Harivamsha Purana
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अध्याय 180 / 318

Parva 2, Adhyāya 125

63 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ63 श्लोक

अध्याय 180

श्लोक 1

श्रीकृष्णकस्य जृम्भास्त्रेण भगवतः शङ्करस्य जृम्भायाः वशीभूतभवनं, ब्रह्मणा शिवं विष्णोः सह तस्य एकत्वस्य स्मारणं, ब्रह्मणः पृच्छाकरणोपरि मार्कण्डेयेन हरिहरस्य एकत्वं स्थापयित्वा माहात्म्यसहितं हरिहरात्मकस्य स्तोत्रस्य वर्णनं अन्धकारीकृते लोके प्रदीप्ते त्र्यम्बके तथा ।न नन्दी नापि च रथो न रुद्रः प्रत्यदृश्यत

śrīkṛṣṇakasya jṛmbhāstreṇa bhagavataḥ śaṅkarasya jṛmbhāyāḥ vaśībhūtabhavanaṃ, brahmaṇā śivaṃ viṣṇoḥ saha tasya ekatvasya smāraṇaṃ, brahmaṇaḥ pṛcchākaraṇopari mārkaṇḍeyena hariharasya ekatvaṃ sthāpayitvā māhātmyasahitaṃ hariharātmakasya stotrasya varṇanaṃ andhakārīkṛte loke pradīpte tryambake tathā | na nandī nāpi ca ratho na rudraḥ pratyadṛśyata

हिन्दी अर्थ

बैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! वैष्णवास्त्रका योग होनेपर जब सम्पूर्ण जगत्‌में अन्धकार छा गया और भगवान्‌ शड्र उसके तेजसे जलने-से लगे, उस मय उस अस्त्रसे आच्छादित होनेके कारण न नन्दी, रथ और न रुद्रदेव ही दिखायी देते थे

अध्याय 180

श्लोक 2

द्विगुणं दीप्तदेहस्तु रोषेण च बलेन च ।त्रिपुरान्तकरो बाणं जग्राह स चतुर्मुखम्

dviguṇaṃ dīptadehastu roṣeṇa ca balena ca | tripurāntakaro bāṇaṃ jagrāha sa caturmukham

हिन्दी अर्थ

तब ष और बलसे त्रिपुरान्तकारी भगवान्‌ शिवका शरीर गुना दमक उठा। उन्होंने चार फलवाला बाण अपने थमें लिया

अध्याय 180

श्लोक 3

सन्दधत् कार्मुकं चैव क्षेप्तुकामस्त्रिलोचनः ।विज्ञातो वासुदेवेन चित्तज्ञेन महात्मना

sandadhat kārmukaṃ caiva kṣeptukāmastrilocanaḥ | vijñāto vāsudevena cittajñena mahātmanā

हिन्दी अर्थ

वे भगवान्‌ त्रिलोचन उस बाणकों नुषपर रखकर छोड़ना ही चाहते थे कि सबके मनकी त जाननेवाले महात्मा वासुदेवने उनके मनोभावको मझ लिया

अध्याय 180

श्लोक 4

जृम्भणं नाम सोऽप्यस्त्रं जग्राह पुरुषोत्तमः ।हरं सञ्जृम्भयामास क्षिप्रकारी महाबलः

jṛmbhaṇaṃ nāma so'pyastraṃ jagrāha puruṣottamaḥ | haraṃ sañjṛmbhayāmāsa kṣiprakārī mahābalaḥ

हिन्दी अर्थ

फिर तो शीघ्रकारी महाबली पुरुषोत्तम ीकृष्णने जुम्भणास्त्र उठाया और उसके द्वारा महादेव- को जुम्भासे अभिभूत कर दिया

अध्याय 180

श्लोक 5

सशरः सधनुश्चैव हरस्तेनाशु जृम्भितः ।संज्ञां न लेभे भगवान् विजेतासुररक्षसाम्

saśaraḥ sadhanuścaiva harastenāśu jṛmbhitaḥ | saṃjñāṃ na lebhe bhagavān vijetāsurarakṣasām

हिन्दी अर्थ

ततमोऊध्याय: + ९०१ इससे भगवान्‌ शिव शीघ्र ही धनुष और बाण लये जँभाई लेने लगे; असुरों और राक्षसोंपर विजय पानेवाले भगवान्‌ शिवको उस समय सुध-बुध न ही

English

Vaishampāyana said:—Hearing those words of the highly effulgent Dwarf, Virochana's son Bali, the king of Daityas and the slayer of his enemies, threw an antelope skin on his person. And then saying 'let it be so' he touched a jar full of water. Desirous of destroying the Asura king the Dwarf too extended his hand destructive of Daityas. As the king of Dānavas, with his face towards east, was about to give him water Pralhāda prevented him. Beholding the un-foreseen form of the Great Hari, who was willing to steal the prosperity of the Asuras, the greatly wise Pralhāda said:—"Do not give any thing unto this dwarfish Brāhmana. It is he who formerly killed your great grandfather. This greatly wise Vishnu has come to impose on you" (22–28). Bali said:—"It is indeed a matter of great joy that I will be able to make gifts unto this Deity. I have obtained as an object of my gifts who is the lord of the universe, who shows such a favour and who is superior even to Bramhā. O foremost of Asuras, one, who has been initiated for sacrifice, must make gifts." Having thus expressed himself in the midst of the Asuras Virochana's son Bali granted the Lord Nārāyana land measuring three feet.

अध्याय 180

श्लोक 6

सशरं सधनुष्कं च दृष्ट्वाऽऽत्मानं विजृम्भितम् ।बलोन्मत्तोऽथ बाणोऽसौ शर्वं चोदयतेऽसकृत्

saśaraṃ sadhanuṣkaṃ ca dṛṣṭvā''tmānaṃ vijṛmbhitam | balonmatto'tha bāṇo'sau śarvaṃ codayate'sakṛt

हिन्दी अर्थ

धनुष और बाणसहित आत्मस्वरूप शिवको जँंभाईके वशीभूत हुआ देख बलोन्मत्त बाणासुर बारम्बार न्हें युद्धके लिये प्रेरित करने लगा

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श्लोक 7

ततो ननाद भूतात्मा स्निग्धगम्भीरया गिरा ।प्रध्मापयामास तदा कृष्णः शङ्खं महाबलः

tato nanāda bhūtātmā snigdhagambhīrayā girā | pradhmāpayāmāsa tadā kṛṣṇaḥ śaṅkhaṃ mahābalaḥ

हिन्दी अर्थ

तब सम्पूर्ण भूतोंके आत्मा महाबली भगवान्‌ श्रीकृष्णने खिग्ध म्भीर वाणीमें सिंहनाद किया और जोर-जोरसे श्ड जाया

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श्लोक 8

पाञ्चजन्यस्य घोषेण शार्ङ्गविस्फूर्जितेन च ।देवं विजृम्भितं दृष्ट्वा सर्वभूतानि तत्रसुः

pāñcajanyasya ghoṣeṇa śārṅgavisphūrjitena ca | devaṃ vijṛmbhitaṃ dṛṣṭvā sarvabhūtāni tatrasuḥ

हिन्दी अर्थ

पाज्जन्य शड्गके गम्भीर घोषसे, शार्ज- पनुषकी टड्ारसे तथा महादेवजीको जुम्भाके वशीभूत देखकर समस्त प्राणी थर्रा उठे

अध्याय 180

श्लोक 9

एतस्मिन्नन्तरे तत्र रुद्रस्य पार्षदा रणे ।मायायुद्धं समाश्रित्य प्रद्युम्नं पर्यवारयन्

etasminnantare tatra rudrasya pārṣadā raṇe | māyāyuddhaṃ samāśritya pradyumnaṃ paryavārayan

हिन्दी अर्थ

इसी बीचमें द्रदेवके पार्षदोंने मायायुद्धका आश्रय ले रणभूमिमें दयुप्रको घेर लिया

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श्लोक 10

सर्वांस्तु निद्रावशगान्कृत्वा मकरकेतुमान् ।दानवान् नाशयत् तत्र शरजालेन वीर्यवान् ।प्रमाथगणभूयिष्ठांस्तत्र तत्र महाबलान्

sarvāṃstu nidrāvaśagānkṛtvā makaraketumān | dānavān nāśayat tatra śarajālena vīryavān | pramāthagaṇabhūyiṣṭhāṃstatra tatra mahābalān

हिन्दी अर्थ

परंतु पराक्रमी मकरध्वज दयुप्रने उन सबको निद्राके वशीभूत करके वहाँ आाणसमूहोंद्वारा महाबली दानवोंका—जिनमें प्रमथगणोंकी ख्या अधिक थी—विनाश कर डाला

अध्याय 180

श्लोक 11

ततस्तु जृम्भमाणस्य देवस्याक्लिष्टकर्मणः ।ज्वाला प्रादुरभूद्वक्त्राद्दहन्तीव दिशो दश

tatastu jṛmbhamāṇasya devasyākliṣṭakarmaṇaḥ | jvālā prādurabhūdvaktrāddahantīva diśo daśa

हिन्दी अर्थ

तदनन्तर भनायास ही महान्‌ कर्म करनेवाले तथा जूम्भाके शीभूत हुए महादेवजीके मुखसे एक आगकी ज्वाला कट हुई, जो सम्पूर्ण दिशाओंको दग्ध करती हुई- ी प्रतीत होती थी

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श्लोक 12

ततस्तु धरणीदेवी पीड्यमाना महात्मभिः ।ब्रह्माणं विश्वधातारं वेपमानाभ्युपागमत्

tatastu dharaṇīdevī pīḍyamānā mahātmabhiḥ | brahmāṇaṃ viśvadhātāraṃ vepamānābhyupāgamat

हिन्दी अर्थ

उस समय उन महात्माओंसे ीड़ित हुई पृथ्वीदेवी काँपती हुई विश्व-स्रष्टा ब्रह्माजीकी ररणमें गयी

अध्याय 180

श्लोक 13

देवदेव महाबाहो पीड्यामि परमौजसा ।कृष्णरुद्रभराक्रान्ता भविष्यैकार्णवा पुनः

devadeva mahābāho pīḍyāmi paramaujasā | kṛṣṇarudrabharākrāntā bhaviṣyaikārṇavā punaḥ

हिन्दी अर्थ

पृथ्वी बोली—देवाधिदेव ! महाबाहो! मैं महान्‌ गोज (बल-पराक्रम)-से पीड़ित हूँ। भगवान्‌ श्रीकृष्ण गौर महादेवजीके भारसे आक्रान्त हो पुन: एकार्णवके लमें निमग्र हो जाऊँगी-ऐसा जान पड़ता है

अध्याय 180

श्लोक 14

अविषह्यमिमं भारं चिन्तयस्व पितामह ।लघ्वीभूता यथा देव धारयेयं चराचरम्

aviṣahyamimaṃ bhāraṃ cintayasva pitāmaha | laghvībhūtā yathā deva dhārayeyaṃ carācaram

हिन्दी अर्थ

परतामह ! मैं इस भारको अपने लिये असह्म मानती , आप इसपर विचार कीजिये। देव! ऐसा कोई उपाय गीजिये, जिससे मैं हलकी होकर चराचर जगत्‌को रण कर सकूँ

अध्याय 180

श्लोक 15

ततस्तु काश्यपीं देवीं प्रत्युवाच पितामहः ।मुहूर्तं धारयात्मानमाशु लघ्वी भविष्यसि

tatastu kāśyapīṃ devīṃ pratyuvāca pitāmahaḥ | muhūrtaṃ dhārayātmānamāśu laghvī bhaviṣyasi

हिन्दी अर्थ

तब पितामह ब्रह्माजीने काश्यपी- वी (पृथ्वी)-से इस प्रकार कहा-तू दो घड़ीतक कसी प्रकार अपने-आपको रोके रह; फिर शीघ्र ही लकी हो जायगी'

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श्लोक 16

दृष्ट्वा तु भगवान् ब्रह्मा रुद्रं वचनमब्रवीत् ।सृष्टो महासुरवधः किं भूयः परिरक्ष्यते

dṛṣṭvā tu bhagavān brahmā rudraṃ vacanamabravīt | sṛṣṭo mahāsuravadhaḥ kiṃ bhūyaḥ parirakṣyate

हिन्दी अर्थ

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! तब भगवान्‌ ह्माने रुद्रदेवसे मिलकर यह बात कही-' (आपकी म्मतिसे ही तो) बड़े-बड़े असुरोंका वध आरम्भ कया गया है, फिर आप स्वयं ही असुरवृन्दकी रक्षा यों करते हैं ?'

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श्लोक 17

न च युद्धं महाबाहो तव कृष्णेन रोचते ।न च बुध्यसि कृष्णं त्वमात्मानं तु द्विधा कृतम्

na ca yuddhaṃ mahābāho tava kṛṣṇena rocate | na ca budhyasi kṛṣṇaṃ tvamātmānaṃ tu dvidhā kṛtam

हिन्दी अर्थ

महाबाहो ! श्रीकृष्णके साथ आपका युद्ध मुझे अच्छा नहीं लगता। आप श्रीकृष्णको समझ नहीं रहे हैं, आपका आत्मा ही (श्रीकृष्ण बनकर) दो रूपोंमें विभक्त हो गया है'

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श्लोक 18

ततः शरीरयोगाद्धि भगवानव्ययः प्रभुः ।प्रविश्य पश्यते कृत्स्नांस्त्रींल्लोकान्सचराचरान्

tataḥ śarīrayogāddhi bhagavānavyayaḥ prabhuḥ | praviśya paśyate kṛtsnāṃstrīṃllokānsacarācarān

हिन्दी अर्थ

ब्रह्माजीके इस प्रकार कहनेपर अविनाशी प्रभु भगवान्‌ शिव शरीरके भीतर अन्त:करणमें ध्यान लगाकर हृदयस्थित ब्रह्ममें प्रविष्ठ हो, तीनों लोकोंके समस्त चराचर प्राणियोंका साक्षात्कार करने लगे

अध्याय 180

श्लोक 19

प्रविश्य योगं योगात्मा वरांस्ताननुचिन्तयन् ।द्वारवत्यां यदुक्तं च तदनुस्मृत्य सर्वशः ।जगाद नोत्तरं किञ्चिन्निवृत्तो ह्यभवत् तदा

praviśya yogaṃ yogātmā varāṃstānanucintayan | dvāravatyāṃ yaduktaṃ ca tadanusmṛtya sarvaśaḥ | jagāda nottaraṃ kiñcinnivṛtto hyabhavat tadā

हिन्दी अर्थ

योगस्वरूप भगवान्‌ श्र योगमें प्रवेश करके (समाधि लगाकर) पहलेके दिये हुए उन वरोंका चिन्तन करने लगे तथा द्वारकामें जो कुछ कहा था, उन सब बातोंका बास्म्बार स्मरण करके उन्होंने ब्रह्माजीको कोई उत्तर नहीं दिया; वे उस समय युद्धसे निवृत्त हो गये

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श्लोक 20

आत्मानं कृष्णयोनिस्थं पश्यत ह्येकयोनिजम् ।ततो निःसृत्य रुद्रस्तु न्यस्तवादोऽभवन्मृधे

ātmānaṃ kṛṣṇayonisthaṃ paśyata hyekayonijam | tato niḥsṛtya rudrastu nyastavādo'bhavanmṛdhe

हिन्दी अर्थ

उन्होंने अपने-आपको सच्चिदानन्द- स्वरूप श्रीकृष्णमय योनि (परब्रह्म)-में स्थित देखा और अपनेको एक-अद्वितीय ब्रह्मस्वरूप योनिसे प्रकट हुआ जाना। तत्पश्चात्‌ रुद्रदेव वहाँसे निकलकर युद्धसे अलग हो गये। उन्होंने उस रणक्षेत्रमें श्रीकृष्णके साथ वाद- विवाद या युद्धकी भावनाका परित्याग कर दिया

अध्याय 180

श्लोक 21

ब्रह्माणं चाब्रवीद् रुद्रो न योत्स्ये भगवन्निति ।कृष्णेन सह सङ्ग्रामे लघ्वी भवतु मेदिनी

brahmāṇaṃ cābravīd rudro na yotsye bhagavanniti | kṛṣṇena saha saṅgrāme laghvī bhavatu medinī

हिन्दी अर्थ

तत्पश्चात्‌ रुद्रने ब्रह्माजीसे कहा-' भगवन्‌! अब मैं संग्रामभूमिमें श्रीकृष्णके साथ युद्ध नहीं करूँगा, अब यह पृथ्वी हलकी हो जाय '

अध्याय 180

श्लोक 22

ततः कृष्णोऽथ रुद्रश्च परिष्वज्य परस्परम् ।परां प्रीतिमुपागम्य सङ्ग्रामादपजग्मतुः

tataḥ kṛṣṇo'tha rudraśca pariṣvajya parasparam | parāṃ prītimupāgamya saṅgrāmādapajagmatuḥ

हिन्दी अर्थ

इसके बाद श्रीकृष्ण और रुद्र एक-दूसरेसे मिलकर बहुत प्रसन्न हुए और आपसके संग्रामसे हट गये

अध्याय 180

श्लोक 23

न च तौ पश्यते कञ्चिद्योगिनौ योगमागतौ ।एको ब्रह्मा तथा कृत्वा पश्यँल्लोकान्पितामहः

na ca tau paśyate kañcidyoginau yogamāgatau | eko brahmā tathā kṛtvā paśya~llokānpitāmahaḥ

श्लोक 23–24 का हिन्दी अर्थ

श्रीकृष्ण और रुद्र दोनों योगी हैं तथा दोनों एक-दूसरेसे अभेद-सम्बन्धको प्राप्त हैं, इस बातको वहाँ दूसरे किसीने नहीं समझा; एकमात्र पितामह ब्रह्माने उन दोनोंका अभेद-सम्बन्ध स्थापित करके उन्हें उसी भावसे देखा और सब लोगोंकी ओर देखते हुए इसी विषयको लेकर अपने बगलमें खड़े हुए नारद तथा मार्कण्डेयको दीर्घदर्शी जानकर इस प्रकार पूछा

अध्याय 180

श्लोक 24

उवाचैतत् समुद्दिश्य मार्कण्डेयं सनारदम् ।पार्श्वस्थं परिपप्रच्छ ज्ञात्वा वै दीर्घदर्शिनम्

uvācaitat samuddiśya mārkaṇḍeyaṃ sanāradam | pārśvasthaṃ paripapraccha jñātvā vai dīrghadarśinam

अर्थ श्लोक 23 के साथ

अध्याय 180

श्लोक 25

मन्दरस्य गिरेः पार्श्वे नलिन्यां भवकेशवौ ।रात्रौ स्वप्नान्तरे ब्रह्मन्मया दृष्टौ हराच्युतौ

mandarasya gireḥ pārśve nalinyāṃ bhavakeśavau | rātrau svapnāntare brahmanmayā dṛṣṭau harācyutau

हिन्दी अर्थ

पितामह बोले—ब्रह्मन! मैंने मन्दराचल पर्वतके पार्धभागमें रातको सोते समय सपनेमें एक सरोवरके तटपर श्रीकृष्ण और भगवान्‌ शड्डरको देखा, जो तत्काल ही एक-दूसरेके रूपमें बदल गये थे (अर्थात्‌ श्रीकृष्णकी जगह शिव और शिवकी जगह श्रीकृष्ण हो गये थे)

अध्याय 180

श्लोक 26

हरं च हरिरूपेण हरिं च हररूपिणम् ।शङ्खचक्रगदापाणिं पीताम्बरधरं हरम्

haraṃ ca harirūpeṇa hariṃ ca hararūpiṇam | śaṅkhacakragadāpāṇiṃ pītāmbaradharaṃ haram

हिन्दी अर्थ

मैंने हरको हरिरूपमें देखा और हरिको हररूपमें; भगवान्‌ हरने हाथोंमें श्ज, चक्र और गदा ले रखी थी और उनके अज्ोपर पीताम्बर शोभा पा रहा था

अध्याय 180

श्लोक 27

त्रिशूलपट्टिशधरं व्याघ्रचर्मधरं हरिम् ।गरुडस्थं चापि हरं हरिं च वृषभध्वजम्

triśūlapaṭṭiśadharaṃ vyāghracarmadharaṃ harim | garuḍasthaṃ cāpi haraṃ hariṃ ca vṛṣabhadhvajam

हिन्दी अर्थ

उधर श्रीहरि त्रिशूल और पट्टिश धारण किये बाघम्बर पहने हुए थे; भगवान्‌ श्र गरुड़पर बैठे थे और श्रीहरि वृषभवाहन होकर अपनी ध्वजामें वृषभका चिह्न धारण किये थे

अध्याय 180

श्लोक 28

विस्मयो मे महान्ब्रह्मन् दृष्ट्वा तत्परमाद्भुतम् ।एतदाचक्ष्व भगवन् याथातथ्येन सुव्रत

vismayo me mahānbrahman dṛṣṭvā tatparamādbhutam | etadācakṣva bhagavan yāthātathyena suvrata

हिन्दी अर्थ

ब्रह्मन्‌! उत्तम ब्रतका पालन करनेवाले महर्षे! वह अद्भुत दृश्य देखकर मुझे महान्‌ विस्मय हुआ। भगवन्‌ ! आप इसके रहस्यका यथार्थरूपसे विवेचन करें

अध्याय 180

श्लोक 29

शिवाय विष्णुरूपाय विष्णवे शिवरूपिणे ।यथान्तरं न पश्यामि तेन तौ दिशतः शिवम्

śivāya viṣṇurūpāya viṣṇave śivarūpiṇe | yathāntaraṃ na paśyāmi tena tau diśataḥ śivam

हिन्दी अर्थ

मार्कण्डेयजी बोले—विष्णुरूपधारी शिव और शिवरूपधारी विष्णुको नमस्कार है। मैं इन दोनोंमें कोई अन्तर नहीं देखता, मेरे इस भावसे संतुष्ट होकर वे दोनों मुझे कल्याण प्रदान करें

अध्याय 180

श्लोक 30

अनादिमध्यनिधनमेतदक्षरमव्ययम् ।तदेव ते प्रवक्ष्यामि रूपं हरिहरात्मकम्

anādimadhyanidhanametadakṣaramavyayam | tadeva te pravakṣyāmi rūpaṃ hariharātmakam

हिन्दी अर्थ

आदि, मध्य और अन्तसे रहित जो यह अविनाशी अक्षर ब्रह्म है, उसका स्वरूप हरिहरात्मक है, ब्रह्मन्‌ ! मैं आपके समक्ष उसी हरिहरात्मक ब्रह्मका वर्णन करूँगा

अध्याय 180

श्लोक 31

यो विष्णुः स तु वै रुद्रो यो रुद्रः स पितामहः ।एका मूर्तिस्त्रयो देवा रुद्रविष्णुपितामहाः

yo viṣṇuḥ sa tu vai rudro yo rudraḥ sa pitāmahaḥ | ekā mūrtistrayo devā rudraviṣṇupitāmahāḥ

हिन्दी अर्थ

जो विष्णु हैं, वे ही रुद्र हैं और जो रुद्र हैं, वे ही ब्रह्मा हैं; इनका मूलस्वरूप तो एक ही है, परंतु ये कार्यभेदसे रुद्र, विष्णु और ब्रह्मा तीन देवता कहलाते हैं

अध्याय 180

श्लोक 32

वरदा लोककर्तारो लोकनाथाः स्वयम्भुवः ।अर्धनारीश्वरास्ते तु व्रतं तीव्रं समास्थिताः

varadā lokakartāro lokanāthāḥ svayambhuvaḥ | ardhanārīśvarāste tu vrataṃ tīvraṃ samāsthitāḥ

हिन्दी अर्थ

ये सब-के-सब लोकस्रष्टा वरदायक, जगन्नाथ, स्वयम्भू, अर्धनारीश्वर तथा तीब्र ब्रतका आश्रय लेनेवाले हैं

अध्याय 180

श्लोक 33

यथा जले जलं क्षिप्तं जलमेव तु तद् भवेत् ।रुद्रं विष्णुः प्रविष्टस्तु तथा रुद्रमयो भवेत्

yathā jale jalaṃ kṣiptaṃ jalameva tu tad bhavet | rudraṃ viṣṇuḥ praviṣṭastu tathā rudramayo bhavet

हिन्दी अर्थ

जैसे जलमें डाला हुआ जल जलरूप ही हो जाता है, उसी प्रकार रुद्रदेवमें प्रविष्ट हुए भगवान्‌ विष्णु रुद्रमय हो जाते हैं

अध्याय 180

श्लोक 34

अग्निमग्निः प्रविष्टस्तु अग्निरेव यथा भवेत् ।तथा विष्णुं प्रविष्टस्तु रुद्रो विष्णुमयो भवेत्

agnimagniḥ praviṣṭastu agnireva yathā bhavet | tathā viṣṇuṃ praviṣṭastu rudro viṣṇumayo bhavet

हिन्दी अर्थ

जैसे अग्रिमें प्रविष्ट हुई अग्रि अग्रिरूप ही होती है, उसी प्रकार विष्णुमें प्रविष्ट हुए रुद्रदेव विष्णुरूप ही होते हैं

अध्याय 180

श्लोक 35

रुद्रमग्निमयं विद्याद्विष्णुः सोमात्मकः स्मृतः ।अग्नीषोमात्मकं चैव जगत् स्थावरजङ्गमम्

rudramagnimayaṃ vidyādviṣṇuḥ somātmakaḥ smṛtaḥ | agnīṣomātmakaṃ caiva jagat sthāvarajaṅgamam

हिन्दी अर्थ

रुद्रको अग्रिस्वरूप जाने और भगवान्‌ विष्णु सोमस्वरूप माने गये हैं। इसीलिये यह समस्त चराचर जगत्‌ अग्रीघोमात्मक कहलाता है

अध्याय 180

श्लोक 36

कर्तारौ चापहर्तारौ स्थावरस्य चरस्य तु ।जगतः शुभकर्तारौ प्रभविष्णू महेश्वरौ

kartārau cāpahartārau sthāvarasya carasya tu | jagataḥ śubhakartārau prabhaviṣṇū maheśvarau

हिन्दी अर्थ

यह हरि और हर ही समस्त चराचर जगत्‌के कर्ता, संहारक, शुभकारक तथा प्रभावशाली महेश्वर हैं

अध्याय 180

श्लोक 37

कर्तृकारणकर्तारौ कर्तृकारणकारकौ ।भूतभव्यभवौ देवौ नारायणमहेश्वरौ

kartṛkāraṇakartārau kartṛkāraṇakārakau | bhūtabhavyabhavau devau nārāyaṇamaheśvarau

हिन्दी अर्थ

ये नारायण और महे ध्रदेव कर्ता और कारणके भी आदि कर्ता हैं तथा कर्ता और कारणसे भी काम करानेवाले हैं। ये ही दोनों भूत, भविष्य और वर्तमानरूप हैं

अध्याय 180

श्लोक 38

जगतः पालकावेतावेतौ सृष्टिकरौ स्मृतौ ।एते चैव प्रवर्षन्ति भान्ति वान्ति सृजन्ति च ।एतत् परतरं गुह्यं कथितं ते पितामह

jagataḥ pālakāvetāvetau sṛṣṭikarau smṛtau | ete caiva pravarṣanti bhānti vānti sṛjanti ca | etat parataraṃ guhyaṃ kathitaṃ te pitāmaha

हिन्दी अर्थ

ये ही जगत्‌के पालक और ये ही इसकी सृष्टि करनेवाले माने गये हैं । ये ब्रह्मा, विष्णु और शिव (मेघरूपसे जलकी) वर्षा करते हैं । ( सूर्यरूपसे ) प्रकाशित होते हैं और (वायुरूपसे ) सर्वत्र गतिशील होते हैं । ये ही सृष्टि करते हैं। पितामह ! यह मैंने आपसे परम गुह्म रहस्यका वर्णन किया है

अध्याय 180

श्लोक 39

यश्चैनं पठते नित्यं यश्चैनं शृणुयान्नरः ।प्राप्नोति परमं स्थानं विष्णुरुद्रप्रसादजम्

yaścainaṃ paṭhate nityaṃ yaścainaṃ śṛṇuyānnaraḥ | prāpnoti paramaṃ sthānaṃ viṣṇurudraprasādajam

हिन्दी अर्थ

जो प्रतिदिन इस स्तोत्रका पाठ करता और जो इसे सुनता है, वह मनुष्य भगवान्‌ विष्णु और रुद्रकी कृपासे परम पदको प्राप्त कर लेता है

अध्याय 180

श्लोक 40

देवौ हरिहरौ स्तोष्ये ब्रह्मणा सह सङ्गतौ ।एतौ च परमौ देवौ जगतः प्रभवाप्ययौ

devau hariharau stoṣye brahmaṇā saha saṅgatau | etau ca paramau devau jagataḥ prabhavāpyayau

हिन्दी अर्थ

मैं ब्रह्माजीके साथ मिले हुए हरि और हर दोनों देवताओंकी स्तुति करूँगा । ये ही दोनों परम देव हैं और परे ही जगत्‌की सृष्टि तथा संहारके कारण हैं

अध्याय 180

श्लोक 41

रुद्रस्य परमो विष्णुर्विष्णोश्च परमः शिवः ।एक एव द्विधाभूतो लोके चरति नित्यशः

rudrasya paramo viṣṇurviṣṇośca paramaḥ śivaḥ | eka eva dvidhābhūto loke carati nityaśaḥ

हिन्दी अर्थ

द्रके परमदेव विष्णु हैं और विष्णुके परमदेव शिव हैं । एक ही परमेश्वर दो रूपोंमें व्यक्त होकर सदा समस्त जगत्‌में विचरते रहते हैं

अध्याय 180

श्लोक 42

न विना शङ्करं विष्णुर्न विना केशवं शिवः ।तस्मादेकत्वमायातौ रूद्रोपेन्द्रौ तु तौ पुरा ।नमो रुद्राय कृष्णाय नमः संहतचारिणे

na vinā śaṅkaraṃ viṣṇurna vinā keśavaṃ śivaḥ | tasmādekatvamāyātau rūdropendrau tu tau purā | namo rudrāya kṛṣṇāya namaḥ saṃhatacāriṇe

हिन्दी अर्थ

भगवान्‌ शड्रके बिना वेष्णु नहीं हैं और विष्णुके बिना शिव नहीं हैं। अतः: त्रे दोनों रुद्र और विष्णु पूर्वकालसे ही एकत्वको प्राप्त हैं । संयुक्त अथवा एकरूप होकर विचरनेवाले भगवान्‌ द्र एवं श्रीकृष्णको नमस्कार है

अध्याय 180

श्लोक 43

नमः षडर्धनेत्राय सद्विनेत्राय वै नमः ।नमः पिङ्गलनेत्राय पद्मनेत्राय वै नमः

namaḥ ṣaḍardhanetrāya sadvinetrāya vai namaḥ | namaḥ piṅgalanetrāya padmanetrāya vai namaḥ

हिन्दी अर्थ

त्रिनेत्रधारी शिवको नमस्कार है, साथ ही द्विनेत्रधारी श्रीकृष्णको नमस्कार ै; पिज़लनेत्रवाले शिवको नमस्कार है और प्रफुल्ल क्रमलके समान नेत्रवाले श्रीकृष्णको नमस्कार है

अध्याय 180

श्लोक 44

नमः कुमारगुरवे प्रद्युम्नगुरवे नमः ।नमो धरणीधराय गङ्गाधराय वै नमः

namaḥ kumāragurave pradyumnagurave namaḥ | namo dharaṇīdharāya gaṅgādharāya vai namaḥ

हिन्दी अर्थ

कुमार कार्तिकेयके पिता भगवान्‌ शिवको नमस्कार है, प्रुप्रके पिता भगवान्‌ श्रीकृष्णको नमस्कार है; शेषरूपसे पुथ्वीको धारण करनेवाले श्रीहरिको प्रणाम है तथा सिरपर गड़ाजीको धारण करनेवाले शिवको नमस्कार है

अध्याय 180

श्लोक 45

नमो मयूरपिच्छाय नमः केयूरधारिणे ।नमः कपालमालाय वनमालाय वै नमः

namo mayūrapicchāya namaḥ keyūradhāriṇe | namaḥ kapālamālāya vanamālāya vai namaḥ

हिन्दी अर्थ

मस्तकपर मोरपड्ड धारण करनेवाले श्रीकृष्णको नमस्कार है। सर्पोंका बाजूबंद धारण करनेवाले शिवको नमस्कार है। वनमालाधारी श्रीकृष्ण तथा कपालमाला- धारी शिवको प्रणाम है

अध्याय 180

श्लोक 46

नमस्त्रिशूलहस्ताय चक्रहस्ताय वै नमः ।नमः कनकदण्डाय नमस्ते ब्रह्मदण्डिने

namastriśūlahastāya cakrahastāya vai namaḥ | namaḥ kanakadaṇḍāya namaste brahmadaṇḍine

हिन्दी अर्थ

हाथमें त्रिशूल धारण करनेवाले श्रीशिवको नमस्कार है; एक हाथमें सुदर्शन चक्र धारण करनेवाले श्रीहरिको नमस्कार है। सोनेका दण्ड धारण करनेवाले श्रीहरिको और ब्रह्मदण्डधारी शिवको नमस्कार है

अध्याय 180

श्लोक 47

नमश्चर्मनिवासाय नमस्ते पीतवाससे ।नमोऽस्तु लक्ष्मीपतये उमायाः पतये नमः

namaścarmanivāsāya namaste pītavāsase | namo'stu lakṣmīpataye umāyāḥ pataye namaḥ

हिन्दी अर्थ

वस्त्रकी जगह व्याश्रचर्म धारण करनेवाले शिवको प्रणाम है। पीताम्बरधारी श्रीकृष्णको नमस्कार है, लक्ष्मीपति श्रीहरिको प्रणाम है और उमापति महादेवजीको नमस्कार है

अध्याय 180

श्लोक 48

नमः खट्वाङ्गधाराय नमो मुसलधारिणे ।नमो भस्माङ्गरागाय नमः कृष्णाङ्गधारिणे

namaḥ khaṭvāṅgadhārāya namo musaladhāriṇe | namo bhasmāṅgarāgāya namaḥ kṛṣṇāṅgadhāriṇe

हिन्दी अर्थ

खट्वाड़- धारी शिवकों प्रणाम है और मुसलधारी बलभद्रस्वरूप प्रीहरिको नमस्कार है, भस्ममय अज्ञराग धारण करनेवाले शिवको नमस्कार है तथा श्यामसुन्दर शरीरधारी श्रीहरिको प्रणाम है

अध्याय 180

श्लोक 49

नमः श्मशानवासाय नमः सागरवासिने ।नमो वृषभवाहाय नमो गरुडवाहिने

namaḥ śmaśānavāsāya namaḥ sāgaravāsine | namo vṛṣabhavāhāya namo garuḍavāhine

हिन्दी अर्थ

श्मशानवासी हर और समुद्रनिवासी हरिको बार्म्बार नमस्कार है। वृषभवाहन हर और गरुड़वाहन हरिको नमस्कार है

अध्याय 180

श्लोक 50

नमस्त्वनेकरूपाय बहुरूपाय वै नमः ।नमः प्रलयकर्त्रे च नमस्त्रैलोक्यधारिणे

namastvanekarūpāya bahurūpāya vai namaḥ | namaḥ pralayakartre ca namastrailokyadhāriṇe

हिन्दी अर्थ

अनेक अवतार धारण करनेवाले हरि और बहुत-से रूप धारण करनेवाले हरको नमस्कार है । प्रलयंकर रुद्र और त्रैलोक्यरक्षक विष्णुको नमस्कार है

अध्याय 180

श्लोक 51

नमोऽस्तु सौम्यरूपाय नमो भैरवरूपिणे ।विरूपाक्षाय देवाय नमः सौम्येक्षणाय च

namo'stu saumyarūpāya namo bhairavarūpiṇe | virūpākṣāya devāya namaḥ saumyekṣaṇāya ca

हिन्दी अर्थ

सौम्यरूपधारी श्रीहरि और भेरवरूपधारी रुद्र- देवको नमस्कार है। विरूप नेत्रवाले महादेवजी तथा सौम्य दृष्टिवाले श्रीहरिको प्रणाम है

अध्याय 180

श्लोक 52

दक्षयज्ञविनाशाय बलेर्नियमनाय च ।नमः पर्वतवासाय नमः सागरवासिने

dakṣayajñavināśāya balerniyamanāya ca | namaḥ parvatavāsāya namaḥ sāgaravāsine

हिन्दी अर्थ

शततमो5ध्याय: + ९०५ दक्षयज्ञका ध्वंस करनेवाले रुद्र तथा बलिको बाँधनेवाले वामनरूपधारी श्रीहरिको नमस्कार है । पर्वत- निवासी शिव और समुद्रवासी विष्णुको नमस्कार है

अध्याय 180

श्लोक 53

नमः सुररिपुघ्नाय त्रिपुरघ्नाय वै नमः ।नमोऽस्तु नरकघ्नाय नमः कामाङ्गनाशिने

namaḥ suraripughnāya tripuraghnāya vai namaḥ | namo'stu narakaghnāya namaḥ kāmāṅganāśine

हिन्दी अर्थ

देवद्रोहियोंका नाश करनेवाले श्रीहरिको प्रणाम है, त्रिपुरासुरके विनाशक रुद्रदेवको नमस्कार है; नरकासुरका बिनाश करनेवाले विष्णुको नमस्कार है और कामदेवके शरीरको दग्ध कर डालनेवाले भगवान्‌ शिवको नमस्कार है

अध्याय 180

श्लोक 54

नमस्त्वन्धकनाशाय नमः कैटभनाशिने ।नमः सहस्रहस्ताय नमोऽसङ्ख्येयबाहवे

namastvandhakanāśāya namaḥ kaiṭabhanāśine | namaḥ sahasrahastāya namo'saṅkhyeyabāhave

हिन्दी अर्थ

अन्धकासुरका नाश करनेवाले रुद्रको नमस्कार है, कैटभका वध करनेवाले विष्णुको नमस्कार है। सहस्रों हाथोंवाले विष्णु और असंख्य भुजाओंवाले शिवको नमस्कार है

अध्याय 180

श्लोक 55

नमः सहस्रशीर्षाय बहुशीर्षाय वै नमः ।दामोदराय देवाय मुञ्जमेखलिने नमः

namaḥ sahasraśīrṣāya bahuśīrṣāya vai namaḥ | dāmodarāya devāya muñjamekhaline namaḥ

हिन्दी अर्थ

सहस्रों मस्तकवाले श्रीहरि और बहुत-से मस्तकवाले भगवान्‌ शिवको नमस्कार है। जिनके उदरमें यशोदा माताके द्वारा रस्सी बाँधी गयी, उन दामोदरदेवको नमस्कार है तथा कटिप्रदेशमें मूँजकी मेखला धारण करनेवाले भगवान्‌ शिवको प्रणाम है

अध्याय 180

श्लोक 56

नमस्ते भगवन् विष्णो नमस्ते भगवञ्छिव ।नमस्ते भगवन् देव नमस्ते देवपूजित

namaste bhagavan viṣṇo namaste bhagavañchiva | namaste bhagavan deva namaste devapūjita

हिन्दी अर्थ

भगवन्‌! विष्णो! आपको नमस्कार है। भगवन्‌ ! शिव ! आपको प्रणाम है। भगवन्‌! महादेव! आपको नमस्कार है। देवपूजित परमेश्वर! आपको प्रणाम है

अध्याय 180

श्लोक 57

नमस्ते सामभिर्गीत नमस्ते यजुभिः सह ।नमस्ते सुरशत्रुघ्न नमस्ते सुरपूजित

namaste sāmabhirgīta namaste yajubhiḥ saha | namaste suraśatrughna namaste surapūjita

श्लोक 57–58 का हिन्दी अर्थ

सामवेदके मन्त्रोंद्वारा गाये जानेवाले परमात्मन्‌ ! आपको नमस्कार है | यजुर्वेदके साथ सम्बन्ध रखनेवाले देवता! आपको प्रणाम है। आप ही कर्मपरायण पुरुषोंके कर्म हैं, आपको नमस्कार है। आपके पराक्रमकी कोई सीमा नहीं है—आपको नमस्कार है। देवद्रोहियोंका नाश करनेवाले श्रीकृष्ण! आपको नमस्कार है। देवपूजित महादेव! आपको प्रणाम है। हृषीकेश! आपको नमस्कार है। सुनहरे केशवाले शिव! आपको प्रणाम है

अध्याय 180

श्लोक 58

नमस्ते कर्मिणां कर्म नमोऽमितपराक्रम ।हृषीकेश नमस्तेऽस्तु स्वर्णकेश नमोऽस्तु ते

namaste karmiṇāṃ karma namo'mitaparākrama | hṛṣīkeśa namaste'stu svarṇakeśa namo'stu te

अर्थ श्लोक 57 के साथ

अध्याय 180

श्लोक 60

इमं स्तवं यो रुद्रस्य विष्णोश्चैव महात्मनः ।समेत्य ऋषिभिः सर्वैः स्तुतौ स्तौति महर्षिभिः ५९॥ व्यासेन वेदविदुषा नारदेन च धीमता ।भारद्वाजेन गर्गेण विश्वामित्रेण वै तथा

imaṃ stavaṃ yo rudrasya viṣṇoścaiva mahātmanaḥ | sametya ṛṣibhiḥ sarvaiḥ stutau stauti maharṣibhiḥ 59|| vyāsena vedaviduṣā nāradena ca dhīmatā | bhāradvājena gargeṇa viśvāmitreṇa vai tathā

अध्याय 180

श्लोक 61

अगस्त्येन पुलस्त्येन धौम्येन तु महात्मना ।य इदं पठते नित्यं स्तोत्रं हरिहरात्मकम्

agastyena pulastyena dhaumyena tu mahātmanā | ya idaṃ paṭhate nityaṃ stotraṃ hariharātmakam

अध्याय 180

श्लोक 62

अरोगो बलवांश्चैव जायते नात्र संशयः ।श्रियं च लभते नित्यं न च स्वर्गान्निवर्तते

arogo balavāṃścaiva jāyate nātra saṃśayaḥ | śriyaṃ ca labhate nityaṃ na ca svargānnivartate

अध्याय 180

श्लोक 63

अपुत्रो लभते पुत्रं कन्या विन्दति सत्पतिम् ।गुर्विणी शृणुते या तु वरं पुत्रं प्रसूयते

aputro labhate putraṃ kanyā vindati satpatim | gurviṇī śṛṇute yā tu varaṃ putraṃ prasūyate

हिन्दी अर्थ

पुत्रहीन पुरुष इसके पाठसे पुत्र पाता है, कुमारी कन्या श्रेष्ठ पति प्राप्त कर लेती है तथा जो गर्भवती स्त्री इसका श्रवण करती है, वह उत्तम पुत्रको जन्म देती है

अध्याय 180

श्लोक 64

राक्षसाश्च पिशाचाश्च विघ्नानि च विनायकः ।भयं तत्र न कुर्वन्ति यत्रायं पठ्यते स्तवः

rākṣasāśca piśācāśca vighnāni ca vināyakaḥ | bhayaṃ tatra na kurvanti yatrāyaṃ paṭhyate stavaḥ

हिन्दी अर्थ

जहाँ प्रतिदिन इस स्तोत्रका पाठ किया जाता है, त्रहाँ राक्षस, पिशाच, विघ्न और विनायक भय नहीं उपस्थित करते हैं

स्रोत: local proofread transcription: Sanskrit shlokas of the Harivamsa (Harivamsha, Vishnu and Bhavishya parvas) from sanskritdocuments.org. One chapter per adhyaya; verse numbers as printed in the source (restarting in each adhyaya). Appendix sections are not included. · प्राप्त 19/10/2026

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शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पाठ-भेद एवं संशोधनVariants & corrections

पाठ-भेद टिप्पणी (Alternative Reading / Variant Notes):

Collated with BORI Critical Edition of Mahabharata Khilaparvan.