Harivamsha Purana
269
अध्याय 269 / 318

Parva 3, Adhyāya 86

18 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ18 श्लोक

अध्याय 269

श्लोक 1

पिशाचैः, मुनिभिः अप्सरोभिश्च साकं उमासहितस्य भगवतः शङ्करस्य श्रीकृष्णस्य समीपे गमनं तस्याग्रे समपद्यन्त भूतसङ्घाः सहस्रशः ।घण्टाकर्णो विरूपाक्षः कुण्डधार कुमुद्वहः

piśācaiḥ, munibhiḥ apsarobhiśca sākaṃ umāsahitasya bhagavataḥ śaṅkarasya śrīkṛṣṇasya samīpe gamanaṃ tasyāgre samapadyanta bhūtasaṅghāḥ sahasraśaḥ | ghaṇṭākarṇo virūpākṣaḥ kuṇḍadhāra kumudvahaḥ

श्लोक 1–8 का हिन्दी अर्थ

बैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! उस समय पगवान्‌ शड्रके आगे सहस्रों भूतसमूह चल रहे मे—घण्टाकर्ण, विरूपाक्ष, कुण्डधार, कुमुद्ह, दीर्घरोमा, ीर्घभुज, दीर्घबाहु, निरज्जन, उसनेत्र, शतमुख, शतग्रीव, गतोदर, कुण्डोदर, महाग्रीव, स्थूलजिह्, द्विबाहु, पार्शववक्त्र, संहमुख, उन्नतांस, महाहनु, त्रिबाहु, पश्नबाहु, व्याघ्रवक्‍्त्र और सितानन—ये तथा दूसरे भी बहुत-से बड़े- डड़े मुख और विशाल नेत्रवाले भूत नाचते, हँसते औौर परस्पर ताल ठोंकते थे। इनके अतिरिक्त भी हहुत-से घोर रूप और विकृत मुखवाले भूत थे, जो मुर्दे खाते, मुर्दोको ढोकर ले जाते और मांस तथा क्तका आहार करते थे। वे बहुत-से शव शीघ्रतापूर्वक धर-उधरसे लाकर खाते थे, भयंकर रक्त पीते थे और ब्रहुत-से शबोंके टुकड़े-टुकड़े कर डालते थे। वे सब- के-सब विस्तृत, विशाल और विकराल थे । उनके शरीरमें शयाप्त हुई नस-नाड़ियाँ स्पष्ट दिखायी देती थीं। वे नाना प्रकारकी आकृतिवाले भूत बड़े वीर थे। उन्होंने अपने शूलोंके अग्रभागमें कितने ही मनुष्योंकी लाशें पिरो रखी थीं । कितने ही भूत नरमुण्डोंकी मालाओंसे अलंकृत थे। केतनोंने अपने-आपको अँतड़ियोंके पाशोंसे बाँध रखा था

अध्याय 269

श्लोक 2

दीर्घरोमा दीर्घभुजो दीर्घबाहुर्निरञ्जनः ।उरुनेत्रः शतमुखः शतग्रीवः शतोदरः

dīrgharomā dīrghabhujo dīrghabāhurnirañjanaḥ | urunetraḥ śatamukhaḥ śatagrīvaḥ śatodaraḥ

अर्थ श्लोक 1 के साथ

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श्लोक 3

कुण्डोदरो महाग्रीवः स्थूलजिह्वो द्विबाहुकः ।पार्श्ववक्त्रः सिंहमुख उन्नतांसो महाहनुः

kuṇḍodaro mahāgrīvaḥ sthūlajihvo dvibāhukaḥ | pārśvavaktraḥ siṃhamukha unnatāṃso mahāhanuḥ

अर्थ श्लोक 1 के साथ

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श्लोक 4

त्रिबाहुः पञ्चबाहुश्च व्याघ्रवक्त्रः सिताननः ।एते चान्ये च बहवो दीर्घास्या दीर्घलोचनाः

tribāhuḥ pañcabāhuśca vyāghravaktraḥ sitānanaḥ | ete cānye ca bahavo dīrghāsyā dīrghalocanāḥ

अर्थ श्लोक 1 के साथ

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श्लोक 5

नृत्यन्तः प्रहसन्तश्च स्फोटयन्तः परस्परम् ।तथान्ये घोररूपाश्च तथान्ये विकृताननाः

nṛtyantaḥ prahasantaśca sphoṭayantaḥ parasparam | tathānye ghorarūpāśca tathānye vikṛtānanāḥ

अर्थ श्लोक 1 के साथ

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श्लोक 6

प्रेतभक्षाः प्रेतवाहा मांसशोणितभोजनाः ।शवानि सुबहून्याशु भक्षयन्तस्ततस्ततः

pretabhakṣāḥ pretavāhā māṃsaśoṇitabhojanāḥ | śavāni subahūnyāśu bhakṣayantastatastataḥ

अर्थ श्लोक 1 के साथ

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श्लोक 7

पिबन्तो रुधिरं घोरं खण्डयन्तः शवान् बहून् ।कराला वितता दीर्घा धमनिस्नायुसन्तताः

pibanto rudhiraṃ ghoraṃ khaṇḍayantaḥ śavān bahūn | karālā vitatā dīrghā dhamanisnāyusantatāḥ

अर्थ श्लोक 1 के साथ

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श्लोक 8

नानाविधाः सुवीराश्च शूलाग्रप्रोतमानुषाः ।शिरोमालावृताः केचिदान्त्रपाशावपाशिताः

nānāvidhāḥ suvīrāśca śūlāgraprotamānuṣāḥ | śiromālāvṛtāḥ kecidāntrapāśāvapāśitāḥ

अर्थ श्लोक 1 के साथ

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श्लोक 9

डिण्डिमैरट्टहासैश्च नादयन्तो वसुन्धराम् ।कपालिनो भैरवाश्च जटिला मुण्डिनस्तथा

ḍiṇḍimairaṭṭahāsaiśca nādayanto vasundharām | kapālino bhairavāśca jaṭilā muṇḍinastathā

श्लोक 9–13 का हिन्दी अर्थ

कोई नगाड़े बजाते और कोई अट्रहास करते हुए पृथ्वीको प्रतिध्वनित करते थे। कपाली, भैरव, जटिल और मुण्डी-ये भाँति-भाँतिके विकृत मुखवाले चार प्रकारके घोर पिशाच तथा अन्य मुनिवीर वहाँ परमे धरका ध्यान और अड्लॉंसहित वेदोंके विविध वाक्योंका पाठ करते थे। कोई कमण्डलुमें हाथ डाले हुए थे, कोई कुश लेकर विचर रहे थे, कितने ही वस्त्रकी जगह कौपीनमात्र धारण करते थे और कितनोंने सूती वस्त्रोंसे अपने अड्रोंको ढक रखा था। वे सब-के-सब भक्तिभावसे शिवसम्बन्धी प्तोत्रोंद्वारा भगवान्‌ शड्रकी स्तुति करते थे। एक ओर तो मुनिगण थे और दूसरी ओर प्रमथगण । इसी तरह एक ओर सिद्ध और गन्धर्व अपनी प्रियतमाओंके साथ वहाँ आये थे

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श्लोक 10

एवं बहुविधा घोराः पिशाचा विकृताननाः ।तथान्ये मुनिवीराश्च ध्यायन्तः परमेश्वरम्

evaṃ bahuvidhā ghorāḥ piśācā vikṛtānanāḥ | tathānye munivīrāśca dhyāyantaḥ parameśvaram

अर्थ श्लोक 9 के साथ

अध्याय 269

श्लोक 11

पठन्तो वेदवाक्यानि साङ्गानि विविधानि च ।कुण्डि=कास्थकराः केचित्केचित्कुशविचारिणः

paṭhanto vedavākyāni sāṅgāni vividhāni ca | kuṇḍi=kāsthakarāḥ kecitkecitkuśavicāriṇaḥ

अर्थ श्लोक 9 के साथ

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श्लोक 12

कौपीनवसनाः केचित् केचित् कार्पाससंवृताः ।स्तुवन्तः शङ्करं भक्त्या स्तोत्रैर्माहेश्वरैस्तथा

kaupīnavasanāḥ kecit kecit kārpāsasaṃvṛtāḥ | stuvantaḥ śaṅkaraṃ bhaktyā stotrairmāheśvaraistathā

अर्थ श्लोक 9 के साथ

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श्लोक 13

एकत्र ते मुनिगणा अपरत्र गणास्तथा ।अन्यत्र सिद्धगन्धर्वाः प्रियाभिः सह सङ्गताः

ekatra te munigaṇā aparatra gaṇāstathā | anyatra siddhagandharvāḥ priyābhiḥ saha saṅgatāḥ

अर्थ श्लोक 9 के साथ

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श्लोक 14

नृत्यन्ति नृत्यकुशला गायन्ति स्म च कन्यकाः ।विद्याधरास्तथान्यत्र स्तुवन्तः शङ्करं शिवम्

nṛtyanti nṛtyakuśalā gāyanti sma ca kanyakāḥ | vidyādharāstathānyatra stuvantaḥ śaṅkaraṃ śivam

हिन्दी अर्थ

नृत्यकुशल गन्धर्वकन्याएँ नाचती और गाती थीं। अन्यत्र विद्याधरगण कल्याणकारी भगवान्‌ शड्रकी स्तुति करते थे

अध्याय 269

श्लोक 15

ननृतुस्तस्य पुरतो गच्छन्तोऽप्सरसां गणाः ।एवमेतैर्महाघोरैः पिशाचैर्भूतकिन्नरैः

nanṛtustasya purato gacchanto'psarasāṃ gaṇāḥ | evametairmahāghoraiḥ piśācairbhūtakinnaraiḥ

श्लोक 15–17 का हिन्दी अर्थ

उनके आगे-आगे चलती हुई अप्सराएँ नृत्य करती थीं । इस प्रकार इन महाभयंकर पिशाचों, भूतों, किन्नरों, मुनियों और प्रमथगणोंके साथ भगवान्‌ शिव उस स्थानपर आये, जहाँ जगदी श्वर श्रीकृष्ण अत्यन्त कठोर तपस्या करते थे और जहाँ उनके दर्शनकी इच्छासे लोकपालगण खड़े थे। लोकभाविनी उमा और गज़ाके साथ भगवान्‌ चन्द्रशेखर वहाँ गये

अध्याय 269

श्लोक 16

मुनिभिश्चैव प्रमथैः समं शर्वः समाययौ ।यत्र विश्वेश्वरो विष्णुस्तपस्तेपे सुदारुणम्

munibhiścaiva pramathaiḥ samaṃ śarvaḥ samāyayau | yatra viśveśvaro viṣṇustapastepe sudāruṇam

अर्थ श्लोक 15 के साथ

अध्याय 269

श्लोक 17

यत्र ते लोकपालाश्च तिष्ठन्ति स्म दिदृक्षया ।उमया लोकभाविन्या गङ्गया चन्द्रशेखरः

yatra te lokapālāśca tiṣṭhanti sma didṛkṣayā | umayā lokabhāvinyā gaṅgayā candraśekharaḥ

अर्थ श्लोक 15 के साथ

अध्याय 269

श्लोक 18

स सर्वलोकप्रभवो भवो विभुर्जटी च साक्षात् प्रणवात्मकः कृती ।द्रष्टुं हरिं विष्णुमुदारविक्रमो ययौ यथेष्टं पिशिताशनैर्वृतः

sa sarvalokaprabhavo bhavo vibhurjaṭī ca sākṣāt praṇavātmakaḥ kṛtī | draṣṭuṃ hariṃ viṣṇumudāravikramo yayau yatheṣṭaṃ piśitāśanairvṛtaḥ

हिन्दी अर्थ

सम्पूर्ण लोकोंकी उत्पत्तिके कारणभूत सर्वव्यापी भगवान्‌ भव साक्षात्‌ प्रणवस्वरूप हैं । वे जटाधारी और कृतकृत्य हैं। उनका पराक्रम महान्‌ है । वे पिशाचोंसे घिरकर यथेष्ट भावसे श्रीहरिका दर्शन करनेके लिये गये

स्रोत: local proofread transcription: Sanskrit shlokas of the Harivamsa (Harivamsha, Vishnu and Bhavishya parvas) from sanskritdocuments.org. One chapter per adhyaya; verse numbers as printed in the source (restarting in each adhyaya). Appendix sections are not included. · प्राप्त 19/10/2026

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शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

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पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

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आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

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आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

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Collated with BORI Critical Edition of Mahabharata Khilaparvan.