Harivamsha Purana
242
अध्याय 242 / 318

Parva 3, Adhyāya 59

101 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ101 श्लोक

अध्याय 242

श्लोक 1

वृषपर्वणः निष्कुम्भेन विश्वेदेवेन सार्द्धं, प्रह्रादस्य कालेन सार्द्धं घोरयुद्धस्य वर्णनं वृषपर्वा तु दैत्येन्द्रो विश्वमद्भुतदर्शनम् ।निष्कुम्भं योधयामास लोहितार्कसमद्युतिम्

vṛṣaparvaṇaḥ niṣkumbhena viśvedevena sārddhaṃ, prahrādasya kālena sārddhaṃ ghorayuddhasya varṇanaṃ vṛṣaparvā tu daityendro viśvamadbhutadarśanam | niṣkumbhaṃ yodhayāmāsa lohitārkasamadyutim

हिन्दी अर्थ

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! दैत्यणाज वृषपर्वानि अरुण-सूर्यके समान कान्तिमान्‌ तथा अद्भुत दिखायी देनेवाले निष्कुम्भ नामक विश्वेदेवके साथ युद्ध किया

अध्याय 242

श्लोक 2

क्रोधमूर्च्छितवक्त्रस्तु धुन्वन् परमकार्मुकम् ।धनूंषि प्रेक्ष्य शत्रूणां सारथिं त्वरितोऽब्रवीत्

krodhamūrcchitavaktrastu dhunvan paramakārmukam | dhanūṃṣi prekṣya śatrūṇāṃ sārathiṃ tvarito'bravīt

हिन्दी अर्थ

उसकी मुखाकृति क्रोधसे व्याप्त थी। तरह अपने उत्तम धनुषको बारम्बार खींच रहा था। उसने शत्रुओंके धनुषको देखकर तुरंत अपने सारथिसे क्रहा—

अध्याय 242

श्लोक 3

अत्रैव तावत् त्वरितं नय मे सारथे रथम् ।एते देवाश्च सहिता घ्नन्ति नः समरे बलम्

atraiva tāvat tvaritaṃ naya me sārathe ratham | ete devāśca sahitā ghnanti naḥ samare balam

हिन्दी अर्थ

सारथे ! ये देवता एक साथ होकर समरभूमिमें हमारी सेनाका संहार करते हैं, अत: तुम मेरे रथको तुरंत पहले यहीं ले चलो

अध्याय 242

श्लोक 4

एतान् निहन्तुमिच्छामि समरश्लाघिनो रणे ॥ एतैर्हि दानवानीकं कृतच्छिद्रमिदं महत्

etān nihantumicchāmi samaraślāghino raṇe || etairhi dānavānīkaṃ kṛtacchidramidaṃ mahat

हिन्दी अर्थ

समरभूमिमें अपने बल- पौरुषकी प्रशंसा करनेवाले इन देवताओंका मैं युद्धमें वध करना चाहता हूँ; क्योंकि इन्होंने दानवसेनामें यह विशाल छिद्र उत्पन्न कर दिया है '

अध्याय 242

श्लोक 5

ततः प्रजविताश्वेन रथेन रथिनां वरः ॥ अरीनभ्यहनत् क्रुद्धः शरजालैर्महासुरः

tataḥ prajavitāśvena rathena rathināṃ varaḥ || arīnabhyahanat kruddhaḥ śarajālairmahāsuraḥ

हिन्दी अर्थ

तदनन्तर वेगशाली घोड़ोंसे युक्त रथके द्वारा वहाँ उपस्थित हो रथियोंमें श्रेष्ठ पहान्‌ असुर वृषपर्वाने क्रोधपूर्वक शत्रुओं पर बाणसमूहोंद्वारा प्रहार आरम्भ किया

अध्याय 242

श्लोक 6

न स्थातुं देवताः शक्ताः किं पुनर्योद्धुमाहवे ॥ वृषपर्वेषुनिर्भिन्नाः सर्व एवाभिदुद्रुवुः

na sthātuṃ devatāḥ śaktāḥ kiṃ punaryoddhumāhave || vṛṣaparveṣunirbhinnāḥ sarva evābhidudruvuḥ

हिन्दी अर्थ

श्१६७ उस समय देवता उस युद्धस्थलमें खड़े भी न रह सके, फिर युद्ध करनेकी तो बात ही कया है? वृषपवकि बाणोंसे विदीर्ण होकर सब-के-सब वहाँसे भाग चले

अध्याय 242

श्लोक 7

तान् मृत्युवशमापन्नान् वैवस्वतवशं गतान् ॥ समीक्ष्य निहतांज्ञातीनवतस्थे महासुरः

tān mṛtyuvaśamāpannān vaivasvatavaśaṃ gatān || samīkṣya nihatāṃjñātīnavatasthe mahāsuraḥ

हिन्दी अर्थ

वहाँ मृत्युके वशमें पड़कर यमराजके अधीन हुए अपने मारे गये भाई-बन्धुओंको देखकर महान्‌ असुर वृषपर्वा वहीं ठहर गया

अध्याय 242

श्लोक 8

दृष्ट्वा तं तत्र निष्कुम्भं सर्वे ते त्रिदशोत्तमाः ।समेत्य सहिताः सर्वे द्रुतं तं पर्यवारयन्

dṛṣṭvā taṃ tatra niṣkumbhaṃ sarve te tridaśottamāḥ | sametya sahitāḥ sarve drutaṃ taṃ paryavārayan

हिन्दी अर्थ

निष्कुम्भ नामक विश्वेदेवको वहाँ उपस्थित देख वे सभी देवशिरोमणि एकत्र होकर एक साथ वहाँ आये और सब-के-सब तुरंत उन्हें घेरकर खड़े हो गये

अध्याय 242

श्लोक 9

व्यवस्थितं तु निष्कुम्भं दृष्ट्वा त्रिदशसत्तमम् ।बभूवुर्बलवन्तो वै तस्यास्त्रबलतेजसा

vyavasthitaṃ tu niṣkumbhaṃ dṛṣṭvā tridaśasattamam | babhūvurbalavanto vai tasyāstrabalatejasā

हिन्दी अर्थ

देवश्रेष्ठ निष्कुम्भको वहाँ डटा हुआ देख उनके अस्त्रबल और तेजसे सभी देवता सबल हो गये

अध्याय 242

श्लोक 10

वृषपर्वा तु शैलाभं निष्कुम्भं समरे स्थितम् ।महेन्द्र इव धाराभिः शरवर्षैरवाकिरत्

vṛṣaparvā tu śailābhaṃ niṣkumbhaṃ samare sthitam | mahendra iva dhārābhiḥ śaravarṣairavākirat

हिन्दी अर्थ

पर्वताकार निष्कुम्भको समराज़णमें खड़ा देख वृषपर्वा उनके ऊपर बाणोंकी वर्षा करने लगा, ठीक उसी तरह जैसे देवराज इन्द्र जलकी धाराओंसे पर्वतको आच्छादित करते हैं

अध्याय 242

श्लोक 11

अचिन्तयित्वा तु शराञ्छरीरे पतितान् बहून् ।स्थितश्च प्रमुखे श्रीमान् ससैन्यः स महाबलः

acintayitvā tu śarāñcharīre patitān bahūn | sthitaśca pramukhe śrīmān sasainyaḥ sa mahābalaḥ

हिन्दी अर्थ

अपने शरीरपर पड़े हुए उन बहुसंख्यक बाणोंकी कोई परवा न करके पहाबली श्रीमान्‌ निष्कुम्भ युद्धके मुहानेपर सेनासहित डटे रहे

अध्याय 242

श्लोक 12

सम्प्रहस्य महातेजा वृषपर्वाणमाहवे ।अभिदुद्राव वेगेन कम्पयन्निव मेदिनीम्

samprahasya mahātejā vṛṣaparvāṇamāhave | abhidudrāva vegena kampayanniva medinīm

श्लोक 12–13 का हिन्दी अर्थ

उन महातेजस्वी विश्वेदेवने युद्धक्षेत्रमें ँसकर पृथ्वीको कम्पित करते हुए-से बड़े वेगसे तरृषपर्वापर आक्रमण किया । धावा करते समय वे तेजसे रीपिमान्‌ हो रहे थे। उस समय उनका रूप प्रज्वलित अग्िके समान दुर्ध्ष हो रहा था

अध्याय 242

श्लोक 13

तस्य त्वाधावमानस्य दीप्यमानस्य तेजसा ॥ बभूव रूपं दुर्धर्षं दीप्तस्येव विभावसोः

tasya tvādhāvamānasya dīpyamānasya tejasā || babhūva rūpaṃ durdharṣaṃ dīptasyeva vibhāvasoḥ

अर्थ श्लोक 12 के साथ

अध्याय 242

श्लोक 14

रथं त्यक्त्वा महातेजाः सक्रोधः समपद्यत ॥ वृक्षमुत्पाटयामास महातालं महोच्छ्रयम्

rathaṃ tyaktvā mahātejāḥ sakrodhaḥ samapadyata || vṛkṣamutpāṭayāmāsa mahātālaṃ mahocchrayam

हिन्दी अर्थ

वे महातेजस्वी निष्कुम्भ रथको त्यागकर अत्यन्त कुपित हो उठे; उन्होंने एक बहुत ऊँचे और विशाल तालवृक्षको इखाड़ लिया

अध्याय 242

श्लोक 15

ततश्चिक्षेप तं वृक्षं निष्कुम्भो वृषपर्वणः ।तं गृहीत्वा महावृक्षं पाणिनैकेन दानवः

tataścikṣepa taṃ vṛkṣaṃ niṣkumbho vṛṣaparvaṇaḥ | taṃ gṛhītvā mahāvṛkṣaṃ pāṇinaikena dānavaḥ

श्लोक 15–20 का हिन्दी अर्थ

तत्पश्चात्‌ निष्कुम्भने वृषपर्वापर उस वृक्षको दे मारा; किंतु उस पराक्रमी दानवने एक ही हाथसे उस विशाल वृक्षको पकड़कर बड़े जोरसे संहनाद किया और उसे घुमाकर उसके द्वारा सवारोंसहित हाथियों, रथोंसहित रथियों एवं बहुत-से देवताओंको मार गराया। समरभूमिमें कुपित हुए प्राणहारी कालके समान रुषपर्वासे पाला पड़नेपर सब देवता भाग खड़े हुए। रवताओंको भय देनेवाले उस कुपित दानवको आक्रमण करते देख निष्कुम्भको बड़ा क्रोध हुआ और उन्होंने पनुष लेकर बड़े जोरसे सिंहनाद किया । उन महापराक्रमी नष्कुम्भने तेज धारवाले तीस मर्मभेदी बाणोंद्वारा दानवराज षपर्वाको घायल कर दिया। तब दैत्यराज वृषपर्वाने भी भयंकर बाणों और शक्तियोंद्वारा निष्कुम्भको घायल कर दिया। घायल होनेपर वे रणभूमिमें खड़े-खड़े बहुत क्त बहाने लगे

अध्याय 242

श्लोक 16

विनद्य सुमहानादं भ्रामयित्वा च वीर्यवान् ॥ सगजान् सगजारोहान् सरथान् रथिनस्तथा

vinadya sumahānādaṃ bhrāmayitvā ca vīryavān || sagajān sagajārohān sarathān rathinastathā

अर्थ श्लोक 15 के साथ

अध्याय 242

श्लोक 17

जघान दानवस्तेन शाखिना त्रिदशांस्तदा ॥ तमन्तकमिव क्रुद्धं समरे प्राणहारिणम्

jaghāna dānavastena śākhinā tridaśāṃstadā || tamantakamiva kruddhaṃ samare prāṇahāriṇam

अर्थ श्लोक 15 के साथ

अध्याय 242

श्लोक 18

वृषपर्वाणमासाद्य त्रिदशा विप्रदुद्रुवुः ।तमापतन्तं सङ्क्रुद्धं त्रिदशानां भयावहम्

vṛṣaparvāṇamāsādya tridaśā vipradudruvuḥ | tamāpatantaṃ saṅkruddhaṃ tridaśānāṃ bhayāvaham

अर्थ श्लोक 15 के साथ

अध्याय 242

श्लोक 19

आलोक्य धन्वी निष्कुम्भश्चुक्रोध च ननाद च ।स तत्र निशितैर्बाणैस्त्रिंशद्भिर्मर्मभेदिभिः

ālokya dhanvī niṣkumbhaścukrodha ca nanāda ca | sa tatra niśitairbāṇaistriṃśadbhirmarmabhedibhiḥ

अर्थ श्लोक 15 के साथ

अध्याय 242

श्लोक 20

निर्बिभेद महावीर्यो निष्कुम्भो दानवाधिपम् ॥ शरशक्तिभिरुग्राभिदैत्यानामधिपोऽप्यमुम्

nirbibheda mahāvīryo niṣkumbho dānavādhipam || śaraśaktibhirugrābhidaityānāmadhipo'pyamum

अर्थ श्लोक 15 के साथ

अध्याय 242

श्लोक 21

विद्धः स रणमध्यस्थो रुधिरं प्रास्रवद् बहु ॥ उद्विग्ना मुक्तकेशास्ते भग्नदर्पाः पराजिताः

viddhaḥ sa raṇamadhyastho rudhiraṃ prāsravad bahu || udvignā muktakeśāste bhagnadarpāḥ parājitāḥ

श्लोक 21–32 का हिन्दी अर्थ

फिर तो वृषपर्वाके भयसे उद्धिग्र हो केश खोले दर्पहीन एवं पराजित हुए समस्त देवता लंबी साँस खींचते हुए वहाँसे भाग चले। वृषपर्वासे डराये हुए देवता भागते समय एक-दूसरेको कुचल डालते थे और भयभीत हो पीछेकी ओर मुँह फेरकर बारंबार देखते जाते थे। युद्धकुशल वृषपर्वाने उस समय संग्राममें निष्कुम्भके उन सब सैनिकोंको हथियार नीचे डालनेके लिये विवश कर दिया था। उसी युद्धमें लाल नेत्रवाले हिरण्यकशिपुकुमार महापराक्रमी प्रह्माद कालके साथ युद्ध कर रहे थे। उन दानववीर प्रह्मादके लिये युद्धकालमें विजय दिलानेवाली सारी क्रियाएँ शुक्राचार्यने बड़ी शीघ्रताके साथ सम्पन्न की थीं। उन्होंने अग्रिको घीकी आहुतिसे तृप्त किया और ब्राह्मणोंको मस्तक झुकाया; उस समय उनके होमे हुए घृतकी सुगन्ध लेकर मन्द- मन्द सुगन्धित वायु चल रही थी। साक्षात्‌ शुक्राचार्यने प्रह्मादके सुन्दर मस्तकपर विजयके लिये अभिमन्त्रित किये हुए नाना प्रकारके विचित्र पुष्पहार बाँधे थे। युद्धपरायण, अतिशय पराक्रमी, महात्मा प्रह्वादके कालके साथ होनेवाले संग्राममें भूगुनन्दन शुक्राचार्यने शान्तिकर्मका सम्पादन किया था। महात्मा शुक्राचार्यके दस हजार शिष्य थे, जो दानववीरोंके लिये परम उत्तम सुख- शान्तिकी प्राप्तिक निमित्त जप करते थे। उन्होंने दानवोंके लिये अथर्ववेदके अनुसार परमात्माकी स्तुतिसे युक्त और रणप्रवेशके अनुरूप विजयसाधक दिव्य कर्मका भी अनुष्ठान किया था। तदनन्तर सम्पूर्ण अस्त्रोंके ज्ञाता, युद्धसे कभी पीछे न हटनेवाले, विद्वान, तपस्वी, स्वस्तिवाचन आदि माज़लिक कृत्यसे सम्पन्न, धनुर्धर तथा कवचधारी दानवोंने बड़े वेगसे उछलकर राजा बलिका सम्मान करते हुए प्रह्मदको चारों ओरसे घेर लिया

अध्याय 242

श्लोक 22

श्वसन्तो दुद्रुवुः सर्वे भयाद् वै वृषपर्वणः ॥ अन्योन्यं प्रममन्थुस्ते त्रासिता वृषपर्वणा

śvasanto dudruvuḥ sarve bhayād vai vṛṣaparvaṇaḥ || anyonyaṃ pramamanthuste trāsitā vṛṣaparvaṇā

अर्थ श्लोक 21 के साथ

अध्याय 242

श्लोक 23

पृष्ठवक्त्राः सुसंविग्नाः प्रेक्षमाणा मुहुर्मुहुः ॥ त्यक्तप्रहरणाः सर्वे कृतास्ते वृषपर्वणा

pṛṣṭhavaktrāḥ susaṃvignāḥ prekṣamāṇā muhurmuhuḥ || tyaktapraharaṇāḥ sarve kṛtāste vṛṣaparvaṇā

अर्थ श्लोक 21 के साथ

अध्याय 242

श्लोक 24

सङ्ग्रामे युद्धशौण्डेन तदा निष्कुम्भसैनिकाः ॥ तत्रैव तु महावीर्यः प्रह्लादः कालमाहवे

saṅgrāme yuddhaśauṇḍena tadā niṣkumbhasainikāḥ || tatraiva tu mahāvīryaḥ prahlādaḥ kālamāhave

अर्थ श्लोक 21 के साथ

अध्याय 242

श्लोक 25

योधयामास रकाक्षो हिरण्यकशिपोः सुतः ॥ तस्य दानववीरस्य युद्धकाले जयक्रियाः

yodhayāmāsa rakākṣo hiraṇyakaśipoḥ sutaḥ || tasya dānavavīrasya yuddhakāle jayakriyāḥ

अर्थ श्लोक 21 के साथ

अध्याय 242

श्लोक 26

चकार त्वरया युक्तो भार्गवो विजयावहाः ॥ हुताशनं तर्पयतो ब्राह्मणांश्च नमस्यतः

cakāra tvarayā yukto bhārgavo vijayāvahāḥ || hutāśanaṃ tarpayato brāhmaṇāṃśca namasyataḥ

अर्थ श्लोक 21 के साथ

अध्याय 242

श्लोक 27

आज्यगन्धप्रतिवहो मारुतः सुरभिर्ववौ ॥ स्रजश्च विविधाश्चित्रा जयार्थमभिमन्त्रिताः

ājyagandhaprativaho mārutaḥ surabhirvavau || srajaśca vividhāścitrā jayārthamabhimantritāḥ

अर्थ श्लोक 21 के साथ

अध्याय 242

श्लोक 28

प्रह्लादस्य शुभे मूर्धन्याबबन्धोशनाः स्वयम् ॥ कालेन सह सङ्ग्रामे प्रयुद्धस्य महात्मनः

prahlādasya śubhe mūrdhanyābabandhośanāḥ svayam || kālena saha saṅgrāme prayuddhasya mahātmanaḥ

अर्थ श्लोक 21 के साथ

अध्याय 242

श्लोक 29

प्रह्लादस्यातिवीर्यस्य शान्ति चक्रे स भार्गवः ॥ दश शिष्यसहस्राणि भार्गवस्य महात्मनः

prahlādasyātivīryasya śānti cakre sa bhārgavaḥ || daśa śiṣyasahasrāṇi bhārgavasya mahātmanaḥ

अर्थ श्लोक 21 के साथ

अध्याय 242

श्लोक 30

यानि दानववीराणां जेपुः शान्तिमनुतमाम् ।अथवणमथो दिव्यं ब्रह्मसंस्तवचोदितम्

yāni dānavavīrāṇāṃ jepuḥ śāntimanutamām | athavaṇamatho divyaṃ brahmasaṃstavacoditam

अर्थ श्लोक 21 के साथ

अध्याय 242

श्लोक 31

ततः सर्वास्त्रविदुषः समरेष्वनिवर्तिनः

tataḥ sarvāstraviduṣaḥ samareṣvanivartinaḥ

अर्थ श्लोक 21 के साथ

अध्याय 242

श्लोक 32

विद्यया तपसा युक्ताः कृतस्वस्त्ययनक्रियाः ।धनुर्हस्ताः कवचिनो वेगेनाप्लुत्य दानवाः ॥ बलिमभ्यर्च्य राजानं प्रह्लादं पर्यवारयन्

vidyayā tapasā yuktāḥ kṛtasvastyayanakriyāḥ | dhanurhastāḥ kavacino vegenāplutya dānavāḥ || balimabhyarcya rājānaṃ prahlādaṃ paryavārayan

अर्थ श्लोक 21 के साथ

अध्याय 242

श्लोक 33

आस्थाय परमं दिव्यं रथं पररथारुजम् ॥ नानाप्रहरणाकीर्णं सवज्रमिव पर्वतम्

āsthāya paramaṃ divyaṃ rathaṃ pararathārujam || nānāpraharaṇākīrṇaṃ savajramiva parvatam

हिन्दी अर्थ

शत्रुओंके रथको तोड़ डालनेमें समर्थ एक परम उत्तम दिव्य रथ नाना प्रकारके आयुधोंसे भरा हुआ था जो वत्रयुक्त पर्वतके समान जान पड़ता था। प्रह्माद उसी रथपर आरूढ़ होकर आये थे

अध्याय 242

श्लोक 34

तद् बभूव मुहूर्तेन क्ष्वेडितास्फोटिताकुलम् ।मेरोः शिखरमाकीर्णं द्यौरिवाम्बुधरागमे

tad babhūva muhūrtena kṣveḍitāsphoṭitākulam | meroḥ śikharamākīrṇaṃ dyaurivāmbudharāgame

हिन्दी अर्थ

जैसे वर्षाकालमें आकाश मेघोंकी घटासे घिर जाता है उसी प्रकार मेरुपर्वतका वह शिखर दो ही घड़ीमें दैत्योंके गर्जन-तर्जन तथा ताल ठोंकनेकी ध्वनिसे व्याप्त हो उठा

अध्याय 242

श्लोक 35

स्रजः पद्मपलाशानामामुच्य सुविभूषिताः ।बान्धवान् सम्परित्यज्य निपतन्ति रणप्रियाः

srajaḥ padmapalāśānāmāmucya suvibhūṣitāḥ | bāndhavān samparityajya nipatanti raṇapriyāḥ

हिन्दी अर्थ

युद्धप्रेमी दैत्य कमलदलोंकी मालाएँ पहनकर वस्त्राभूषणोंसे भलीभाँति विभूषित हो बन्धु-बान्धवोंको त्यागकर वहाँ टूटे पड़ते थे

अध्याय 242

श्लोक 36

महायुधधरः श्रीमाञ्छुभचर्मधरः प्रभुः ॥ सतनुत्रशिरस्त्राणो धन्वी परमदुर्जयः

mahāyudhadharaḥ śrīmāñchubhacarmadharaḥ prabhuḥ || satanutraśirastrāṇo dhanvī paramadurjayaḥ

हिन्दी अर्थ

मोडध्याय: + श्२६९ महान्‌ आयुध, सुन्दर ढाल, कवच और शिरस्त्राण (टोप) धारण करके हाथमें धनुष लिये प्रभावशाली श्रीमान्‌ प्रह्नाद शत्रुओंके लिये अत्यन्त दुर्जय हो गये थे

अध्याय 242

श्लोक 37

सिंहशार्दूलदर्पाणां गदतां किङ्किणीकिनाम् ।दैत्यानां च सहस्राणि प्रयान्त्यग्रे महारणे

siṃhaśārdūladarpāṇāṃ gadatāṃ kiṅkiṇīkinām | daityānāṃ ca sahasrāṇi prayāntyagre mahāraṇe

हिन्दी अर्थ

उनके आगे उस महासमरमें सिंह और व्याघ्रके समान बलाभिमानी तथा कमरमें क्षुद्र घण्टिकाओंसे युक्त करधनी बाँधनेवाले सहसत्रों दैत्य गर्जना करते हुए चलते थे

अध्याय 242

श्लोक 38

सैन्यपक्षहितास्तस्य रथाः परमदुर्जयाः ।सप्ततिर्वै सहस्राणि गजास्तावन्त एव च

sainyapakṣahitāstasya rathāḥ paramadurjayāḥ | saptatirvai sahasrāṇi gajāstāvanta eva ca

हिन्दी अर्थ

उनकी सेनामें परम दुर्जय सत्तर हजार रथ थे। हाथियोंकी संख्या भी उतनी ही थी

अध्याय 242

श्लोक 39

मध्ये व्यूहोदरस्थस्तु कालनेमिर्महासुरः ॥ धनुर्विस्फारयन् घोरं ननाद प्रजहास च

madhye vyūhodarasthastu kālanemirmahāsuraḥ || dhanurvisphārayan ghoraṃ nanāda prajahāsa ca

हिन्दी अर्थ

सेनाके मध्यभागमें जो व्यूहका उदर था, उसमें स्थित हुआ कालनेमि नामक महान्‌ असुर अपने भयंकर धनुषको खींचता हुआ गरजता और अट्रहास करता था

अध्याय 242

श्लोक 40

तस्मिञ्छतसहस्राणि पुरो यान्ति महाद्युतेः ॥ दानवानां बलवतां शक्रप्रतिमतेजसाम्

tasmiñchatasahasrāṇi puro yānti mahādyuteḥ || dānavānāṃ balavatāṃ śakrapratimatejasām

हिन्दी अर्थ

उस सैन्यव्यूहमें महातेजस्वी कालनेमिके आगे इन्द्रतुल्य तेजस्वी एक लाख बलवान्‌ दानव चलते थे

अध्याय 242

श्लोक 41

स समं वर्तमानस्तु पक्षाभ्यां विस्तृतो महान् ।अभवद् दानवव्यूहो दुर्भेद्यः सर्वदैवतैः

sa samaṃ vartamānastu pakṣābhyāṃ vistṛto mahān | abhavad dānavavyūho durbhedyaḥ sarvadaivataiḥ

हिन्दी अर्थ

समभावसे विद्यमान तथा दोनों पक्षोंसे महान्‌ विस्तृत वह दानवव्यूह समस्त देवताओंके लिये दुर्भेद्य हो गया था

अध्याय 242

श्लोक 42

षष्टी रथसहस्राणि दानवानां धनुर्भृताम् ।नानाप्रहरणानां च परिमाणं न विद्यते

ṣaṣṭī rathasahasrāṇi dānavānāṃ dhanurbhṛtām | nānāpraharaṇānāṃ ca parimāṇaṃ na vidyate

हिन्दी अर्थ

धनुर्धर दानवोंके साठ हजार रथ वहाँ शोभा पाते थे। नाना प्रकारके आयुधोंकी कोई गणना ही नहीं थी

अध्याय 242

श्लोक 43

गदापरिघनिस्त्रिशैः शूलमुद्गरपट्टिशैः ॥ प्रगृहीतैर्व्यराजन्त दानवाः पर्वतोपमाः

gadāparighanistriśaiḥ śūlamudgarapaṭṭiśaiḥ || pragṛhītairvyarājanta dānavāḥ parvatopamāḥ

हिन्दी अर्थ

पर्वताकार दानव अपने हाथोंमें गदा, परिघ, खड्ग, शूल, मुद्रर और पट्रिश लेकर बड़ी शोभा पा रहे थे

अध्याय 242

श्लोक 44

गर्जन्तो निनदन्तश्च विक्रोशन्तः पुनः पुनः ॥ अयुध्यन्त महावीर्याः समरेष्वनिवर्तिनः

garjanto ninadantaśca vikrośantaḥ punaḥ punaḥ || ayudhyanta mahāvīryāḥ samareṣvanivartinaḥ

हिन्दी अर्थ

वे गर्जते, सिंहनाद करते और बारम्बार चिल्लाते थे। उनका पराक्रम महान्‌ था। वे समरभूमिसे पीछे हटनेवाले नहीं थे। अतः: उत्साहपूर्वक युद्धमें लगे रहते थे

अध्याय 242

श्लोक 45

तत्र तूर्यसहस्राणि भेरीशङ्खरवाणि च ।हयानां च गजानां च गर्जतामतिवेगिनाम्

tatra tūryasahasrāṇi bherīśaṅkharavāṇi ca | hayānāṃ ca gajānāṃ ca garjatāmativeginām

श्लोक 45–46 का हिन्दी अर्थ

वहाँ सहसत्रों तुरहियाँ बजने लगीं, भेरियों और शड्डोंकी ध्वनि होने लगी | अत्यन्त वेगशाली घोड़ों और हाथियोंके गर्जनका शब्द होने लगा। इन सबके साथ दुन्दुभियोंका गम्भीर घोष मेघगर्जनाके समान जान पड़ता था। शड्डुनाद और पटहोंकी ध्वनि विशेषरूपसे सुनायी पड़ती थी

अध्याय 242

श्लोक 46

दुन्दुभीनां च निर्घोषः पर्जन्यनिनदोपमः ।शुश्रुवे शङ्खशब्दश्च पटहानां च निःस्वनः

dundubhīnāṃ ca nirghoṣaḥ parjanyaninadopamaḥ | śuśruve śaṅkhaśabdaśca paṭahānāṃ ca niḥsvanaḥ

अर्थ श्लोक 45 के साथ

अध्याय 242

श्लोक 47

तेन शङ्खनिनादेन भेरीतूर्यरवेण च ।निर्घोषेण रथानां च क्रोशतीव नभस्तलम्

tena śaṅkhaninādena bherītūryaraveṇa ca | nirghoṣeṇa rathānāṃ ca krośatīva nabhastalam

हिन्दी अर्थ

उस शड्डनादसे, भेरी और तुरहीके शब्दसे और रथोंकी घरघराहटसे वहाँका आकाश कोलाहल करता-सा प्रतीत होता था

अध्याय 242

श्लोक 48

सागरप्रतिमौघेन बलेन महता वृतः ॥ प्रह्लादोऽयुध्यत रणे कालान्तकयमोपमः

sāgarapratimaughena balena mahatā vṛtaḥ || prahlādo'yudhyata raṇe kālāntakayamopamaḥ

हिन्दी अर्थ

रणभूमिमें उस समुद्रतुल्य विशाल सेनासे घिरे हुए प्रह्माद काल, अन्तक और यमके समान युद्ध कर रहे थे

अध्याय 242

श्लोक 49

तस्य नादेन रौद्रेण घोरेणाप्रतिमौजसः ।विनेदुः सर्वभूतानि त्रैलोक्यनिकृतैः स्वनैः

tasya nādena raudreṇa ghoreṇāpratimaujasaḥ | vineduḥ sarvabhūtāni trailokyanikṛtaiḥ svanaiḥ

हिन्दी अर्थ

अप्रतिम तेजस्वी प्रह्मादके घोर एवं भयंकर नादसे तथा तीनों लोकोंको तिरस्कृत करनेवाली गर्जनाओंसे भयभीत हो समस्त प्राणी आर्तनाद करने लगे

अध्याय 242

श्लोक 50

अन्तरिक्षात् पपातोल्का वायुश्च परुषो ववौ ॥ वमन्त्यः पावकं घोरं शिवाश्चैव ववाशिरे

antarikṣāt papātolkā vāyuśca paruṣo vavau || vamantyaḥ pāvakaṃ ghoraṃ śivāścaiva vavāśire

हिन्दी अर्थ

अन्तरिक्षसे उल्कापात होने लगा। प्रचण्ड वायु चलने लगी तथा गीदड़ियाँ घोर आग उगलती हुई क्रन्दन करने लगीं

अध्याय 242

श्लोक 51

प्रह्लादस्तु महावीर्यः प्रहसन् युद्धदुर्मदः ।उवाच वचनं श्रीमांस्तत्कालक्षममुत्तमम्

prahlādastu mahāvīryaḥ prahasan yuddhadurmadaḥ | uvāca vacanaṃ śrīmāṃstatkālakṣamamuttamam

हिन्दी अर्थ

महापराक्रमी रणदुर्मद श्रीमान्‌ प्रह्नाद वहाँ जोर-जोरसे हँसते हुए उस समयके योग्य यह उत्तम वचन बोले—

अध्याय 242

श्लोक 52

अद्याहं दर्शयिष्यामि स्वबाहुबलमूर्जितम् ।अद्य मद्बाणनिहतान् देवान् द्रक्ष्यथ संयुगे

adyāhaṃ darśayiṣyāmi svabāhubalamūrjitam | adya madbāṇanihatān devān drakṣyatha saṃyuge

हिन्दी अर्थ

वीरो! आज मैं अपने बढ़े हुए बाहुबलका दर्शन कराऊँगा। आज युद्धस्थलमें तुम सब लोग मेंरे द्वारा मारे गये देवताओंको प्रत्यक्ष देखोगे

अध्याय 242

श्लोक 53

बान्धवा निहता येषां त्रिदशैरिह संयुगे ॥ अद्य निर्वर्तयिष्यन्ति शत्रुमांसानि दानवाः

bāndhavā nihatā yeṣāṃ tridaśairiha saṃyuge || adya nirvartayiṣyanti śatrumāṃsāni dānavāḥ

हिन्दी अर्थ

देवताओंने रणभूमिमें जिनके भाई-बन्धुओंका वध किया है, वे दानव आज अपने उन बन्धुओंके उद्देश्यसे शत्रुओंके मांस अर्पित करेंगे

अध्याय 242

श्लोक 55

इममद्य समुद्भूतं रेणुं समरमूर्धनि ।अहं तु शमयिष्यामि शत्रुशोणितविस्रवैः ॥ ५४॥।तिमिरौघहतार्कं तु सैन्यरेण्वरुणीकृतम् ।आकाशं सम्पतिष्यन्ति खद्योता इव मे शराः

imamadya samudbhūtaṃ reṇuṃ samaramūrdhani | ahaṃ tu śamayiṣyāmi śatruśoṇitavisravaiḥ || 54||| timiraughahatārkaṃ tu sainyareṇvaruṇīkṛtam | ākāśaṃ sampatiṣyanti khadyotā iva me śarāḥ

हिन्दी अर्थ

जहाँ अँधेरेके कारण सूर्यका दर्शन नहीं हो रहा है, जो सेनाकी धूलसे अरुण रंगका हो गया है, उस आकाशमें आज मेरे चमकीले बाण जुगुनुओंके समान उड़ेंगे

अध्याय 242

श्लोक 56

हृष्टाः सम्परिमोदध्वं देवेभ्यस्त्यज्यतां भयम् ।अद्याहं निहनिष्यामि कालेन्द्रं धनुषा रणे

hṛṣṭāḥ samparimodadhvaṃ devebhyastyajyatāṃ bhayam | adyāhaṃ nihaniṣyāmi kālendraṃ dhanuṣā raṇe

हिन्दी अर्थ

अब तुमलोग हर्षपूर्वक आनन्द मनाओ । देवताओंसे होनेवाले भयको त्याग दो। आज मैं रणभूमिमें अपने धनुषसे कालके स्वामी यमराजका वध कर डालूँगा

अध्याय 242

श्लोक 57

तोषयिष्यामि राजानं बलिं बलवतां वरम् ।त्रिदशान् सगणान् हत्वा रणे चान्तकमन्तिकात्

toṣayiṣyāmi rājānaṃ baliṃ balavatāṃ varam | tridaśān sagaṇān hatvā raṇe cāntakamantikāt

हिन्दी अर्थ

समरभूमिमें सेवकगणोंसहित देवताओंका और निकटसे यमराजका भी वध करके आज मैं बलवानोंमें श्रेष्ठ राजा बलिको भी संतुष्ट करूँगा

अध्याय 242

श्लोक 58

अक्षयाः सन्ति मे तूणाः शराश्चाशीविषोपमाः ॥ स्थातुं मे पुरतः शक्ताः के रणे जीवितेप्सवः

akṣayāḥ santi me tūṇāḥ śarāścāśīviṣopamāḥ || sthātuṃ me purataḥ śaktāḥ ke raṇe jīvitepsavaḥ

हिन्दी अर्थ

मरे तरकस अक्षय हैं, उनमें बाणोंकी कभी कमी नहीं होती है तथा मेरे बाण विषधर सर्पोके समान भयंकर हैं । जो अपने जीवनकी इच्छा रखनेवाले हैं, ऐसे कौन योद्धा णभूमिमें मेरे सामने ठहर सकते हैं 2

अध्याय 242

श्लोक 59

हत्वा रिपुगणांस्तुष्टिरनुरागश्च राजसु ॥ हतस्य त्रिदिवे वासो नास्ति युद्धसमा गतिः

hatvā ripugaṇāṃstuṣṭiranurāgaśca rājasu || hatasya tridive vāso nāsti yuddhasamā gatiḥ

हिन्दी अर्थ

शत्रुओंका त्रंध करनेसे मनमें संतोष होगा, राजाओंमें अनुराग उत्पन्न होगा और यदि युद्धमें वीर पुरुष स्वयं ही मारा गया तो इसका स्वर्गलोकमें निवास होगा; अत: युद्धके समान दूसरी कोई गति नहीं है

अध्याय 242

श्लोक 60

तद् भयं पृष्ठतः कृत्वा रणे दानवसत्तमाः ॥ निहत्येमानरीन् सर्वान् मोदध्वं नन्दने वने

tad bhayaṃ pṛṣṭhataḥ kṛtvā raṇe dānavasattamāḥ || nihatyemānarīn sarvān modadhvaṃ nandane vane

हिन्दी अर्थ

अत: दानवशिरोमणियो ! णभूमिमें भयको पीछे करके इन समस्त शत्रु ओंका वध करो और नन्दनवनमें आनन्द भोगो'

अध्याय 242

श्लोक 61

एवमुक्त्वा महत्सैन्यं प्रह्लादो दानवोत्तमः ।कालसैन्यं महारौद्रं तरसामर्दतासुरः

evamuktvā mahatsainyaṃ prahlādo dānavottamaḥ | kālasainyaṃ mahāraudraṃ tarasāmardatāsuraḥ

हिन्दी अर्थ

दानवशिरोमणि भसुर प्रह्नाद अपनी विशाल सेनाके सैनिकॉंसे उपर्युक्त नात कहकर कालकी महाभयंकर सेनाका वेगपूर्वक र्दन करने लगे

अध्याय 242

श्लोक 62

सर्वास्त्रविद्वान् वीरश्च नित्यं चाप्यपराजितः ।युद्धे ह्यभिमुखो नित्यं स्वबाहुबलदर्पितः

sarvāstravidvān vīraśca nityaṃ cāpyaparājitaḥ | yuddhe hyabhimukho nityaṃ svabāhubaladarpitaḥ

हिन्दी अर्थ

वे सम्पूर्ण अस्त्रोंके ज्ञाता, वीर था नित्यविजयी थे। कभी उनकी पराजय नहीं होती पी । उन्हें अपने बाहुबलपर गर्व था; अत: वे युद्धमें परदा सामने रहकर लड़ते थे

अध्याय 242

श्लोक 63

षष्टिं रथसहस्राणि विविधायुधधारिणीम् ।प्रह्लादस्यातिवीर्यस्य ते तस्य तनया निजाः

ṣaṣṭiṃ rathasahasrāṇi vividhāyudhadhāriṇīm | prahlādasyātivīryasya te tasya tanayā nijāḥ

हिन्दी अर्थ

नाना प्रकारके भायुध धारण करनेवाले साठ हजार रथी तथा अतिशय ीर्यशाली प्रह्मादके वे पूर्वोक्त औरस पुत्र सभी स॒ युद्धमें सम्मिलित थे

अध्याय 242

श्लोक 64

तैस्तु क्रतुशतैरिष्टं विपुलैराप्तदक्षिणैः ॥ क्षान्ता धर्मपरा नित्यं सत्यव्रतपरायणाः

taistu kratuśatairiṣṭaṃ vipulairāptadakṣiṇaiḥ || kṣāntā dharmaparā nityaṃ satyavrataparāyaṇāḥ

हिन्दी अर्थ

उन सबने पर्याप्त क्षिणावाले सौ विशाल यज्ञोंका अनुष्ठान किया था। वे भी क्षमाशील, धर्मपरायण तथा सदैव सत्यब्रतका ालन करनेवाले थे

अध्याय 242

श्लोक 65

दातारः प्रियवक्तारो वक्तारः शास्त्रवस्तुषु ।स्वदारनिरता दान्ता ब्रह्मण्याः सत्यसङ्गराः

dātāraḥ priyavaktāro vaktāraḥ śāstravastuṣu | svadāraniratā dāntā brahmaṇyāḥ satyasaṅgarāḥ

हिन्दी अर्थ

दानी, प्रियभाषी, शास्त्रीय वषयोंके वक्ता, अपनी ही स्त्रीमें अनुराग रखनेवाले, जतेन्द्रिय, ब्राह्मणभक्त तथा सत्यप्रतिज्ञ थे

अध्याय 242

श्लोक 66

यष्टारः क्रतुभिर्नित्यं नित्यं चाध्ययने रताः ।इष्वस्त्रकुशलाः सर्वे बहुशो दृढविक्रमाः

yaṣṭāraḥ kratubhirnityaṃ nityaṃ cādhyayane ratāḥ | iṣvastrakuśalāḥ sarve bahuśo dṛḍhavikramāḥ

हिन्दी अर्थ

श१७१ वे सदा यज्ञोंका अनुष्ठान करते और प्रतिदिन वेदशास्त्रोंके स्वाध्यायमें लगे रहते थे। सब-के-सब धनुर्वेदमें कुशल तथा बारम्बार सुदूढ़ पराक्रमका परिचय देनेवाले थे

अध्याय 242

श्लोक 67

मत्तवारणविक्रान्ताः शत्रुसैन्यप्रमर्दकाः ।दारयन्तः पदाक्षेपैः सुघोरान् वातरेचकान्

mattavāraṇavikrāntāḥ śatrusainyapramardakāḥ | dārayantaḥ padākṣepaiḥ sughorān vātarecakān

हिन्दी अर्थ

उनका पराक्रम मतवाले हाथियोंके समान था। वे शत्रुसेनाका मर्दन करनेवाले थे तथा अपने पैरोंके आघातसे घोर वृक्ष आदिको भी विदीर्ण कर डालते थे

अध्याय 242

श्लोक 68

युद्धोत्सुकधिया नित्यं क्रोधरञ्जितलोचनाः ॥ सन्दष्टौष्ठपुटा दैत्या विनेदुर्भीमविक्रमाः ।क्ष्वेडितास्फोटितरवैरन्योन्यं समहर्षयन्

yuddhotsukadhiyā nityaṃ krodharañjitalocanāḥ || sandaṣṭauṣṭhapuṭā daityā vinedurbhīmavikramāḥ | kṣveḍitāsphoṭitaravairanyonyaṃ samaharṣayan

हिन्दी अर्थ

उनकी चित्तवृत्ति सदा युद्धके लिये उत्सुक रहती थी, इसलिये उनकी आँखें क्रोधसे लाल बनी रहती थीं। अपने ओठको दाँतोंतले दबाये हुए वे भयंकर पराक्रमी दैत्य वहाँ जोर-जोरसे गर्जना करते और सिंहनाद तथा ताल ठोंकनेकी आवाजसे एक- दूसरेके हर्ष बढ़ाते थे

अध्याय 242

श्लोक 69

वेणुशङ्खरवैश्चैव सिंहनादैश्च पुष्कलैः ।आप्लुत्याप्लुत्य सहसा रणे वव्रुरनेकशः

veṇuśaṅkharavaiścaiva siṃhanādaiśca puṣkalaiḥ | āplutyāplutya sahasā raṇe vavruranekaśaḥ

हिन्दी अर्थ

वेणु और शज्जुकी ध्वनि तथा पुष्कल सिंहनादके साथ सहसा उछल-उछलकर वे बहुसंख्यक दैत्य युद्धमें आने और हथियार ग्रहण करने लगे

अध्याय 242

श्लोक 70

तालमात्राणि चापानि विकृष्य सुमहाबलाः ॥ अमृष्यमाणाः सहसा दानवाश्चापपाणयः

tālamātrāṇi cāpāni vikṛṣya sumahābalāḥ || amṛṣyamāṇāḥ sahasā dānavāścāpapāṇayaḥ

श्लोक 70–72 का हिन्दी अर्थ

वे महाबली दानव हाथमें धनुष लिये अमर्षमें भरे हुए थे। वे तालके बराबर लंबे धनुषोंको खींचकर देवताओं और असुरोंसे भी पराजित न होनेवाले कालके साथ समराज़णमें युद्ध करने लगे। सभी दानव तपाये हुए सुवर्णके आभूषण पहने हुए थे। सबके अज्लोंमें श्वेत वस्त्र शोभा पा रहे थे। सब- के-सब मानी थे और सभी स्वर्गलोककी अभिलाषा रखते थे। शत्रुवंधके लिये उद्यत हुए वे सभी वीर अपने पक्षकी विजय चाहते थे

अध्याय 242

श्लोक 71

सुरासुरैरप्यजितं योधयन्ति रणेऽन्तकम् ॥ प्रतप्तहेमाभरणाः सर्वे ते श्वेतवाससः

surāsurairapyajitaṃ yodhayanti raṇe'ntakam || prataptahemābharaṇāḥ sarve te śvetavāsasaḥ

अर्थ श्लोक 70 के साथ

अध्याय 242

श्लोक 72

दानवा मानिनः सर्वे सर्वे स्वर्गाभिकाङ्क्षिणः ।सर्वे जयैषिणो वीराः सर्वे शत्रुवधोद्यताः

dānavā māninaḥ sarve sarve svargābhikāṅkṣiṇaḥ | sarve jayaiṣiṇo vīrāḥ sarve śatruvadhodyatāḥ

अर्थ श्लोक 70 के साथ

अध्याय 242

श्लोक 73

शुशुभे सा चमूर्दीप्ता पताकाध्वजमालिनी ॥ गजाश्वरथसम्बाधा स्वर्गमार्गाभिकाङ्क्षिणी

śuśubhe sā camūrdīptā patākādhvajamālinī || gajāśvarathasambādhā svargamārgābhikāṅkṣiṇī

हिन्दी अर्थ

ध्वजा- पताकाओंसे अलंकृत हाथी, घोड़े और रथोंसे भरी हुई तथा स्वर्गलोकके मार्गपर जानेकी इच्छा रखनेवाली वह दीसिशालिनी दैत्यसेना बड़ी शोभा पा. रही थी

अध्याय 242

श्लोक 75

ततः कालः सुनिर्यातो भीमो भीमपराक्रमः ।निनदन् सुमहाकायो व्याधिभिर्बहुभिर्वृतः ॥ ७४॥।ददर्श महतीं सेनां दानवानां बलीयसाम् ॥ अभिसञ्जातदर्पाणां कालं समभिगर्जताम्

tataḥ kālaḥ suniryāto bhīmo bhīmaparākramaḥ | ninadan sumahākāyo vyādhibhirbahubhirvṛtaḥ || 74||| dadarśa mahatīṃ senāṃ dānavānāṃ balīyasām || abhisañjātadarpāṇāṃ kālaṃ samabhigarjatām

हिन्दी अर्थ

उन्होंने अपने सामने गर्जते और अभिमानमें भरे हुए महाबली दानवोंकी उस विशाल सेनाको देखा

अध्याय 242

श्लोक 76

तदायान्तं तदानीकं दानवानां तरस्विनाम् ।प्रतिलोमं चकाराशु व्याधिभिः सहितोऽन्तकः

tadāyāntaṃ tadānīkaṃ dānavānāṃ tarasvinām | pratilomaṃ cakārāśu vyādhibhiḥ sahito'ntakaḥ

हिन्दी अर्थ

वेगशाली दानवोंकी उस आती हुई सेनाको व्याधियोंसहित कालने तुरंत प्रतिकूल दिशामें ठेल दिया

अध्याय 242

श्लोक 77

प्रविश्य ध्वजिनीं चैषां पातयामास दानवान् ।कालो रुधिररक्ताक्षः स्वेनानीकेन संवृतः

praviśya dhvajinīṃ caiṣāṃ pātayāmāsa dānavān | kālo rudhiraraktākṣaḥ svenānīkena saṃvṛtaḥ

हिन्दी अर्थ

तत्पश्चात्‌ अपनी सेनासे घिरे हुए लाल नेत्रवाले कालदेव दानवोंकी सेनामें प्रवेश करके उन्हें धराशायी करने लगे

अध्याय 242

श्लोक 78

प्रह्लादबलमत्युग्रं प्रह्लादं च महाबलम् ।आजघान रणे कालो दण्डमुद्गरपट्टिशैः

prahlādabalamatyugraṃ prahlādaṃ ca mahābalam | ājaghāna raṇe kālo daṇḍamudgarapaṭṭiśaiḥ

हिन्दी अर्थ

उस युद्धमें कालदेव दण्ड, मुद्ृर और पट्टिश आदि अस्त्रोंद्वारा पहाबली प्रह्माद तथा उनकी अत्यन्त भयंकर सेनापर घातक प्रहार करने लगे

अध्याय 242

श्लोक 79

शरशक्त्यृष्टिखड्गांश्च शूलानि मुसलानि च ।गदाश्च परिघाश्चैव विचित्राश्च परश्वधाः

śaraśaktyṛṣṭikhaḍgāṃśca śūlāni musalāni ca | gadāśca parighāścaiva vicitrāśca paraśvadhāḥ

श्लोक 79–80 का हिन्दी अर्थ

कालके सैनिक व्याधियोंने रणक्षेत्रमें बाण, शक्ति, ऋषि, खड्ग, शूल, मुसल, गदा, परिघ, विचित्र फरसे, भाँति-भाँतिके धनुष तथा लोहेकी बनी हुई सुदूढ़ शतघ्री आदि बहुत-से अस्त्र-शस्त्र दानव-सेनाके ऊपर गिराये

अध्याय 242

श्लोक 80

धनूंषि च विचित्राणि शतघ्नीश्च स्थिरायसीः ।पात्यन्ते व्याधिभिर्युद्धे दानवानां चमूमुखे

dhanūṃṣi ca vicitrāṇi śataghnīśca sthirāyasīḥ | pātyante vyādhibhiryuddhe dānavānāṃ camūmukhe

अर्थ श्लोक 79 के साथ

अध्याय 242

श्लोक 81

बहवो व्याधयो युद्धे बहूनसुरपुङ्गवान् ।व्याधीनपि च दैत्यौघा निजघ्नुर्बहवो बहून्

bahavo vyādhayo yuddhe bahūnasurapuṅgavān | vyādhīnapi ca daityaughā nijaghnurbahavo bahūn

हिन्दी अर्थ

उस युद्धमें बहुसंख्यक व्याधियोंने बहुत-से असुरशिरोमणियोंका वध किया और बहुत- से दैत्योंने भी बहुसंख्यक व्याधियोंका विनाश कर डाला

अध्याय 242

श्लोक 82

शूलैः प्रमथिताः केचित् केचिच्छिन्नाः परश्वधैः ।परिघैराहताः केचित् केचिच्च परमायुधैः

śūlaiḥ pramathitāḥ kecit kecicchinnāḥ paraśvadhaiḥ | parighairāhatāḥ kecit kecicca paramāyudhaiḥ

हिन्दी अर्थ

कितने ही योद्धा शूलोंसे मथ डाले गये। कितनोंके फरसोंसे टुकड़े-टुकड़े कर दिये गये। कोई परिघोंसे आहत हुए तो कोई दूसरे-दूसरे उत्तम आयुधोंसे

अध्याय 242

श्लोक 83

केचिद् द्विधा कृताः खड्गैः स्फुरन्तः पतिता भुवि ॥ व्याधयो दानवैरेव नानाशस्त्रैर्विदारिताः

kecid dvidhā kṛtāḥ khaḍgaiḥ sphurantaḥ patitā bhuvi || vyādhayo dānavaireva nānāśastrairvidāritāḥ

हिन्दी अर्थ

किन्हींके खड़्गोंद्वारा दो टुकड़े कर दिये गये और वे पृथ्वीपर गिरकर छटपटाने लगे। दानवोंने नाना प्रकारके शस्त्रोंद्वारा व्याधियोंको विदीर्ण कर डाला

अध्याय 242

श्लोक 84

ते चापि व्याधिभिः सर्वे विविधैरायुधोत्तमैः ।खड्गैश्च मुसलैस्तीक्ष्णैः प्रासतोमरमुद्गरैः ।भिन्नाश्च दानवाः सर्वे निकृत्ताश्च परश्वधैः

te cāpi vyādhibhiḥ sarve vividhairāyudhottamaiḥ | khaḍgaiśca musalaistīkṣṇaiḥ prāsatomaramudgaraiḥ | bhinnāśca dānavāḥ sarve nikṛttāśca paraśvadhaiḥ

हिन्दी अर्थ

व्याधियोंने भी नाना प्रकारके उत्तम आायुधों, खड़्गों, तीखी धारवाले मुसलों, प्रास, तोमर और मुद्रों तथा फरसोंसे समस्त दानवोंको छिंन्न-भिन्न करके काट डाला

अध्याय 242

श्लोक 85

मुद्गरैः पट्टिशैश्चैव व्याधिभिश्च महाबलैः ॥ कृत्वा शस्त्रैरनेकैश्च मुष्टिभिश्च हता भृशम्

mudgaraiḥ paṭṭiśaiścaiva vyādhibhiśca mahābalaiḥ || kṛtvā śastrairanekaiśca muṣṭibhiśca hatā bhṛśam

हिन्दी अर्थ

महाबली व्याधियोंने मुद्रों, पट्टिशों तथा अनेक प्रकारके शस्त्रोंद्वारा दैत्योंके टुकड़े- टुकड़े करके बहुतोंको मुक्कोंसे भी मार गिराया

अध्याय 242

श्लोक 86

वेमुः शोणितमन्योन्यं विष्टब्धदशनेक्षणाः ॥ आर्तस्वरं च नदतां सिंहनादं च गर्जताम्

vemuḥ śoṇitamanyonyaṃ viṣṭabdhadaśanekṣaṇāḥ || ārtasvaraṃ ca nadatāṃ siṃhanādaṃ ca garjatām

श्लोक 86–95 का हिन्दी अर्थ

एक-दूसरेके द्वारा दाँतोंके तोड़ दिये जानेपर और आँखोंके फोड़ दिये जानेपर वे सब योद्धा मुँहसे रक्त वमन करने नगे। उस रोमाश्कारी संग्राममें आर्तस्वरसे कराहते और सिंहोंके समान गर्जते हुए योद्धाओंका शब्द बड़ा भयंकर पतीत होता था। युद्धस्थलमें खड़े हुए योद्धाओंके मस्तक था दूसरे-दूसरे अज्भ बारंबार मुक्कों और तमाचोंकी मार ड़नेसे कटकर पृथ्वीपर गिर पड़ते थे। उस समय वहाँ री कोलाहलके साथ खूनकी विस्तृत नदी बह चली। भाँसू ही उसमें फेन थे। ध्वजोंकी भँवर उठ रही थी। फटी हुई बाँहिं बड़े-बड़े सर्पोके समान जान पड़ती थीं। ल और शक्ति नामक अस्त्र महान मत्स्य-से प्रतीत ते थे। धनुषरूपी ग्राहोंसे वह भरी हुई थी। रथोंके षादण्डरूपी प्रस्तरखण्डोंसे वह नदी व्याप्त थी तथा वजरूपी वृक्षों और लताओंसे आवृत दिखायी देती थी। + ११७३ दैत्य प्रह्मदा और कालदेवता दोनों मेघके समान होकर बाणरूपी जलकी धारा गिरा रहे थे। दोनोंकि अपने धनुष ही इन्द्रधनुषकी प्रतीति कराते थे और उनकी बाँहोंमें जो सोनेके बाजूबन्द थे, वे विद्युतके समान प्रकाशित हो रहे थे। क्रमश: रथ और हाथीपर बैठे हुए वे दोनों योद्धा महान्‌ मेघके समान जान पड़ते थे। दोनों ही एक-दूसरेके प्रति क्रोधसे भरे हुए थे और सजल जलधरोंके समान शोभा पाते थे। तपाये हुए सुवर्णमय कवच तथा दिव्य हारोंसे विभूषित वे दोनों विजयके लिये प्रयत्रशील योद्धा सूर्य और अग्रिके समान शोभा पाते थे। महान्‌ पर्वतके समान विशाल शरीरवाले वे दोनों वीर सेनाके मुहानेपर युद्धस्थलमें 'एक-दूसरेको इन्द्रके वज़की भाँति दुः:सह बाणोंद्वारा चोट पहुँचाते थे। उन दोनोंके दुर्जय युद्धमें परस्पर भिड़े हुए योद्धा समरभूमिमें अपने जीवनकी भी आशा छोड़ बैठे थे। उनके सारे अज्ञ बाणोंसे क्षत-विक्षत हो गये थे। उनके बन्धु-बान्धव भी युद्धमें काम आ गये थे और उन प्रमुख योद्धाओंकी छाती खूनसे रँगी हुई थी । इस अवस्थामें वे धराशायी हो गये

अध्याय 242

श्लोक 87

बभूव तुमुलः शब्दः सङ्ग्रामे लोमहर्षणे ।मुष्टिभिश्चोत्तमाङ्गानि तलैर्गात्राणि चासकृत्

babhūva tumulaḥ śabdaḥ saṅgrāme lomaharṣaṇe | muṣṭibhiścottamāṅgāni talairgātrāṇi cāsakṛt

अर्थ श्लोक 86 के साथ

अध्याय 242

श्लोक 88

सादितानि महीं जग्मुस्तिष्ठतामेव संयुगे ।अस्त्रफेना ध्वजावर्ता च्छिन्नबाहुमहोरगा

sāditāni mahīṃ jagmustiṣṭhatāmeva saṃyuge | astraphenā dhvajāvartā cchinnabāhumahoragā

अर्थ श्लोक 86 के साथ

अध्याय 242

श्लोक 89

शूलशक्तिमहामत्स्या चापग्राहसमाकुला ॥ रथेषोपलसम्बाधा ध्वजदुमलतावृता

śūlaśaktimahāmatsyā cāpagrāhasamākulā || ratheṣopalasambādhā dhvajadumalatāvṛtā

अर्थ श्लोक 86 के साथ

अध्याय 242

श्लोक 90

सशब्दघोषविस्तारा लोहितोदाभवन्नदी ।स्वधनुःशक्रधनुषौ काञ्चनाङ्गदविद्युतौ

saśabdaghoṣavistārā lohitodābhavannadī | svadhanuḥśakradhanuṣau kāñcanāṅgadavidyutau

अर्थ श्लोक 86 के साथ

अध्याय 242

श्लोक 91

तौ दैत्यकालजलदौ शरधारां व्यमुञ्चताम् ॥ तौ महामेघसङ्काशौ रथनागगतौ तदा

tau daityakālajaladau śaradhārāṃ vyamuñcatām || tau mahāmeghasaṅkāśau rathanāgagatau tadā

अर्थ श्लोक 86 के साथ

अध्याय 242

श्लोक 92

बभूवतुरभिक्रुद्धौ साम्बुगर्भाविवाम्बुदौ ।तप्तकाञ्चनसन्नाहौ दिव्यहारविभूषितौ

babhūvaturabhikruddhau sāmbugarbhāvivāmbudau | taptakāñcanasannāhau divyahāravibhūṣitau

अर्थ श्लोक 86 के साथ

अध्याय 242

श्लोक 94

तौ विरेजतुरायस्तौ सूर्यवैश्वानरोपमौ ।तौ महाबलसङ्काशावन्योन्यस्य चमूमुखे ॥ ९३॥ शक्राशनिसमस्पर्शैर्बाणैर्जघ्नतुराहवे ।परस्परं समासाद्य तयोर्युधि दुरासदे

tau virejaturāyastau sūryavaiśvānaropamau | tau mahābalasaṅkāśāvanyonyasya camūmukhe || 93|| śakrāśanisamasparśairbāṇairjaghnaturāhave | parasparaṃ samāsādya tayoryudhi durāsade

अर्थ श्लोक 86 के साथ

अध्याय 242

श्लोक 95

नाशंसन्त तदा योधा जीवितान्यपि संयुगे ।शरैर्विभिन्नसर्वाङ्गा युधि प्रक्षीणबान्धवाः ॥ निपेतुर्योधमुख्यास्तु रुधिरोक्षितवक्षसः

nāśaṃsanta tadā yodhā jīvitānyapi saṃyuge | śarairvibhinnasarvāṅgā yudhi prakṣīṇabāndhavāḥ || nipeturyodhamukhyāstu rudhirokṣitavakṣasaḥ

अर्थ श्लोक 86 के साथ

अध्याय 242

श्लोक 96

पतितैर्निष्पतद्भिश्च पात्यमानैश्च संयुगे ।बभूव भूः समाकीर्णा योधैरुद्गतजीवितैः

patitairniṣpatadbhiśca pātyamānaiśca saṃyuge | babhūva bhūḥ samākīrṇā yodhairudgatajīvitaiḥ

हिन्दी अर्थ

युद्धस्थलमें गिरे हुए, गिरते हुए और गिराये जाते हुए निष्प्राण योद्धाओंकी लाशोंसे भूमि पट गयी थी

अध्याय 242

श्लोक 97

सङ्गृह्णतोः शरान् घोरान्न च सन्दधतोस्तयोः ।अन्तरं ददृशे कश्चित् प्रयत्नादपि संयुगे

saṅgṛhṇatoḥ śarān ghorānna ca sandadhatostayoḥ | antaraṃ dadṛśe kaścit prayatnādapi saṃyuge

हिन्दी अर्थ

उस युद्धस्थलमें घोर बाणोंको हाथमें लेते और धनुषपर रखते हुए उन दोनों वीरोंमें कितना अन्तर है, इस बातको कोई प्रयत्न करके भी न देख सका

अध्याय 242

श्लोक 98

लघुत्वाच्च महाबाहू युद्धशौण्डौ महाबलौ ।मण्डलीभूतधनुषौ सकृदेव बभूवतुः

laghutvācca mahābāhū yuddhaśauṇḍau mahābalau | maṇḍalībhūtadhanuṣau sakṛdeva babhūvatuḥ

हिन्दी अर्थ

वे दोनों महाबली, महाबाहु युद्धमें कुशल थे। उन दोनोंने फुर्तीके कारण एक साथ ही अपने धनुषोंको खींचकर मण्डलाकार बना लिया

अध्याय 242

श्लोक 99

प्रह्लादस्य च बाणौघैर्दुद्रावान्तकवाहिनी ॥ उह्यमानं बलवता वायुनेवाभ्रमण्डलम्

prahlādasya ca bāṇaughairdudrāvāntakavāhinī || uhyamānaṃ balavatā vāyunevābhramaṇḍalam

हिन्दी अर्थ

प्रह्नादके बाणसमूहोंसे घायल होकर कालकी सेना भाग चली। ठीक उसी तरह जैसे बलवान्‌ वायुके द्वारा ढोये जाते हुए मेघोंका समूह छिन्न-भिन्न हो जाता है

अध्याय 242

श्लोक 100

हतदर्पं तु विज्ञाय प्रह्लादः कालमाहवे ।अपयातं च समरे द्विषन्तं सम्प्रतर्क्य तम्

hatadarpaṃ tu vijñāya prahlādaḥ kālamāhave | apayātaṃ ca samare dviṣantaṃ sampratarkya tam

श्लोक 100–101 का हिन्दी अर्थ

उस समराज्णमें कालका घमंड चूर हुआ जान तथा अपने उस शत्रुको युद्धसे भागा हुआ समझकर रणदुर्मद महान्‌ असुर प्रह्ाद उन्हें पराजित मानकर पुन: दूसरी देवसेनाका मर्दन करने लगे

अध्याय 242

श्लोक 101

मत्वा वशगतं चैव प्रह्लादो युद्धदुर्मदः ।तत्रैवान्यां चमूं भूयः सम्ममर्द महासुरः

matvā vaśagataṃ caiva prahlādo yuddhadurmadaḥ | tatraivānyāṃ camūṃ bhūyaḥ sammamarda mahāsuraḥ

अर्थ श्लोक 100 के साथ

अध्याय 242

श्लोक 102

कालप्रह्लादयोर्युद्धमभवद् यादृशं पुरा ।तादृशं सर्वलोकेषु न भूतं न भविष्यति

kālaprahlādayoryuddhamabhavad yādṛśaṃ purā | tādṛśaṃ sarvalokeṣu na bhūtaṃ na bhaviṣyati

हिन्दी अर्थ

पूर्वकालमें प्रह्माद और कालका जैसा युद्ध हुआ था, वैसा युद्ध सम्पूर्ण लोकोंमें न तो कभी हुआ है और न होगा ही

अध्याय 242

श्लोक 103

एवमद्भुतवीर्यौजा महारणकृतव्रणः ।प्रह्लादस्त्वथ वृद्धोऽत्र कालस्त्वपसृतो रणात्

evamadbhutavīryaujā mahāraṇakṛtavraṇaḥ | prahlādastvatha vṛddho'tra kālastvapasṛto raṇāt

हिन्दी अर्थ

इस प्रकार अद्भुत बल-पराक्रम और ओजसे सम्पन्न तथा उस महासमरमें घायल हुए प्रह्वाद उस युद्धमें बढ़ गये—विजयी हुए और कालदेवता रणक्षेत्रसे भाग गये

अध्याय 242

श्लोक 59b

इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि वामने देवासुरयुद्धे कालप्रहादयुद्धे एकोनषष्टितमोध्यायः

iti śrīmahābhārate khilabhāge harivaṃśe bhaviṣyaparvaṇi vāmane devāsurayuddhe kālaprahādayuddhe ekonaṣaṣṭitamodhyāyaḥ

स्रोत: local proofread transcription: Sanskrit shlokas of the Harivamsa (Harivamsha, Vishnu and Bhavishya parvas) from sanskritdocuments.org. One chapter per adhyaya; verse numbers as printed in the source (restarting in each adhyaya). Appendix sections are not included. · प्राप्त 19/10/2026

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शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पाठ-भेद एवं संशोधनVariants & corrections

पाठ-भेद टिप्पणी (Alternative Reading / Variant Notes):

Collated with BORI Critical Edition of Mahabharata Khilaparvan.