Harivamsha Purana
175
अध्याय 175 / 318

Parva 2, Adhyāya 120

48 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ48 श्लोक

अध्याय 175

श्लोक 1

अनिरुद्धेन आर्यादेव्याः स्तुतिः, देव्या प्रसन्नं भूत्वा तस्य बन्धनानां कष्टेभिः मोचनं यदा बाणपुरे वीरः सोऽनिरुद्धः सहोषया ।सन्निरुद्धो नरेन्द्रेण बाणेन बलिसूनुना

aniruddhena āryādevyāḥ stutiḥ, devyā prasannaṃ bhūtvā tasya bandhanānāṃ kaṣṭebhiḥ mocanaṃ yadā bāṇapure vīraḥ so'niruddhaḥ sahoṣayā | sanniruddho narendreṇa bāṇena balisūnunā

श्लोक 1–2 का हिन्दी अर्थ

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! जब उषाके वीर अनिरुद्ध बलिकुमार राजा बाणासुरके द्वारा गगरमें बंदी बना लिये गये, तब वे अपनी रक्षाके कोटवती देवीकी शरणमें गये। उस समय रद्धने जिस स्तोत्रका गान किया था, वह इस प्रकार पुनो

अध्याय 175

श्लोक 2

तदा देवीं कोटवतीं रक्षार्थं शरणं गतः ।यद् गीतमनिरुद्धेन देव्याः स्तोत्रमिदं शृणु

tadā devīṃ koṭavatīṃ rakṣārthaṃ śaraṇaṃ gataḥ | yad gītamaniruddhena devyāḥ stotramidaṃ śṛṇu

अर्थ श्लोक 1 के साथ

अध्याय 175

श्लोक 3

अनन्तमक्षयं दिव्यमादिदेवं सनातनम् ।नारायणं नमस्कृत्य प्रवरं जगतां प्रभुम्

anantamakṣayaṃ divyamādidevaṃ sanātanam | nārāyaṇaṃ namaskṛtya pravaraṃ jagatāṃ prabhum

श्लोक 3–4 का हिन्दी अर्थ

जो अनन्त, अक्षय, दिव्य, आदिदेव सनातन हैं, उन सर्वश्रेष्ठ जगदीश्वर नारायणदेवको करार करके. विश्ववन्दित वरदायिनी चण्डी ायनी आर्या देवीका मैं श्रीहरिके द्वारा प्रशंसित से कीर्तन करूँगा

अध्याय 175

श्लोक 4

चण्डीं कात्यायनीं देवीमार्यां लोकनमस्कृताम् ।वरदां कीर्तयिष्यामि नामभिर्हरिसंस्तुतैः

caṇḍīṃ kātyāyanīṃ devīmāryāṃ lokanamaskṛtām | varadāṃ kīrtayiṣyāmi nāmabhirharisaṃstutaiḥ

अर्थ श्लोक 3 के साथ

अध्याय 175

श्लोक 5

ऋषिभिर्दैवतैश्चैव वाक्पुष्पैरर्चितां शुभाम् ।तां देवीं सर्वदेहस्थां सर्वदेवनमस्कृताम्

ṛṣibhirdaivataiścaiva vākpuṣpairarcitāṃ śubhām | tāṃ devīṃ sarvadehasthāṃ sarvadevanamaskṛtām

हिन्दी अर्थ

ऋषियों और देवताओंने वाणीरूपी पुष्पोंद्वारा जिन मज्लमयी देवीकी पूजा की है, जो सबके शरीरमें विराजमान हैं तथा सम्पूर्ण देवता जिन्हें नमस्कार करते हैं, उन आर्या देवीका मैं गुणगान करूँगा

अध्याय 175

श्लोक 6

महेन्द्रविष्णुभगिनीं नमस्यामि हिताय वै ।मनसा भावशुद्धेन शुचिः स्तोष्ये कृताञ्जलिः

mahendraviṣṇubhaginīṃ namasyāmi hitāya vai | manasā bhāvaśuddhena śuciḥ stoṣye kṛtāñjaliḥ

हिन्दी अर्थ

अनिरुद्धने कहा—जो देवराज इन्द्र और भगवान्‌ विष्णुकी बहिन हैं, उन देवीको मैं अपने हितके लिये नमस्कार करता हूँ तथा हाथ जोड़कर पत्रित्र हो भावशुद्ध हृदयसे उनकी स्तुति करना चाहता हूँ

अध्याय 175

श्लोक 7

गौतमीं कंसभयदां यशोदानन्दवर्द्धिनीम् ।मेध्यां गोकुलसम्भूतां नन्दगोपस्य नन्दिनीम्

gautamīṃ kaṃsabhayadāṃ yaśodānandavarddhinīm | medhyāṃ gokulasambhūtāṃ nandagopasya nandinīm

हिन्दी अर्थ

जो गौतमी (गोदावरी )-स्वरूपा, कंसको भय देनेवाली, यशोदाका आनन्द बढ़ानेवाली, पतित्र, गोकुलमें आविर्भूत तथा नन्दगोपकी नन्दिनी हैं, उन आयदिवीको मैं नमस्कार करता हूँ

अध्याय 175

श्लोक 8

प्राज्ञां दक्षां शिवां सौम्यां दनुपुत्रविमर्दिनीम् ।तां देवीं सर्वदेहस्थां सर्वभूतनमस्कृताम्

prājñāṃ dakṣāṃ śivāṃ saumyāṃ danuputravimardinīm | tāṃ devīṃ sarvadehasthāṃ sarvabhūtanamaskṛtām

हिन्दी अर्थ

जो प्राज्ञा (बुद्धिमती एवं विदुषी ), दक्षा, कल्याणस्वरूपा, सौम्या, दानवमर्दिनी, सबके शरीरमें विद्यमान तथा सम्पूर्ण भूतोंद्वारा वन्दित हैं, उन आयदिवीको मेरा प्रणाम है

अध्याय 175

श्लोक 9

दर्शनीं पूरणीं मायां वह्निसूर्यशशिप्रभाम् ।शान्तिं ध्रुवां च जननीं मोहनीं शोषणीं तथा

darśanīṃ pūraṇīṃ māyāṃ vahnisūryaśaśiprabhām | śāntiṃ dhruvāṃ ca jananīṃ mohanīṃ śoṣaṇīṃ tathā

श्लोक 9–10 का हिन्दी अर्थ

जो दर्शनी (दृष्टिशक्ति), पूरणी (मनोरथोंकी पूर्ति करनेवाली ), मायास्वरूपा, अग्नि, सूर्य और चन्द्रमाके समान कान्तिवाली, शान्तिमयी, शध्रुवा (अविनाशिनी), सबकी जननी, मोहिनी तथा शोषणी हैं, ऋषियोंसहित सम्पूर्ण देवता जिनकी सेवा करते हैं, समस्त देवता जिनके चरणोंमें शीश झुकाते हैं, जो काली, कात्यायनी देवी, भयदायिनी तथा भयनाशिनी हैं, उनको मैं नमस्कार करता हूँ

अध्याय 175

श्लोक 10

सेव्यां देवैः सर्षिगणैः सर्वदेवनमस्कृताम् ।कालीं कात्यायनीं देवीं भयदां भयनाशिनीम्

sevyāṃ devaiḥ sarṣigaṇaiḥ sarvadevanamaskṛtām | kālīṃ kātyāyanīṃ devīṃ bhayadāṃ bhayanāśinīm

अर्थ श्लोक 9 के साथ

अध्याय 175

श्लोक 11

कालरात्रिं कामगमां त्रिनेत्रां ब्रह्मचारिणीम् ।सौदामिनीं मेघरवां वेतालीं विपुलाननाम्

kālarātriṃ kāmagamāṃ trinetrāṃ brahmacāriṇīm | saudāminīṃ megharavāṃ vetālīṃ vipulānanām

हिन्दी अर्थ

जो कालरात्रि, इच्छानुसार सर्वत्र जा सकनेवाली, त्रिनेत्रधारिणी और ब्रह्मचारिणी हैं, जो विद्युत्स्वरूपा, मेघके समान गर्जना करनेवाली, वेताली और विशाल मुखवाली हैं, उन देवीको मैं नमस्कार करता हूँ

अध्याय 175

श्लोक 12

यूथस्याद्यां महाभागां शकुनीं रेवतीं तथा ।तिथीनां पञ्चमीं षष्ठीं पूर्णमासीं चतुर्दशीम्

yūthasyādyāṃ mahābhāgāṃ śakunīṃ revatīṃ tathā | tithīnāṃ pañcamīṃ ṣaṣṭhīṃ pūrṇamāsīṃ caturdaśīm

हिन्दी अर्थ

जो यूथकी प्रधान अध्यक्षा, महासौभाग्यशालिनी, शकुनी, रेवती आदि ग्रहस्वरूपा तथा तिथियोंमें पश्नमी, षष्ठी, पूर्णणासी और चतुर्दशीस्वरूपा हैं, उन देवीको नमस्कार है

अध्याय 175

श्लोक 13

सप्तविंशतिऋक्षाणि नद्यः सर्वा दिशो दश ।नगरोपवनोद्यानद्वाराट्टालकवासिनीम्

saptaviṃśatiṛkṣāṇi nadyaḥ sarvā diśo daśa | nagaropavanodyānadvārāṭṭālakavāsinīm

हिन्दी अर्थ

सत्ताईस नक्षत्र, सम्पूर्ण नदियाँ और दसों दिशाएँ—ये जिनके स्वरूप हैं, जो नगरों, उपवनों, उद्यानों और अट्टालिकाओंमें उनकी अधिष्ठात्री देवीके रूपमें निवास करती हैं, उन आयदिवीको मैं नमस्कार करता हूँ

अध्याय 175

श्लोक 14

ह्रीं श्रीं गङ्गां च गन्धर्वां योगिनीं योगदां सताम् ।कीर्तिमाशां दिशं स्पर्शां नमस्यामि सरस्वतीम्

hrīṃ śrīṃ gaṅgāṃ ca gandharvāṃ yoginīṃ yogadāṃ satām | kīrtimāśāṃ diśaṃ sparśāṃ namasyāmi sarasvatīm

हिन्दी अर्थ

जो ही (लजजा), श्री (लक्ष्मी या सम्पत्ति), गड़ा, गन्धर्वा (श्रीराधा), योगिनी तथा सत्पुरुषोंको योग प्रदान करनेवाली हैं, उन कीर्ति, आशा, दिशा, स्पर्शा एवं सरस्वती नामवाली देवीको मैं प्रणाम करता हूँ

अध्याय 175

श्लोक 15

वेदानां मातरं चैव सावित्रीं भक्तवत्सलाम् ।तपस्विनीं शान्तिकरीमेकानंशां सनातनाम्

vedānāṃ mātaraṃ caiva sāvitrīṃ bhaktavatsalām | tapasvinīṃ śāntikarīmekānaṃśāṃ sanātanām

हिन्दी अर्थ

जो वेदोंकी माता, भक्तवत्सला सावित्री, तपस्विनी, शान्तिकरी, एकानंशा एवं सनातन-स्वरूपा हैं, उन आर्यादिवीको नमस्कार है

अध्याय 175

श्लोक 16

कौटीर्यां मदिरां चण्डामिलां मलयवासिनीम् ।भूतधात्रीं भयकरीं कूष्माण्डीं कुसुमप्रियाम्

kauṭīryāṃ madirāṃ caṇḍāmilāṃ malayavāsinīm | bhūtadhātrīṃ bhayakarīṃ kūṣmāṇḍīṃ kusumapriyām

हिन्दी अर्थ

ततमो जो कुटीरवासिनी, मत्त बना देनेवाली, अत्यन्त क्रोपना, इला, मलयवासिनी, सम्पूर्ण भूतोंको धारण करनेवाली, भयड्री, कूष्माण्डी और कुसुमप्रिया हैं, उन देवीको मेरा नमस्कार है

अध्याय 175

श्लोक 17

दारुणीं मदिरावासां विन्ध्यकैलासवासिनीम् ।वराङ्गनां सिंहरथीं बहुरूपां वृषध्वजाम्

dāruṇīṃ madirāvāsāṃ vindhyakailāsavāsinīm | varāṅganāṃ siṃharathīṃ bahurūpāṃ vṛṣadhvajām

हिन्दी अर्थ

जिनका स्वभाव ररुण है, आवासस्थान भी मत्त बना देनेवाला है, जो वन्ध्य और कैलास पर्वतपर निवास करती हैं, श्रेष्ठ भद्धना हैं, सिंह जिनका रथ या वाहन है, जो बहुत- मे रूप धारण करनेवाली तथा वृषभचिह्मसे चिह्नित तजवाली हैं, उन देवीको नमस्कार है

अध्याय 175

श्लोक 18

दुर्लभां दुर्जयां दुर्गां निशुम्भभयदर्शिनीम् ।सुरप्रियां सुरां देवीं वज्रपाण्यनुजां शिवाम्

durlabhāṃ durjayāṃ durgāṃ niśumbhabhayadarśinīm | surapriyāṃ surāṃ devīṃ vajrapāṇyanujāṃ śivām

हिन्दी अर्थ

जो र्लभ, दुर्जय, दुर्गम, निशुम्भासुरको भय दिखानेवाली, रवप्रिया, सुरस्वरूपा तथा वज़पाणि इन्द्रकी अनुजा , उन कल्याणमयी देवीको नमस्कार है

अध्याय 175

श्लोक 19

किरातीं चीरवसनां चौरसेनानमस्कृताम् ।आज्यपां सोमपां सौम्यां सर्वपर्वतवासिनीम्

kirātīṃ cīravasanāṃ caurasenānamaskṛtām | ājyapāṃ somapāṃ saumyāṃ sarvaparvatavāsinīm

हिन्दी अर्थ

जो केरात-वेष धारण करनेवाली, चीर-वस्त्रधारिणी और ोरोंकी सेनासे नमस्कृत हैं तथा जो घृत पीनेवाली, गोमरसका पान करनेवाली, सौम्यस्वरूपा एवं समस्त र्वतोंमें निवास करनेवाली हैं, उन देवीको मैं नमस्कार रता हूँ

अध्याय 175

श्लोक 20

निशुम्भशुम्भमथनीं गजकुम्भोपमस्तनीम् ।जननीं सिद्धसेनस्य सिद्धचारणसेविताम्

niśumbhaśumbhamathanīṃ gajakumbhopamastanīm | jananīṃ siddhasenasya siddhacāraṇasevitām

श्लोक 20–24 का हिन्दी अर्थ

जो निशुम्भ और शुम्भका संहार ररनेवाली हैं, जिनके स्तन हाथीके कुम्भस्थलके समान गान पड़ते हैं तथा सिद्ध और चारण जिनकी सेवामें गे रहते हैं, जो कार्तिकेयकी जननी हैं, जिनसे मारकी उत्पत्ति हुई है तथा जो पर्वतकी पुत्री होनेपर भी सर्वत्र विचरनेवाली हैं, उन पार्वती देवीको मैं प्रणाम रता हूँ। पचास देवकन्याओंमें , जो देवताओंकी त्नियाँ हैं उनमें, कद्के जो हजारों पुत्र हैं-उनके ्रों और पौत्रोंकी जो सुन्दरी स्त्रियाँ हैं—उनमें, माता गौर पितामें, स्वर्गके देवताओं और अप्सराओंसहित इषिपत्नियों में, यक्षों और गन्धर्वोंकी स्त्रियोंमें, विद्याधरोंकी रियोंमें और सती-साध्वी मानवी स््त्रियोंमें, इस प्रकार न उपर्युक्त महिलाओंमें आप जगन्माता देवीका निवास ; क्योंकि आप सम्पूर्ण भूतोंका आश्रय हैं। तीनों लोकोंमें र्वत्र आपके चरणोंमें मस्तक झुकाया जाता है। किन्ननलोग च्व स्वरसे गीत गाकर आपकी सेवा करते हैं

अध्याय 175

श्लोक 21

चरां कुमारप्रभवां पार्वतीं पर्वतात्मजाम् ।पञ्चाशद्देवकन्यानां पत्न्यो देवगणस्य च

carāṃ kumāraprabhavāṃ pārvatīṃ parvatātmajām | pañcāśaddevakanyānāṃ patnyo devagaṇasya ca

अर्थ श्लोक 20 के साथ

अध्याय 175

श्लोक 22

कद्रुपुत्रसहस्रस्य पुत्रपौत्रवरस्त्रियः ।माता पिता जगन्मान्या दिवि देवाप्सरोगणैः

kadruputrasahasrasya putrapautravarastriyaḥ | mātā pitā jaganmānyā divi devāpsarogaṇaiḥ

अर्थ श्लोक 20 के साथ

अध्याय 175

श्लोक 23

ऋषिपत्नीगणानां च यज्ञगन्धर्वयं पिताम् ।विद्याधराणां नारीषु साध्वीषु मनुजासु च

ṛṣipatnīgaṇānāṃ ca yajñagandharvayaṃ pitām | vidyādharāṇāṃ nārīṣu sādhvīṣu manujāsu ca

अर्थ श्लोक 20 के साथ

अध्याय 175

श्लोक 24

एवमेतासु नारीषु सर्वभूताश्रया ह्यसि ।नमस्कृतासि त्रैलोक्ये किन्नरोद्गीतसेविते

evametāsu nārīṣu sarvabhūtāśrayā hyasi | namaskṛtāsi trailokye kinnarodgītasevite

अर्थ श्लोक 20 के साथ

अध्याय 175

श्लोक 25

अचिन्त्या ह्यप्रमेयासि यासि सासि नमोऽस्तु ते ।एभिर्नामभिरन्यैश्च कीर्तिता ह्यसि गौतमि

acintyā hyaprameyāsi yāsi sāsi namo'stu te | ebhirnāmabhiranyaiśca kīrtitā hyasi gautami

हिन्दी अर्थ

पाप अचिन्त्य और अप्रमेय हैं, जो हैं सो हैं, आपको मस्कार है। गौतमनन्दिनि! इन पूर्वोक्त नामोंसे और सरे नामोंसे भी आपका ही कीर्तन होता है

अध्याय 175

श्लोक 26

त्वत्प्रसादादविघ्नेन क्षिप्रं मुच्येय बन्धनात् ।अवेक्षस्व विशालाक्षि पादौ ते शरणं व्रजे

tvatprasādādavighnena kṣipraṃ mucyeya bandhanāt | avekṣasva viśālākṣi pādau te śaraṇaṃ vraje

श्लोक 26–30 का हिन्दी अर्थ

से २७ सोमको, १३ कश्यपको और १० धर्मको व्याही गयी विशाललोचने! मैं आपकी कृपासे बिना किसी बघ्न-बाधाके शीघ्र बन्धनमुक्त हो जाऊँ। आप मेरे पर कृपादृष्टि करें; मैं आपके चरणोंकी शरण लेता हूँ। माप मुझे सभी बन्धनोंसे छुड़ानेयोग्य हैं । ब्रह्मा, विष्णु, द्र, चन्द्रमा, सूर्य, अग्नि, वायु, अश्विनीकुमार, वसु, वश्चेदेव, साध्यगण, मरुदूगण, पर्जन्य, धाता, भूमि, दसों दशाएँ, गौ, नक्षत्रसमूह, ग्रहगण, नदियाँ, सरोवर, सरिताएँ, पमुद्र, नाना विद्याधर, सर्प, नाग, गरुड़, गन्धर्व और पप्सराओंके समूह—इस प्रकार देवीके नामोंका बार्म्बार कीर्तन करनेसे इस सम्पूर्ण जगत्‌का कीर्तन हो जाता

अध्याय 175

श्लोक 27

सर्वेषामेव बन्धानां मोक्षणं कर्तुमर्हसि ।ब्रह्मा विष्णुश्च रुद्रश्च चन्द्रसूर्याग्निमारुताः

sarveṣāmeva bandhānāṃ mokṣaṇaṃ kartumarhasi | brahmā viṣṇuśca rudraśca candrasūryāgnimārutāḥ

अर्थ श्लोक 26 के साथ

अध्याय 175

श्लोक 28

अश्विनौ वसवश्चैव विश्वेसाध्यास्तथैव च ।मरुता सह पर्जन्यो धाता भूमिर्दिशो दश

aśvinau vasavaścaiva viśvesādhyāstathaiva ca | marutā saha parjanyo dhātā bhūmirdiśo daśa

अर्थ श्लोक 26 के साथ

अध्याय 175

श्लोक 29

गावो नक्षत्रवंशाश्च ग्रहा नद्यो ह्रदास्तथा ।सरितः सागराश्चैव नानाविद्याधरोरगाः

gāvo nakṣatravaṃśāśca grahā nadyo hradāstathā | saritaḥ sāgarāścaiva nānāvidyādharoragāḥ

अर्थ श्लोक 26 के साथ

अध्याय 175

श्लोक 30

तथा नागाः सुपर्वाणो गन्धर्वाप्सरसां गणाः ।कृत्स्नं जगदिदं प्रोक्तं देव्या नामानुकीर्तनात्

tathā nāgāḥ suparvāṇo gandharvāpsarasāṃ gaṇāḥ | kṛtsnaṃ jagadidaṃ proktaṃ devyā nāmānukīrtanāt

अर्थ श्लोक 26 के साथ

अध्याय 175

श्लोक 31

देव्याः स्तवमिमं पुण्यं यः पठेत् सुसमाहितः ।सा तस्मै सप्तमे मासि वरमग्र्यं प्रयच्छति

devyāḥ stavamimaṃ puṇyaṃ yaḥ paṭhet susamāhitaḥ | sā tasmai saptame māsi varamagryaṃ prayacchati

हिन्दी अर्थ

जो एकाग्रचित्त होकर देवीके इस पवित्र तोत्रका पाठ करता है, देवी उसे सातवें महीनेमें उत्तम र प्रदान करती हैं

अध्याय 175

श्लोक 32

अष्टादशभुजा देवी दिव्याभरणभूषिता ।हारशोभितसर्वाङ्गी मुकुटोज्ज्वलभूषणा

aṣṭādaśabhujā devī divyābharaṇabhūṣitā | hāraśobhitasarvāṅgī mukuṭojjvalabhūṣaṇā

हिन्दी अर्थ

देवीकी अठारह भुजाएँ हैं। बे दिव्य आभरणोंसे विभूषित हैं । हारसे उनके सारे अज्ज पुशोभित हैं। मुकुटकी आभासे उनके आभूषण चमक ठे हैं

अध्याय 175

श्लोक 33

कात्यायनि स्तूयसे त्वं वरमग्र्यं प्रयच्छसि ।अतः स्तवीमि त्वां देवीं वरदे वामलोचने

kātyāyani stūyase tvaṃ varamagryaṃ prayacchasi | ataḥ stavīmi tvāṃ devīṃ varade vāmalocane

हिन्दी अर्थ

कात्यायनि! जब आपकी स्तुति की नाती है, तब आप उत्तम वर प्रदान करती हैं। अत: रदायिनि वामलोचने! मैं आप देवीकी स्तुति करता ूँ

अध्याय 175

श्लोक 34

नमोऽस्तु ते महादेवि सुप्रीता मे सदा भव ।प्रयच्छ त्वं वरं ह्यायुः पुष्टिं चैव क्षमां धृतिम्

namo'stu te mahādevi suprītā me sadā bhava | prayaccha tvaṃ varaṃ hyāyuḥ puṣṭiṃ caiva kṣamāṃ dhṛtim

हिन्दी अर्थ

महादेवि! आपको नमस्कार है। आप सदा पुझपर सुप्रसन्न रहें और मुझे श्रेष्ठ आयु, पुष्टि, क्षमा तथा रर्य प्रदान करें। मैं बन्धनमें पड़ा हुआ हूँ, किंतु इससे मुक हो जाऊँ—मेरा यह संकल्प सत्य हो

अध्याय 175

श्लोक 35

बन्धनस्थो विमुच्येयं सत्यमेतद् भवेदिति ।एवं स्तुता महादेवी दुर्गा दुर्गपराक्रमा

bandhanastho vimucyeyaṃ satyametad bhavediti | evaṃ stutā mahādevī durgā durgaparākramā

श्लोक 35–37 का हिन्दी अर्थ

वैशम्पायनजी कहते हैं—राजन्‌! इस प्रकार तुति की जानेपर दुर्गम पराक्रम प्रकट करनेवाली पहादेवी दुरगनि बन्धनागारमें अनिरुद्धके पास आकर न्हें दर्शन दिया। उस शरणागतवत्सला देवीने बाणनगरमें थे हुए वीर अनिरुद्धको उनका हित-साधन करनेके लये बन्धनसे मुक्त कर दिया। साथ ही उन अमर्षशील और अनिरुद्धको सान्त्वना प्रदान की

अध्याय 175

श्लोक 36

सान्निध्यं कल्पयामास अनिरुद्धस्य बन्धने ।अनिरुद्धहितार्थाय देवी शरणवत्सला

sānnidhyaṃ kalpayāmāsa aniruddhasya bandhane | aniruddhahitārthāya devī śaraṇavatsalā

अर्थ श्लोक 35 के साथ

अध्याय 175

श्लोक 37

बद्धं बाणपुरे वीरमनिरुद्धं व्यमोक्षयत् ।सान्त्वयामास तं वीरमनिरुद्धममर्षणम्

baddhaṃ bāṇapure vīramaniruddhaṃ vyamokṣayat | sāntvayāmāsa taṃ vīramaniruddhamamarṣaṇam

अर्थ श्लोक 35 के साथ

अध्याय 175

श्लोक 38

पूजयामास तां वीरः सोऽनिरुद्धः प्रतापवान् ।प्रसादं दर्शयामास अनिरुद्धस्य बन्धने

pūjayāmāsa tāṃ vīraḥ so'niruddhaḥ pratāpavān | prasādaṃ darśayāmāsa aniruddhasya bandhane

हिन्दी अर्थ

उस पमय प्रतापी वीर अनिरुद्धने देवीका पूजन किया। रैवीने बन्धनागारमें अनिरुद्धको अपनी कृपाका प्रत्यक्ष रर्शन कराया

अध्याय 175

श्लोक 39

नागपाशेन बद्धस्य तस्योषाहृतचेतसः ।स्फोटयित्वा कराग्रेण पञ्जरं वज्रसन्निभम्

nāgapāśena baddhasya tasyoṣāhṛtacetasaḥ | sphoṭayitvā karāgreṇa pañjaraṃ vajrasannibham

श्लोक 39–40 का हिन्दी अर्थ

जो नागपाशमें बँधे हुए थे और इषाने जिनके चित्तको चुरा लिया था, उन अनिरुद्धके त्ज़तुल्य पिंजरेको अपने हाथके अग्रभागसे तोड़- फोड़कर देवीने बाणपुरमें अवरुद्ध हुए वीर अनिरुद्धको पुक्ता कर दिया और कृपा करनेके लिये उद्यत हो हें सान्त्वना देते हुए इस प्रकार कहा—

अध्याय 175

श्लोक 40

रुद्धं बाणपुरे वीरं सानिरुद्धमभाषत ।सान्त्वयन्ती वचो देवी प्रसादाभिमुखी तदा

ruddhaṃ bāṇapure vīraṃ sāniruddhamabhāṣata | sāntvayantī vaco devī prasādābhimukhī tadā

अर्थ श्लोक 39 के साथ

अध्याय 175

श्लोक 41

चक्रायुधो मोक्षयितानिरुद्ध त्वां बन्धनादाशु सहस्व कालम् ।छित्त्वा स बाणस्य सहस्रबाहुं पुरीं निजां नेष्यति दैत्यसूदनः

cakrāyudho mokṣayitāniruddha tvāṃ bandhanādāśu sahasva kālam | chittvā sa bāṇasya sahasrabāhuṃ purīṃ nijāṃ neṣyati daityasūdanaḥ

श्लोक 41–42 का हिन्दी अर्थ

श्रीदेवीने कहा—अनिरुद्ध! चक्रधारी भगवान्‌ कृष्ण शीघ्र आकर तुम्हें पूर्णत: इस बन्धनसे छुड़ायेंगे, तक कुछ कालतक इस कष्टको सहन करो। वे यसूदन श्रीहरि बाणासुरकी सहस्र भुजाओंका छेदन (के तुम्हें अपनी पुरीको ले जायँगे। तदनन्तर चन्द्रमाके गान कमनीय मुखवाले अनिरुद्धने प्रसन्न होकर पुन: का स्तवन किया॥ '४ंश्टू॥ अनिरुद्ध बोले—कल्याणस्वरूपे ! वरदायिनि देवि ! पको नमस्कार है। देवशत्रुओंका नाश करनेवाली तर ! आपको प्रणाम है

अध्याय 175

श्लोक 42

ततोऽनिरुद्धः पुनरेव देवीं तुष्टाव हृष्टः शशिकान्तवक्त्रः ।नमोऽस्तु ते देवि वरप्रदे शिवे नमोऽस्तु ते देवि सुरारिनाशिनि

tato'niruddhaḥ punareva devīṃ tuṣṭāva hṛṣṭaḥ śaśikāntavaktraḥ | namo'stu te devi varaprade śive namo'stu te devi surārināśini

अर्थ श्लोक 41 के साथ

अध्याय 175

श्लोक 43

नमोऽस्तु ते कामचरे सदाशिवे नमोऽस्तु ते सर्वहितैषिणि प्रिये ।नमोऽस्तु ते भीतिकरि द्विषां सदा नमोऽस्तु ते बन्धनमोक्षकारिणि

namo'stu te kāmacare sadāśive namo'stu te sarvahitaiṣiṇi priye | namo'stu te bhītikari dviṣāṃ sadā namo'stu te bandhanamokṣakāriṇi

हिन्दी अर्थ

इच्छानुसार विचरनेवाली राशिवे ! आपको नमस्कार है। सबका हित चाहनेवाली प्रिये! आपको नमस्कार है। शत्रुओंको सदा भय वाली देवि ! आपको प्रणाम है तथा बन्धनसे छुड़ानेबाली व! आपको नमस्कार है

अध्याय 175

श्लोक 44

ब्रह्माणीन्द्राणि रुद्राणि भूतभव्यभवे शिवे ।त्राहि मां सर्वभीतिभ्यो नारायणि नमोऽस्तु ते

brahmāṇīndrāṇi rudrāṇi bhūtabhavyabhave śive | trāhi māṃ sarvabhītibhyo nārāyaṇi namo'stu te

हिन्दी अर्थ

ब्रह्माणि! इन्द्राणि! ाणि! भूत, वर्तमान और भविष्यस्वरूपे शिवे! सब छारके भयोंसे मेरी रक्षा करें। नारायणि! आपको स्कार है

अध्याय 175

श्लोक 45

नमोऽस्तु ते जगन्नाथे प्रिये दान्ते महाव्रते ।भक्तिप्रिये जगन्मातः शैलपुत्रि वसुन्धरे

namo'stu te jagannāthe priye dānte mahāvrate | bhaktipriye jaganmātaḥ śailaputri vasundhare

श्लोक 45–46 का हिन्दी अर्थ

जगत्‌की रक्षा करनेवाली प्रिय देवि ! पको नमस्कार है। मन और इन्द्रियोंको वशमें बनेवाली महाब्रतधारिणी भक्तप्रिये! जगन्मात: ! रिराजनन्दिनि! वसुन्धरे ! विशाल नेत्रोंवाली नारायणि ! प मेरी रक्षा कीजिये! आपको नमस्कार है । दानवोंको प देनेवाली देवि! सब प्रकारके दु:खोंसे मेरा परित्राण जिये

अध्याय 175

श्लोक 46

त्राहि मां त्वं विशालाक्षि नारायणि नमोऽस्तु ते ।त्रायस्व सर्वदुःखेभ्यो दानवानां भयङ्करि

trāhi māṃ tvaṃ viśālākṣi nārāyaṇi namo'stu te | trāyasva sarvaduḥkhebhyo dānavānāṃ bhayaṅkari

अर्थ श्लोक 45 के साथ

अध्याय 175

श्लोक 47

रुद्रप्रिये महाभागे भक्तानामार्तिनाशिनि ।नमामि शिरसा देवीं बन्धनस्थो विमोक्षितः

rudrapriye mahābhāge bhaktānāmārtināśini | namāmi śirasā devīṃ bandhanastho vimokṣitaḥ

हिन्दी अर्थ

रुद्रप्रिये ! भक्तोंकी पीड़ा दूर करनेवाली गभागे! मैं चरणोंमें मस्तक झुकाकर आप देवीको स्कार करता हूँ। आपने मुझे बन्धनमें रहते हुए भी के कर दिया

अध्याय 175

श्लोक 48

आर्यास्तवमिदं पुण्यं यः पठेत् सुसमाहितः ।सर्वपापविनिर्मुक्तो विष्णुलोकं स गच्छति ।बन्धनस्थो विमुच्येत सत्यं व्यासवचो यथा

āryāstavamidaṃ puṇyaṃ yaḥ paṭhet susamāhitaḥ | sarvapāpavinirmukto viṣṇulokaṃ sa gacchati | bandhanastho vimucyeta satyaṃ vyāsavaco yathā

हिन्दी अर्थ

वैशम्पायनजी कहते हैं—राजन्‌! जो एकाग्रचित्त कर इस पवित्र आर्यास्तोत्रका पाठ करता है, वह पापोंसे मुक्त होकर विष्णुलोकमें जाता है और दे बन्धनमें पड़ा हो तो उससे मुक्त हो जाता है। पा कि व्यासजीका सत्य वचन है

स्रोत: local proofread transcription: Sanskrit shlokas of the Harivamsa (Harivamsha, Vishnu and Bhavishya parvas) from sanskritdocuments.org. One chapter per adhyaya; verse numbers as printed in the source (restarting in each adhyaya). Appendix sections are not included. · प्राप्त 19/10/2026

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शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पाठ-भेद एवं संशोधनVariants & corrections

पाठ-भेद टिप्पणी (Alternative Reading / Variant Notes):

Collated with BORI Critical Edition of Mahabharata Khilaparvan.