अध्याय 18
श्लोक 1
पितृकल्प-मार्कण्डेय सनत्कुमार संवाद में पितरो के गण, लोक, शक्ति और कन्याओं का वर्णन तथा पितरो के प्रभाव को देखने के लिये मार्कण्डेयजी को दिव्य दृष्टि की प्राप्ति इत्युक्तोऽहं भगवता देवदेवेन भास्वता ।सनत्कुमारेण पुनः पृष्टवान् देवमव्ययम्
pitṛkalpa-mārkaṇḍeya sanatkumāra saṃvāda meṃ pitaro ke gaṇa, loka, śakti aura kanyāoṃ kā varṇana tathā pitaro ke prabhāva ko dekhane ke liye mārkaṇḍeyajī ko divya dṛṣṭi kī prāpti ityukto'haṃ bhagavatā devadevena bhāsvatā | sanatkumāreṇa punaḥ pṛṣṭavān devamavyayam
श्लोक 1–2 का हिन्दी अर्थ
मार्कण्डेयजी कहते हैं—गज़ानन्दन भीष्म ! तेजस्वी देवदेव भगवान् सनत्कुमारके इस प्रकार कहनेपर मैंने काम-क्रोधादि शत्रुओंका दमन करनेवाले उन देवश्रेष्ठ अव्यय भगवान् सनत्कुमारसे अपने जिन सारे संदेहोंको आरम्भसे पूछा था, उन्हें मुझसे सुनो
English
⁵² A reciter of the prayers &c. of the Sama Veda.