Harivamsha Purana
226
अध्याय 226 / 318

Parva 3, Adhyāya 43

17 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ17 श्लोक

अध्याय 226

श्लोक 1

प्रह्लादेन नरसिंहविग्रहे समस्तायाः त्रिलोक्याः दर्शनं ततो दृष्ट्वा महाबाहुं कालचक्रमिवागतम् ।नारसिंहवपुश्छन्नं भस्माच्छन्नमिवानलम्

prahlādena narasiṃhavigrahe samastāyāḥ trilokyāḥ darśanaṃ tato dṛṣṭvā mahābāhuṃ kālacakramivāgatam | nārasiṃhavapuśchannaṃ bhasmācchannamivānalam

श्लोक 1–3 का हिन्दी अर्थ

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! तदनन्तर खसे ढकी हुई आगकी भाँति नरसिंह-शरीरमें छिपे ए महाबाहु भगवान्‌ विष्णुको वहाँ कालचक्रके समान या देख समस्त दानव और हिरण्यकशिपु आपसभमें हने लगे-“अहो! यह श्ड, कुन्द और चन्द्रमाके मान विचित्र रूप दिखायी दे रहा है!' भारत! भगवान्‌ रसिंहके मुख और गर्दनके बाल घुँघराले थे। उनका प-सौन्दर्य सहस्रों चन्द्रमाओंके समान प्रकाशित होता

अध्याय 226

श्लोक 2

विकुञ्चितसटं तस्य नारसिंहस्य भारत ।रूपौदार्यं वभौ तत्र सहस्रशशिसन्निभम्

vikuñcitasaṭaṃ tasya nārasiṃhasya bhārata | rūpaudāryaṃ vabhau tatra sahasraśaśisannibham

अर्थ श्लोक 1 के साथ

अध्याय 226

श्लोक 3

अहो रूपमिदं चित्रं शङ्खकुन्देन्दुसन्निभम् ।अब्रुवन् दानवाः सर्वे हिरण्यकशिपुश्च सः

aho rūpamidaṃ citraṃ śaṅkhakundendusannibham | abruvan dānavāḥ sarve hiraṇyakaśipuśca saḥ

अर्थ श्लोक 1 के साथ

अध्याय 226

श्लोक 4

एवं हि ब्रुवतां तेषां निर्दग्धानां महात्मनाम् ।नारसिंहेन चक्षुर्भ्यां चोदिताः कालधर्मणा

evaṃ hi bruvatāṃ teṣāṃ nirdagdhānāṃ mahātmanām | nārasiṃhena cakṣurbhyāṃ coditāḥ kāladharmaṇā

श्लोक 4–5 का हिन्दी अर्थ

भगवान्‌ नरसिंहरूपी मृत्युसे प्रेरित और नकी नेत्राग्निसे दग्ध होते हुए वे विशालकाय दानव ब आपसमें उपर्युक्त बातें कह रहे थे, उस समय रण्यकशिपुके पुत्र प्रह्नाद नामक पराक्रमी दैत्यने वहाँ धारे हुए नरसिंहभगवान्‌को दिव्य दृष्टिसे देखा

अध्याय 226

श्लोक 5

हिरण्यकशिपोः पुत्रः प्रह्रादो नाम वीर्यवान् ।दिव्येन चक्षुषा सिंहमपश्यद् देवमागतम्

hiraṇyakaśipoḥ putraḥ prahrādo nāma vīryavān | divyena cakṣuṣā siṃhamapaśyad devamāgatam

अर्थ श्लोक 4 के साथ

अध्याय 226

श्लोक 6

तं दृष्ट्वा रुक्मशैलाभमपूर्वां तनुमास्थितम् ।विस्मिता दानवाः सर्वे हिरण्यकशिपुश्च सः

taṃ dṛṣṭvā rukmaśailābhamapūrvāṃ tanumāsthitam | vismitā dānavāḥ sarve hiraṇyakaśipuśca saḥ

हिन्दी अर्थ

रेंशो$ध्याय: + १०८३ सोनेके पर्वतकी भाँति अपूर्व शरीर धारण किये भगवान्‌को देखकर समस्त दानव और हिरण्यकशिपु आश्चर्यचकित हो रहे थे

अध्याय 226

श्लोक 7

महाराज महाबाहो दैत्यानामादिसम्भव ।न श्रुतं नैव दृष्टं च नारसिंहमिदं वपुः

mahārāja mahābāho daityānāmādisambhava | na śrutaṃ naiva dṛṣṭaṃ ca nārasiṃhamidaṃ vapuḥ

हिन्दी अर्थ

उस समय प्रह्वादजी बोले—महाराज! महाबाहो ! दैत्योंके आदिसम्भव (पूर्वपुरुष) ! मैंने ऐसा नरसिंहरूप न तो कभी देखा है और न सुना ही है

अध्याय 226

श्लोक 8

अव्यक्तप्रभवं दिव्यं किमिदं रूपमद्भुतम् ।दैत्यान्तकरणं घोरं शंसन्तीव मनांसि नः

avyaktaprabhavaṃ divyaṃ kimidaṃ rūpamadbhutam | daityāntakaraṇaṃ ghoraṃ śaṃsantīva manāṃsi naḥ

हिन्दी अर्थ

जिसकी उत्पत्तिका कारण अव्यक्त है, ऐसा यह दिव्य अद्भुत रूप कया है? हमारा मन तो ऐसा कहता है कि यह कोई दैत्योंका विनाश करनेवाला भयड्र भूत है

अध्याय 226

श्लोक 9

अस्य देवाः शरीरस्थाः सागरा सरितस्तथा ।हिमवान् पारियात्रश्च ये चान्ये कुलपर्वताः

asya devāḥ śarīrasthāḥ sāgarā saritastathā | himavān pāriyātraśca ye cānye kulaparvatāḥ

हिन्दी अर्थ

इसके शरीरमें समस्त देवता, समुद्र तथा सरिताएँ दिखायी देती हैं, हिमवानू, पारियात्र तथा अन्य जो कुलपर्वत हैं, वे भी यहाँ दृष्टिगोचर होते हैं

अध्याय 226

श्लोक 10

चन्द्रमाः सह नक्षत्रैरादित्याश्चाश्विनौ तथा ।धनदो वरुणश्चैव यमः शक्रः शचीपतिः

candramāḥ saha nakṣatrairādityāścāśvinau tathā | dhanado varuṇaścaiva yamaḥ śakraḥ śacīpatiḥ

श्लोक 10–14 का हिन्दी अर्थ

नक्षत्रोंसहित चन्द्रमा, आदित्य, अश्विनीकुमार, कुबेर, वरुण, यम, शचीपति इन्द्र, मरुद्रण, देवता, गन्धर्व, तपोधन मुनि, नाग, यक्ष, पिशाच, भयड्र पराक्रमी राक्षस, ब्रह्माजी तथा भगवान्‌ पशुपति (शिव)—ये सब इसके ललाठमें स्थित जान पढ़ते हैं । स्थावर और जड्म भूत, सब दैत्यगणोंसे घिरे हुए हमारे साथ आप, सैकड़ों विमानोंसे भरी हुई हमारी यह आन्तरिक सभा, सारी त्रिलोकी तथा सनातन लोकधर्म—ये सब-के-सब इस नरसिंह-विग्रहमें उसी तरह दिखायी देते हैं, जैसे महान्‌ दर्पणके समान निर्मल चन्द्रमण्डलमें नेत्रोंकी धारणा करनेसे यह सम्पूर्ण जगत्‌ दृष्टिगोचर होता है

अध्याय 226

श्लोक 11

मरुतो देवगन्धर्वा मुनयश्च तपोधनाः ।नागा यक्षाः पिशाचाश्च राक्षसा भीमविक्रमाः

maruto devagandharvā munayaśca tapodhanāḥ | nāgā yakṣāḥ piśācāśca rākṣasā bhīmavikramāḥ

अर्थ श्लोक 10 के साथ

अध्याय 226

श्लोक 12

ब्रह्मदेवः पशुपतिर्ललाटस्था विभान्ति वै ।स्थावराणि च भूतानि जङ्गमानि तथैव च

brahmadevaḥ paśupatirlalāṭasthā vibhānti vai | sthāvarāṇi ca bhūtāni jaṅgamāni tathaiva ca

अर्थ श्लोक 10 के साथ

अध्याय 226

श्लोक 13

भवांश्च सहितोऽस्माभिः सर्वैर्दैत्यगणैर्वृतः ।विमानशतसङ्कीर्णा तथाभ्यन्तरजा सभा

bhavāṃśca sahito'smābhiḥ sarvairdaityagaṇairvṛtaḥ | vimānaśatasaṅkīrṇā tathābhyantarajā sabhā

अर्थ श्लोक 10 के साथ

अध्याय 226

श्लोक 14

सर्वं त्रिभुवनं राजँल्लोकधर्मश्च शाश्वतः ।दृश्यते नारसिंहेऽस्मिन् यथेन्दौ विमले जगत्

sarvaṃ tribhuvanaṃ rāja~llokadharmaśca śāśvataḥ | dṛśyate nārasiṃhe'smin yathendau vimale jagat

अर्थ श्लोक 10 के साथ

अध्याय 226

श्लोक 15

प्रजापतिश्चात्र मनुर्महात्मा ग्रहाश्च योगाश्च मही नभश्च ।उत्पातकालश्च धृतिः स्मृतिश्च रजश्च सत्त्वं च तपो दमश्च

prajāpatiścātra manurmahātmā grahāśca yogāśca mahī nabhaśca | utpātakālaśca dhṛtiḥ smṛtiśca rajaśca sattvaṃ ca tapo damaśca

हिन्दी अर्थ

इस नरसिंह-विग्रहमें प्रजापति, महात्मा मनु, ग्रह, योग, पृथ्वी, आकाश, उत्पातकाल, धृति, स्मृति, रजोगुण, सत्त्वगुण, तप और इन्द्रिय संयम सभी दिखायी देते हैं

अध्याय 226

श्लोक 16

सनत्कुमारश्च महानुभावो विश्वे च देवाप्सरसश्च सर्वाः ।क्रोधश्च कामश्च तथैव हर्षो दर्पश्च मोहः पितरश्च सर्वे

sanatkumāraśca mahānubhāvo viśve ca devāpsarasaśca sarvāḥ | krodhaśca kāmaśca tathaiva harṣo darpaśca mohaḥ pitaraśca sarve

हिन्दी अर्थ

महानुभाव सनत्कुमार, विश्वेदेव, समस्त अप्सराएँ, काम, क्रोध, हर्ष, दर्प, मोह और सारे पितर भी इसमें दृष्टिगोचर होते हैं

अध्याय 226

श्लोक 17

इत्येवमुक्त्वा स च दैत्यराजं हिरण्यनामानमविस्मयेन ।दध्यौ च दैत्येश्वरपुत्र उग्रं महामतिः किञ्चिदधोमुखः प्राक्

ityevamuktvā sa ca daityarājaṃ hiraṇyanāmānamavismayena | dadhyau ca daityeśvaraputra ugraṃ mahāmatiḥ kiñcidadhomukhaḥ prāk

हिन्दी अर्थ

दैत्यराजके पुत्र परम बुद्धिमान्‌ प्रह्माद बिना किसी विस्मयके उस उग्र दैत्यपति हिरण्यकशिपुसे उपर्युक्त बात कहकर अपना मुँह कुछ नीचे करके पूर्व दिशाकी ओर ध्यान करने लगे

स्रोत: local proofread transcription: Sanskrit shlokas of the Harivamsa (Harivamsha, Vishnu and Bhavishya parvas) from sanskritdocuments.org. One chapter per adhyaya; verse numbers as printed in the source (restarting in each adhyaya). Appendix sections are not included. · प्राप्त 19/10/2026

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स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

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6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
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मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

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व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

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