Harivamsha Purana
233
अध्याय 233 / 318

Parva 3, Adhyāya 50

28 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ28 श्लोक

अध्याय 233

श्लोक 1

पुलोमा तु महादैत्यस्तिमिराकारगह्वरम् ।आरुरोहायसं घोरं रथं पररथारुजम्

pulomā tu mahādaityastimirākāragahvaram | ārurohāyasaṃ ghoraṃ rathaṃ pararathārujam

हिन्दी अर्थ

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! पुलोमा नामक महादैत्य घनीभूत अंधकारके समान रंगवाले लोहेके बने हुए भयंकर रथपर आरूढ़ हुआ। वह रथ शत्रुओंके रथोंको नष्ट करनेवाला था

अध्याय 233

श्लोक 2

उत्कीर्णपर्वताकारं लोहजालान्तरान्तरम् ।नेमिघोषेण महता क्षुभ्यन्तमिव सागरम्

utkīrṇaparvatākāraṃ lohajālāntarāntaram | nemighoṣeṇa mahatā kṣubhyantamiva sāgaram

हिन्दी अर्थ

खण्डित होकर पृथ्वीपर गिरे हुए पर्वतके समान उसका विशाल आकार था, उसका भीतरी भाग लोहेकी जालसे आवृत था तथा अपने पहियोंके महान्‌ घोषसे वह समुद्रमें भी क्षोभ- सा उत्पन्न कर देता था

अध्याय 233

श्लोक 3

गदापरिघनिस्त्रिंशैः सतोमरपरश्वधैः ।शक्तिमुद्गरसङ्कीर्णं सतोयमिव तोयदम्

gadāparighanistriṃśaiḥ satomaraparaśvadhaiḥ | śaktimudgarasaṅkīrṇaṃ satoyamiva toyadam

हिन्दी अर्थ

गदा, परिघ, खड्ग, तोमर, फरसे, शक्ति और मुद्रर आदि अस्त्र-शस्त्रोंसे भरा होनेके कारण वह रथ सजल जलधरके समान प्रतीत होता था

अध्याय 233

श्लोक 4

रथमुष्ट्रसहस्रेण संयुक्तं वायुवेगिना ।पुलोमाऽऽरुह्य युद्धाय प्रस्थितो युद्धदुर्मदः

rathamuṣṭrasahasreṇa saṃyuktaṃ vāyuveginā | pulomā''ruhya yuddhāya prasthito yuddhadurmadaḥ

हिन्दी अर्थ

उसमें वायुके समान वेगशाली एक सहख्र ऊँट जुते हुए थे, रणदुर्मद पुलोमा उसी रथपर आरूढ़ हो युद्धके लिये प्रस्थित हुआ

अध्याय 233

श्लोक 5

षष्टी रथसहस्राणि पुलोमानं महारथम् ।अन्वयुः सूर्यवर्णानि प्रदीप्तानीव तेजसा

ṣaṣṭī rathasahasrāṇi pulomānaṃ mahāratham | anvayuḥ sūryavarṇāni pradīptānīva tejasā

हिन्दी अर्थ

अपने तेजसे सूर्यके समान उद्धासित होनेवाले साठ हजार रथ महारथी पुलोमाके पीछे-पीछे चले

अध्याय 233

श्लोक 6

खड्गध्वजेन महता तप्तकाञ्चनवर्चसा ।भ्राजते रथमध्यस्थः पर्वतस्य इवांशुमान्

khaḍgadhvajena mahatā taptakāñcanavarcasā | bhrājate rathamadhyasthaḥ parvatasya ivāṃśumān

हिन्दी अर्थ

पुलोमाका रथ तपाये हुए सुवर्णके समान कान्तिवाले खड्गचिहित विशाल ध्वजसे सुशोभित होता था, रथके भीतर बैठा हुआ पुलोमा उदयगिरिपर विराजमान अंशुमाली सूर्यके समान जान पड़ता था

अध्याय 233

श्लोक 7

सुचारुचामीकरपट्टनद्धां महागदां कालनिभां महाबलः ।प्रगृह्य बभ्राज स शत्रुमध्ये कार्ष्णायसीं केतुरिवास्थितोर्व्याम्

sucārucāmīkarapaṭṭanaddhāṃ mahāgadāṃ kālanibhāṃ mahābalaḥ | pragṛhya babhrāja sa śatrumadhye kārṣṇāyasīṃ keturivāsthitorvyām

हिन्दी अर्थ

वह महाबली योद्धा वहाँ शत्रुओंके बीच काले लोहेकी बनी हुई कालसदूृश विशाल गदा हाथमें लेकर पृथ्वीपर खड़े किये गये ध्वजके समान शोभा पाता था, उसकी उस गदापर सुन्दर सुवर्णके पत्र मँढ़े हुए थे

अध्याय 233

श्लोक 8

हयग्रीवस्तु बलवान् हयग्रीवैर्महासुरैः ।वृतः शतसहस्रेण रथानां रथिसत्तमः

hayagrīvastu balavān hayagrīvairmahāsuraiḥ | vṛtaḥ śatasahasreṇa rathānāṃ rathisattamaḥ

हिन्दी अर्थ

रथियोंमें श्रेष्ठ बलवान्‌ हयग्रीव घोड़ेके समान गर्दनवाले बड़े-बड़े असुरोंके साथ एक लाख रथियोंसे घिरा हुआ युद्धके लिये आया

अध्याय 233

श्लोक 9

धराधरनिभाकारं सपत्नानीकमर्दनम् ।स्यन्दनं भीममास्थाय युद्धायाभिमुखः स्थितः

dharādharanibhākāraṃ sapatnānīkamardanam | syandanaṃ bhīmamāsthāya yuddhāyābhimukhaḥ sthitaḥ

हिन्दी अर्थ

उसके रथका आकार मेघके समान भयंकर था, वह शत्रुओंकी सेनाका मर्दन करनेवाला था, उसीपर आरूढ़ होकर वह युद्धके लिये उद्यत होकर सामने खड़ा था

अध्याय 233

श्लोक 10

श्वेतशैलप्रतीकाशः श्वेतकुण्डलभूषणः ।शुशुभे रथमध्यस्थः श्वेतशृङ्ग इवाचलः

śvetaśailapratīkāśaḥ śvetakuṇḍalabhūṣaṇaḥ | śuśubhe rathamadhyasthaḥ śvetaśṛṅga ivācalaḥ

हिन्दी अर्थ

वह श्वेत पर्वतके समान कान्तिमान्‌ और श्वेत कुण्डलॉंसे विभूषित हो रथके भीतर बैठकर श्वेत शिखरवाले शैलके समान शोभा पाता था

अध्याय 233

श्लोक 11

महता सप्तशीर्षेण शोभितो नागकेतुना ।वैदूर्यमणिचित्रेण प्रवालाङ्कुरशोभिना

mahatā saptaśīrṣeṇa śobhito nāgaketunā | vaidūryamaṇicitreṇa pravālāṅkuraśobhinā

हिन्दी अर्थ

सात फनवाले सर्पसे चिह्नित विशाल ध्वज, जो वैूर्यमणिसे जटित होनेके कारण विचित्र जान पड़ता था तथा नये- नये पल्लवोंके अंकुरोंसे अलंकृत था, हयग्रीवके रथकी शोभा बढ़ा रहा था

अध्याय 233

श्लोक 12

अमितबलपराक्रमाकृतीनां वररथिनामनुजग्मुरूर्जितानाम् ।असुरगणशतानि गच्छमानं त्रिदशगणा इव वासवं प्रयान्तम्

amitabalaparākramākṛtīnāṃ vararathināmanujagmurūrjitānām | asuragaṇaśatāni gacchamānaṃ tridaśagaṇā iva vāsavaṃ prayāntam

हिन्दी अर्थ

जैसे यात्रा करते हुए इन्द्रके पीछे देवताओंके समुदाय चलते हैं, उसी प्रकार युद्धके लिये जाते हुए हयग्रीवके पीछे अनन्त बल-पराक्रमसे सम्पन्न शरीरवाले ओजस्वी श्रेष्ठ रथी असुर सैकड़ोंकी संख्यामें चले

अध्याय 233

श्लोक 13

प्रह्रादस्तु महाप्राज्ञः सर्वशास्त्रविशारदः ।सर्वमायाधरः श्रीमान् यष्टा क्रतुशतैरपि

prahrādastu mahāprājñaḥ sarvaśāstraviśāradaḥ | sarvamāyādharaḥ śrīmān yaṣṭā kratuśatairapi

हिन्दी अर्थ

महाज्ञानी तथा सम्पूर्ण शास्त्रोंमें निपुण विद्वान्‌ श्रीमान्‌ प्रह्माद सम्पूर्ण मायाओंको धारण करनेवाले थे, वे सैकड़ों यज्ञोंका अनुष्ठान कर चुके थे

अध्याय 233

श्लोक 14

समनह्यत तेजस्वी पावकार्चिःसमप्रभः ।रथानीकेन महता दुर्दिनाम्भोदनादिना

samanahyata tejasvī pāvakārciḥsamaprabhaḥ | rathānīkena mahatā durdināmbhodanādinā

हिन्दी अर्थ

उनकी कान्ति अग्निकी ज्वालाके समान प्रकाशित होती थी, वे बड़े तेजस्वी थे, वे भी वर्षकालके मेघकी भाँति गम्भीर घोष करनेवाले विशाल रथ-सेनाको साथ लेकर युद्धके लिये तैयार हो गये

अध्याय 233

श्लोक 15

शूरेणामितवीर्येण हेमकुण्डलधारिणा ।वृतो दैत्यसहस्रेण देवैरिव पितामहः

śūreṇāmitavīryeṇa hemakuṇḍaladhāriṇā | vṛto daityasahasreṇa devairiva pitāmahaḥ

हिन्दी अर्थ

देवताओंसे घिरे हुए ब्रह्माजीके समान प्रह्माद सोनेके कुण्डल धारण करनेवाले सहस्रों अमित पराक्रमी शूरवीर दैत्योंसे घिरे हुए थे

अध्याय 233

श्लोक 164

स्ववीर्यादग्रणीर्दृप्तो मत्तवारणविक्रमः ।सुरसैन्यस्य सर्वस्य प्रतिक्षोभ इव स्थितः

svavīryādagraṇīrdṛpto mattavāraṇavikramaḥ | surasainyasya sarvasya pratikṣobha iva sthitaḥ

अध्याय 233

श्लोक 17

स्ववीर्येणोदधेस्तुल्यः प्रदीप्ताग्निरिव ज्वलन् ।तेजसा भास्कराकारः क्षमया पृथिवीसमः

svavīryeṇodadhestulyaḥ pradīptāgniriva jvalan | tejasā bhāskarākāraḥ kṣamayā pṛthivīsamaḥ

हिन्दी अर्थ

अपने अगाध बलसे वे समुद्रके समान थे, कान्तिसे प्रज्वलित अग्निकी भाँति प्रकाशित हो रहे थे, तेजसे सूर्यके तुल्य और क्षमासे पृथ्वीके समान जान पड़ते थे

अध्याय 233

श्लोक 18

तालध्वजेन दीप्तेन रथेनातिविराजता ।तं यान्तमनुयान्ति स्म दानवाः शतसङ्घशः

tāladhvajena dīptena rathenātivirājatā | taṃ yāntamanuyānti sma dānavāḥ śatasaṅghaśaḥ

हिन्दी अर्थ

दीतिमान्‌ तालध्वजसे अत्यन्त सुशोभित होनेवाले रथके द्वारा युद्धकी ओर जाते हुए प्रह्मादके पीछे सैकड़ों दानवोंके समूह चलते थे

अध्याय 233

श्लोक 19

सर्वे हिरण्यकवचाः सर्वे रत्नविभूषिताः ।दिव्याङ्गरागाभरणाः समरेष्वनिवर्तिनः

sarve hiraṇyakavacāḥ sarve ratnavibhūṣitāḥ | divyāṅgarāgābharaṇāḥ samareṣvanivartinaḥ

हिन्दी अर्थ

वे सब-के-सब सुवर्णमय कवचसे युक्त तथा रत्नोंके आभूषणोंसे विभूषित थे, उनके अद्धराग और आभूषण दिव्य थे तथा वे युद्धसे कभी पीछे नहीं हटते थे

अध्याय 233

श्लोक 20

जाम्बूनदविचित्राङ्गा वैदूर्यविकृताङ्गदाः ।दिव्यस्यन्दनमध्यस्थाः खस्था इव महाग्रहाः

jāmbūnadavicitrāṅgā vaidūryavikṛtāṅgadāḥ | divyasyandanamadhyasthāḥ khasthā iva mahāgrahāḥ

हिन्दी अर्थ

जाम्बूनद नामक सुवर्णसे उनके अज्ञोंकी विचित्र शोभा होती थी। वे वैदूर्यमणिके बने हुए बाजूबंद धारण करते थे तथा दिव्य रथके अंदर बैठकर आकाशमें स्थित हुए महान्‌ ग्रहोंके समान सुशोभित होते थे

अध्याय 233

श्लोक 21

आचारवांश्चैव जितेन्द्रियश्च धर्मे रतः सत्यपरोऽनसूयः ।स्थितोऽग्नितोयाम्बुदवायुकल्पो रूपी यथा सर्वहरः कृतान्तः

ācāravāṃścaiva jitendriyaśca dharme rataḥ satyaparo'nasūyaḥ | sthito'gnitoyāmbudavāyukalpo rūpī yathā sarvaharaḥ kṛtāntaḥ

हिन्दी अर्थ

प्रह्माद आचारवान्‌, जितेन्द्रिय, धर्मतत्पर, सत्यपरायण तथा दोषदृष्टिसे रहित थे। वे अग्नि, जल, मेघ और वायुके समान शक्तिशाली थे तथा मूर्तिमान्‌ सर्वसंहारकारी कालके समान वहाँ युद्धके लिये खड़े थे

अध्याय 233

श्लोक 22

शम्बरस्तु महामायो रथयूथपयूथपः ।आरुरोह रथं दिव्यं सर्वयुद्धविशारदः

śambarastu mahāmāyo rathayūthapayūthapaḥ | āruroha rathaṃ divyaṃ sarvayuddhaviśāradaḥ

हिन्दी अर्थ

महामायावी शम्बर रथ-यूथपतियोंका भी यूथपति था, सब प्रकारके युद्धकी कलामें कुशल था। वह भी दिव्य (थपर आरूढ़ हुआ

अध्याय 233

श्लोक 23

लोहिताक्षो महाबाहुः प्रतप्तोत्तमकुण्डलः ।जीमूतघनसङ्काशो श्यियस्रगनुलेपनः

lohitākṣo mahābāhuḥ prataptottamakuṇḍalaḥ | jīmūtaghanasaṅkāśo śyiyasraganulepanaḥ

हिन्दी अर्थ

उसके नेत्र लाल थे, भुजाएँ बड़ी -बड़ी थीं, कानोंमें तपाये हुए सोनेके उत्तम कुण्डल शोभा पाते थे, उसकी कान्ति मेघके समान श्याम थी, तरह दिव्य हार और दिव्य अनुलेपन धारण करता था

अध्याय 233

श्लोक 24

विद्युज्ज्योतिर्निकाशेन मुकुटेनार्कवर्चसा ।मणिरत्नविचित्रेण वैदूर्यवरशोभिना

vidyujjyotirnikāśena mukuṭenārkavarcasā | maṇiratnavicitreṇa vaidūryavaraśobhinā

श्लोक 24–25 का हिन्दी अर्थ

उसके मस्तकपर विद्युतकी ज्योति तथा पूर्वक तेजके समान प्रकाशमान मुकुट था, उससे तथा मणि और रल्लोंसे जटित सुन्दर वैदूर्यमणिसे सुशोभित, पुवर्णनिर्मित शोभाशाली विशाल कवचसे ढका हुआ राम्बरासुर संध्याकालके लाल बादलोंसे आच्छादित श्रीमानू अस्ताचलके समान जान पड़ता था

अध्याय 233

श्लोक 25

तपनीयेन महता कवचेन विराजता ।सन्ध्याभ्रेणेव सञ्च्छन्नः श्रीमानस्तशिलोच्चयः

tapanīyena mahatā kavacena virājatā | sandhyābhreṇeva sañcchannaḥ śrīmānastaśiloccayaḥ

अर्थ श्लोक 24 के साथ

अध्याय 233

श्लोक 26

त्रिंशच्छतसहस्राणि दैत्यानां चित्रयोधिनाम् ।बलिनां कालकल्पानामन्वयु शम्बरं तदा

triṃśacchatasahasrāṇi daityānāṃ citrayodhinām | balināṃ kālakalpānāmanvayu śambaraṃ tadā

हिन्दी अर्थ

उस समय विचित्र रीतिसे युद्ध करनेवाले तथा कालके परमान बलवान्‌ तीस लाख दैत्य शम्बरासुरके पीछे- पीछे चलते थे

अध्याय 233

श्लोक 27

युक्तं हयसहस्रेण शुक्लवर्णेन राजता ।क्रौञ्चध्वजेन दीप्तेन रथेनाहवशोभिना

yuktaṃ hayasahasreṇa śuklavarṇena rājatā | krauñcadhvajena dīptena rathenāhavaśobhinā

हिन्दी अर्थ

उसके रथमें श्वेत रंगके एक सहस्र सुन्दर घोड़े जुते हुए थे। युद्धमें शोभा पानेवाला तह रथ क्रौज्नके चिह्से युक्त विशाल ध्वजसे सुशोभित था। (ऐसे रथके द्वारा वह युद्धके लिये आया था)

अध्याय 233

श्लोक 28

व्यासक्तवैदूर्यसुवर्णजालं नानाविहङ्गैरपि भक्तिचित्रम् ।विद्युत्प्रभं भीमरवं सुवेगं रथं समारुह्य रराज दैत्यः

vyāsaktavaidūryasuvarṇajālaṃ nānāvihaṅgairapi bhakticitram | vidyutprabhaṃ bhīmaravaṃ suvegaṃ rathaṃ samāruhya rarāja daityaḥ

हिन्दी अर्थ

उस रथमें वैदूर्यमणि और सुवर्णकी जाली लगी हुई थी, नाना प्रकारके पक्षियोंके पृथक्‌-पृथकू चित्र बने डुए थे, वह रथ विद्युतके समान कान्तिमान्‌ था, उससे मयंकर शब्द होता रहता था। उस उत्तम वेगशाली रथपर भारूढ़ हो वह दैत्य बड़ी शोभा पा रहा था

स्रोत: local proofread transcription: Sanskrit shlokas of the Harivamsa (Harivamsha, Vishnu and Bhavishya parvas) from sanskritdocuments.org. One chapter per adhyaya; verse numbers as printed in the source (restarting in each adhyaya). Appendix sections are not included. · प्राप्त 19/10/2026

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स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

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6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
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अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

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