अध्याय 252
श्लोक 1
कश्यपाय अदितये देवेभ्यश्च भगवतः विष्णोः वरदानं, अदितेः गर्भात् प्राकट्यं नारायणस्तु भगवाञ्छ्रुत्वैतत् परमं स्तवम् ।ब्रह्मज्ञेन द्विजेन्द्रेण कश्यपेन समीरितम्
kaśyapāya aditaye devebhyaśca bhagavataḥ viṣṇoḥ varadānaṃ, aditeḥ garbhāt prākaṭyaṃ nārāyaṇastu bhagavāñchrutvaitat paramaṃ stavam | brahmajñena dvijendreṇa kaśyapena samīritam
श्लोक 1–3 का हिन्दी अर्थ
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! ब्रह्मवेत्ता विप्रवर कश्यपद्वारा किये गये इस परमस्तवकों सुनकर गवान् नारायणके मनमें बड़ी प्रसन्नता हुई; वे उन हहात्मा देवताओंसे मेघगर्जनाके समान खिग्ध-गम्भीर पष करते हुए हृष्ट-पुष्ठ पद और अक्षरवाली उत्तम ाणीमें बोले; उस समय आकाशसे केवल उनका न्दमात्र सुनायी देता था, दर्शन नहीं हो रहा था। करने, | करने और अन्यथा करनेमें भी समर्थ वे श्रीमान् गगवान् नारायण देव इस प्रकार कहने लगे