Harivamsha Purana
229
अध्याय 229 / 318

Parva 3, Adhyāya 46

76 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ76 श्लोक

अध्याय 229

श्लोक 1

दैत्यानां विनाशसूचकाः महान्ति उत्पातानि, हिरण्यकशिपुना गदामादाय आक्रमणम्, तस्य पादानां धमनात् पृथ्वी, पर्वत, नदी एवं देशानां कम्पनं ततः सर्वासु मायासु हतासु दितिनन्दनाः ।हिरण्यकशिपुं सर्वे विषण्णाः शरणं गताः

daityānāṃ vināśasūcakāḥ mahānti utpātāni, hiraṇyakaśipunā gadāmādāya ākramaṇam, tasya pādānāṃ dhamanāt pṛthvī, parvata, nadī evaṃ deśānāṃ kampanaṃ tataḥ sarvāsu māyāsu hatāsu ditinandanāḥ | hiraṇyakaśipuṃ sarve viṣaṇṇāḥ śaraṇaṃ gatāḥ

हिन्दी अर्थ

बैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! जब दैत्योंकी सारी मायाएँ नष्ट हो गयीं, तब सब-के-सब खिन्न होकर हिरण्यकशिपुकी शरणमें गये

अध्याय 229

श्लोक 2

ततः प्रज्वलितः क्रोधात् प्रदहन्निव तेजसा ।हिरण्यकशिपुर्दैत्यश्चालयामास मेदिनीम्

tataḥ prajvalitaḥ krodhāt pradahanniva tejasā | hiraṇyakaśipurdaityaścālayāmāsa medinīm

हिन्दी अर्थ

तब दैत्य हिरण्यकशिपुने क्रोधसे प्रज्वलित हो पृथ्वीको तेजसे दग्ध-सा करता हुआ उसे कम्पित कर दिया

अध्याय 229

श्लोक 3

ततः प्रक्षुभिताः सर्वे सागराः सलिलाकराः ।चलिता गिरयः सर्वे सकाननवनद्रुमाः

tataḥ prakṣubhitāḥ sarve sāgarāḥ salilākarāḥ | calitā girayaḥ sarve sakānanavanadrumāḥ

हिन्दी अर्थ

फिर तो सारे समुद्र और जलाशय शक्षुब्ध हो गये। वन, कानन और वृक्षॉंसहित परमस्त पर्वत हिलने लगे

अध्याय 229

श्लोक 4

तस्मिन् क्रुद्धे तु दैत्येन्द्रे तमोभूतमभूज्जगत् ।तमसा समभूच्छन्नं न प्राज्ञायत किञ्चन

tasmin kruddhe tu daityendre tamobhūtamabhūjjagat | tamasā samabhūcchannaṃ na prājñāyata kiñcana

हिन्दी अर्थ

दैत्यराज हिरण्यकशिपुके कुपित होनेपर सारा जगतू अन्धकारमय हो गया। भन्धकारसे आच्छादित हो जानेके कारण किसी भी स्तुका ज्ञान नहीं होता था

अध्याय 229

श्लोक 5

आवहः प्रवहश्चैव विवहश्च समीरणः ।परावहः संवहश्च उद्वहश्च महाबलः

āvahaḥ pravahaścaiva vivahaśca samīraṇaḥ | parāvahaḥ saṃvahaśca udvahaśca mahābalaḥ

श्लोक 5–6 का हिन्दी अर्थ

आवह, प्रवह, विवह, गरावह, संवह, महाबली उद्दह तथा श्रीमान्‌ परिवह—मे सात आकाशचारी समीर क्षुब्थ होकर भयकी सूचना ने लगे

अध्याय 229

श्लोक 6

तथा परिवहः श्रीमान् मारुता भयशंसिनः ।इत्येते क्षुभिताः सप्त मारुता गगनेचराः

tathā parivahaḥ śrīmān mārutā bhayaśaṃsinaḥ | ityete kṣubhitāḥ sapta mārutā gaganecarāḥ

अर्थ श्लोक 5 के साथ

अध्याय 229

श्लोक 7

ये ग्रहाः सर्वलोकस्य क्षये प्रादुर्भवन्ति वै ।ते ग्रहा गगने हृष्टा विचरन्ति यथासुखम्

ye grahāḥ sarvalokasya kṣaye prādurbhavanti vai | te grahā gagane hṛṣṭā vicaranti yathāsukham

हिन्दी अर्थ

जो ग्रह सम्पूर्ण जगत्‌का संहार होनेके पमय प्रकट होते हैं, वे ही उस समय आकाशमें उदित गो बड़े हर्ष और सुखसे विचर रहे थे

अध्याय 229

श्लोक 8

अयोगतश्चात्यचरद् योगं दिवि निशाकरः ।सग्रहं सहनक्षत्रं प्रजज्वाल नभो नृप

ayogataścātyacarad yogaṃ divi niśākaraḥ | sagrahaṃ sahanakṣatraṃ prajajvāla nabho nṛpa

हिन्दी अर्थ

चन्द्रमा भाकाशमें नियत योगके बिना ही अतिचारगतिसे दूरवर्ती क्षत्रोंके साथ भी संयुक्त होने लगे। नरेश्वर ! ग्रहों और क्षेत्रोंसे सारा आकाश जल उठा

अध्याय 229

श्लोक 9

विवर्णत्वं च भगवान् गतो दिवि दिवाकरः ।कृष्णः कबन्धश्च महाँल्लक्ष्यते च नभस्तले

vivarṇatvaṃ ca bhagavān gato divi divākaraḥ | kṛṣṇaḥ kabandhaśca mahā~llakṣyate ca nabhastale

हिन्दी अर्थ

सूर्यदेव आकाशभें गीहीन-से हो गये। व्योममण्डलमें काले रंगका महान्‌ ठबन्ध दृष्टिगोचर होने लगा

अध्याय 229

श्लोक 10

अमुञ्चच्चासितां सूर्यो धूमवर्तिं भयावहाम् ।गगनस्थश्च भगवानभीक्ष्णं परितप्यते

amuñcaccāsitāṃ sūryo dhūmavartiṃ bhayāvahām | gaganasthaśca bhagavānabhīkṣṇaṃ paritapyate

हिन्दी अर्थ

सूर्यदेव काले रंगकी [मकी भयंकर बत्ती छोड़ने लगे। आकाशमें स्थित हुए गगवान्‌ सूर्य बहुत अधिक तपने और तपाने लगे

अध्याय 229

श्लोक 11

सप्तधूमनिभा घोराः सूर्या दिवि समुत्थिताः ।सोमस्य गगनस्थस्य ग्रहास्तिष्ठन्ति शृङ्गगाः

saptadhūmanibhā ghorāḥ sūryā divi samutthitāḥ | somasya gaganasthasya grahāstiṣṭhanti śṛṅgagāḥ

हिन्दी अर्थ

[एँके समान रंगवाले सात भयंकर सूर्य आकाशमें उदित गये और व्योममण्डलमें स्थित हुए सोमके श्रुज्पर तत ग्रह स्थित हो गये

अध्याय 229

श्लोक 12

वामे च दक्षिणे चैव स्थितौ शुक्रबृहस्पती ।शनैश्चरो लोहिताङ्गो लोहितार्कसमद्युतिः

vāme ca dakṣiṇe caiva sthitau śukrabṛhaspatī | śanaiścaro lohitāṅgo lohitārkasamadyutiḥ

हिन्दी अर्थ

सोमके बायें भागमें शुक्र और दायें भागमें बृहस्पति स्थित हुए। शनैश्चर और तत:कालके अरुण वर्णवाले सूर्यके समान कान्तिमान्‌ गल भी क्रमश: बायें-दायें स्थित हो गये

अध्याय 229

श्लोक 13

समं समभिरोहन्ति दुर्गाणि गगनेचराः ।शृङ्गाणि कनकैर्घोरा युगान्तावर्तका ग्रहाः

samaṃ samabhirohanti durgāṇi gaganecarāḥ | śṛṅgāṇi kanakairghorā yugāntāvartakā grahāḥ

हिन्दी अर्थ

लयकालकी आवृत्ति करनेवाले भयंकर आकाशचारी ह मेरु पर्वतके सुवर्णनिर्मित दुर्गम शिखरोंपर एक साथ ारोहण करने लगे

अध्याय 229

श्लोक 14

चन्द्रमाः सह नक्षत्रैर्ग्रहैः सप्तभिरावृतः ।चराचरविनाशार्थं रोहिणीं नाभ्यनन्दत

candramāḥ saha nakṣatrairgrahaiḥ saptabhirāvṛtaḥ | carācaravināśārthaṃ rohiṇīṃ nābhyanandata

हिन्दी अर्थ

तर, मोक्षधर्मपर्व अध्याय ३२८ के श्लोक ३६ से ५२ तक नक्षत्रोंके साथ चन्द्रमा सात ग्रहोंसे आवृत हो चराचर पाणियों के विनाशके लिये रोहिणीका अभिनन्दन नहीं करते थे

अध्याय 229

श्लोक 15

गृहीतो राहुणा चन्द्र उल्काभिरभिहन्यते ।उल्काः प्रज्वलिताश्चन्द्रे प्रचेलुर्घोरदर्शनाः

gṛhīto rāhuṇā candra ulkābhirabhihanyate | ulkāḥ prajvalitāścandre pracelurghoradarśanāḥ

हिन्दी अर्थ

राहुसे ग्रस्त हुए चन्द्रमा उल्काओंसे भाहत होने लगे। भयंकर दिखायी देनेवाली प्रज्वलित इल्‍्काएँ चन्द्रमण्डलकी ओर जाने लगीं

अध्याय 229

श्लोक 16

देवानामपि यो देवः सोऽभ्यवर्षत शोणितम् ।अपतन् गगनादुल्का विद्युद्रूपाः सनिःस्वनाः

devānāmapi yo devaḥ so'bhyavarṣata śoṇitam | apatan gaganādulkā vidyudrūpāḥ saniḥsvanāḥ

हिन्दी अर्थ

जो रेवताओंके भी देवता हैं, वे इन्द्र रक्तकी वर्षा करने नगे। आकाशसे भयंकर शब्दके साथ विद्युन्मयी उल्काएँ गरने लगीं

अध्याय 229

श्लोक 17

अकाले पादपाः सर्वे पुष्यन्ति च फलन्ति च ।लताश्च सफलाः सर्वा याः प्राहुर्दैत्यनाशनम्

akāle pādapāḥ sarve puṣyanti ca phalanti ca | latāśca saphalāḥ sarvā yāḥ prāhurdaityanāśanam

हिन्दी अर्थ

सभी वृक्ष असमयमें फूलने-फलने लगे, समस्त लताएँ फलोंसे लद गयीं, जो दैत्योंके विनाशकी सूचना दे रही थीं

अध्याय 229

श्लोक 18

फले फलान्यजायन्त पुष्पे पुष्पं तथैव च ।उन्मीलन्ति निमीलन्ति हसन्ति च रुदन्ति च

phale phalānyajāyanta puṣpe puṣpaṃ tathaiva ca | unmīlanti nimīlanti hasanti ca rudanti ca

श्लोक 18–19 का हिन्दी अर्थ

फलमें फल और फूलमें फूल उत्पन्न होने लगे। समस्त देवताओंकी प्रतिमाएँ आँखें खोलने-मीचने लगीं, हँसने-रोने लगीं, वे उच्च स्वरसे चीत्कार कर उठती थीं, कभी धुँआ छोड़तीं, कभी प्रज्वलित होने लगती थीं, इस प्रकार वे प्रलयकी सूचना दे रही थीं

अध्याय 229

श्लोक 19

विक्रोशन्ति च गम्भीरं धूमयन्ति ज्वलन्ति च ।प्रतिमाः सर्वदेवानां कथयन्ति युगक्षयम्

vikrośanti ca gambhīraṃ dhūmayanti jvalanti ca | pratimāḥ sarvadevānāṃ kathayanti yugakṣayam

अर्थ श्लोक 18 के साथ

अध्याय 229

श्लोक 20

आरण्यैः सह संसृष्टा ग्राम्याश्च मृगपक्षिणः ।चुक्रुशुर्भैरवं तत्र मृगेन्द्रे समुपस्थिते

āraṇyaiḥ saha saṃsṛṣṭā grāmyāśca mṛgapakṣiṇaḥ | cukruśurbhairavaṃ tatra mṛgendre samupasthite

हिन्दी अर्थ

ग्रामीण पशु- पक्षी जंगली पशु-पक्षियोंके साथ संसर्ग (मैथुन) करने लगे। वहाँ भगवान्‌ नरसिंहके उपस्थित होनेपर वे सभी पशु-पक्षी भैरव-रवमें आर्तनाद करने लगे

अध्याय 229

श्लोक 21

नद्यश्च प्रतिलोमा हि वहन्ति कलुषोदकाः ।अपराह्णगते सूर्ये लोकानां क्षयकारके

nadyaśca pratilomā hi vahanti kaluṣodakāḥ | aparāhṇagate sūrye lokānāṃ kṣayakārake

हिन्दी अर्थ

नदियाँ उलटी दिशाकी ओर बहने लगीं। उनके जल गँदले हो गये। उस समय सम्पूर्ण लोकोंके विनाशकी सूचना देते हुए सूर्यदेव अपराह्ककालमें आ पहुँचे थे

अध्याय 229

श्लोक 22

न प्रकाशन्ति च दिशो रक्तरेणुसमाकुलाः ।वानस्पत्या न पूज्यन्ते पूजनार्हाः कथञ्चन

na prakāśanti ca diśo raktareṇusamākulāḥ | vānaspatyā na pūjyante pūjanārhāḥ kathañcana

हिन्दी अर्थ

दिशाएँ लाल रंगकी धूलसे भर रही थीं, अतः प्रकाशित नहीं होती थीं। पूजनीय चैत्य देवताओंकी किसी तरह पूजा नहीं होती थी

अध्याय 229

श्लोक 23

वायुवेगेन हन्यन्ते भिद्यन्ते प्रणुदन्ति च ।तदा च सर्वभूतानां छाया न परिवर्तते

vāyuvegena hanyante bhidyante praṇudanti ca | tadā ca sarvabhūtānāṃ chāyā na parivartate

श्लोक 23–26 का हिन्दी अर्थ

वे चैत्य वृक्ष वायुके वेगसे छिन्न-भिन्न तथा कम्पित होते रहते थे। उस समय सूर्य अपराह्ककालमें स्थित थे और लोकोंका प्रलय-सा उपस्थित था। उस अवस्थामें सूर्यकी प्रभा हीन हो जानेसे किसी भी प्राणीकी छाया (परछाईं) नहीं पड़ रही थी। हिरण्यकशिपु दैत्यके महलके ऊपर तथा उसके भण्डारगृह और शस्त्रागारमें मधुकी मव्खियोंने मधुका छाता लगा रखा था। इसी तरह उसके आयुधागारमें धूममाला उठती दिखायी दी। हिरण्यकशिपुने उस समय उन बड़े- बड़े उत्पातोंको देखकर अपने पुरोहित शुक्राचार्यसे कहा—

अध्याय 229

श्लोक 24

अपराह्णगते सूर्ये लोकानां च युगक्षये ।तदा हिरण्यकशिपोर्दैत्यस्योपरिवेश्मनः

aparāhṇagate sūrye lokānāṃ ca yugakṣaye | tadā hiraṇyakaśipordaityasyopariveśmanaḥ

अर्थ श्लोक 23 के साथ

अध्याय 229

श्लोक 25

भाण्डागारायुधागारे निविष्टमभवन्मधु ।तथैव चायुधागारे धूमराजिरदृश्यत

bhāṇḍāgārāyudhāgāre niviṣṭamabhavanmadhu | tathaiva cāyudhāgāre dhūmarājiradṛśyata

अर्थ श्लोक 23 के साथ

अध्याय 229

श्लोक 26

स च दृष्ट्वा महोत्पातान् हिरण्यकशिपुस्तदा ।पुरोहितं तदा शुक्रं वचनं चेदमब्रवीत्

sa ca dṛṣṭvā mahotpātān hiraṇyakaśipustadā | purohitaṃ tadā śukraṃ vacanaṃ cedamabravīt

अर्थ श्लोक 23 के साथ

अध्याय 229

श्लोक 27

किमर्थं भगवन्नेते महोत्पाताः समुत्थिताः ।श्रोतुमिच्छामि तत्त्वेन परं कौतूहलं हि मे

kimarthaṃ bhagavannete mahotpātāḥ samutthitāḥ | śrotumicchāmi tattvena paraṃ kautūhalaṃ hi me

हिन्दी अर्थ

भगवन्‌! ये बड़े-बड़े उत्पात किसलिये प्रकट हो रहे हैं, मैं ठीक-ठीक इनका कारण सुनना चाहता हूँ। इसके लिये मेरे मनमें बड़ा कौतूहल है'

अध्याय 229

श्लोक 28

शृणु राजन्नवहितो वचनं मे महासुर ।यदर्थमिह दृश्यन्ते महोत्पाता महाभयाः

śṛṇu rājannavahito vacanaṃ me mahāsura | yadarthamiha dṛśyante mahotpātā mahābhayāḥ

हिन्दी अर्थ

श्०९१ शुक्र बोले—राजन्‌! महासुर! तुम ध्यान देकर मेरी तत सुनो। ये महान्‌ भयदायक बड़े-बड़े उत्पात यहाँ जस निमित्तसे दिखायी देते हैं, वह बताता हूँ, [नो

अध्याय 229

श्लोक 29

यस्यैते सम्प्रदृश्यन्ते राज्ञो राष्ट्रे महासुर ।देशो वा ह्रियते तस्य राजा वा वधमर्हति

yasyaite sampradṛśyante rājño rāṣṭre mahāsura | deśo vā hriyate tasya rājā vā vadhamarhati

हिन्दी अर्थ

महासुर ! जिस राजाके राज्यमें ये उत्पात ष्रिगोचर होते हैं, उसका राज्य छिन जाता है अथवा वह जा ही मारा जाता है

अध्याय 229

श्लोक 30

अतो बुद्धया समीक्षस्व यथा सर्वं प्रणश्यति ।वृहद्भयं हि नचिराद् भविष्यति न संशयः

ato buddhayā samīkṣasva yathā sarvaṃ praṇaśyati | vṛhadbhayaṃ hi nacirād bhaviṣyati na saṃśayaḥ

हिन्दी अर्थ

अतः: तुम बुद्धिसे लीभाँति विचार करो, जिससे सारा उत्पात नष्ट हो ाय, अन्यथा शीघ्र ही महान्‌ भय प्रात होगा, इसमें शय नहीं है

अध्याय 229

श्लोक 31

एतावदुक्त्वा शुक्रस्तु हिरण्यकशिपुं तदा ।स्वस्तीत्युक्त्वा तु दैन्येन्द्रं जगाम स्वं निवेशनम्

etāvaduktvā śukrastu hiraṇyakaśipuṃ tadā | svastītyuktvā tu dainyendraṃ jagāma svaṃ niveśanam

हिन्दी अर्थ

उस समय दैत्यराज हिरण्यकशिपुसे तना ही कहकर शुक्राचार्य ' तुम्हारा कल्याण हो' ऐसा हते हुए अपने घरको चले गये

अध्याय 229

श्लोक 32

तस्मिन्गते स दैत्येन्द्रो ध्यातवान् सुचिरं तदा ।आसाञ्चक्रे सुदीनात्मा ब्रह्मवाक्यमनुस्मरन्

tasmingate sa daityendro dhyātavān suciraṃ tadā | āsāñcakre sudīnātmā brahmavākyamanusmaran

हिन्दी अर्थ

उनके चले [निपर वह दैत्यराज बहुत देरतक चिन्तामग्र बैठा रहा। स॒ब्राह्मणके वाक्यका बास्म्बार स्मरण करके वह दैत्य न-ही-मन बहुत दुःखी हो गया था

अध्याय 229

श्लोक 33

असुराणां विनाशाय सुराणां विजयाय च ।दृश्यन्ते विविधोत्पाता घोरा घोरनिदर्शनाः

asurāṇāṃ vināśāya surāṇāṃ vijayāya ca | dṛśyante vividhotpātā ghorā ghoranidarśanāḥ

हिन्दी अर्थ

असुरोंके नाश और देवताओंकी विजयके लिये नाना प्रकारके यंकर उत्पात दिखायी देते थे; जो देखनेमें भी बड़े यानक थे

अध्याय 229

श्लोक 34

एते चान्ये च बहवो घोरा ह्युत्पातदर्शनाः ।दैत्येन्द्राणां विनाशाय दृश्यन्ते कालनिर्मिताः

ete cānye ca bahavo ghorā hyutpātadarśanāḥ | daityendrāṇāṃ vināśāya dṛśyante kālanirmitāḥ

हिन्दी अर्थ

ये तथा और भी बहुत-से घोर त्यात जो साक्षात्‌ कालके द्वारा निर्मित थे, दैत्यराजाओंके नाशके लिये दृष्टिगोचर हो रहे थे

अध्याय 229

श्लोक 35

ततो हिरण्यकशिपुर्गदामादाय सत्वरम् ।अभ्यद्रवत वेगेन धरणीमनुकम्पयन्

tato hiraṇyakaśipurgadāmādāya satvaram | abhyadravata vegena dharaṇīmanukampayan

हिन्दी अर्थ

तदनन्तर रण्यकशिपु तुरंत ही हाथमें गदा लेकर पृथ्वीको रम्बार कम्पित करता हुआ बड़े वेगसे दौड़ा

अध्याय 229

श्लोक 36

हिरण्यकशिपुर्दैत्यो पदा सस्पृष्टवान् महीम् ।सन्दष्टौष्ठपुटः क्रोधाद् वराह इव पूर्वजः

hiraṇyakaśipurdaityo padā saspṛṣṭavān mahīm | sandaṣṭauṣṭhapuṭaḥ krodhād varāha iva pūrvajaḥ

हिन्दी अर्थ

य हिरण्यकशिपुने रोषसे ओठको दाँतों तले दबाकर गवान्‌ आदिवाराहकी भाँति अपने पैरसे पृथ्वीका स्पर्श या

अध्याय 229

श्लोक 37

मेदिन्यां कम्प्यमानायां दैत्येन्द्रेण महात्मना ।महीधरेभ्यो नागेन्द्रा निपेतुर्भयविक्लवाः

medinyāṃ kampyamānāyāṃ daityendreṇa mahātmanā | mahīdharebhyo nāgendrā nipeturbhayaviklavāḥ

हिन्दी अर्थ

उस महाकाय दैत्यराजके द्वारा जब रम्बार पृथ्वी कँपायी जाने लगी, तब भयसे व्याकुल ए बहुत-से नागराज पर्वतोंसे नीचे गिरने लगे

अध्याय 229

श्लोक 38

विषज्वालाकुलैर्वक्त्रैविम्मुञ्चन्तो हुताशनम् ।चतुःशीर्षाः पञ्चशीर्षाः सप्तशीर्षाश्च पन्नगाः

viṣajvālākulairvaktraivimmuñcanto hutāśanam | catuḥśīrṣāḥ pañcaśīrṣāḥ saptaśīrṣāśca pannagāḥ

हिन्दी अर्थ

विषकी ज्वालासे व्याप्त हुए मुखोंद्वारा आग उगल रहे । उनमेंसे किन्हींके चार, किन्हींके पाँच और किन्हींके त फन थे

अध्याय 229

श्लोक 39

वासुकिस्तक्षकश्चैव कर्कोटकधनञ्जयौ ।एलापत्रश्च कालीयो महापद्मश्च वीर्यवान् ।सहस्रशीर्षधृङ्नागो हेमतालध्वजः प्रभुः

vāsukistakṣakaścaiva karkoṭakadhanañjayau | elāpatraśca kālīyo mahāpadmaśca vīryavān | sahasraśīrṣadhṛṅnāgo hematāladhvajaḥ prabhuḥ

श्लोक 39–46 का हिन्दी अर्थ

वासुकि, तक्षक, कर्कोटक, धनझ्य, नापत्र, कालिय, पराक्रमी महापद्य तथा सहस्र फन रण करनेवाले, सुवर्णमय तालध्वजसे सुशोभित, तरसमर्थ पृथ्वीपालक भगवान्‌ अनन्त शेषनाग भी, न्हें कँंपाना बहुत ही कठिन था, कम्पित हो उठे। लके भीतर रहनेवाले जो तेजस्वी भूधर (दिग्गज दि) थे, उन्हें भी उस समय कुपित हुए उस यने सब ओरसे कम्पित कर दिया। पातालतलमें चरने और नागोंके. तेजको धारण करनेवाले ल्याणकारी सुन्दर सुस्वादु जल, जिनके रसको चलित करना बहुत ही कठिन था, सहसा क्षुब्ध हो गये। भागीरथी नदी, सरयू, कौशिकी (कोशी), यमुना, काबेरी, कृष्णा, वेणा, महाभागा सुवेणा, गोदावरी नदी, चर्मण्वती, सिन्धु, नदों और नदियोंका अधिपति समुद्र, मिकल पर्वतसे प्रकट हुआ और मणिके समान स्वच्छ जलवाला शोणभद्रनद, सुन्दर स््रोतवाली नर्मदा नदी, वेत्रवती नदी, गौओंके समुदायसे व्याप्त गोमती नदी, अपूर्ण जलवाली सरस्वती नदी, मही कालनदी, पतित्र जल बहानेवाली तमसा, सीता, इक्षुमती, देविका और महानदी—इन सबको उस दैत्यने विश्षुब्ध कर दिया

अध्याय 229

श्लोक 40

शेषोऽनन्तो महीपालो दुष्प्रकम्पः प्रकम्पितः ।दीप्तान्यन्तर्जलस्थानि पृथिवीधरणानि च

śeṣo'nanto mahīpālo duṣprakampaḥ prakampitaḥ | dīptānyantarjalasthāni pṛthivīdharaṇāni ca

अर्थ श्लोक 39 के साथ

अध्याय 229

श्लोक 41

तदा क्रुद्धेन दैत्येन कम्पितानि समन्ततः ।पातालतलचारिण्यो नागतेजोधराः शिवाः

tadā kruddhena daityena kampitāni samantataḥ | pātālatalacāriṇyo nāgatejodharāḥ śivāḥ

अर्थ श्लोक 39 के साथ

अध्याय 229

श्लोक 42

आपश्च सहसा क्रुद्धा दुष्प्रकम्प्यरसाः शुभाः ।नदी भागीरथी चैव सरयूः कौशिकी तथा

āpaśca sahasā kruddhā duṣprakampyarasāḥ śubhāḥ | nadī bhāgīrathī caiva sarayūḥ kauśikī tathā

अर्थ श्लोक 39 के साथ

अध्याय 229

श्लोक 43

यमुना चैव कावेरी कृष्णा वेणा तथैव च ।सुवेणा च महाभागा नदी गोदावरी तथा

yamunā caiva kāverī kṛṣṇā veṇā tathaiva ca | suveṇā ca mahābhāgā nadī godāvarī tathā

अर्थ श्लोक 39 के साथ

अध्याय 229

श्लोक 44

चर्मण्वती च सिन्धुश्च तथा नदनदीपतिः ।मेकलप्रभवश्चैव शोणो मणिनिभोदकः

carmaṇvatī ca sindhuśca tathā nadanadīpatiḥ | mekalaprabhavaścaiva śoṇo maṇinibhodakaḥ

अर्थ श्लोक 39 के साथ

अध्याय 229

श्लोक 45

सुस्रोता नर्मदा चैव तथा वेत्रवती नदी ।गोमती गोकुलाकीर्णा तथापूर्णा सरस्वती

susrotā narmadā caiva tathā vetravatī nadī | gomatī gokulākīrṇā tathāpūrṇā sarasvatī

अर्थ श्लोक 39 के साथ

अध्याय 229

श्लोक 46

मही कालनदी चैव तमसा पुण्यवाहिनी ।सीता चेक्षुमती चैव देविका च महानदी

mahī kālanadī caiva tamasā puṇyavāhinī | sītā cekṣumatī caiva devikā ca mahānadī

अर्थ श्लोक 39 के साथ

अध्याय 229

श्लोक 47

जम्बूद्वीपं रत्नवन्तं सर्वरत्नोपशोभितम् ।सुवर्णकूटकं चैव सुवर्णाकरमण्डितम्

jambūdvīpaṃ ratnavantaṃ sarvaratnopaśobhitam | suvarṇakūṭakaṃ caiva suvarṇākaramaṇḍitam

हिन्दी अर्थ

सम्पूर्ण रत्लोंसे सुशोभित रत्रवान्‌ जम्बूद्ीपको और सोनेकी खानोंसे युक्त स्वर्णकूटक नामक देशको भी उसने कम्पित कर दिया

अध्याय 229

श्लोक 48

महानदश्च लौहित्यः शैलकाननशोभितः ।पत्तनं कौशिकारण्यं द्रविडं रजताकरम्

mahānadaśca lauhityaḥ śailakānanaśobhitaḥ | pattanaṃ kauśikāraṇyaṃ draviḍaṃ rajatākaram

श्लोक 48–50 का हिन्दी अर्थ

पर्वतों और काननोंसे सुशोभित लौहित्य नामक महानद, कौशिकारण्य नामक पत्तन (नगर या प्रान्त), चाँदीकी खानोंसे युक्त द्रविड़ देश, बड़े-बड़े ग्रामवाले मगध, अडज्भ, वड्भ, सुह्म, मल्ल, विदेह, मालव, काशी और कौशल देशोंको तथा जिसे विश्वकर्माने बनाया था और जो कैलाश पर्वतके शिखरकी भाँति सुशोभित होता था, गरुड़के उस स्वर्णनिर्मित भवनको भी उस दैत्यने कम्पित कर दिया

अध्याय 229

श्लोक 49

मागधांश्च महाग्रामानङ्गान् वङ्गांस्तथैव च ।सुह्यान् मल्लान् विदेहांश्च मालवान् काशिकोसलान्

māgadhāṃśca mahāgrāmānaṅgān vaṅgāṃstathaiva ca | suhyān mallān videhāṃśca mālavān kāśikosalān

अर्थ श्लोक 48 के साथ

अध्याय 229

श्लोक 50

भवनं वैनतेयस्य सुवर्णस्य च कम्पितम् ।कैलासशिखराकारं यत् कृतं विश्वकर्मणा

bhavanaṃ vainateyasya suvarṇasya ca kampitam | kailāsaśikharākāraṃ yat kṛtaṃ viśvakarmaṇā

अर्थ श्लोक 48 के साथ

अध्याय 229

श्लोक 51

रक्ततोयो भीमवेगो लौहित्यो नाम सागरः ।शुभः पाण्डुरमेघाभः क्षीरोदश्चैव सागरः

raktatoyo bhīmavego lauhityo nāma sāgaraḥ | śubhaḥ pāṇḍurameghābhaḥ kṣīrodaścaiva sāgaraḥ

हिन्दी अर्थ

जिसका जल लाल तथा वेग भयंकर है, उस लौहित्य नामक सागरको और थ्रेत बादलोंके समान सुन्दर एवं स्वच्छ क्षीरसमुद्रको भी उसने विचलित कर दिये

अध्याय 229

श्लोक 52

उदयश्चैव राजेन्द्र उच्छ्रितः शतयोजनम् ।सुपर्णवेदिकः श्रीमान् नागपक्षिनिषेवितः

udayaścaiva rājendra ucchritaḥ śatayojanam | suparṇavedikaḥ śrīmān nāgapakṣiniṣevitaḥ

श्लोक 52–53 का हिन्दी अर्थ

राजेन्द्र ! उदयगिरि सौ योजन ऊँचा है, उसपर सोनेकी वेदियाँ बनी हुई हैं, वह शोभाशाली पर्वत नागों और पक्षियोंसे सेवित है। सूर्यके सदूृश तेजस्वी स्वर्णमय वृक्ष साल, ताल, तमाल आदि जो फूलोंके भारसे लदे रहते हैं, उदयगिरिकी शोभा बढ़ाते हैं। कर्णिकाएँ भी उस पर्वतकी श्रीवृद्धि करती हैं (ऐसा उदयाचल भी उस दैत्यके पैरोंकी धमकसे कम्पित हो गया)

अध्याय 229

श्लोक 53

भ्राजमानोऽर्कसहृशैर्जातरूपमयैर्दुमैः ।शालैस्तालैस्तमालैश्च कर्णिकाभिश्च पुष्पितैः

bhrājamāno'rkasahṛśairjātarūpamayairdumaiḥ | śālaistālaistamālaiśca karṇikābhiśca puṣpitaiḥ

अर्थ श्लोक 52 के साथ

अध्याय 229

श्लोक 54

अयोमुखश्च विपुलः सर्वतो धातुमण्डितः ।तमालवनगन्धश्च पर्वतो मलयः शुभः

ayomukhaśca vipulaḥ sarvato dhātumaṇḍitaḥ | tamālavanagandhaśca parvato malayaḥ śubhaḥ

हिन्दी अर्थ

सब ओरसे धातुओंद्वारा अलंकृत विशाल अयोमुख पर्वत तथा तमाल वन और चन्दनकी सुगन्धसे भरा हुआ सुन्दर मलयगिरि भी उस समय विचलित हो उठा

अध्याय 229

श्लोक 55

सुराष्ट्राश्च सुबाह्लीकाः शूराभीरास्तथैव च ।भोजाः पाण्ड्याश्च वङ्गाश्च कलिङ्गास्ताम्रलिप्तकाः

surāṣṭrāśca subāhlīkāḥ śūrābhīrāstathaiva ca | bhojāḥ pāṇḍyāśca vaṅgāśca kaliṅgāstāmraliptakāḥ

श्लोक 55–56 का हिन्दी अर्थ

सुराष्ट्र, सुबाह्नीक, शूर, आशभीर, भोज, पाण्ड्य, वज्भ, कलिड्ध, ताम्रलिप्, आन्श्र, पुण्ड़, वामचूड और केरल नामक देशोंको तथा वहँके देवताओं और अप्सराओंको भी उस दैत्यने शोकमें डाल दिया

अध्याय 229

श्लोक 56

तथैवान्ध्राश्च पुण्ड्राश्च वामचूडाः सकेरलाः ।क्षोभितास्तेन दैत्येन सदेवाः साप्सरोगणाः

tathaivāndhrāśca puṇḍrāśca vāmacūḍāḥ sakeralāḥ | kṣobhitāstena daityena sadevāḥ sāpsarogaṇāḥ

अर्थ श्लोक 55 के साथ

अध्याय 229

श्लोक 57

अगस्तिभुवनं चैव यदगम्यं पुरा कृतम् ।सिद्धचारणसङ्घैश्च सेवितं सुमनोहरम्

agastibhuvanaṃ caiva yadagamyaṃ purā kṛtam | siddhacāraṇasaṅghaiśca sevitaṃ sumanoharam

श्लोक 57–58 का हिन्दी अर्थ

ीडध्याय: + १०९३ सिद्धों और चारणोंके समुदायोंसे सेवित महर्षि भगस्त्यका निवासभूत * अगस्तिभुवन' नामक पर्वत, जिसे पूर्वकालमें दूसरोंके लिये अगम्य बना दिया गया पा, बहुत ही मनोहर है। वहाँके नाग और पक्षी विचित्र , लताएँ और वृक्ष फूलोंके भारसे लदे रहते हैं। वह वर्णमय शिखरोंसे सुशोभित तथा अप्सराओंके समूहसे ववित है (किंतु उसे भी उस दैत्यने क्षुब्ध कर दया )

अध्याय 229

श्लोक 58

विचित्रनागविहगं सुपुष्पितलताद्रुमम् ।जातरूपमयैः शृङ्गैरप्सरोगणसेवितम्

vicitranāgavihagaṃ supuṣpitalatādrumam | jātarūpamayaiḥ śṛṅgairapsarogaṇasevitam

अर्थ श्लोक 57 के साथ

अध्याय 229

श्लोक 59

गिरिः पुष्पितकश्चैव लक्ष्मीवान् प्रियदर्शनः ।उत्थितः सागरं भित्त्वा वयस्यश्चन्द्रसूर्ययोः

giriḥ puṣpitakaścaiva lakṣmīvān priyadarśanaḥ | utthitaḥ sāgaraṃ bhittvā vayasyaścandrasūryayoḥ

श्लोक 59–60 का हिन्दी अर्थ

पुष्पितक नामक पर्वत उत्तम शोभासे म्पन्न और देखनेमें प्रिय है। वह समुद्रका भेदन करके परको उठा हुआ है। वह अपने शिखरोंपर चन्द्रमा गौर सूर्यको विश्राम देता है, इसलिये उनका प्रिय सखा '। सूर्य और चन्द्रमाकी किरणोंके समान प्रकाशमान पपने बड़े-बड़े श्रज्लोंद्वारा वह आकाशमें रेखा खींचता आ-सा सुशोभित होता है। उसका निम्रभाग सब ऐरसे समुद्रके जलसे आच्छादित है (वह पर्वत भी स दैत्यके पैरोंकी धमकसे कम्पित हो उठा )

अध्याय 229

श्लोक 60

रराज सुमहाशृङ्गैर्गगनं विलिखन्निव ।सूर्यचन्द्रांशुसङ्काशैः सागराम्बुसमावृतः

rarāja sumahāśṛṅgairgaganaṃ vilikhanniva | sūryacandrāṃśusaṅkāśaiḥ sāgarāmbusamāvṛtaḥ

अर्थ श्लोक 59 के साथ

अध्याय 229

श्लोक 61

विद्युत्वान् पर्वतः श्रीमानायतः शतयोजनम् ।विद्युतां यत्र सम्पाता निपात्यन्ते नगोत्तमे

vidyutvān parvataḥ śrīmānāyataḥ śatayojanam | vidyutāṃ yatra sampātā nipātyante nagottame

श्लोक 61–63 का हिन्दी अर्थ

शोभाशाली विद्युत्वान्‌ नामक पर्वत सौ जन लम्बा है। उस श्रेष्ठ पर्वतपर विद्युत्यात होते रहते । उसके सिवा, वृषभके आकारमें स्थित ऋषभ पर्वत, हाँ अगस्त्यजीका विशाल भवन है वह कुज्जर पर्वत, पॉका निवासस्थान दुर्जय विशाखरथ्या नामक पुरी था. भोगवतीपुरीको भी उस दैत्यराजने कम्पित कर या

अध्याय 229

श्लोक 62

ऋषभः पर्वतश्चैव श्रीमानृषभसंस्थितः ।कुञ्जरः पर्वतश्चैव यत्रागस्त्यगृहं महत्

ṛṣabhaḥ parvataścaiva śrīmānṛṣabhasaṃsthitaḥ | kuñjaraḥ parvataścaiva yatrāgastyagṛhaṃ mahat

अर्थ श्लोक 61 के साथ

अध्याय 229

श्लोक 63

विशाखरथ्या दुर्धर्षा सर्पाणामालया पुरी ।तथा भोगवती चापि दैत्येन्द्रेणाभिकम्पिता

viśākharathyā durdharṣā sarpāṇāmālayā purī | tathā bhogavatī cāpi daityendreṇābhikampitā

अर्थ श्लोक 61 के साथ

अध्याय 229

श्लोक 64

महामेघगिरिश्चैव पारियात्रश्च पर्वतः ।चक्रवांस्तु गिरिः श्रेष्ठो वाराहश्चैव पर्वतः

mahāmeghagiriścaiva pāriyātraśca parvataḥ | cakravāṃstu giriḥ śreṣṭho vārāhaścaiva parvataḥ

श्लोक 64–66 का हिन्दी अर्थ

प्रजानाथ! महामेघगिरि, पारियात्र वत, श्रेष्ठ चक्रवान्‌ गिरि, वाराह पर्वत, स्वर्णमय सुन्दर ग्ज्योतिषपुर जिसमें नरक नामक दुष्टात्मा दानव निवास रता था, मेघकी गम्भीर गर्जनासे युक्त पर्वतश्रेष्ठ मेरु, हाँ साठ हजार पर्वतोंका निवास है; इन सबको उस यने विचलित कर दिया

अध्याय 229

श्लोक 65

प्राग्ज्योतिषपुरं चैव जातरूपमयं शुभम् ।यस्मिन् वसति दुष्टात्मा नरको नाम दानवः

prāgjyotiṣapuraṃ caiva jātarūpamayaṃ śubham | yasmin vasati duṣṭātmā narako nāma dānavaḥ

अर्थ श्लोक 64 के साथ

अध्याय 229

श्लोक 66

मेरुश्च पर्वतश्रेष्ठो मेघगम्भीरनिःस्वनः ।षष्टिं तत्र सहस्राणि पर्वतानां विशाम्पते

meruśca parvataśreṣṭho meghagambhīraniḥsvanaḥ | ṣaṣṭiṃ tatra sahasrāṇi parvatānāṃ viśāmpate

अर्थ श्लोक 64 के साथ

अध्याय 229

श्लोक 67

तरुणादित्यसङ्काशो महेन्द्रश्च महागिरिः ।देवावासः शुभः पुण्यो गिरिराजो दिवं गतः

taruṇādityasaṅkāśo mahendraśca mahāgiriḥ | devāvāsaḥ śubhaḥ puṇyo girirājo divaṃ gataḥ

हिन्दी अर्थ

बाल-सूर्यके मान अरुण कान्तिसे प्रकाशित महागिरि महेन्द्र जो त्रताओंका सुन्दर निवास-स्थान है, वह पत्रित्र गिरिराज र्गलोकतक पहुँचा हुआ है (वह भी उस दैत्यसे म्पित हो गया।)

अध्याय 229

श्लोक 68

हेमशृङ्गो महाशैलस्तथा मेघसखो गिरिः ।कैलासश्चापि दुष्कम्पो दानवेन्द्रेण कम्पितः

hemaśṛṅgo mahāśailastathā meghasakho giriḥ | kailāsaścāpi duṣkampo dānavendreṇa kampitaḥ

हिन्दी अर्थ

महाशैल हेमश्रुज्ध, मेघसख मक पर्वत तथा जिसको कम्पित करना कठिन है ह कैलास भी उस दानवराजके पैरोंकी धमकसे काँप डा

अध्याय 229

श्लोक 69

यक्षराक्षसगन्धर्वैर्नित्यं सेवितकन्दरः ।श्रीमान् मन्दरश्चैव नित्यं पुष्पितपादपः

yakṣarākṣasagandharvairnityaṃ sevitakandaraḥ | śrīmān mandaraścaiva nityaṃ puṣpitapādapaḥ

हिन्दी अर्थ

कैलास वह पर्वत है जिसकी कन्दराओंका त, राक्षस और गन्धर्व सदा ही सेवन करते हैं, उसके ्ष सदा खिले रहते हैं, वह सुन्दर शोभासे सम्पन्न र मनोहर है

अध्याय 229

श्लोक 70

हेमपुष्करसञ्छन्नं तेन वैखानसं सरः ।कम्पितं मानसं चैव राजहंसैर्निषेवितम्

hemapuṣkarasañchannaṃ tena vaikhānasaṃ saraḥ | kampitaṃ mānasaṃ caiva rājahaṃsairniṣevitam

हिन्दी अर्थ

स्वर्णमय कमलोंसे आच्छादित वानस सरोवर तथा राजहंसोंसे सेवित मानस सरोवरकों _ उसने क्षुब्ध कर दिया था

अध्याय 229

श्लोक 71

विशृङ्गः पर्वतश्चैव कुमारी च सरिद्वरा ।तुषारचयसङ्काशो मन्दरश्चैव पर्वतः

viśṛṅgaḥ parvataścaiva kumārī ca saridvarā | tuṣāracayasaṅkāśo mandaraścaiva parvataḥ

श्लोक 71–72 का हिन्दी अर्थ

विश्वूज्॒ पर्वत, सरिताओंमें श्रेष्ठ कुमारी नदी, हमके राशि-सदृश मन्दराचल, उशीरबीज नामक पर्वत, गरिराज रुद्रोपस्थ तथा प्रजापतिका निवास-स्थान पुष्कर र्वत—इन सबको उस दैत्यने कम्पित कर दिया था

अध्याय 229

श्लोक 72

उशीरबीजश्च गिरी रुद्रोपस्थस्तथाद्रिराट् ।प्रजापतेश्च निलयस्तथा पुष्करपर्वतः

uśīrabījaśca girī rudropasthastathādrirāṭ | prajāpateśca nilayastathā puṣkaraparvataḥ

अर्थ श्लोक 71 के साथ

अध्याय 229

श्लोक 73

देवावृत् पर्वतश्चैव तथा वै वालुको गिरिः ।क्रौञ्चः सप्तर्षिशैलश्च धूमवर्णश्च पर्वतः

devāvṛt parvataścaiva tathā vai vāluko giriḥ | krauñcaḥ saptarṣiśailaśca dhūmavarṇaśca parvataḥ

श्लोक 73–74 का हिन्दी अर्थ

देवावृत्‌ पर्वत, वालुकगिरि, क्रौज्नगिरि, तर्षिशैल तथा धूम्रवर्ण पर्वत—ये और दूसरे भी हुत-से पर्वत, देश, जनपद, नदी और समुद्र उस दानवेन्द्रने कम्पित कर दिये

अध्याय 229

श्लोक 74

एते चान्ये च गिरयो देशा जनपदास्तथा ।नद्यश्च सागराश्चैव दानवेन्द्रेण कम्पिताः

ete cānye ca girayo deśā janapadāstathā | nadyaśca sāgarāścaiva dānavendreṇa kampitāḥ

अर्थ श्लोक 73 के साथ

अध्याय 229

श्लोक 75

कपिलश्च महीपुत्रो व्याघ्राक्षः क्षितिकम्पनः ।खेचराश्च निशापुत्राः पातालतलवासिनः

kapilaśca mahīputro vyāghrākṣaḥ kṣitikampanaḥ | khecarāśca niśāputrāḥ pātālatalavāsinaḥ

श्लोक 75–76 का हिन्दी अर्थ

इतना ही नहीं, आकाशमें विचरनेकी शक्ति रखनेवाले जो पातालनिवासी निशाचरवंशज थे, वे महीपुत्र कपिल, याघ्राक्ष, क्षितिकम्पन तथा अन्य भयंकर असुरगण—मेघनाद, अडशायुध, ऊर्ध्वंग और भीमवेग आदि भी-सब-के-सब कम्पित हो उठे

अध्याय 229

श्लोक 76

गणस्तथापरो रौद्रो मेघनादोऽङ्कुशायुधः ।ऊर्ध्वगो भीमवेगश्च सर्व एवाभिकम्पिताः

gaṇastathāparo raudro meghanādo'ṅkuśāyudhaḥ | ūrdhvago bhīmavegaśca sarva evābhikampitāḥ

अर्थ श्लोक 75 के साथ

स्रोत: local proofread transcription: Sanskrit shlokas of the Harivamsa (Harivamsha, Vishnu and Bhavishya parvas) from sanskritdocuments.org. One chapter per adhyaya; verse numbers as printed in the source (restarting in each adhyaya). Appendix sections are not included. · प्राप्त 19/10/2026

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शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

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6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

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व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

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