अध्याय 269
श्लोक 1
पिशाचैः, मुनिभिः अप्सरोभिश्च साकं उमासहितस्य भगवतः शङ्करस्य श्रीकृष्णस्य समीपे गमनं तस्याग्रे समपद्यन्त भूतसङ्घाः सहस्रशः ।घण्टाकर्णो विरूपाक्षः कुण्डधार कुमुद्वहः
piśācaiḥ, munibhiḥ apsarobhiśca sākaṃ umāsahitasya bhagavataḥ śaṅkarasya śrīkṛṣṇasya samīpe gamanaṃ tasyāgre samapadyanta bhūtasaṅghāḥ sahasraśaḥ | ghaṇṭākarṇo virūpākṣaḥ kuṇḍadhāra kumudvahaḥ
श्लोक 1–8 का हिन्दी अर्थ
बैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! उस समय पगवान् शड्रके आगे सहस्रों भूतसमूह चल रहे मे—घण्टाकर्ण, विरूपाक्ष, कुण्डधार, कुमुद्ह, दीर्घरोमा, ीर्घभुज, दीर्घबाहु, निरज्जन, उसनेत्र, शतमुख, शतग्रीव, गतोदर, कुण्डोदर, महाग्रीव, स्थूलजिह्, द्विबाहु, पार्शववक्त्र, संहमुख, उन्नतांस, महाहनु, त्रिबाहु, पश्नबाहु, व्याघ्रवक््त्र और सितानन—ये तथा दूसरे भी बहुत-से बड़े- डड़े मुख और विशाल नेत्रवाले भूत नाचते, हँसते औौर परस्पर ताल ठोंकते थे। इनके अतिरिक्त भी हहुत-से घोर रूप और विकृत मुखवाले भूत थे, जो मुर्दे खाते, मुर्दोको ढोकर ले जाते और मांस तथा क्तका आहार करते थे। वे बहुत-से शव शीघ्रतापूर्वक धर-उधरसे लाकर खाते थे, भयंकर रक्त पीते थे और ब्रहुत-से शबोंके टुकड़े-टुकड़े कर डालते थे। वे सब- के-सब विस्तृत, विशाल और विकराल थे । उनके शरीरमें शयाप्त हुई नस-नाड़ियाँ स्पष्ट दिखायी देती थीं। वे नाना प्रकारकी आकृतिवाले भूत बड़े वीर थे। उन्होंने अपने शूलोंके अग्रभागमें कितने ही मनुष्योंकी लाशें पिरो रखी थीं । कितने ही भूत नरमुण्डोंकी मालाओंसे अलंकृत थे। केतनोंने अपने-आपको अँतड़ियोंके पाशोंसे बाँध रखा था