श्लोक 6–16 का हिन्दी अर्थ
सब अस्त्रोंमें श्रेष्ठ जो अत्यन्त भयड्र दण्डास्त्र था, उसको भी चलाया। उसके सिवा अत्यन्त उम्र क्रालचक्र, विष्णुचक्र, धर्मचक्र, महाचक्र, अजितचक्र, योर ऐन्द्रचक्र, ऋषिचफक्र, ब्रह्मचक्र, जिसकी गड़गड़ाहटकी तीनों लोकोंमें भूरि-भूरि प्रशंसा की जाती है, वह विचित्र अशनि, सूखी-गीली दो प्रकारकी अशनि, भयानक रौद्रास्त्-शूल, कड्लाल, मूसल, ब्रह्मशिर नामक अस्त्र, ब्रह्मास्त्र, ऐषीकास्त्र, ऐन्द्रास्त्र, आग्रेयास्त्र, शैशिरास्त्र, वायव्यास्त्र, मथनास्त्र, कपालास्त्र, किड्टरास्त्र, अप्रतिम शक्ति, क्रौज्लास्त्र, हयग्रीवास्त्र, सौम्यास्त्र, अनुपम पैशाचास्त्र, अद्भुत सर्पास्त्र, मोहनास्त्र, शोषणास्त्र, संतापनास्त्र, विलापनास्त्र, जुम्भणास्त्र, प्रापणास्त्र, अत्यन्त दारुण त्वाष््टा्तर, अक्षोभ्य कालमुद्र, महाबलवान् क्षोभणास्त्र, संवर्तनास्त्र, सम्मोहनास्त्र, मायाधरास्त्र तथा प्रिय गान्धर्वास्त्र, खड्गरत्र नन्दक, प्रस्वापनास्त्र, प्रमथनास्त्र, उत्तम वारुणास्त्र तथा जिसकी गति कहीं भी कुण्ठित नहीं होती, वह पाशुपतास्त्र-इन सभी अस्त्रोंको उस समय हिरण्यकशिपुने भगवान् नरसिंहपर वारी- वारीसे चलाया, मानो वह प्रज्वलित अग्रिको आहुति दे रहा हो