जो भविष्यमें होनेवाला है, वह सब आप ही हैं। ऐसी कोई भी वस्तु नहीं, जो आपसे रहित हो

अध्याय 271

श्लोक 65

स्तुवन्ति देवाः सततं भवन्तं स्वैर्गुणैः प्रभो ।ऋक्च त्वं यजुरेवासि सामासि सततं प्रभो

stuvanti devāḥ satataṃ bhavantaṃ svairguṇaiḥ prabho | ṛkca tvaṃ yajurevāsi sāmāsi satataṃ prabho

हिन्दी अर्थ

प्रभो! देवता सदा आपके निजी गु्णोंका बखान करके आपकी स्तुति करते हैं। भगवन्‌ ! आप ही नित्य-निरन्तर ऋग्वेद, यजुर्वेद और सामवेद हैं

अध्याय 271

श्लोक 66

किमुच्यते मया देव सर्वं त्वं भूतभावन ।नमः सर्वात्मना देव विष्णो माधव केशव

kimucyate mayā deva sarvaṃ tvaṃ bhūtabhāvana | namaḥ sarvātmanā deva viṣṇo mādhava keśava

हिन्दी अर्थ

भूतभावन देव! मैं अधिक क्या कहूँ? आप ही सब कुछ हैं। देव! विष्णो! माधव! केशव! आपको सब प्रकारसे नमस्कार है

अध्याय 271

श्लोक 67

नमस्करोमि सर्वात्मन् नमस्तेऽस्तु सदा हरे ।नमः पुष्करनाभाय वन्दे त्वामहमीश्बर

namaskaromi sarvātman namaste'stu sadā hare | namaḥ puṣkaranābhāya vande tvāmahamīśbara

हिन्दी अर्थ

सर्वात्मन्‌ ! मैं आपको नमस्कार करता हूँ। हरे! आपको सदा ही नमस्कार है। आप पद्मनाभ हैं, आपको नमस्कार है। ईश्वर! मैं आपकी वन्दना करता हूँ

स्रोत: local proofread transcription: Sanskrit shlokas of the Harivamsa (Harivamsha, Vishnu and Bhavishya parvas) from sanskritdocuments.org. One chapter per adhyaya; verse numbers as printed in the source (restarting in each adhyaya). Appendix sections are not included. · प्राप्त 19/10/2026

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शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

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पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

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पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

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पाठ-भेद टिप्पणी (Alternative Reading / Variant Notes):

Collated with BORI Critical Edition of Mahabharata Khilaparvan.