Harivamsha Purana
235
अध्याय 235 / 318

Parva 3, Adhyāya 52

64 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ64 श्लोक

अध्याय 235

श्लोक 1

श्रुतस्ते दैत्यसैन्यस्य विस्तरो जनमेजय ।भूयस्त्रिदशसैन्यस्य शृणु विस्तरमादितः

śrutaste daityasainyasya vistaro janamejaya | bhūyastridaśasainyasya śṛṇu vistaramāditaḥ

हिन्दी अर्थ

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! तुमने दैत्योंकी नाका विस्तारपूर्वक वर्णन सुन लिया; अब पुनः वताओंकी सेनाका विस्तार आरम्भसे ही बता रहा हूँ, नो

अध्याय 235

श्लोक 2

सुराधिपस्तु भगवानाज्ञापयत वै सुरान् ।मरुद्गणास्तथादित्यान् विश्वान्देवांश्च वासवः

surādhipastu bhagavānājñāpayata vai surān | marudgaṇāstathādityān viśvāndevāṃśca vāsavaḥ

श्लोक 2–4 का हिन्दी अर्थ

देवताओंके अधिपति भगवान्‌ इन्द्रने देवता, रुद्ण, आदित्य, विश्वेदेव, आठ वसु, यक्ष, राक्षस, डे-बड़े नाग, समस्त विद्याधरगण, महाबली गन्धर्व, मोडध्याय: + १११७ महासागर, पर्वत, महातेजस्वी रुद्र, यम, कुबेर तथा राजा वरुणको युद्धके लिये तैयार होनेकी आज्ञा दी

अध्याय 235

श्लोक 3

वसूनष्टौ भृशं सर्वान् यक्षरक्षोमहोरगान् ।विद्याधरगणान्सर्वान्गन्धर्वांश्च महाबलान्

vasūnaṣṭau bhṛśaṃ sarvān yakṣarakṣomahoragān | vidyādharagaṇānsarvāngandharvāṃśca mahābalān

अर्थ श्लोक 2 के साथ

अध्याय 235

श्लोक 5

महार्णवांश्च शैलांश्च तथा रुद्रान् महौजसः ।यमवैश्रवणौ चोभौ वरुणं च जनाधिपं ४॥ ये तु सिद्धा महात्मानः पितरश्च मनस्विनः ।राजर्षयश्च शतशो योगसिद्धास्तथैव च

mahārṇavāṃśca śailāṃśca tathā rudrān mahaujasaḥ | yamavaiśravaṇau cobhau varuṇaṃ ca janādhipaṃ 4|| ye tu siddhā mahātmānaḥ pitaraśca manasvinaḥ | rājarṣayaśca śataśo yogasiddhāstathaiva ca

श्लोक 5–6 का हिन्दी अर्थ

उनके आदेशकी घोषणा इस प्रकार हुई—' जो सिद्ध महात्मा हैं, जो मनस्वी पितर हैं तथा जो राजर्षि और सैकड़ों योग- सिद्ध पुरुष हैं, उन सबको सर्वसमर्थ, देवशासक, पराक्रमी इन्द्र आज्ञा देते हैं कि आपलोग दैत्योंका विनाश करनेके लिये कमर कसकर तैयार हो जायेँ'

अध्याय 235

श्लोक 6

त्रिदशाज्ञापकः शक्र आज्ञापयति वीर्यवान् ।भवन्तो दैत्यनाशाय सन्नह्यन्तामिति प्रभुः

tridaśājñāpakaḥ śakra ājñāpayati vīryavān | bhavanto daityanāśāya sannahyantāmiti prabhuḥ

अर्थ श्लोक 5 के साथ

अध्याय 235

श्लोक 7

शक्रस्य वचनं श्रुत्वा ततः सर्वे दिवौकसः ।सन्नह्यन्त महात्मानः शक्रस्य समविक्रमाः

śakrasya vacanaṃ śrutvā tataḥ sarve divaukasaḥ | sannahyanta mahātmānaḥ śakrasya samavikramāḥ

हिन्दी अर्थ

देवेन्द्रका यह वचन सुनकर उनके समान ही पराक्रम प्रकट करनेवाले समस्त महामनस्वी देवता युद्धके लिये तैयार होने लगे

अध्याय 235

श्लोक 8

नानाकवचिनः सर्वे विचित्रकवचध्वजाः ।नानायुधोद्यतकरा मत्ता इव महागजाः

nānākavacinaḥ sarve vicitrakavacadhvajāḥ | nānāyudhodyatakarā mattā iva mahāgajāḥ

हिन्दी अर्थ

उन सबने नाना प्रकारके कवच धारण किये। उनके कवच और ध्वज विचित्र थे। वे हाथोंमें नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्र लिये हुए थे और मतवाले गजराजोंके समान युद्धके लिये उद्यत थे

अध्याय 235

श्लोक 9

केचिदारुरुहुर्व्याघ्रान् केचिदारुरुहुर्गजान् ।केचिदारुरुहुर्नागान् केचिदारुरुहुर्वृषान्

kecidāruruhurvyāghrān kecidāruruhurgajān | kecidāruruhurnāgān kecidāruruhurvṛṣān

हिन्दी अर्थ

उनमेंसे कुछ लोग व्याप्रोंपर सवार थे और कुछ लोग हाथियोंपर। कोई नागोंपर चढ़े थे और कोई बैलोंपर

अध्याय 235

श्लोक 10

हरिनेत्रो हरिश्मश्रुर्द्विरदैरावृतध्वजम् ।रथं हरिहयैर्युक्तं स प्रायात् समरं प्रति

harinetro hariśmaśrurdviradairāvṛtadhvajam | rathaṃ harihayairyuktaṃ sa prāyāt samaraṃ prati

हिन्दी अर्थ

इन्द्रके नेत्र सिंहके समान चमकीले हैं, उनकी मूँछ नीले रंगकी है, उनका ध्वज ऐरावत हाथीसे चिह्नित है, उनके रथमें हरे रंगके घोड़े जुते हुए हैं। वे उसी रथपर आरूढ़ हो समरकी ओर चले

अध्याय 235

श्लोक 11

आदित्यवर्णं विरजं सुधौतं त्वष्ट्रा स्वयं निर्मितमीश्वरार्थम् ।जालैश्च जाम्बूनदभक्तिचित्रै- रलङ्कृतं काञ्चनदामभिश्च

ādityavarṇaṃ virajaṃ sudhautaṃ tvaṣṭrā svayaṃ nirmitamīśvarārtham | jālaiśca jāmbūnadabhakticitrai- ralaṅkṛtaṃ kāñcanadāmabhiśca

हिन्दी अर्थ

उस रथकी कान्ति सूर्यके समान थी। वह निर्मल तथा स्वच्छ धुला हुआ था। साक्षात्‌ विश्वकर्माने इन्द्रके लिये उसका निर्माण किया था। वह सोनेकी जालियों, जाम्बूनदकी चित्रभड्डी तथा सुवर्णकी लड़ियोंसे अलंकृत था

अध्याय 235

श्लोक 12

सकूबरोपस्करबन्धुरेषं विद्युत्प्रभाभिः कृतमाभिताम्रम् ।कैलासशृङ्गोपमन्द्रियानं सुचारुचारु प्रतिचक्रचक्रम्

sakūbaropaskarabandhureṣaṃ vidyutprabhābhiḥ kṛtamābhitāmram | kailāsaśṛṅgopamandriyānaṃ sucārucāru praticakracakram

हिन्दी अर्थ

कूबर, अन्य उपकरण तथा मनोहर ईषादण्डसहित वह रथ विद्युतकी प्रभासे ताप्रवर्णका हो गया था। वह इन्द्रयान कैलास-शिखरके समान दिखायी देता था और मनोहरसे भी मनोहर तथा शत्रुमण्डलीपर शासन करनेवाला था

अध्याय 235

श्लोक 13

तारासहस्रैः खचितं ज्वलद्भि- र्देवार्हमाल्यार्चितसर्वदेहम् ।समुच्छ्रितश्रीध्वजमक्षयाक्षं प्रज्वाल्यमानं पुरुषोत्तमेन

tārāsahasraiḥ khacitaṃ jvaladbhi- rdevārhamālyārcitasarvadeham | samucchritaśrīdhvajamakṣayākṣaṃ prajvālyamānaṃ puruṣottamena

हिन्दी अर्थ

उसमें सहसत्रों प्रकाशमान तारे जड़े हुए थे। उस रथका सम्पूर्ण अड्ध देवोचित मालाओंसे पूजित था। उसमें शोभाशाली ऊँचा ध्वज फहरा रहा था तथा उसका धुरा कभी क्षीण होनेवाला नहीं था। पुरुषोत्तम इन्द्रकी कान्तिसे वह रथ और भी उद्धासित हो रहा था

अध्याय 235

श्लोक 14

आस्थाय तं भास्करमाशुवेगं शचीपतिर्लोकपतिः सुरेशः ।वज्रस्य धर्ता भुवनस्य गोप्ता ययौ महात्मा भगवान् महेन्द्रः

āsthāya taṃ bhāskaramāśuvegaṃ śacīpatirlokapatiḥ sureśaḥ | vajrasya dhartā bhuvanasya goptā yayau mahātmā bhagavān mahendraḥ

हिन्दी अर्थ

तीत्र वेगसे चलनेवाले उस तेजस्वी रथपर आरूढ़ हो तीनों लोकोंके स्वामी देवताओंके ईश्वर वज़धारी भुवनरक्षक शचीपति महात्मा भगवान्‌ महेन्द्र युद्धके लिये चले

अध्याय 235

श्लोक 15

आमुच्च वर्माथ सहस्रतारं हुताशनादित्यसमप्रभावम् ।सूर्यप्रभं चामुमुचे किरीटं मालां च जाम्बूनदवैजयन्तीम्

āmucca varmātha sahasratāraṃ hutāśanādityasamaprabhāvam | sūryaprabhaṃ cāmumuce kirīṭaṃ mālāṃ ca jāmbūnadavaijayantīm

हिन्दी अर्थ

उन्होंने अग्नि और सूर्यके समान प्रभापुज्ञसे परिपूर्ण पहसख्र तारिकावाले कवचको धारण करके मस्तकपर पूर्कि समान तेजस्वी मुकुटको रखा और गलेमें पैरॉंतक लटकनेवाली जाम्बूनदमयी वैजयन्तीमाला धारण की

अध्याय 235

श्लोक 16

त्वष्ट्रा कृतं भास्कररश्मिदीप्तं सुतीक्ष्णघोरामलतीव्रधारम् ।महासुराणां रुधिरार्द्रमुग्रं प्रगृह्य वज्रं शतपर्व भीमम्

tvaṣṭrā kṛtaṃ bhāskararaśmidīptaṃ sutīkṣṇaghorāmalatīvradhāram | mahāsurāṇāṃ rudhirārdramugraṃ pragṛhya vajraṃ śataparva bhīmam

हिन्दी अर्थ

इसके बाद सौ पर्वोंसे युक्त भयंकर त्रज़॒हाथमें लिया, जो बड़े-बड़े असुरोंके रक्तसे भीगा हुआ था। सूर्यकी किरणोंके समान उद्दीस होनेवाले उस उग्र वज्का निर्माण साक्षात्‌ विश्वक्मनि केया था। उसकी धार अत्यन्त तीक्ष्ण, घोर, निर्मल और तीव्र थी

अध्याय 235

श्लोक 17

महाशनी द्वे च महाग्रहाभे दीप्ताममोघां च सशक्तिमुग्राम् ।चक्रं तथैन्द्रं सुमहत्प्रतापं प्रगृह्य शक्रः प्रययौ रणाय

mahāśanī dve ca mahāgrahābhe dīptāmamoghāṃ ca saśaktimugrām | cakraṃ tathaindraṃ sumahatpratāpaṃ pragṛhya śakraḥ prayayau raṇāya

हिन्दी अर्थ

महान्‌ ग्रहोंके समान प्रकाशित होनेवाली दो मशनियाँ, प्रज्वलित एवं अमोघ उग्र शक्ति तथा हहाप्रतापी ऐन्द्र-चक्र हाथमें लेकर देवराज इन्द्र युद्धके लिये प्रस्थित हुए

अध्याय 235

श्लोक 18

सहस्रदृग् भूतपतिः सनातनः सनातनानामपि यः सनातनः ।खड्गं च देवाधिपतिर्महात्मा वैयाघ्रमादाय च चर्म चित्रम्

sahasradṛg bhūtapatiḥ sanātanaḥ sanātanānāmapi yaḥ sanātanaḥ | khaḍgaṃ ca devādhipatirmahātmā vaiyāghramādāya ca carma citram

हिन्दी अर्थ

उनके. सहखर नेत्र हैं। के सम्पूर्ण भूतोंके सनातन पति हैं। सनातनोंके भी गो सनातन हैं । देवताओंके भी अधिपति और महामनस्वी । वे उस समय व्याघ्रचर्मकी बनी हुई विचित्र गाल और एक तलवार लेकर संग्रामभूमिकी ओर ले

अध्याय 235

श्लोक 19

क्षीरोदधिक्षोभसमुच्छ्रितानि पुरामृतादुत्तमभूषणानि ।देवासुराणां श्रमनिर्जितानि सोमार्कनक्षत्रतडित्प्रभाणि

kṣīrodadhikṣobhasamucchritāni purāmṛtāduttamabhūṣaṇāni | devāsurāṇāṃ śramanirjitāni somārkanakṣatrataḍitprabhāṇi

श्लोक 19–20 का हिन्दी अर्थ

पूर्वकालमें क्षीरसागरके मन्थनसे जिनका ाकट्य हुआ था, जो अमृतसे निकले थे तथा देवता गौर असुर दोनोंके परिश्रमसे उपलब्ध हुए थे, जिनकी भा चन्द्रमा, सूर्य, नक्षत्र और विद्युतके समान थी था जो सर्वोत्तम भूषण माने गये थे, उन मणिमय ण्डलोंको अदितिने युद्धके लिये प्रस्थित हुए वराज इन्द्रको दिया। उनसे भूषित होकर सहस्र- पचन इन्द्र दिशाओं और विदिशाओंको प्रकाशित रते हुए बड़ी शोभा पाने लगे

अध्याय 235

श्लोक 20

दत्तान्यदित्या मणिकुण्डलानि युद्धे प्रयातस्य सुरेश्वरस्य ।तैर्भूषितो भाति सहस्रचक्षु- रुद्योतयन् वै विदिशो दिशश्च

dattānyadityā maṇikuṇḍalāni yuddhe prayātasya sureśvarasya | tairbhūṣito bhāti sahasracakṣu- rudyotayan vai vidiśo diśaśca

अर्थ श्लोक 19 के साथ

अध्याय 235

श्लोक 21

हरिः प्रभुर्नेत्रसहस्रचित्रो विभाति युद्धाभिमुखः सुरेन्द्रः ।यया सितं शारदमभ्रकल्पं नभस्तलं ह्यृक्षसहस्रचित्रम्

hariḥ prabhurnetrasahasracitro vibhāti yuddhābhimukhaḥ surendraḥ | yayā sitaṃ śāradamabhrakalpaṃ nabhastalaṃ hyṛkṣasahasracitram

हिन्दी अर्थ

सर्वसमर्थ वराज इन्द्र युद्धके लिये उत्सुक हो सहस्र नेत्रोिंकी चित्र शोभा धारण किये ऐसे जान पड़ते थे नो शरद्‌ू-ऋतुका . मेघहीन स्वच्छ आकाश हस्त्रों नक्षत्रोंसे चितकबरा दिखायी देता हो

अध्याय 235

श्लोक 22

स्तुवन्ति यान्तं विपुलैर्वचोभि- र्जयाशिषा चोर्जितसत्त्ववीर्यम् ।अत्रिर्वसिष्ठो जमदग्निरूर्वो बृहस्पतिर्नारदपर्वतौ च

stuvanti yāntaṃ vipulairvacobhi- rjayāśiṣā corjitasattvavīryam | atrirvasiṣṭho jamadagnirūrvo bṛhaspatirnāradaparvatau ca

हिन्दी अर्थ

श११९ बढ़े हुए धर्म तथा बल-पराक्रमसे सम्पन्न इन्द्र जब युद्धके लिये चले, तब अत्रि, वसिष्ट, जमदग्नि, ऊर्व, बृहस्पति, नारद तथा पर्वत—ये ऋषि अपने विपुल वचनोंद्वारा उन्हें विजयके लिये आशीर्वाद देते हुए उनकी स्तुति करने लगे

अध्याय 235

श्लोक 23

तमन्वयुर्देवगणा महेन्द्रं प्रयान्तमादित्यसमानवर्चसम् ।विश्वे च देवा मरुतस्तथैव साध्यास्तथाऽऽदित्यगणाश्च सर्वे

tamanvayurdevagaṇā mahendraṃ prayāntamādityasamānavarcasam | viśve ca devā marutastathaiva sādhyāstathā''dityagaṇāśca sarve

हिन्दी अर्थ

सूर्यके समान तेजस्वी महेन्द्रको जाते देख उनके पीछे विश्वेदेव, मरुद्रण, साध्य, आदित्यगण तथा अन्य सब देवता भी चले

अध्याय 235

श्लोक 24

ते देवराजस्य पुरन्दरस्य हयाश्च ये मातलिसङ्गृहीताः ।प्रयान्ति देवेश्वरमुद्वहन्तो नभस्तलं पद्भिरिवाक्षिपन्तः

te devarājasya purandarasya hayāśca ye mātalisaṅgṛhītāḥ | prayānti deveśvaramudvahanto nabhastalaṃ padbhirivākṣipantaḥ

हिन्दी अर्थ

जिनकी रास मातलिने पकड़ रखी थी, वे देवराज इन्द्रके घोड़े देवेश्वरकी सवारी ढोते हुए आकाशको अपने पैरोंसे तिरस्कृत करते हुए-से तीव्र गतिसे आगे बढ़ने लगे

अध्याय 235

श्लोक 25

ब्रह्मर्षयश्चैव महर्षयश्च राजर्षयश्चाक्षयपुण्यलोकाः ।सर्वेऽनुजग्मुः सहसा ज्वलन्तं तेजोऽन्वितं शक्रममित्रसाहम्

brahmarṣayaścaiva maharṣayaśca rājarṣayaścākṣayapuṇyalokāḥ | sarve'nujagmuḥ sahasā jvalantaṃ tejo'nvitaṃ śakramamitrasāham

हिन्दी अर्थ

अक्षय पुण्य-लोकोंमें निवास करनेवाले ब्रह्मर्षि, महर्षि तथा राजर्षि-ये सब लोग सहसा तेजसे प्रज्वलित होने और शत्रुका सामना करनेवाले इन्द्रके पीछे-पीछे चल दिये

अध्याय 235

श्लोक 26

प्रगृह्य शूलांश्च परश्वधांश्च दीप्तानि चापान्यशनीर्विचित्राः ।वर्माणि चामुच्य हिरण्मयानि प्रयान्ति सूर्यांशुसमप्रभाणि

pragṛhya śūlāṃśca paraśvadhāṃśca dīptāni cāpānyaśanīrvicitrāḥ | varmāṇi cāmucya hiraṇmayāni prayānti sūryāṃśusamaprabhāṇi

हिन्दी अर्थ

वे हाथोंमें शूल, फरसे, दमकते हुए धनुष और विचित्र अशनि लेकर सूर्यके समान तेजस्वी सुवर्णमय कवच धारण करके युद्धके लिये आगे बढ़ने लगे

अध्याय 235

श्लोक 27

तथा कुबेरोऽश्वसहस्रयुक्तं श्रेष्ठं रथं सर्वसहं महार्हम् ।दिव्यं समारुह्य रणाय यातो धनेश्वरो दीप्तगदाग्रहस्तः

tathā kubero'śvasahasrayuktaṃ śreṣṭhaṃ rathaṃ sarvasahaṃ mahārham | divyaṃ samāruhya raṇāya yāto dhaneśvaro dīptagadāgrahastaḥ

हिन्दी अर्थ

इसी प्रकार धनेश्वर कुबेर सहस्र अश्वोंसे जुते हुए सब कुछ सहनेमें समर्थ बहुमूल्य एवं दिव्य उत्तम रथपर आरूढ़ हो युद्धके लिये चले, उनके हाथके अग्रभागमें दमकती हुई गदा शोभा पा रही थी

अध्याय 235

श्लोक 28

निशाचराः पावकधूमकाया रक्षोवृषा रुद्रसखस्य तस्य ।विशालनानायुधदीप्तहस्ता यान्त्यप्रतो वैश्रवणस्य राज्ञः

niśācarāḥ pāvakadhūmakāyā rakṣovṛṣā rudrasakhasya tasya | viśālanānāyudhadīptahastā yāntyaprato vaiśravaṇasya rājñaḥ

हिन्दी अर्थ

विश्रवाके पुत्र तथा रुद्रके सखा राजा कुबेरके आगे नाना प्रकारके विशाल आयुधोंसे चमकीले हाथवाले बहुत-से निशाचारी । राक्षसप्रवर जा रहे थे। उनके शरीर अग्नि और धूमके समान वर्णवाले थे

अध्याय 235

श्लोक 29

ते लोहिताक्षाः परिवार्य देवं व्रजन्ति भिन्नाञ्जनचूर्णवर्णाः ।यक्षोत्तमा यक्षपतिं धनेशं रक्षन्ति वै पाशगदासिदस्ताः

te lohitākṣāḥ parivārya devaṃ vrajanti bhinnāñjanacūrṇavarṇāḥ | yakṣottamā yakṣapatiṃ dhaneśaṃ rakṣanti vai pāśagadāsidastāḥ

हिन्दी अर्थ

जिनके शरीरकी कान्ति कटे हुए कोयलोंके चूर्णकी भाँति काली है, वे लाल नेत्रोंवाले यक्षशिरोमणि वीर हाथोंमें पाश, गदा और तलवार लिये यक्षराज धनेश्वरदेवको चारों ओरसे घेरकर उनकी रक्षा करते हैं

अध्याय 235

श्लोक 30

पुण्यः प्रभुः प्राणपतिर्जितात्मा वैवस्वतो धर्मभृतां वरिष्ठः ।तडिद्गणाभं शतवाजियुक्तं रथं समारोहत सूर्यकल्पम्

puṇyaḥ prabhuḥ prāṇapatirjitātmā vaivasvato dharmabhṛtāṃ variṣṭhaḥ | taḍidgaṇābhaṃ śatavājiyuktaṃ rathaṃ samārohata sūryakalpam

हिन्दी अर्थ

अपने मनको वशमें रखनेवाले, प्राणिमात्रके प्राणोंके अधिपति तथा धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ पुण्यात्सा प्रभु सूर्यपुत्र यम सौ घोड़ोंसे जुते हुए, विद्युद्रणोंसे प्रकाशित तथा सूर्कि समान तेजस्वी रथपर आरूढ़ हुए

अध्याय 235

श्लोक 31

तं लोकपालं पितरोऽनुजग्मु र्विविक्तपापा ज्वलितास्तपोभिः ।सर्वे च भूता भुवनप्रधाना नानायुधव्यग्रकराः सुभीमाः

taṃ lokapālaṃ pitaro'nujagmu rviviktapāpā jvalitāstapobhiḥ | sarve ca bhūtā bhuvanapradhānā nānāyudhavyagrakarāḥ subhīmāḥ

हिन्दी अर्थ

तपस्यासे प्रकाशित होनेवाले पापरहित पितृगणोंने उन लोकपाल यमका अनुसरण किया। तीनों लोकोंमें जो प्रधान-प्रधान भयंकर भूत थे, वे सब हाथोंमें नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्र लेकर उनके पीछे-पीछे चले

अध्याय 235

श्लोक 32

दण्डं महास्त्रं परिगृह्य देवो लोकाङ्कुशं निग्रहनिश्चितार्थम् ।हिरण्मयानां कमलोत्पलानां मालां मनोज्ञामवसज्य कण्ठे

daṇḍaṃ mahāstraṃ parigṛhya devo lokāṅkuśaṃ nigrahaniścitārtham | hiraṇmayānāṃ kamalotpalānāṃ mālāṃ manojñāmavasajya kaṇṭhe

हिन्दी अर्थ

समस्त जगत्पर अड्डुश (नियन्त्रण) रखनेवाले दण्ड नामक महान्‌ अस्त्रको, जो शत्रुओंका निश्चितरूपसे निग्रह करनेवाला था, हाथमें लेकर यमराजने अपने कण्ठमें सुवर्णमय कमलों और उत्पलोंकी मनोहर माला पहन ली थी

अध्याय 235

श्लोक 33

स्थितोऽस्थिमेदामिषलोहितार्द्रं सर्वासुराणां निधनं विरूपम् ।तेजोमयं मुद्गरमुग्ररूपं विकर्षमाणोऽरुणधूम्रनेत्रः

sthito'sthimedāmiṣalohitārdraṃ sarvāsurāṇāṃ nidhanaṃ virūpam | tejomayaṃ mudgaramugrarūpaṃ vikarṣamāṇo'ruṇadhūmranetraḥ

हिन्दी अर्थ

उनके नेत्र अरुण और धूम्रवर्णके थे। वे रथपर बैठकर अपने उस तेजोमय, भयंकर एवं विरूप पुद्ररको साथ लिये जा रहे थे, जो समस्त असुरोंके लिये कालरूप था और उनके मेद, मांस, अस्थि तथा क्तसे भीगा हुआ था

अध्याय 235

श्लोक 34

समन्वितो व्याधिशतैरनेकै- र्ययौ हरिश्मश्रुरुदारसत्त्वः ।महासुराणां निधनाय बुद्धिं चक्रे तदा व्याधिपतिः कृतान्तः

samanvito vyādhiśatairanekai- ryayau hariśmaśrurudārasattvaḥ | mahāsurāṇāṃ nidhanāya buddhiṃ cakre tadā vyādhipatiḥ kṛtāntaḥ

हिन्दी अर्थ

उनकी मूँछ काली या पीली थी। उनका अन्त:करण उदार था। रोग- याधियोंके स्वामी उन यमराजने नाना प्रकारकी पैकड़ों व्याधियोंको साथ लेकर बड़े-बड़े असुरोंके विनाशका निश्चय कर लिया था

अध्याय 235

श्लोक 35

ततस्त्रिशीर्षैर्भुजगैर्बृहद्भि- र्युक्तं रथं हेमचितं महात्मा ।आस्थाय कुन्देन्दुनिभं जलेशो ययौ रणायासुरदर्पहन्ता

tatastriśīrṣairbhujagairbṛhadbhi- ryuktaṃ rathaṃ hemacitaṃ mahātmā | āsthāya kundendunibhaṃ jaleśo yayau raṇāyāsuradarpahantā

हिन्दी अर्थ

तदनन्तर भसुरोंके दर्षका दमन करनेवाले जलके स्वामी महात्मा ररुण कुन्द और चन्द्रमाके समान उज्वल तथा पुवर्णजटित रथपर, जिसमें तीन सिरवाले विशालकाय र्प जुते हुए थे, आरूढ़ हो युद्धके लिये चले

अध्याय 235

श्लोक 36

वैदूर्यमुक्तामणिभूषिताङ्ग स्तेजोमयः पाशगृहीतहस्तः ।महासुराणां निधनाय देवः प्रयाति रूप्याङ्गदबद्धबाहुः

vaidūryamuktāmaṇibhūṣitāṅga stejomayaḥ pāśagṛhītahastaḥ | mahāsurāṇāṃ nidhanāya devaḥ prayāti rūpyāṅgadabaddhabāhuḥ

हिन्दी अर्थ

नके अज्ञ वैदूर्य, मुक्ता एवं मणियोंसे विभूषित पे, उनकी भुजाओंमें चाँदीके बाजूबंद बँधे हुए थे गौर उन्होंने अपने हाथमें पाश ले रखा था, इस कार वे तेजस्वी देवता वरुण उन महान्‌ असुरोंके वनाशके लिये समराड्णकी ओर प्रस्थित हुए

अध्याय 235

श्लोक 37

अन्वीयमानो जलदेवताभि- र्निषेच्यमाणो जलजैश्च सत्त्वैः ।संस्तूयमानश्च महर्षिवृन्दैः सम्पूज्यमानश्च महाभुजङ्गैः

anvīyamāno jaladevatābhi- rniṣecyamāṇo jalajaiśca sattvaiḥ | saṃstūyamānaśca maharṣivṛndaiḥ sampūjyamānaśca mahābhujaṅgaiḥ

हिन्दी अर्थ

पोडध्याय: + श्श२१ उस समय जलके अधिष्ठाता देवता उनका अनुसरण करते थे। जलमें उत्पन्न होनेवाले उनका अभिषेक कर रहे थे। महर्षियोंके समुदाय उनके गुण गा रहे थे और बड़े-बड़े भुजंग उनकी पूजामें लगे थे

अध्याय 235

श्लोक 38

कैलासशृङ्गप्रतिमोऽप्रमेयः समुद्रनाथोऽमृतपो महात्मा ।महोरगैः स्वैस्तनयैः सुगुप्तो ययौ रथेनार्कसमप्रभेण

kailāsaśṛṅgapratimo'prameyaḥ samudranātho'mṛtapo mahātmā | mahoragaiḥ svaistanayaiḥ sugupto yayau rathenārkasamaprabheṇa

हिन्दी अर्थ

पमुद्रके स्वामी तथा अमृतपान करनेवाले महात्मा तरुण कैलास-शिखरके समान गौरवर्णके थे। उनकी शक्ति अप्रमेय थी। उनके पुत्र और बड़े-बड़े नाग उनकी भलीभाँति रक्षा करते थे। वे सूर्यके समान गजस्वी रथसे चले

अध्याय 235

श्लोक 39

युद्धाय तं यान्तमदीनसत्त्वं नभस्तले चन्द्रमिवातिकान्तम् ।पश्यन्ति भूतानि महानुभावं संहृष्टरोमाणि कृताञ्जलीनि

yuddhāya taṃ yāntamadīnasattvaṃ nabhastale candramivātikāntam | paśyanti bhūtāni mahānubhāvaṃ saṃhṛṣṭaromāṇi kṛtāñjalīni

हिन्दी अर्थ

चन्द्रमाके समान अत्यन्त क्रान्तिमान्‌ और उदार हृदयवाले महानुभाव वरुण जब पुद्धके लिये जा रहे थे, उस समय आकाशमें समस्त प्राणी पुलकित-शरीरसे हाथ जोड़कर उनकी ओर देख हे थे

अध्याय 235

श्लोक 40

धातार्यमांशोऽथ भगो विवस्त्रान् पर्जन्यमित्रौ च शशी च देवः ।त्वष्टा तथैवोर्जितविश्वकर्मा पूषा च साक्षाद् दिवि देवराजः

dhātāryamāṃśo'tha bhago vivastrān parjanyamitrau ca śaśī ca devaḥ | tvaṣṭā tathaivorjitaviśvakarmā pūṣā ca sākṣād divi devarājaḥ

श्लोक 40–41 का हिन्दी अर्थ

धाता, अर्यमा, अंश, भग, विवस्वान्‌, र्जन्य, मित्र, चन्द्रदेव, त्वष्टा, तेजस्वी विश्वकर्मा, पूषा तथा साक्षात्‌ देवराज इन्द्र-ये सभी देवता भाकाशमें अच्छे घोड़ोंसे जुते हुए रथोंपर आरूढ़ थे। ते सभी घोड़े हृदयको आच्छादित करनेवाले कवचोंसे ुक्त थे। उनके गलेमें वैदूर्यमणिके पदक और सोनेके गार शोभा पाते थे। वे अश्व ध्वज और छोटी- छोटी घंटिकाओंसे युक्त थे। उन सबका रंग वही था, नो इन्द्रके रथमें जुते हुए घोड़ोंका था (इन्द्रके थमें हरे रंगके घोड़े जुते हुए थे)

अध्याय 235

श्लोक 41

सोरश्छदैः सध्वजकिङ्किणीकै- र्वैदूर्यनिष्कैश्चितहेमकण्ठैः ।हयैर्वरैः शक्ररथप्रकाशै- र्युक्तान् रथानारुरुहुः सुरास्ते

soraśchadaiḥ sadhvajakiṅkiṇīkai- rvaidūryaniṣkaiścitahemakaṇṭhaiḥ | hayairvaraiḥ śakrarathaprakāśai- ryuktān rathānāruruhuḥ surāste

अर्थ श्लोक 40 के साथ

अध्याय 235

श्लोक 42

दिवाकराकारनिभानि केचि- द्धुताशनार्चिः प्रतिमानि केचित् ।निशाकरांशुप्रतिमानि केचित् तडिद्गणोद्द्योतनिभानि केचित्

divākarākāranibhāni keci- ddhutāśanārciḥ pratimāni kecit | niśākarāṃśupratimāni kecit taḍidgaṇoddyotanibhāni kecit

श्लोक 42–47 का हिन्दी अर्थ

कुछ रवता सूर्यमण्डलके समान, कोई अग्निकी ज्वालाके पमान, कोई चन्द्रमाकी किरणोंके सदृश, कुछ देवता वद्युतकी प्रभाके समान, कुछ नीलवर्णवाले मेघोंके पदृश और कोई काले लोहेके समान महान्‌ प्रभापुझसे [के तथा उत्तम किरणोंसे उद्धासित दिव्य कवच गारण किये हुए थे, जिन्हें साक्षातू विश्वक्मनि ननाया था। जिनमें सुवर्णमय पुष्प गूँथे गये थे, ऐसी ालाएँ पहनकर जल और वायुके समान तीत्र गगवाले वे देवता रणभूमिकी ओर बढ़े जा रहे थे। प्में सबसे उत्तम तथा धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ दोनों शिविनीकुमार महानुभाव भी सुवर्णजटित रथपर गरूढ़ हो रणभूमिमें गये। उन दोनोंके शरीरकी कान्ति वर्णके तुल्य थी। मनुके पुत्र तथा समस्त वसु देवता ही उत्कट बलशाली और हाथोंमें उत्तम अस्त्र धारण रनेवाले थे, बड़े-बड़े रथों और हाथियों पर आरूढ़ हो त्योंका वध करनेके लिये चले। अरुण और धूमके मान वर्णवाले समस्त रुद्रगण, जो महाबली, सर्वगुणसम्पन्न और दीपिमान्‌ शरीरवाले थे तथा अपनी प्रभाओंसे ज्वलित-से हो रहे थे, श्वेतवर्णवाले विशाल वृषभोंद्वारा द्धभूमिमें गये । नाना प्रकारके आयुधों से युक्त हाथवाली जाओंसे वे समस्त लोकोंको दग्ध करते हुए-से जान ड्ते थे

अध्याय 235

श्लोक 43

नीलांशुमेघप्रतिमानि केचित् कार्ष्णायसाकारनिभानि केचित् ।वर्माणि दिव्यानि महाप्रभाणि त्वष्ट्रा कृतान्युत्तमभानुमन्ति

nīlāṃśumeghapratimāni kecit kārṣṇāyasākāranibhāni kecit | varmāṇi divyāni mahāprabhāṇi tvaṣṭrā kṛtānyuttamabhānumanti

अर्थ श्लोक 42 के साथ

अध्याय 235

श्लोक 44

आमुच्य मालाश्च सुवर्णपुष्पाः प्रयान्ति तोयानिलतुल्यवेगाः ।द्वावश्विनौ चैव महानुभावौ रूपोत्तमौ धर्मभृतां वरिष्ठौ

āmucya mālāśca suvarṇapuṣpāḥ prayānti toyānilatulyavegāḥ | dvāvaśvinau caiva mahānubhāvau rūpottamau dharmabhṛtāṃ variṣṭhau

अर्थ श्लोक 42 के साथ

अध्याय 235

श्लोक 45

रथं समारुह्य सुवर्णचित्रं रणं गतौ काञ्चनतुल्यवर्णौ ।मनोः सुता वै वसवश्च सर्वे बलोत्कटा दैत्यवधाय देवाः

rathaṃ samāruhya suvarṇacitraṃ raṇaṃ gatau kāñcanatulyavarṇau | manoḥ sutā vai vasavaśca sarve balotkaṭā daityavadhāya devāḥ

अर्थ श्लोक 42 के साथ

अध्याय 235

श्लोक 46

रथांश्च नागांश्च महाप्रमाणा- नास्थाय जग्मुः सुशुभास्त्रहस्ताः ।रुद्राश्च सर्वेऽरुणधूमवर्णाः श्वेतैर्ययुर्गोपतिभिर्बृहद्भिः

rathāṃśca nāgāṃśca mahāpramāṇā- nāsthāya jagmuḥ suśubhāstrahastāḥ | rudrāśca sarve'ruṇadhūmavarṇāḥ śvetairyayurgopatibhirbṛhadbhiḥ

अर्थ श्लोक 42 के साथ

अध्याय 235

श्लोक 47

महौजसः सर्वगुणोपपन्ना दीप्तात्न्मनो भाभिरिव ज्वलन्तः ।नानायुधव्यग्रकरैर्भुजैस्तै र्लोकान् समस्तानिव निर्दहन्तः

mahaujasaḥ sarvaguṇopapannā dīptātnmano bhābhiriva jvalantaḥ | nānāyudhavyagrakarairbhujaistai rlokān samastāniva nirdahantaḥ

अर्थ श्लोक 42 के साथ

अध्याय 235

श्लोक 48

ययुः ससैन्यास्तपनीयनद्धाः सविद्युतस्तोयधरा यथैव ।विश्वे च देवास्तपसा ज्वलन्तो वीर्योत्तमाः सूर्यमरीचिवर्णाः

yayuḥ sasainyāstapanīyanaddhāḥ savidyutastoyadharā yathaiva | viśve ca devāstapasā jvalanto vīryottamāḥ sūryamarīcivarṇāḥ

श्लोक 48–50 का हिन्दी अर्थ

सुवर्णमय कवच बाँधकर सेनाको पथ लिये जब वे आगे बढ़े, उस समय बिजलियोंसे क्त मेघोंके समान शोभा पाने लगे। सूर्यकी किरणोंके मान कान्तिमान्‌, उत्तम बलशाली तथा तपस्याके तेजसे काशित होनेवाले विश्वेदेवगण भी सेना साथ लेकर द्धके लिये चले । शत्रुओंके लिये उनके वेगको रोकना ठिन था। वे उत्कट बलशाली तथा सहस्त्र कमलोंकी पालाओंसे अलंकृत थे। सोनेके समान कान्तिवाले तथा दूर्य, मुक्ता और मणियोंकी लड़ियोंसे विचित्र शोभा पनेवाले, भलीभाँति जुते हुए रथोंद्वारा वे सब लोग प्रमरभूमिमें गये। वे नाना प्रकारकी आकृतियोंसे युक्त पे। उनके ऊपर सुवर्णनिर्मित, मनोहर, विचित्र, अत्यन्त नर्मल, तेजस्वी और सब ओर घूमनेवाले श्वेत छत्र तने हुए थे। जिनके कारण वे सब लोग प्रज्वलित अग्निके पमान प्रकाशित हो रहे थे

अध्याय 235

श्लोक 49

ययुः ससैन्या युधि दुर्निवार्या बलोत्कटाः पद्मसहस्रमालाः ।रथैः सुयुक्तैस्तपनीयवर्णै- र्वैदूर्यमुक्तामणिदामचित्रैः

yayuḥ sasainyā yudhi durnivāryā balotkaṭāḥ padmasahasramālāḥ | rathaiḥ suyuktaistapanīyavarṇai- rvaidūryamuktāmaṇidāmacitraiḥ

अर्थ श्लोक 48 के साथ

अध्याय 235

श्लोक 50

नानाविधाकारसमाकुलास्ते पारिप्लवैश्चैव सितातपत्रैः ।तेजोमयैः काञ्चनचारुचित्रैः सुनिर्मलैः पावकसन्निभास्ते

nānāvidhākārasamākulāste pāriplavaiścaiva sitātapatraiḥ | tejomayaiḥ kāñcanacārucitraiḥ sunirmalaiḥ pāvakasannibhāste

अर्थ श्लोक 48 के साथ

अध्याय 235

श्लोक 51

सोरश्छदैः सध्वजकिङ्किणीकै- र्हयैश्च वायोः समवेगवद्भिः ।दिशां गजैश्चैव महाबलैस्तैः कैलासशृङ्गप्रतिमैर्महद्भिः

soraśchadaiḥ sadhvajakiṅkiṇīkai- rhayaiśca vāyoḥ samavegavadbhiḥ | diśāṃ gajaiścaiva mahābalaistaiḥ kailāsaśṛṅgapratimairmahadbhiḥ

श्लोक 51–53 का हिन्दी अर्थ

कवच, ध्वज भर घुँघुरुओंसे युक्त वायुके समान वेगशाली घोड़ों तथा कैलासशिखरके समान उज्जवल, विशालकाय एवं महाबली दिग्गजोंद्वारा वे यात्रा कर रहे थे। उनके डाथोंमें भयंकर धनुष थे, जिनसे वे युगान्तकालमें ्रज्वलित होनेवाली उल्काओंके समान प्रतीत होते थे। श्श्२्३ महान्‌ प्रभावशाली साध्यदेवता सारी सेनाको अपने अधीन करके युद्धके लिये जा रहे थे। उनके मुख दिव्य दीसिसे उद्दीत हो रहे थे। उन्होंने अपने अज्ञोंको जाम्बूनदके आभूषणोंसे विभूषित कर रखा था। उनके साथ गड़ाके जलप्रवाह और आकाशके समान अनन्त एवं असंख्य सैनिक थे। विजयी वीरोंमें श्रेष्ठ वे महाबली साध्यगण अपने तेजसे समस्त दिशाओं और विदिशाओंको प्रकाशित कर रहे थे

अध्याय 235

श्लोक 52

प्रजग्मुरुग्रायुधचापहस्ता- श्चतुर्युगान्ते ज्वलिता इवोल्काः ।साध्याश्च देवाः सुमहाप्रभावाः स्वाधीनचक्राः प्रतिदीप्तवक्त्राः

prajagmurugrāyudhacāpahastā- ścaturyugānte jvalitā ivolkāḥ | sādhyāśca devāḥ sumahāprabhāvāḥ svādhīnacakrāḥ pratidīptavaktrāḥ

अर्थ श्लोक 51 के साथ

अध्याय 235

श्लोक 53

प्रयान्ति जाम्बूनदभूषिताङ्गा गाङ्गौघमात्रैर्गगनैर्बलौघैः ।विद्योतयन्तो विदिशो दिशश्च महाबलास्ते जयतां वरिष्ठाः

prayānti jāmbūnadabhūṣitāṅgā gāṅgaughamātrairgaganairbalaughaiḥ | vidyotayanto vidiśo diśaśca mahābalāste jayatāṃ variṣṭhāḥ

अर्थ श्लोक 51 के साथ

अध्याय 235

श्लोक 54

वरिष्ठपुष्टाष्टभुजाः सुदृप्ता वैश्वानरार्कप्रतिमप्रभावाः ।ते ब्रह्मविद्भिश्च नमस्यमानाः सम्पूज्यमानाश्च सुरैः सशक्रैः

variṣṭhapuṣṭāṣṭabhujāḥ sudṛptā vaiśvānarārkapratimaprabhāvāḥ | te brahmavidbhiśca namasyamānāḥ sampūjyamānāśca suraiḥ saśakraiḥ

श्लोक 54–58 का हिन्दी अर्थ

उनके आठ भुजाएँ थीं, जो श्रेष्ठ एवं पुष्ठ थीं। उन्हें अपने बलपर गर्व था। वे अग्नि एवं सूर्यके समान प्रभावशाली थे। ब्रह्मवेत्ता पुरुष उन्हें नमस्कार करते थे। इन्द्रसहित सम्पूर्ण देवता उनकी पूजा करते थे तथा दैत्येश्वरोंका वध करनेके लिये जाते हुए उन साध्यगणोंके पीछे गन्धरवोंके समुदाय चलते थे। वैदूर्य, हीरे और स्फटिकमणिसे जटित होनेके कारण विचित्र शोभा पानेवाले ध्वजों और सुवर्णमय आभूषणोंसे जिनकी सुन्दर शोभा होती थी, जो उत्कट आभूषण पहने हुए थे तथा दैत्येन्द्रोंकें विनाशके लिये ही जिन्होंने अपनेको विभूषित किया था, उन साध्य देवताओंका रूप वहाँ अद्भुत शोभा पा रहा था। युद्धके लिये उत्कट प्रतीत होनेवाली अपने शरीरकी प्रभा, अन्धकारको दूर करनेवाली कवचोंकी प्रभा, ध्वजसे उत्पन्न होनेवाली आभा तथा अपने बाणसमूहोंसे उदत हुई प्रचुर प्रभा—इन सबके योगसे प्रकाशित होनेवाली परम उज्चल महाप्रभाओंसे वे साध्यगणों सहित श्रेष्ठ देवता बड़ी शोभा पा रहे थे। वे महाबली देवता अपने विशाल रथोंपर बैठकर शब्भुध्वनि और सिंहनाद करते हुए शत्रुसेनाकी ओर बढ़ने लगे। उनके हाथोंमें बड़े-बड़े अस्त्र थे। उनकी काया भयंकर थी; वे देवता उन महादैत्योंका संहार करनेके लिये चल दिये

अध्याय 235

श्लोक 55

गन्धर्वसङ्घैरनुगम्यमाना वधाय तेषामसुराधिपानाम् ।वैदूर्यवज्रस्फटिकाग्रचित्रै- र्ध्वजैः सुवर्णैश्च परिष्कृतानाम्

gandharvasaṅghairanugamyamānā vadhāya teṣāmasurādhipānām | vaidūryavajrasphaṭikāgracitrai- rdhvajaiḥ suvarṇaiśca pariṣkṛtānām

अर्थ श्लोक 54 के साथ

अध्याय 235

श्लोक 56

रूपं बभौ चोत्कटभूषणानां दैत्येन्द्रनाशाय विभूषितानाम् ।आत्मप्रभाभिश्च रणोत्कटाभि- र्वर्मप्रभाभिश्च तमोनुदाभिः

rūpaṃ babhau cotkaṭabhūṣaṇānāṃ daityendranāśāya vibhūṣitānām | ātmaprabhābhiśca raṇotkaṭābhi- rvarmaprabhābhiśca tamonudābhiḥ

अर्थ श्लोक 54 के साथ

अध्याय 235

श्लोक 57

ध्वजोत्थभाभिः स्वशरोरुभाभि- र्महाप्रभाभिश्च महोज्ज्वलाभिः ।विभान्ति ते देववराः ससाध्याः प्रध्मातशङ्खस्वनसिंहनादाः

dhvajotthabhābhiḥ svaśarorubhābhi- rmahāprabhābhiśca mahojjvalābhiḥ | vibhānti te devavarāḥ sasādhyāḥ pradhmātaśaṅkhasvanasiṃhanādāḥ

अर्थ श्लोक 54 के साथ

अध्याय 235

श्लोक 58

महारथस्थास्त्रिदिवौकसस्ते महाबलाः शत्रुबलं प्रयान्ति ।महास्त्रहस्ता ययुरुग्रकाया महासुराणां निधनाय देवाः

mahārathasthāstridivaukasaste mahābalāḥ śatrubalaṃ prayānti | mahāstrahastā yayurugrakāyā mahāsurāṇāṃ nidhanāya devāḥ

अर्थ श्लोक 54 के साथ

अध्याय 235

श्लोक 59

तथैव सर्वे मरुतोऽतिवीर्या बलोत्कटास्ते समरं प्रतीताः ।ययुर्महामेघसमानवर्णा- श्चक्रायुधास्तोयदनादनादाः

tathaiva sarve maruto'tivīryā balotkaṭāste samaraṃ pratītāḥ | yayurmahāmeghasamānavarṇā- ścakrāyudhāstoyadanādanādāḥ

हिन्दी अर्थ

इसी प्रकार अत्यन्त पराक्रमी और उत्कट बलशाली समस्त मरुदण, जो महान्‌ मेघके मान श्याम वर्णवाले तथा चक्रधारी थे, मेघकी भाँति जना करते हुए विजयका दृढ़ विश्वास लिये मरभूमिकी ओर चले

अध्याय 235

श्लोक 60

महेन्द्रकेतुप्रतिमा महाबलाः प्रगृह्य सर्वासुरसूदनां गदाम् ।रणोत्कटा लोहितचन्दनाक्ताः सहेममाल्याम्बरभूषिताङ्गाः

mahendraketupratimā mahābalāḥ pragṛhya sarvāsurasūdanāṃ gadām | raṇotkaṭā lohitacandanāktāḥ sahemamālyāmbarabhūṣitāṅgāḥ

हिन्दी अर्थ

वे इन्द्रके ध्वजस्वरूप रावतके समान महान्‌ बलवानू्‌ थे । युद्धमें उन्मत्त होकर ड्नेवाले थे। उनके सारे अद्ध लाल चन्दनसे चर्चित था सोनेके हार और दिव्य वस्त्रिंसे विभूषित थे । उन्होंने मस्त असुरोंका संहार करनेवाली गदा लेकर युद्धके नये यात्रा की थी

अध्याय 235

श्लोक 61

ते युद्धशौण्डाः सभुजास्त्रवीर्या बलोत्कटाः क्रोधविलोहिताक्षाः ।ययुः सजाम्बूनदपद्ममाला यथेष्टनानाविधकामरूपाः

te yuddhaśauṇḍāḥ sabhujāstravīryā balotkaṭāḥ krodhavilohitākṣāḥ | yayuḥ sajāmbūnadapadmamālā yatheṣṭanānāvidhakāmarūpāḥ

श्लोक 61–64 का हिन्दी अर्थ

वे सब-के-सब युद्धमें शल थे। उनमें बाहुबल और अस्त्रबलकी पूर्णता थी। उत्कट बलशाली थे। उनकी आँखें क्रोधसे लाल हो डी थीं। वे देवता सुवर्ण तथा कमलोंकी माला धारण रके इच्छानुसार नाना प्रकारके रूप धारण किये वराज इन्द्रको चारों ओरसे घेरकर रणभूमिकी ओर जा है थे। उनके कंधे और पीठ खड्गोंकी प्रभासे साँवले र्खायी देते थे। शत्रुओंका वेग सहन करनेमें समर्थ वे वता अपने अज़्ोंमें वैदूर्य और सुवर्णसे जटित होनेके गरण मनोहररूपवाले परम कान्तिमान्‌ कवचोंको, जो त्योंके अस्त्रोंका निवारण करनेवाले थे, बाँधकर युद्धके नये जा रहे थे। सोनेकी वेदिकाओंसे युक्त और सूर्यकी करणोंके समान कान्तिमान्‌ ऊँचे उठे हुए श्रेष्ठ ध्वजोंसे पलक्षित होनेवाली देवताओंकी वह भयंकर सेना द्धके लिये जोर-जोरसे सिंहनाद करती हुई जा रही ही। इस प्रकार उन असुरेश्वरोंके वधके लिये [द्स्थलकी ओर प्रस्थित हुए विजयशाली देवेश्वर न्द्रकी वह सेना बड़ी प्रभावशालिनी थी। जिसका इस पमें वर्णन किया गया है

अध्याय 235

श्लोक 62

खड्गप्रभाश्यामलितांसपीठाः पुरन्दरं वै परिवार्य देवाः ।वैदूर्यचामीकरचारुरूपा- ण्याबध्य गात्रेषु महाप्रभाणि

khaḍgaprabhāśyāmalitāṃsapīṭhāḥ purandaraṃ vai parivārya devāḥ | vaidūryacāmīkaracārurūpā- ṇyābadhya gātreṣu mahāprabhāṇi

अर्थ श्लोक 61 के साथ

अध्याय 235

श्लोक 63

वर्माणि दैत्यास्त्रनिवारणानि प्रयान्ति युद्धाय सपत्नसाहाः ।तैरुत्थितैः काञ्चनवेदिकाढ्यै- र्वरध्वजैर्भास्कररश्मिवर्णैः

varmāṇi daityāstranivāraṇāni prayānti yuddhāya sapatnasāhāḥ | tairutthitaiḥ kāñcanavedikāḍhyai- rvaradhvajairbhāskararaśmivarṇaiḥ

अर्थ श्लोक 61 के साथ

अध्याय 235

श्लोक 64

ययौ सुराणां पृतनोग्रभासा समुन्नदन्ती युधि सिंहनादान् ।इत्येवमुक्तं त्रिदिवेश्वरस्य सैन्यं तदासीत् सुमहत्प्रभावम्

yayau surāṇāṃ pṛtanograbhāsā samunnadantī yudhi siṃhanādān | ityevamuktaṃ tridiveśvarasya sainyaṃ tadāsīt sumahatprabhāvam

अर्थ श्लोक 61 के साथ

अध्याय 235

श्लोक 65

युद्धं प्रयातस्य जयावहस्य वधाय तेषामसुराधिपानाम्

yuddhaṃ prayātasya jayāvahasya vadhāya teṣāmasurādhipānām

अर्थ श्लोक 61 के साथ

स्रोत: local proofread transcription: Sanskrit shlokas of the Harivamsa (Harivamsha, Vishnu and Bhavishya parvas) from sanskritdocuments.org. One chapter per adhyaya; verse numbers as printed in the source (restarting in each adhyaya). Appendix sections are not included. · प्राप्त 19/10/2026

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शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पाठ-भेद एवं संशोधनVariants & corrections

पाठ-भेद टिप्पणी (Alternative Reading / Variant Notes):

Collated with BORI Critical Edition of Mahabharata Khilaparvan.