Harivamsha Purana
268
अध्याय 268 / 318

Parva 3, Adhyāya 85

22 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ22 श्लोक

अध्याय 268

श्लोक 1

भगवतः श्रीकृष्णस्य समीपे इन्द्रादीनां देवानां उमासहितस्य भगवतः शिवस्य चागमनं तत इन्द्रः स्वयं तत्र आरुह्य गजमुत्तमम् ।द्रष्टुं सर्वेश्वरं विष्णुं तपस्यन्तं समाययौ

bhagavataḥ śrīkṛṣṇasya samīpe indrādīnāṃ devānāṃ umāsahitasya bhagavataḥ śivasya cāgamanaṃ tata indraḥ svayaṃ tatra āruhya gajamuttamam | draṣṭuṃ sarveśvaraṃ viṣṇuṃ tapasyantaṃ samāyayau

हिन्दी अर्थ

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! तदनन्तर साक्षात्‌ न्द्र अपने उत्तम हाथी ऐरावतपर आरूढ़ हो तपस्यामें नगे हुए सर्वेश्वर श्रीकृष्णका दर्शन करनेके लिये वहाँ भाये

अध्याय 268

श्लोक 2

ततो यमस्तु भगवानारुह्य महिषं वरम् ।किङ्करैश्च स्वयं साक्षादाययौ नगमुत्तमम्

tato yamastu bhagavānāruhya mahiṣaṃ varam | kiṅkaraiśca svayaṃ sākṣādāyayau nagamuttamam

हिन्दी अर्थ

इसके बाद साक्षात्‌ भगवान्‌ यम श्रेष्ठ महिषपर भारूढ़ हो अपने किड्टरोंके साथ उस उत्तम पर्वतपर भाये

अध्याय 268

श्लोक 3

प्रचेता हंसमारुह्य वारुणैश्च समन्वितः ।श्वेतच्छत्रसमायुक्तः श्वेतव्यजनवीजितः

pracetā haṃsamāruhya vāruṇaiśca samanvitaḥ | śvetacchatrasamāyuktaḥ śvetavyajanavījitaḥ

हिन्दी अर्थ

श्रेत छत्रसे युक्त वरुण हंसपर आरूढ़ हो अपने सेवकोंके साथ वहाँ पधारे। उनके सेवक श्वेत ्रैवरसे उनके लिये हवा कर रहे थे

अध्याय 268

श्लोक 4

ययौ कैलासशिखरं द्रष्टुं केशवमञ्जसा ।अन्ये चापि तथा देवा आदित्या वसवस्तथा

yayau kailāsaśikharaṃ draṣṭuṃ keśavamañjasā | anye cāpi tathā devā ādityā vasavastathā

श्लोक 4–8 का हिन्दी अर्थ

वे वरुण भी पस्वी केशवका दर्शन करनेके लिये कैलासशिखरपर ये थे। राजन्‌ ! इसी प्रकार दूसरे देवता आदित्य, वसु और रुद्र आदि भी केशवका दर्शन करनेके लिये वहाँ धधारे थे। राजन्‌ ! सिद्ध, मुनि, गन्धर्व, यक्ष, किन्नर तथा त्य और गीतमें निपुण समस्त अप्सराएँ भी वहाँ आरयीं । स प्रकार सब देवता कैलास पर्वतपर आये। पर्वत, रद तथा अन्य श्रेष्ठ मुनि एवं समस्त देवता आश्चर्यसे कित-नेत्र होकर परस्पर कहने लगे-' यह आश्चर्यकी गत देखो ! ऐसा न तो हुआ है और न होगा। जो योगियोंके येय हैं, वे साक्षात्‌ जगद्‌गुरु श्रीकृष्ण स्वयं ही तप कर हे हैं।' इस तपस्याका क्या उद्देश्य हो सकता है, इसपर | सभी समुदायोंके लोग विचार करने लगे

अध्याय 268

श्लोक 5

रुद्राश्चैव तथा राजन् द्रष्टुं केशवमाययुः ।सिद्धाश्च मुनयश्चैव गन्धर्वा यक्षकिन्नराः

rudrāścaiva tathā rājan draṣṭuṃ keśavamāyayuḥ | siddhāśca munayaścaiva gandharvā yakṣakinnarāḥ

अर्थ श्लोक 4 के साथ

अध्याय 268

श्लोक 6

सर्वाश्चाप्सरसो राजन् नृत्यगीतविशारदाः ।ततो देवगणः सर्वः कैलासं समपद्यत

sarvāścāpsaraso rājan nṛtyagītaviśāradāḥ | tato devagaṇaḥ sarvaḥ kailāsaṃ samapadyata

अर्थ श्लोक 4 के साथ

अध्याय 268

श्लोक 7

पर्वतो नारदश्चैव तथान्ये मुनिसत्तमाः ।विस्मयस्थितलोलाक्षाः सर्वदेवगणास्तथा

parvato nāradaścaiva tathānye munisattamāḥ | vismayasthitalolākṣāḥ sarvadevagaṇāstathā

अर्थ श्लोक 4 के साथ

अध्याय 268

श्लोक 8

आश्चर्यं खलु पश्यध्वं न भूतं न भविष्यति ।योगिध्येयः स्वयं कृष्णो यत्तप्यति गुरुः स्वयम् ।को न्वत्र समयो भूयादिति ते मेनिरे गणाः

āścaryaṃ khalu paśyadhvaṃ na bhūtaṃ na bhaviṣyati | yogidhyeyaḥ svayaṃ kṛṣṇo yattapyati guruḥ svayam | ko nvatra samayo bhūyāditi te menire gaṇāḥ

अर्थ श्लोक 4 के साथ

अध्याय 268

श्लोक 9

ततः समाप्ते सकले जगत्पतेर्व्रते समूले सकलेश्वरः शिवः ।द्रष्टुं हरिं लोकहितैषिणं प्रभुं ययौ भवान्या सह भूतसङ्घैः

tataḥ samāpte sakale jagatpatervrate samūle sakaleśvaraḥ śivaḥ | draṣṭuṃ hariṃ lokahitaiṣiṇaṃ prabhuṃ yayau bhavānyā saha bhūtasaṅghaiḥ

हिन्दी अर्थ

तदनन्तर जब जगत्पति श्रीकृष्णका वह सारा ब्रत पूलसहित परिपूर्ण हो गया, तब सकलेश्वर शिव पार्वती तथा भूतगणोंके साथ उन लोकहितैषी प्रभु श्रीहरिसे मिलनेके लिये गये

अध्याय 268

श्लोक 10

सार्धं कुबेरेण सगुह्यकेन सख्या प्रियेण प्रभुरीश्वरः शिवः ।स्वयं जटी भूतपिशाचसंवृतः शरी च खड्गी शशिखण्डशेखरः

sārdhaṃ kubereṇa saguhyakena sakhyā priyeṇa prabhurīśvaraḥ śivaḥ | svayaṃ jaṭī bhūtapiśācasaṃvṛtaḥ śarī ca khaḍgī śaśikhaṇḍaśekharaḥ

हिन्दी अर्थ

उनके साथ गुह्मकोंसहित प्रिय सखा कुबेर भी थे। सर्वसमर्थ ईश्वर भगवान्‌ शिव स्वयं. सिरपर जटा धारण किये भूतों और पिशाचोंसे घिरे हुए थे, धनुष, बाण और खड्गसे युक्त थे। उनके मस्तकपर अर्धचन्द्र शोभा दे रहा था

अध्याय 268

श्लोक 11

करेण बिभ्रत्सहदर्भकुण्डिकां करेण साक्षादपरेण दीपिकाम् ।अन्येन विभ्रन्महतीं स डिण्डिमां शूलं च बिभ्रन्नपरेण बाहुना

kareṇa bibhratsahadarbhakuṇḍikāṃ kareṇa sākṣādapareṇa dīpikām | anyena vibhranmahatīṃ sa ḍiṇḍimāṃ śūlaṃ ca bibhrannapareṇa bāhunā

श्लोक 11–12 का हिन्दी अर्थ

एक हाथमें कुशसहित कमण्डलु धारण किये, दूसरे हाथमें जलती मशाल लिये, तीसरे हाथमें विशाल डमरू धारण किये और चौथे हाथमें त्रिशूल लिये, गलेमें रुद्राक्षकी मालाएँ धारण किये, कुछ-कुछ पिज्ल एवं ताम्रवर्णके शरीरवाले, जटाओंसे सुशोभित कल्याणकारी भगवान्‌ चन्द्रशेखर श्वेत वृषभसे संयुक्त हो बड़ी शोभा पा रहे थे

अध्याय 268

श्लोक 12

गुणान् स रुद्राक्षकृतान् समुद्वहञ्जटाभिरापिङ्गलताम्रमूर्तिः ।विराजमानः प्रभुरिन्दुशेखरो वृषेण युक्तः स सितेन शङ्करः

guṇān sa rudrākṣakṛtān samudvahañjaṭābhirāpiṅgalatāmramūrtiḥ | virājamānaḥ prabhurinduśekharo vṛṣeṇa yuktaḥ sa sitena śaṅkaraḥ

अर्थ श्लोक 11 के साथ

अध्याय 268

श्लोक 13

उमास्तनद्वन्द्वसमर्पिताननस्तथा समाश्लिष्य निपीडिताधरः ।गङ्गाम्बुविक्षालितचन्द्रशेखरस्तां चापि वीक्षन् बहुशस्तदा शिवः

umāstanadvandvasamarpitānanastathā samāśliṣya nipīḍitādharaḥ | gaṅgāmbuvikṣālitacandraśekharastāṃ cāpi vīkṣan bahuśastadā śivaḥ

हिन्दी अर्थ

उनके मुख-मण्डलकी दृष्टि देवी उमाके उरोजॉंपर लगी हुई थी। भगवती उमा भी महादेवजीका आलिऑ्न करके उनका अधर-चुम्बन कर लेती थीं। भगवान्‌ शिवका चन्द्रारध-शोभित मस्तक गज्ञजाजीके जलसे प्रक्षालित होता था और वे भगवान्‌ शड्डर उस समय बारम्बार देवी उमाकी ओर देखते रहते थे

अध्याय 268

श्लोक 14

भस्माङ्गरागैरनुलेपिताननो महोरगैर्बद्धजटः सनातनः ।शिरःकपालैः परिशोभितस्तदा द्रष्टुं हरिं केशवमभ्ययाच्छिवः

bhasmāṅgarāgairanulepitānano mahoragairbaddhajaṭaḥ sanātanaḥ | śiraḥkapālaiḥ pariśobhitastadā draṣṭuṃ hariṃ keśavamabhyayācchivaḥ

हिन्दी अर्थ

उनके मुखपर भस्मस्वरूप अज़राग लगा हुआ था। बड़े-बड़े सर्पोंसे उनकी जटाएँ बँधी हुई थीं। नरमुण्डोंकी मालासे सुशोभित वे सनातन शिव उस समय भगवान्‌ केशवको देखनेके लिये उनके पास गये

अध्याय 268

श्लोक 15

यमाहुरग्र्यं पुरुषं महान्तं पुरातनं साङ्ख्यनिबद्धदृष्टयः ।यस्यापि देवस्य गुणान् समग्रांस्तत्त्वांश्चतुर्विंशतिमाहुरेके

yamāhuragryaṃ puruṣaṃ mahāntaṃ purātanaṃ sāṅkhyanibaddhadṛṣṭayaḥ | yasyāpi devasya guṇān samagrāṃstattvāṃścaturviṃśatimāhureke

हिन्दी अर्थ

जिन्हें सांख्यदर्शी विद्वान्‌ श्रेष्ठ, महान्‌ एवं पुरातन पुरुष कहते हैं, जिन महादेवजीके समस्त गु्णोंको ही एक श्रेणीके विद्वान्‌ चौबीस तत्त्व कहते हैं

अध्याय 268

श्लोक 16

यमाहुरेकं पुरुषं पुरातनं कणादनामानमजं महेश्वरम् ।दक्षस्य यज्ञं विनिहत्य यो वै विनाश्य देवानसुरान् सनातनः

yamāhurekaṃ puruṣaṃ purātanaṃ kaṇādanāmānamajaṃ maheśvaram | dakṣasya yajñaṃ vinihatya yo vai vināśya devānasurān sanātanaḥ

हिन्दी अर्थ

जिन्हें एकमात्र पुरातन पुरुष, कणाद नामसे प्रसिद्ध, अजन्मा महेश्वर कहा गया है, जिन सनातन महादेवने दक्षयज्ञका विध्वंस करके देवता और असुरोंको भी मार भगाया था

अध्याय 268

श्लोक 17

यं विदुर्भूततत्त्वज्ञं भूतेशं भूतभावनम् ।वामदेवं विरूपाक्षमाहुस्तत्त्वविदो जनाः

yaṃ vidurbhūtatattvajñaṃ bhūteśaṃ bhūtabhāvanam | vāmadevaṃ virūpākṣamāhustattvavido janāḥ

श्लोक 17–20 का हिन्दी अर्थ

श्२६१ जिन्हें तत्त्ववेत्ता पुरुष सम्पूर्ण भूतोंका तत्त्वज्ञ जानते हैं और जिन्हें भूतनाथ, भूतभावन, वामदेव तथा विरूपाक्ष कहते हैं । महादेव, सहस्राक्ष, कालमूर्ति, चतुर्भुज, रुद्र, रोदन नामधारी और विश्वेश्वर शिव कहकर पुकारते हैं। जिन्हें शिवभक्त पुरुष अप्रमेय, आधाररहित, नगर, नगर पार्षदोंसे घिरा हुआ, नागयुक्त, अग्रितुल्य तेजस्वी, विश्वेश्वर, शान्तस्वरूप, आदि एवं सनातन शिव कहते हैं। राजन्‌! ये पृथ्वी आदि सारे तत्त्व उन्हींकी मूर्ति हैं

अध्याय 268

श्लोक 18

महादेवं सहस्राक्षं कालमूर्तिं चतुर्भुजम् ।रुद्रं रोदननामानमाहुर्विश्वेश्वरं शिवम्

mahādevaṃ sahasrākṣaṃ kālamūrtiṃ caturbhujam | rudraṃ rodananāmānamāhurviśveśvaraṃ śivam

अर्थ श्लोक 17 के साथ

अध्याय 268

श्लोक 19

अप्रमेयमनाधारमाहुर्माहेश्वरा जनाः ।नग्नं नग्नपरीतं तु नागिनं त्वग्निवर्चसम्

aprameyamanādhāramāhurmāheśvarā janāḥ | nagnaṃ nagnaparītaṃ tu nāginaṃ tvagnivarcasam

अर्थ श्लोक 17 के साथ

अध्याय 268

श्लोक 20

आहुर्विश्वेश्वरं शान्तं शिवमादिं सनातनम् ।तस्य मूर्तिरिमाः सर्वा धराद्याः सकला नृप

āhurviśveśvaraṃ śāntaṃ śivamādiṃ sanātanam | tasya mūrtirimāḥ sarvā dharādyāḥ sakalā nṛpa

अर्थ श्लोक 17 के साथ

अध्याय 268

श्लोक 21

भूमिरापोऽनलो वायुः खं सूर्यश्च तथा शशी ।अग्निश्च यजमानश्च प्रकृतिश्चैवमष्टधा

bhūmirāpo'nalo vāyuḥ khaṃ sūryaśca tathā śaśī | agniśca yajamānaśca prakṛtiścaivamaṣṭadhā

हिन्दी अर्थ

पृथ्वीरहित जल, अग्रि, वायु, आकाश, पूर्य, चन्द्रमा, यजमान और प्रकृति—ये महादेवजीके आठ विग्रह हैं

अध्याय 268

श्लोक 22

महादेवो महायोगी गिरीशो नीललोहितः ।आदिकर्ता महाभर्ता शूलपाणिरुमापतिः ।द्रष्टुं विश्वेश्वरं विष्णुं भूतसङ्घैः समाययौ

mahādevo mahāyogī girīśo nīlalohitaḥ | ādikartā mahābhartā śūlapāṇirumāpatiḥ | draṣṭuṃ viśveśvaraṃ viṣṇuṃ bhūtasaṅghaiḥ samāyayau

हिन्दी अर्थ

वे महादेव, महायोगी, गिरीश, गील-लोहित, आदिकर्ता, महाभर्ता, शूलपाणि एवं उमावल्लभ शिव जगदीश्वर श्रीकृष्णका दर्शन करनेके लिये भूत- परमूहोंके साथ वहाँ आये

स्रोत: local proofread transcription: Sanskrit shlokas of the Harivamsa (Harivamsha, Vishnu and Bhavishya parvas) from sanskritdocuments.org. One chapter per adhyaya; verse numbers as printed in the source (restarting in each adhyaya). Appendix sections are not included. · प्राप्त 19/10/2026

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शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

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आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

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Collated with BORI Critical Edition of Mahabharata Khilaparvan.