Harivamsha Purana
237
अध्याय 237 / 318

Parva 3, Adhyāya 54

80 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ80 श्लोक

अध्याय 237

श्लोक 1

देवासुराणां युद्धस्य यज्ञरूपेण वर्णनं, द्वयोः सेनयोः तुमुलं युद्धं, सावित्रध्रुवयोः पराजयं उभयोः सेनयो राजन् भूयो युद्धमवर्तत ।नादेन सञ्चालयतां त्रैलोक्यमिदमव्ययम्

devāsurāṇāṃ yuddhasya yajñarūpeṇa varṇanaṃ, dvayoḥ senayoḥ tumulaṃ yuddhaṃ, sāvitradhruvayoḥ parājayaṃ ubhayoḥ senayo rājan bhūyo yuddhamavartata | nādena sañcālayatāṃ trailokyamidamavyayam

श्लोक 1–2 का हिन्दी अर्थ

वैशम्पायनजी कहते हैं—राजन्‌! पुन: दोनों सेनाओंमें घोर युद्ध होने लगा। गोमुख, बिगुल, भेरी, ढोल, झाँझ और नगाड़ोंके बड़े भारी शब्द सुनायी देने लगे। वे बाजे अपनी तुमुल ध्वनिसे तीनों लोकोंको विचलित कर रहे थे

अध्याय 237

श्लोक 2

गोमुखाडम्बराणां च भेरीणां मुरजैः सह ।झल्लरीडिण्डिमानां च व्यभूयन्त महास्वनाः

gomukhāḍambarāṇāṃ ca bherīṇāṃ murajaiḥ saha | jhallarīḍiṇḍimānāṃ ca vyabhūyanta mahāsvanāḥ

अर्थ श्लोक 1 के साथ

अध्याय 237

श्लोक 3

प्रवृत्तो युद्धयज्ञस्तु तुमुलो लोमहर्षणः ।रणमध्ये महानादः स्वर्गीयः शूरसम्मतः

pravṛtto yuddhayajñastu tumulo lomaharṣaṇaḥ | raṇamadhye mahānādaḥ svargīyaḥ śūrasammataḥ

हिन्दी अर्थ

वहाँ रोंगटे खड़े कर देनेवाला भयंकर युद्धयज्ञ होने लगा, जो स्वर्गरूपी फलकी प्राप्ति करानेवाला था। उस संग्राममें महान्‌ सिंहनाद एवं आर्तनाद होता था, जो शूरवीरोंके लिये अभिमत है

अध्याय 237

श्लोक 4

युद्धयज्ञस्य नेताभूत् प्रह्रादो दैत्यसत्तमः ।विरोचनस्तथाध्वर्युर्युद्धयज्ञप्रवर्तकः

yuddhayajñasya netābhūt prahrādo daityasattamaḥ | virocanastathādhvaryuryuddhayajñapravartakaḥ

हिन्दी अर्थ

उस युद्धयज्ञके नेता हुए दैत्यप्रवर प्रह्नाइ। उनका पुत्र विरोचन उस युद्धयज्ञका प्रवर्तक अध्वर्यु हुआ

अध्याय 237

श्लोक 5

होता चैवात्र नमुचिर्वृत्रः स्तोत्रोपकल्पकः ।मन्त्रा दैत्याः समाख्याता यज्ञकर्मणि तत्र वै

hotā caivātra namucirvṛtraḥ stotropakalpakaḥ | mantrā daityāḥ samākhyātā yajñakarmaṇi tatra vai

हिन्दी अर्थ

इसमें नमुचि होता और वृत्रासुर प्रस्तोता हुआ। उस यज्ञकर्ममें दैत्योंको ही मन्त्र कहा गया है

अध्याय 237

श्लोक 6

अनुयातश्च पितरमधिको वा पराक्रमैः ।यष्टा तत्राभवद् बाण संयुगे चोपतिष्ठते

anuyātaśca pitaramadhiko vā parākramaiḥ | yaṣṭā tatrābhavad bāṇa saṃyuge copatiṣṭhate

हिन्दी अर्थ

जो पराक्रमद्वारा अपने पिता बलिका अनुसरण करता था अथवा पितासे बढ़कर पराक्रमी था, वह बाणासुर उस युद्धयज्ञरका यजमान बना और युद्धस्थलमें बराबर उपस्थित रहा

अध्याय 237

श्लोक 7

ऐन्द्रं पाशुपतं ब्राह्मं स्थूणाकर्णं सुदुर्जयम् ।मन्त्रास्तत्राभ्यवर्तन्त साध्वनुह्रादयोजिताः

aindraṃ pāśupataṃ brāhmaṃ sthūṇākarṇaṃ sudurjayam | mantrāstatrābhyavartanta sādhvanuhrādayojitāḥ

हिन्दी अर्थ

अनुषादके द्वारा भलीभाँति प्रयुक्त हुए ऐन्द्र, पाशुपत, ब्राह्म और अत्यन्त दुर्जय स्थूणाकर्ण नामक अस्त्र वहाँ मन्त्र थे

अध्याय 237

श्लोक 8

उद्गाता च मयः श्रीमान् स्थितः शत्रुभयङ्करः ।विनदन् दितिजश्रेष्ठो देवानीकं व्यदारयत्

udgātā ca mayaḥ śrīmān sthitaḥ śatrubhayaṅkaraḥ | vinadan ditijaśreṣṭho devānīkaṃ vyadārayat

हिन्दी अर्थ

शत्रुओंके लिये भयंकर श्रीमान्‌ू मयासुर वहाँ उद्ाता बनकर खड़ा था। वह दैत्यशिरोमणि वीर सिंहनाद करके देवताओंकी सेनाको विदीर्ण करने लगा

अध्याय 237

श्लोक 9

बलिस्तु राजा द्युतिमान् स्वयं तत्र महासुरः ।जाप्यैर्होमैश्च संयुक्ता ब्रह्मत्वमकरोत्प्रभुः

balistu rājā dyutimān svayaṃ tatra mahāsuraḥ | jāpyairhomaiśca saṃyuktā brahmatvamakarotprabhuḥ

हिन्दी अर्थ

सामर्थ्यशाली, तेजस्वी, महान्‌ असुर राजा बलि स्वयं ही वहाँ जप-होम आदिसे युक्त हो ब्रह्माका कार्य करने लगे

अध्याय 237

श्लोक 10

रणाग्निर्ज्वलितो घोरो वैरेन्धनसमीरितः ।हूयते त्वसुरैस्तत्र देवो विष्णुः सुरैः सह

raṇāgnirjvalito ghoro vairendhanasamīritaḥ | hūyate tvasuraistatra devo viṣṇuḥ suraiḥ saha

हिन्दी अर्थ

वैरके ईंधनसे उद्दीत हो वहाँ युद्धकी घोर अग्नि प्रज्वलित हुई। असुरगण देवताओंके साथ आकर उस आगमें आहुति डालने लगे। वह आइुति भगवान्‌ विष्णुकी तृपिके लिये की जा रही थी

अध्याय 237

श्लोक 11

शङ्खशब्दैः सुतुमुलैर्भेरीणां च महास्वनैः ।उद्घुष्टं विमलं चैव सुब्रह्मण्यं प्रयुज्यते

śaṅkhaśabdaiḥ sutumulairbherīṇāṃ ca mahāsvanaiḥ | udghuṣṭaṃ vimalaṃ caiva subrahmaṇyaṃ prayujyate

हिन्दी अर्थ

श्जोंकी तुमुल ध्वनि और भेरियोंके गम्भीर नादसे मानो वहाँ 'सुब्रह्मण्यम्‌' का विमल उद्घोष होता रहता था

अध्याय 237

श्लोक 12

बलश्च बलकश्चैव पुलोमा च महासुरः ।प्रशस्तं च समं कृत्वा सत्रं सम्यक् प्रचक्रिरे

balaśca balakaścaiva pulomā ca mahāsuraḥ | praśastaṃ ca samaṃ kṛtvā satraṃ samyak pracakrire

हिन्दी अर्थ

बल, बलक और पुलोमा नामक महासुर इन तीनोंने वहाँ प्रशस्त एवं सम कर्म करके सम्यक्‌- रूपसे सत्रका अनुष्ठान किया

अध्याय 237

श्लोक 13

कल्माषदण्डा विमला विपुला रथपङ्क्तयः ।यूपाश्च समकल्पन्त युद्धयज्ञे महाफले

kalmāṣadaṇḍā vimalā vipulā rathapaṅktayaḥ | yūpāśca samakalpanta yuddhayajñe mahāphale

हिन्दी अर्थ

उस महान्‌ फलदायक युद्धयज्ञमें चितकबरे ईषा- दण्डवाली निर्मल एवं विशाल रथपंक्तियाँ यूपोंके रूपों में कल्पित हुईं

अध्याय 237

श्लोक 14

कर्णिनालीकनाराचा वत्सदन्तोपबृंहिकाः ।तोमराः सोमकलशा विचित्राणि धनूंषि च

karṇinālīkanārācā vatsadantopabṛṃhikāḥ | tomarāḥ somakalaśā vicitrāṇi dhanūṃṣi ca

हिन्दी अर्थ

कर्णि, नालीक, नाराच, वत्सदन्त, उपबूंहिका, तोमर और विचित्र धनुष—ये ही उस यज्ञमें सोमकलश थे

अध्याय 237

श्लोक 15

अस्थीन्यत्र कपालानि पुरोडाशाः शिरांसि च ।आज्यं च रौद्रं रुधिरं तस्मिन् यज्ञेऽभिहूयते

asthīnyatra kapālāni puroḍāśāḥ śirāṃsi ca | ājyaṃ ca raudraṃ rudhiraṃ tasmin yajñe'bhihūyate

हिन्दी अर्थ

हड्डियाँ इसमें कपाल थीं, सिर पुरोडाश थे तथा भयंकर रुधिर ही घी था, जिसकी उस यज्ञमें आहुति दी जाती थी

अध्याय 237

श्लोक 16

इध्माः परिधयस्तत्र प्रस्तारा विपुला गदाः ।हयग्रीवोऽसिलोमा च राहुः केशी च दानवः

idhmāḥ paridhayastatra prastārā vipulā gadāḥ | hayagrīvo'silomā ca rāhuḥ keśī ca dānavaḥ

श्लोक 16–17 का हिन्दी अर्थ

शरपंक्तियाँ, इध्म और विशाल गदाएँ परिधि थीं। हयग्रीव, असिलोमा, राहु, दानव केशी, विरोचन, जम्भ, महाबली कुजम्भ और पराक्रमी विप्रचित्ति-ये उस यज्ञमें सदस्य थे

अध्याय 237

श्लोक 17

विरोचनश्च जम्भश्च कुजम्भश्च महाबलः ।सदस्यास्तत्र तु मखे विप्रचित्तिस्तु वीर्यवान्

virocanaśca jambhaśca kujambhaśca mahābalaḥ | sadasyāstatra tu makhe vipracittistu vīryavān

अर्थ श्लोक 16 के साथ

अध्याय 237

श्लोक 18

इषवस्तु स्रुवास्तत्र रथाक्षसदृशाः शुभाः ।धनुष्कोट्या धनुर्ज्याश्च स्रुवस्तत्र महामखे

iṣavastu sruvāstatra rathākṣasadṛśāḥ śubhāḥ | dhanuṣkoṭyā dhanurjyāśca sruvastatra mahāmakhe

हिन्दी अर्थ

रथके धुरेके समान मोटे और सुन्दर बाण उस यज्में खुवा थे। धनुषकी कोटियाँ और प्रत्यज्ञाएँ उस महायज्ञमें खुबका काम देती थीं

अध्याय 237

श्लोक 19

प्रतिप्रास्थानिकं कर्म वृषपर्वाकरोदिह ।दीक्षितस्तत्र तु बलिस्तस्य पत्नी महाचमूः

pratiprāsthānikaṃ karma vṛṣaparvākarodiha | dīkṣitastatra tu balistasya patnī mahācamūḥ

हिन्दी अर्थ

वृषपवनि उस यजमें प्रतिप्रस्थाताका कार्य किया, राजा बलि उसमें दीक्षा ग्रहण करनेवाले यजमान थे और उनकी विशाल सेना ही उनकी पत्नी थी

अध्याय 237

श्लोक 20

शम्बरस्तत्र शामित्रमकरोद् दितिनन्दनः ।अतिरात्रे महाबाहुर्वितते यज्ञकर्मणि

śambarastatra śāmitramakarod ditinandanaḥ | atirātre mahābāhurvitate yajñakarmaṇi

हिन्दी अर्थ

महाबाहु दितिनन्दन शम्बरने वहाँ चालू हुए उस अतिरात्र नामक यज्ञकर्ममें शामित्र- कर्म किया

अध्याय 237

श्लोक 21

दक्षिणास्तस्य यज्ञस्य कालनेमिर्महासुरः ।वैताने कर्मणि विभोर्यः ख्यातो हव्यवाडिव

dakṣiṇāstasya yajñasya kālanemirmahāsuraḥ | vaitāne karmaṇi vibhoryaḥ khyāto havyavāḍiva

हिन्दी अर्थ

उस यज्ञकी दक्षिणाओंके रूपमें महानू असुर कालनेमि उपस्थित था, जो अपने स्वामी बलिके यज्ञकर्ममें अग्निके समान विख्यात था

अध्याय 237

श्लोक 22

त्रिदशानां तु सैन्यस्य शरीरैर्गतजीवितैः ।तस्मिन् यज्ञे तु सवनं वर्धते दैत्यनिर्मितम्

tridaśānāṃ tu sainyasya śarīrairgatajīvitaiḥ | tasmin yajñe tu savanaṃ vardhate daityanirmitam

हिन्दी अर्थ

देवताओंकी सेनाके निष्प्राण शरीरोंद्वरारा उस यसमें दैत्योंका किया हुआ सवनकर्म उत्तरोत्तर बढ़ रहा था

अध्याय 237

श्लोक 23

देवानां रुधिरं सङ्ख्ये पपुरुग्रा दितेः सुताः ।नर्दमानाः प्रमुदिताः सोमपानं रणाध्वरे

devānāṃ rudhiraṃ saṅkhye papurugrā diteḥ sutāḥ | nardamānāḥ pramuditāḥ somapānaṃ raṇādhvare

हिन्दी अर्थ

उस रणयज्ञमें भयंकर दैत्य जो देवताओंका रुधिर पान करते थे, वही मानो प्रसन्नतापूर्वक उनके द्वारा किया गया सोमपान था, वे कोलाहल करते हुए वहाँ वह सोमपान करते थे

अध्याय 237

श्लोक 24

यदा बलिर्महादैत्यो विजेता समरे सुरान् ।तदा ह्यवभृथो यज्ञे भविष्यति न संशयः

yadā balirmahādaityo vijetā samare surān | tadā hyavabhṛtho yajñe bhaviṣyati na saṃśayaḥ

हिन्दी अर्थ

जब महादैत्य बलि समरमें देवताओंपर विजय पा लेंगे, तब उस यज्ञकी समासिपर अवभूथस्नान होगा, इसमें संशय नहीं है

अध्याय 237

श्लोक 25

महासुरेन्द्रपतयो यज्वानो भूरिदक्षिणाः ।वेदवन्तो वृत्तवन्तः शूराः सर्वे तनुत्यजः

mahāsurendrapatayo yajvāno bhūridakṣiṇāḥ | vedavanto vṛttavantaḥ śūrāḥ sarve tanutyajaḥ

हिन्दी अर्थ

बड़े-बड़े असुरेश्वर जो प्रचुर दक्षिणा देनेवाले, यज्ञकर्ता, वेदज्ञ, सदाचारी और शूरवीर थे, पसब-के-सब उस युद्धमें शरीरका मोह छोड़कर लगे थे

अध्याय 237

श्लोक 26

त्रैलोक्यहरणे सृष्टा युद्धयज्ञाय दीक्षिताः ।बद्धकृष्णाजिनाः सर्वे व्रतिनो मुञ्जधारिणः

trailokyaharaṇe sṛṣṭā yuddhayajñāya dīkṣitāḥ | baddhakṛṣṇājināḥ sarve vratino muñjadhāriṇaḥ

हिन्दी अर्थ

वे सब त्रिलोकीका राज्य हर लेनेके लिये उद्यत हो उस युद्धरूपी यज्ञके लिये दीक्षा ले चुके थे। उन सबने अपने शरीरमें काले मृगचर्म बाँध रखे थे। वे सभी मुझकी मेखला धारण करके त्रतके पालनमें तत्पर थे

अध्याय 237

श्लोक 27

एकनिश्चयकार्याश्च त्रैलोक्यजयकाङ्क्षिणः ।सुरदानवदैत्यानां शब्दः समभवन्महान्

ekaniścayakāryāśca trailokyajayakāṅkṣiṇaḥ | suradānavadaityānāṃ śabdaḥ samabhavanmahān

श्लोक 27–30 का हिन्दी अर्थ

श्श्३१ एक ही निश्चित उद्देश्यको लेकर वे सभी युद्धरूपी कार्यमें संलग्न थे। सबके मनमें यही इच्छा थी कि त्रिलोकीके राज्यपर विजय प्राप्त हो जाय । नाना प्रकारके आयुध हाथमें लेकर बड़ी उतावलीके साथ रणभूमिमें तीव्रगतिसे दौड़ते हुए देवताओं, दानवों और दैत्योंका पहानू कोलाहल वहाँ होने लगा। योद्धाओंके सिंहनाद, उच्चस्वरसे पुकार, गर्जना, हाथियोंके चिग्घाड़ने तथा रथके पहियोंकी घरघराहट आदिके घोर कोलाहलसे वहाँ सब ओर तुमुलनाद छा गया। शड्डू और दुन्दुभियोंके गम्भीर घोषसे, घोड़ोंके हिनहिनानेकी आवाजसे, हींसते हुए अश्वों और गरजते हुए दानवोंके सिंहनादसे, उनके चीखने और चिल्लानेसे तथा उनके हाथ-पैर पटकनेसे भी वहाँ महान्‌ कोलाहल छा रहा था

अध्याय 237

श्लोक 28

नानायुधविहस्तानां त्वरितानां प्रधावताम् ।क्ष्वेडितोत्क्रुष्टनिनदैर्गजबृंहितनिःस्वनैः

nānāyudhavihastānāṃ tvaritānāṃ pradhāvatām | kṣveḍitotkruṣṭaninadairgajabṛṃhitaniḥsvanaiḥ

अर्थ श्लोक 27 के साथ

अध्याय 237

श्लोक 29

रथनेमिस्वनैर्घोरैस्तुमुलः सर्वतोऽभवत् ।शङ्खदुन्दुभिनिर्घोषैर्हयहेषितनिःस्वनैः

rathanemisvanairghoraistumulaḥ sarvato'bhavat | śaṅkhadundubhinirghoṣairhayaheṣitaniḥsvanaiḥ

अर्थ श्लोक 27 के साथ

अध्याय 237

श्लोक 30

हयानां हेषमाणानां दानवानां च गर्जताम् ।क्ष्वेडितोत्क्रुष्टनिनदैः पाणिपादरवैस्तथा

hayānāṃ heṣamāṇānāṃ dānavānāṃ ca garjatām | kṣveḍitotkruṣṭaninadaiḥ pāṇipādaravaistathā

अर्थ श्लोक 27 के साथ

अध्याय 237

श्लोक 31

दानवानां परेषां च शस्त्रवन्ति महान्ति च ।समरे भीमकर्माणि सैन्यानि प्रचकाशिरे

dānavānāṃ pareṣāṃ ca śastravanti mahānti ca | samare bhīmakarmāṇi sainyāni pracakāśire

हिन्दी अर्थ

दानवों और देवताओंकी विशाल सेनाएँ अस्त्र-शस्त्रोंसे सुसज्जित हो समराद्भणमें भयंकर कर्म करती हुई प्रकाशित हो रही थीं

अध्याय 237

श्लोक 32

ततो नागा रथाश्चैव जाम्बूनदविभूषिताः ।भ्राजमाना व्यराजन्त मेघा इव सविद्युतः

tato nāgā rathāścaiva jāmbūnadavibhūṣitāḥ | bhrājamānā vyarājanta meghā iva savidyutaḥ

हिन्दी अर्थ

उस समय वहाँ सुवर्णसे विभूषित हाथी और रथ, विद्युत्सहित मेघोंके समान उद्धासित होते हुए बड़ी शोभा पा रहे थे

अध्याय 237

श्लोक 33

ऋष्टिखड्गगदास्तीक्ष्णाः शूलशक्तिपरश्वधाः ।चारु विभ्राजिरे तत्र तेष्वनीकेषु भागशः

ṛṣṭikhaḍgagadāstīkṣṇāḥ śūlaśaktiparaśvadhāḥ | cāru vibhrājire tatra teṣvanīkeṣu bhāgaśaḥ

हिन्दी अर्थ

उन सेनाओंमें पृथक्‌- पृथक्‌ ऋषि, खड्ग, गदा, तीखे शूल, शक्ति और फरसे चमक रहे थे, जो अत्यन्त मनोहर जान पड़ते थे

अध्याय 237

श्लोक 34

रथा बहुविधाकाराः शतशोऽथ सहस्रशः ।हेमप्रच्छन्नशिखरा ज्वलन्त इव पावकाः

rathā bahuvidhākārāḥ śataśo'tha sahasraśaḥ | hemapracchannaśikharā jvalanta iva pāvakāḥ

हिन्दी अर्थ

नाना प्रकारकी आकृतिवाले सैकड़ों और हजारों रथ जिनके ऊपरी भाग सोनेके पत्रसे ढके हुए थे, प्रज्वलित अग्निके समान प्रकाशित हो रहे थे

अध्याय 237

श्लोक 35

दानवानां सुराणां च समालोक्यन्त सैनिकाः ।काञ्चनैः कवचैः सर्वे ज्वलितार्कसमप्रभैः

dānavānāṃ surāṇāṃ ca samālokyanta sainikāḥ | kāñcanaiḥ kavacaiḥ sarve jvalitārkasamaprabhaiḥ

श्लोक 35–44 का हिन्दी अर्थ

दीसिमान्‌ पूर्कि समान प्रकाशित होनेवाले सुवर्णमय कवचोंसे पुसच्जित हुए दानवों और देवताओंके समस्त सैनिक आाकाशमें तारोंके समान दृष्टिगोचर हो रहे थे। हाथोंमें दस्ताने बाँधे और पीठपर तरकस लिये बैलोंके समान बड़े-बड़े नेत्रोंवाले देवता सेनाके मुहानेपर आकर ऊपर उठाये हुए विचित्र आयुधोंके द्वारा बड़ी शोभा पा रहे थें। समरभूमिमें जूझते हुए रणकुशल योद्धाओंकी बहुरंगी पताकाओं और ध्वजपंक्तियोंको वायु कम्पित कर रही थी । सैनिकोंके ध्वज, आभूषण, वस्त्र और कवच—न सभी वस्तुओंको सूर्यदेव अपनी किरणोंसे उन्हींके प्रमान कान्तिमान्‌ बनाकर प्रकाशित कर रहे थे। दोनों र्लोंके समस्त पैदल सैनिकोंके, जो असंख्य थे, पैरोंसे उठी हुई धुले हुए रेशमी वस्त्रके समान श्वेत धूलने समस्त दिशाओंको आच्छादित कर दिया। सबने दिव्य आयुध धारण कर रखे थे; सभीके अस्त्र-शस्त्र तथा वस्त्र-आभूषण आदि चमकीले थे। वे आपसमें एक सेनाके लोग दूसरी सेनाके लोगोंको स्तम्भित कर देते थे (आगे नहीं बढ़ने देते थे) । पर्वत-शिखरोंके समान ऊँचे शरीरवाले वे समस्त देवता और दानव उस समय रणभूमिमें खड़े हो एक-दूसरेपर चोट करते हुए विचित्र रीतिसे युद्ध करने लगे। पंखोंसे वेगयुक्त हुए दुर्जय, तीक्ण और परम सुन्दर बाण, मुद्र, मूसल, शूल, अयस्तुण्ड, उलूखल, अशनितुल्य वर, खड्ग और वृक्ष आदिके द्वारा अदूभुत पराक्रम प्रकट करते हुए उन योद्धाओंमें जब इस प्रकार भीषण मारकाट हो रही थी, उसी समय सावित्रका वध करनेके लिये बाणासुरने धनुष उठाया

अध्याय 237

श्लोक 36

सन्नद्धाः समदृश्यन्त ज्योतींषि गगने यथा ।उद्यतैरायुधैश्चित्रैस्तलबद्धाः कलापिनः

sannaddhāḥ samadṛśyanta jyotīṃṣi gagane yathā | udyatairāyudhaiścitraistalabaddhāḥ kalāpinaḥ

अर्थ श्लोक 35 के साथ

अध्याय 237

श्लोक 37

ऋषभाक्षाः सुरगणाश्चमूमुखगता बभुः ।नानावर्णाः पताकाश्च ध्वजमालाश्च संयुगे

ṛṣabhākṣāḥ suragaṇāścamūmukhagatā babhuḥ | nānāvarṇāḥ patākāśca dhvajamālāśca saṃyuge

अर्थ श्लोक 35 के साथ

अध्याय 237

श्लोक 38

युद्ध्यतां रणशौण्डानामीरयामास मारुतः ।ध्वजालङ्कारवस्त्राणि कवचानि च रश्मिभिः

yuddhyatāṃ raṇaśauṇḍānāmīrayāmāsa mārutaḥ | dhvajālaṅkāravastrāṇi kavacāni ca raśmibhiḥ

अर्थ श्लोक 35 के साथ

अध्याय 237

श्लोक 39

भासयामास सर्वाणि रश्मिवर्णानि रश्मिवान् ।सर्वेषामप्रमेयाणां बलानां पादचारिणाम्

bhāsayāmāsa sarvāṇi raśmivarṇāni raśmivān | sarveṣāmaprameyāṇāṃ balānāṃ pādacāriṇām

अर्थ श्लोक 35 के साथ

अध्याय 237

श्लोक 40

रजः प्रच्छादयामास पत्रोर्णं पाण्डुरं दिशः ।दिव्यायुधधराः सर्वे दीप्तायुधपरिच्छदाः

rajaḥ pracchādayāmāsa patrorṇaṃ pāṇḍuraṃ diśaḥ | divyāyudhadharāḥ sarve dīptāyudhaparicchadāḥ

अर्थ श्लोक 35 के साथ

अध्याय 237

श्लोक 41

प्रतितस्तम्भिरेऽन्योन्यमनीकं प्रत्यनीकतः ।गिरिकूटोच्छ्रयाः सर्वे तदा ते देवदानवाः

pratitastambhire'nyonyamanīkaṃ pratyanīkataḥ | girikūṭocchrayāḥ sarve tadā te devadānavāḥ

अर्थ श्लोक 35 के साथ

अध्याय 237

श्लोक 42

अन्योन्यमभिनिघ्नन्तो रणस्थाश्चित्रयोधिनः ।बाणैः सुरुचिरैस्तीक्ष्णैः पत्रवाजैर्दुरासदैः

anyonyamabhinighnanto raṇasthāścitrayodhinaḥ | bāṇaiḥ suruciraistīkṣṇaiḥ patravājairdurāsadaiḥ

अर्थ श्लोक 35 के साथ

अध्याय 237

श्लोक 43

मुद्गरैर्मुसलैः शूलैरयस्तुण्डैरुलूखलैः ।वज्रैरशनिकल्पैश्च खड्गवृक्षादिभिस्तथा

mudgarairmusalaiḥ śūlairayastuṇḍairulūkhalaiḥ | vajrairaśanikalpaiśca khaḍgavṛkṣādibhistathā

अर्थ श्लोक 35 के साथ

अध्याय 237

श्लोक 44

तथा प्रवर्तिते तेषां विमर्देऽद्भुतविक्रमे ।सावित्रस्य वधं प्रेप्सुर्बाणो जग्राह कार्मुकम्

tathā pravartite teṣāṃ vimarde'dbhutavikrame | sāvitrasya vadhaṃ prepsurbāṇo jagrāha kārmukam

अर्थ श्लोक 35 के साथ

अध्याय 237

श्लोक 45

शरजालेन दिव्येन च्छादयानः सुरोत्तमम् ।मन्त्रैर्हुत इवार्चिष्मान् सम्प्रजज्वाल तेजसा

śarajālena divyena cchādayānaḥ surottamam | mantrairhuta ivārciṣmān samprajajvāla tejasā

हिन्दी अर्थ

अपने दिव्य बाणोंके जालसे सुस्श्रेष्ठ सावित्रको आच्छादित करता हुआ बाणासुर मन्त्रों द्वारा घीकी आहुति पाये हुए अग्निदेवके समान तेजसे प्रज्वलित हो उठा

अध्याय 237

श्लोक 46

सागराभां महासेनां देवानां दैत्यपुङ्गवः ।संशोषयति बाणौघैरर्कोंऽशुभिरिवार्णवम्

sāgarābhāṃ mahāsenāṃ devānāṃ daityapuṅgavaḥ | saṃśoṣayati bāṇaughairarkoṃ'śubhirivārṇavam

हिन्दी अर्थ

देवताओंकी विशाल सेना समुद्रके समान थी। उसे दैत्यशिरोमणि बाणासुर अपने बाणसमूहों द्वारा उसी प्रकार सुखाने लगा, जैसे सूर्य अपनी किरणोंद्वारा समुद्रको सुखाते रहते हैं

अध्याय 237

श्लोक 47

मारुतः सुमहावेगः सावित्रः शक्तिमुत्तमाम् ।चिक्षेप बलिपुत्राय शक्रोऽशनिमिवाद्रये

mārutaḥ sumahāvegaḥ sāvitraḥ śaktimuttamām | cikṣepa baliputrāya śakro'śanimivādraye

हिन्दी अर्थ

तब महान्‌ वेगशाली सावित्र नामक मारुतने बलिपुत्र बाणासुरपर उत्तम शक्ति चलायी, मानो इन्द्रने किसी पर्वतपर वत्र फेंका हो

अध्याय 237

श्लोक 48

आपतन्ती च सा शक्तिर्महोल्का ज्वलिता इव ।द्विधा छिन्ना क्षुरप्रेण बाणेनाद्भुतकर्मणा

āpatantī ca sā śaktirmaholkā jvalitā iva | dvidhā chinnā kṣurapreṇa bāṇenādbhutakarmaṇā

हिन्दी अर्थ

परंतु अद्भुत कर्म करनेवाले बाणासुरने प्रज्वलित हुई विशाल उल्काके समान अपनी ओर आती हुई उस शक्तिके एक क्षुरप्रद्वारा दो टुकड़े कर डाले

अध्याय 237

श्लोक 49

हतायामथ शक्त्यां तु सावित्रो देवसत्तमः ।विश्वकर्मकृतं दिव्यं सुतीक्ष्ण दानवार्दनम्

hatāyāmatha śaktyāṃ tu sāvitro devasattamaḥ | viśvakarmakṛtaṃ divyaṃ sutīkṣṇa dānavārdanam

श्लोक 49–50 का हिन्दी अर्थ

उस शक्तिके खण्डित हो जानेपर देवशिरोमणि सावित्रने विश्वकर्माके बनाये हुए एक दिव्य दानवदलन खड्गको हाथमें लिया, जो विषधर सर्पके समान भयंकर था। उसकी धार बहुत ही तीखी और पुष्ट थी। वह निर्मल एवं विशाल खड्ग तेज होनेके साथ ही चन्द्रमाके समान उज्चल कान्तिसे प्रकाशित हो रहा था

अध्याय 237

श्लोक 50

सुपीनधारं विमलं विपुलं चन्द्रवर्चसम् ।अगृह्णन्निशितं खड्गमाशीविषमिवोरगम्

supīnadhāraṃ vimalaṃ vipulaṃ candravarcasam | agṛhṇanniśitaṃ khaḍgamāśīviṣamivoragam

अर्थ श्लोक 49 के साथ

अध्याय 237

श्लोक 51

तं गृहीत्वा रणमुखे प्रज्वलन्तं महाप्रभम् ।बाणाभ्याशे महातेजाः खड्गपाणिरवस्थितः

taṃ gṛhītvā raṇamukhe prajvalantaṃ mahāprabham | bāṇābhyāśe mahātejāḥ khaḍgapāṇiravasthitaḥ

हिन्दी अर्थ

युद्धके मुहानेपर उस प्रज्वलित होनेवाले महान्‌ कान्तिमान्‌ खड्गको हाथमें लेकर महातेजस्वी सावित्र बाणासुरके निकट खड़े हो गये

अध्याय 237

श्लोक 52

स तं स्थितमथालक्ष्य सावित्रं बलिनन्दनः ।लोहिताक्षं महाकायं चिक्षेप च ननाद च

sa taṃ sthitamathālakṣya sāvitraṃ balinandanaḥ | lohitākṣaṃ mahākāyaṃ cikṣepa ca nanāda ca

हिन्दी अर्थ

सावित्रकी आँखें लाल और काया विशाल थी। उन्हें इस प्रकार खड़ा हुआ देख बलिनन्दन बाणासुरने उनके प्रति आश्षेप और सिंहनाद किया

अध्याय 237

श्लोक 53

ततोऽर्ककिरणाकारानशनिप्रतिमाञ्छितान् ।सन्दधे चाशु बाणौघानाशीविषशिलीमुखान्

tato'rkakiraṇākārānaśanipratimāñchitān | sandadhe cāśu bāṇaughānāśīviṣaśilīmukhān

हिन्दी अर्थ

तदनन्तर उसने सूर्यकी किरणोंके समान तेजस्वी, अशनिके सद्ृश तीखे और विषधर सर्पोकी भाँति विषैले बाणसमूहोंका शीघ्र ही संधान किया

अध्याय 237

श्लोक 54

रुक्मपुङ्खान् प्रदीप्ताग्रानुग्रवेगानलङ्कृतान् ।आकर्णपूरांश्चिक्षेप शरानुग्रान् समन्ततः

rukmapuṅkhān pradīptāgrānugravegānalaṅkṛtān | ākarṇapūrāṃścikṣepa śarānugrān samantataḥ

हिन्दी अर्थ

श्श्य्डे उनमें सोनेके पर लगे थे। उनका अग्रभाग उद्दीस हो रहा था। वे भयंकर वेगशाली तथा अलंकृत थे। बाणासुरने उन उग्र बाणोंको धनुषपर रखकर उन्हें कानतक खींचकर चारों ओर बरसाना आरम्भ किया

अध्याय 237

श्लोक 55

दृढचापप्रयुक्तास्ते शरा वैश्वानरप्रभाः ।सावित्रं छादयामासुः कैलासमिव तोयदाः

dṛḍhacāpaprayuktāste śarā vaiśvānaraprabhāḥ | sāvitraṃ chādayāmāsuḥ kailāsamiva toyadāḥ

हिन्दी अर्थ

वे अग्निके समान तेजस्वी बाण सुदूढ़ धनुषद्वारा छोड़े गये थे। उन्होंने सावित्रको उसी तरह ढक लिया, जैसे बादल कैलास पर्वतको आच्छादित कर देते हैं

अध्याय 237

श्लोक 56

सञ्छाद्यमानः शस्त्रौघैर्बाणेन बलिसूनुना ।पराङ्मुखः सुरवरः प्रयातः सरथध्वजः

sañchādyamānaḥ śastraughairbāṇena balisūnunā | parāṅmukhaḥ suravaraḥ prayātaḥ sarathadhvajaḥ

हिन्दी अर्थ

बलिकुमार बाणासुरके शस्त्रसमूहोंद्वारा इस प्रकार आच्छादित होते हुए सुर्श्रेष्ठ सावित्र युद्धसे विमुख हो रथ और ध्वजसहित वहाँसे चल दिये

अध्याय 237

श्लोक 57

पराजित्य स सावित्रं बाणः परमहर्षितः ।प्रगृह्य कार्मुकं घोरं गतः शक्ररथं प्रति

parājitya sa sāvitraṃ bāṇaḥ paramaharṣitaḥ | pragṛhya kārmukaṃ ghoraṃ gataḥ śakrarathaṃ prati

हिन्दी अर्थ

सावित्रको पराजित करके बाणासुर बहुत प्रसन्न हुआ। तत्पश्चात्‌ वह भयंकर धनुष लेकर इन्द्रके रथकी ओर चला गया

अध्याय 237

श्लोक 58

बलश्चाप्यसुरश्रेष्ठः प्रगृह्य महतीं गदाम् ।ध्रुवाय वसवे मूर्ध्नि रौद्रां चिक्षेप दानवः

balaścāpyasuraśreṣṭhaḥ pragṛhya mahatīṃ gadām | dhruvāya vasave mūrdhni raudrāṃ cikṣepa dānavaḥ

हिन्दी अर्थ

इधर असुरशिरोमणि बल नामक दानवने विशाल एवं भयंकर गदा हाथमें लेकर उसे ध्रुव नामक वसुके मस्तकपर दे मारा

अध्याय 237

श्लोक 59

तस्य निर्मथितं त्वंसे हेमचित्रं च वर्म वै ।गदावेगेन भीमेन ध्रुवस्य समरे तदा

tasya nirmathitaṃ tvaṃse hemacitraṃ ca varma vai | gadāvegena bhīmena dhruvasya samare tadā

हिन्दी अर्थ

उस समय समराज्णमें उस गदाके भयंकर वेगसे ध्रुवके कंधेपर स्थित सुवर्णजटित विचित्र कवच छिन्न-भिन्न हो गया

अध्याय 237

श्लोक 60

शेषाश्च वसवः सर्वे दिव्यास्त्रैर्घोरदर्शनैः ।प्राच्छादयन् रणे दैत्यमादित्यमिव तोयदाः

śeṣāśca vasavaḥ sarve divyāstrairghoradarśanaiḥ | prācchādayan raṇe daityamādityamiva toyadāḥ

हिन्दी अर्थ

तब शेष सभी वसुओंने घोर दिव्यास्त्रोंद्वारा रणभूमिमें उस दैत्यको उसी प्रकार ढक दिया, जैसे बादल सूर्यदेवको आच्छादित कर देते हैं

अध्याय 237

श्लोक 61

ततः सम्मर्दितो बाणैर्बलो दानवसत्तमः ।अवातरद् रथात्तस्माद् गदामुद्यम्य वेगवान्

tataḥ sammardito bāṇairbalo dānavasattamaḥ | avātarad rathāttasmād gadāmudyamya vegavān

हिन्दी अर्थ

फिर तो उनके बाणोंसे रौंदा गया दानवशिरोमणि बल गदा उठाकर अपने उस रथसे वेगपूर्वक उतर पड़ा

अध्याय 237

श्लोक 62

पातयामास शत्रूणां समाविध्य महासुरः ।दिशः प्राद्रावयत्सर्वांस्त्रिदशान्सा महागदा

pātayāmāsa śatrūṇāṃ samāvidhya mahāsuraḥ | diśaḥ prādrāvayatsarvāṃstridaśānsā mahāgadā

हिन्दी अर्थ

उस महान्‌ असुरने गदाको घुमाकर उसे अपने शत्रुओंपर चला दिया। उस विशाल गदाने सम्पूर्ण देवताओंको उस समय विभिन्न दिशाओं में भागनेको विवश कर दिया

अध्याय 237

श्लोक 63

इन्द्राशनिरिवेन्द्रेण प्रवृद्धा सुमहास्वना ।तस्याः सविद्युद्धोषायास्तेन शब्देन वेपिताः

indrāśanirivendreṇa pravṛddhā sumahāsvanā | tasyāḥ savidyuddhoṣāyāstena śabdena vepitāḥ

श्लोक 63–66 का हिन्दी अर्थ

जैसे इन्द्रके द्वारा फेंकी गयी उनकी आअशनि बड़े वेगसे आगे बढ़कर बड़ी भारी गड़गड़ाहट पैदा करती है, उसी तरह उस गदाने भी किया। बिजलीकी-सी कड़क पैदा करनेवाली उस गदाके शब्दसे कम्पित होकर उस समय देवसेनाके रथी अपने रथोंसे कूदकर भाग गये। तब सूर्यके समान तेजस्विनी और मेघोंके समान गर्जना करनेवाली देवताओंकी उस प्रचण्ड रथ-सेनापर बलने चारों ओरसे बाणधाराकी वर्षा आरम्भ कर दी। वह महातेजस्वी महान्‌ असुर देवताओंको क्षुरप्र, विशिख, भल्ल, वत्सदन्त तथा शिलीमुख नामक बाणोंद्वारा बारम्बार घायल करने लगा। बलाक नामक दैत्य हाथमें गदा लेकर मुँह बाये हुए कालके समान जान पड़ता था

अध्याय 237

श्लोक 64

व्यद्रवन्त परिभ्रष्टा रथेभ्यो रथिनस्तदा ।तदुदीर्णे रथानीकं सूर्याभं मेघनिःस्वनम्

vyadravanta paribhraṣṭā rathebhyo rathinastadā | tadudīrṇe rathānīkaṃ sūryābhaṃ meghaniḥsvanam

अर्थ श्लोक 63 के साथ

अध्याय 237

श्लोक 65

देवानां शरधाराभिः समन्तादभ्यवर्षत ।क्षुरप्रैर्विशिखैर्भल्लैर्वत्सदन्तैः शिलीमुखैः

devānāṃ śaradhārābhiḥ samantādabhyavarṣata | kṣuraprairviśikhairbhallairvatsadantaiḥ śilīmukhaiḥ

अर्थ श्लोक 63 के साथ

अध्याय 237

श्लोक 66

मुहुर्मुहुर्महातेजाः प्रत्यविध्यन्महासुरः ।बलाकस्तु गदापाणिर्व्यादितास्य इवान्तकः

muhurmuhurmahātejāḥ pratyavidhyanmahāsuraḥ | balākastu gadāpāṇirvyāditāsya ivāntakaḥ

अर्थ श्लोक 63 के साथ

अध्याय 237

श्लोक 67

तडिद्गणार्कसदृशो वैश्वानर इवापरः ।पिबन्निव शरौघांस्तान् देवचापसमुच्छ्रितान्

taḍidgaṇārkasadṛśo vaiśvānara ivāparaḥ | pibanniva śaraughāṃstān devacāpasamucchritān

श्लोक 67–71 का हिन्दी अर्थ

वह विद्युत्‌ और सूर्यके समान तेजस्वी था। दूसरे ैश्वानर (अग्नि)-के समान प्रकाशित हो रहा था। तरह दैत्यराज देवताओंके धनुषसे छूटे हुए बाणसमूहों को पीता हुआ-सा उनकी ओर दौड़ा । वह दूसरे महासागरके प्मान वेगशाली प्रतीत होता था। जैसे पर्वत समुद्रके त्रेगको भंग कर देते हैं, उसी प्रकार उस दानव अथवा रैत्य बलाकने अपनी गर्जनासे सम्पूर्ण दिशाओंको प्रतिध्वनित करते हुए अपने बल-पराक्रमसे समस्त रेवताओंकी प्रगति भंग कर दी। समुद्र नामक दैत्य जैसे वायु अपने बलसे वृक्षोंको उखाड़ फेंकता है, उसी प्रकार अपने वेगसे महाधनुर्धर देवताओंका दमन करता हुआ आप और अनिल नामक दो वसुओंके पाथ युद्ध करने लगा। शत्रुओंका दमन करनेवाले परंतप आप और अनिल दोनों वसुओंने दो मेघोंके समान तेजस्वी बाणोंकी वर्षा आरम्भ कर दी; परंतु उस दैत्यने उनके चलाये हुए उन तेजस्वी बाणोंको आकाशमें ही क्राट गिराया

अध्याय 237

श्लोक 68

अभ्यद्रवत दैत्येन्द्रो महार्णव इवापरः ।अवस्फूर्जन् दिशः सर्वाः स्वेन वीर्येण दानवः

abhyadravata daityendro mahārṇava ivāparaḥ | avasphūrjan diśaḥ sarvāḥ svena vīryeṇa dānavaḥ

अर्थ श्लोक 67 के साथ

अध्याय 237

श्लोक 69

अरुणत्त्रिदशान् दैत्यः सिन्धुवेगान् नगा इव ।समुद्रस्तरसा देवान् वायुर्वृक्षानिवौजसा

aruṇattridaśān daityaḥ sindhuvegān nagā iva | samudrastarasā devān vāyurvṛkṣānivaujasā

अर्थ श्लोक 67 के साथ

अध्याय 237

श्लोक 70

दमयंश्च महेष्वासान् वसुभ्यां समसज्जत ।आपश्चैवानिलश्चैव ववर्षतुररिन्दमौ

damayaṃśca maheṣvāsān vasubhyāṃ samasajjata | āpaścaivānilaścaiva vavarṣaturarindamau

अर्थ श्लोक 67 के साथ

अध्याय 237

श्लोक 72

शरवर्षाणि दीप्तानि मेघाविव परन्तपौ ।क्षिप्तांस्तान् विशिखान् दीप्तानन्तरिक्षे स चिच्छिदे।७१॥ अमृष्यमाणस्तत्कर्म ध्रुवस्तमभिदुद्रुवे ।तौ पृथक्छरवर्षाभ्यामन्योन्यमभिजघ्नतुः

śaravarṣāṇi dīptāni meghāviva parantapau | kṣiptāṃstān viśikhān dīptānantarikṣe sa cicchide|71|| amṛṣyamāṇastatkarma dhruvastamabhidudruve | tau pṛthakcharavarṣābhyāmanyonyamabhijaghnatuḥ

हिन्दी अर्थ

उसके उस कर्मको ध्रुव पहन न कर सके; अत: उन्होंने उसपर धावा कर दिया। फिर वे दोनों वीर पृथक्‌-पृथक्‌ बाण-वर्षा करके एक-दूसरेको घायल करने लगे

अध्याय 237

श्लोक 73

उत्तमाभिजनौ शूरौ देवदैत्यौ यशस्करौ ।तौ नखैरिव शार्दूलौ दन्तैरिव महाद्विपौ

uttamābhijanau śūrau devadaityau yaśaskarau | tau nakhairiva śārdūlau dantairiva mahādvipau

श्लोक 73–74 का हिन्दी अर्थ

वे देवता और रैत्य दोनों शूरवीर, उत्तम कुलमें उत्पन्न तथा यशस्वी थे। जैसे दो बाघ नखोंसे और दो महान्‌ गजराज दाँतोंसे एक-दूसरेपर चोट करते हैं, उसी प्रकार वे दोनों वीर (थ-शक्तियों और बाणोंद्वारा एक-दूसरेको क्षत-विश्षत करने लगे। वे अपने-अपने सायकोंद्वारा प्रतिपक्षीके अड्लोंको विदीर्ण एवं घायल करने लगे

अध्याय 237

श्लोक 74

रथशक्तिभिरन्योन्यं विशिखैश्चाप्यकृन्तताम् ।निर्भिन्दन्तौ च गात्राणि विलिखन्तौ च सायकैः

rathaśaktibhiranyonyaṃ viśikhaiścāpyakṛntatām | nirbhindantau ca gātrāṇi vilikhantau ca sāyakaiḥ

अर्थ श्लोक 73 के साथ

अध्याय 237

श्लोक 75

स्तम्भयन्तौ च बलिनौ प्रतुदन्तौ स्थितौ रणे ।चरन्तौ विविधान् मार्गान्मण्डलानि च भागशः

stambhayantau ca balinau pratudantau sthitau raṇe | carantau vividhān mārgānmaṇḍalāni ca bhāgaśaḥ

हिन्दी अर्थ

दोनों बलवान्‌ थे; अत: दोनों ही रणभूमिमें स्थित होकर रक-दूसरेको आगे बढ़नेसे रोकते और पीड़ित करते हुए युद्धके विविध मार्गोंसे विचरते और पृथक्‌-पृथक्‌ पैंतरे दिखाते थे

अध्याय 237

श्लोक 76

मुद्गरैर्जघ्नतुः क्रुद्धावन्योन्यमभिमानिनौ ।असिभ्यां चर्मणी दिव्ये विपुले च शरासने

mudgarairjaghnatuḥ kruddhāvanyonyamabhimāninau | asibhyāṃ carmaṇī divye vipule ca śarāsane

श्लोक 76–78 का हिन्दी अर्थ

इसके बाद वे दोनों अभिमानी वीर कुपित होकर परस्पर मुदूगरोंकी मार करने लगे। दोनों ही तलबवारोंसे दोनोंके दिव्य ढाल और विशाल धनुष काटकर पर्वतके समान खड़े हो परस्पर बाहुयुद्ध करने लगे। दोनोंकी ही छाती चौड़ी और भुजाएँ बड़ी-बड़ी थीं। दोनों ही मल्लयुद्धमें कुशल थे, अत: लोहेके बने हुए परिघोंके समान अपनी मोटी एवं बलिष्ठ भुजाओंद्वारा वे एक-दूसरेसे गुथ गये। उन दोनोंमें भुजाओंके आघातसे निग्रह और प्रग्रहके दाँव-पेंच चलने लगे

अध्याय 237

श्लोक 77

निकृत्याचलसङ्काशौ बाहुयुद्धं प्रचक्रतुः ।व्यूढोरस्कौ दीर्घभुजौ नियुद्धकुशलावुभौ

nikṛtyācalasaṅkāśau bāhuyuddhaṃ pracakratuḥ | vyūḍhoraskau dīrghabhujau niyuddhakuśalāvubhau

अर्थ श्लोक 76 के साथ

अध्याय 237

श्लोक 78

बाहुभिः समसज्जेतामायसैः परिघैरिव ।तयोरासीद् भुजाघातैर्निग्रहः प्रग्रहस्तथा

bāhubhiḥ samasajjetāmāyasaiḥ parighairiva | tayorāsīd bhujāghātairnigrahaḥ pragrahastathā

अर्थ श्लोक 76 के साथ

अध्याय 237

श्लोक 79

अतीव भीमः संह्रादो वज्रपर्वतयोरिव ।द्विपाविव विषाणाग्रैः शृङ्गैरिव महावृषौ

atīva bhīmaḥ saṃhrādo vajraparvatayoriva | dvipāviva viṣāṇāgraiḥ śṛṅgairiva mahāvṛṣau

श्लोक 79–80 का हिन्दी अर्थ

उस समय व्र और पर्वतके टकरानेके समान अत्यन्त भयंकर शब्द होता था। जैसे दो हाथी अपने दाँतोंके अग्रभागसे तथा दो बड़े-बड़े साँड़ अपने सींगोंसे प्रहार करते हुए लड़ते हैं, उसी प्रकार वे दोनों वीर अत्यन्त क्रोधपूर्क दो घड़ीतक एक-दूसरेको खींचते और धक्के देते रहे

अध्याय 237

श्लोक 80

अन्योन्यमभिसंरब्धौ मुहूर्तं पर्यकर्षताम्

anyonyamabhisaṃrabdhau muhūrtaṃ paryakarṣatām

अर्थ श्लोक 79 के साथ

अध्याय 237

श्लोक 81

ततः पराजितो देवो बलाकेन तथा ध्रुवः ।रथं त्यक्त्वा भयात्तस्य प्रणष्टः प्राङ्मुखो वसुः

tataḥ parājito devo balākena tathā dhruvaḥ | rathaṃ tyaktvā bhayāttasya praṇaṣṭaḥ prāṅmukho vasuḥ

हिन्दी अर्थ

तदनन्तर वसुदेवता ध्रुव बलाक नामक दैत्यसे पराजित हो रथ छोड़कर भयके मारे पूर्व दिशाकी ओर भाग गये

स्रोत: local proofread transcription: Sanskrit shlokas of the Harivamsa (Harivamsha, Vishnu and Bhavishya parvas) from sanskritdocuments.org. One chapter per adhyaya; verse numbers as printed in the source (restarting in each adhyaya). Appendix sections are not included. · प्राप्त 19/10/2026

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शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

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व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

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शोध टिप्पणीResearch note

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Collated with BORI Critical Edition of Mahabharata Khilaparvan.