Harivamsha Purana
168
अध्याय 168 / 318

Parva 2, Adhyāya 113

32 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ32 श्लोक

अध्याय 168

श्लोक 1

श्रीकृष्णेन ब्राह्मणपुत्राणां आनयनं ततः पर्वतजालानि सरितश्च वनानि च ।अपश्यं समतिक्रम्य सागरं वरुणालयम्

śrīkṛṣṇena brāhmaṇaputrāṇāṃ ānayanaṃ tataḥ parvatajālāni saritaśca vanāni ca | apaśyaṃ samatikramya sāgaraṃ varuṇālayam

हिन्दी अर्थ

ततमो$ध्याय: स्‍्स्स-एु पुत्रोंका आनयन अर्जुन कहते हैं—तदनन्तर बहुत-से पर्वत- समूहों, सरिताओं और वनोंको लाँघकर मैंने वरुणालय पमुद्रको देखा

अध्याय 168

श्लोक 2

ततोऽर्घ्यमुदधिः साक्षादुपनीय जनार्दनम् ।स प्राञ्जलिः समुत्थाय किङ्करोमीति चाब्रवीत्

tato'rghyamudadhiḥ sākṣādupanīya janārdanam | sa prāñjaliḥ samutthāya kiṅkaromīti cābravīt

हिन्दी अर्थ

उस समय साक्षात्‌ समुद्रने भगवान्‌ जनार्दनको अर्घ्य निवेदन किया और हाथ जोड़ खड़ा होकर कहा—' प्रभो! मैं आपकी क्या सेवा करूँ? '

अध्याय 168

श्लोक 3

प्रतिगृह्य स तां पूजां तमुवाच जनार्दनः ।रथपन्थानमिच्छामि त्वया दत्तं नदीपते

pratigṛhya sa tāṃ pūjāṃ tamuvāca janārdanaḥ | rathapanthānamicchāmi tvayā dattaṃ nadīpate

हिन्दी अर्थ

पमुद्रद्वारा अर्पित की हुई पूजाको ग्रहण करके भगवान्‌ जनार्दनने कहा—' नदीपते ! मैं चाहता हूँ कि तुम मुझे मेरे रथके लिये मार्ग दे दो'

अध्याय 168

श्लोक 4

अथाब्रवीत् समुद्रस्तु प्राञ्जलिर्गरुडध्वजम् ।प्रसीद भगवन् नैवमन्योऽप्येवं गमिष्यति

athābravīt samudrastu prāñjalirgaruḍadhvajam | prasīda bhagavan naivamanyo'pyevaṃ gamiṣyati

हिन्दी अर्थ

तब समुद्रने हाथ जोड़कर गरुडध्वज श्रीकृष्णसे कहा—' भगवन्‌ ! प्रसन्न होइये। इस तरह मेरे भीतर मार्ग न बनाइये, नहीं तो दूसरे लोग भी इसी तरह आया-जाया करेंगे

अध्याय 168

श्लोक 5

त्वयैव स्थापितः पूर्वमगाधोऽस्मि जनार्दन ।त्वया प्रवर्तिते मार्गे यास्यामि गमनायताम्

tvayaiva sthāpitaḥ pūrvamagādho'smi janārdana | tvayā pravartite mārge yāsyāmi gamanāyatām

हिन्दी अर्थ

शततमो 5ध्याय;: * ८२५ “जनार्दन ! पहले आपने ही मुझे इस रूपमें प्रतिष्ठित किया है। मैं अगाध हूँ। जब आप मेरे भीतर मार्ग बना देंगे, तब मैं सबके लिये गमनीय (लॉँघ जानेके योग्य) हो जाऊँगा

अध्याय 168

श्लोक 6

अन्येऽप्येवं गमिष्यन्ति राजानो दर्पमोहिताः ।एवं सञ्चिन्त्य गोविन्द यत् क्षमं तत् समाचर

anye'pyevaṃ gamiṣyanti rājāno darpamohitāḥ | evaṃ sañcintya govinda yat kṣamaṃ tat samācara

हिन्दी अर्थ

फिर तो अभिमानसे मोहित हुए दूसरे राजा भी मुझे इसी तरह लाँघ जाया करेंगे । गोविन्द ! इस 'बातका विचार करके जो उचित हो वह कीजिये

अध्याय 168

श्लोक 7

ब्राह्मणार्थं मदर्थ च कुरु सागर मद्वचः ।मदृते न पुमान् कश्चिदन्यस्त्वां धर्षयिष्यति

brāhmaṇārthaṃ madartha ca kuru sāgara madvacaḥ | madṛte na pumān kaścidanyastvāṃ dharṣayiṣyati

हिन्दी अर्थ

भगवान्‌ श्रीकृष्ण बोले—सागर ! तुम इस ब्राह्मणके लिये और मेरे लिये भी मेरी इस बातको मान लो, मेरे सिवा दूसरा कोई पुरुष तुम्हें नहीं लाॉघ सकेगा

अध्याय 168

श्लोक 8

अथाब्रवीत् समुद्रस्तु पुनरेव जनार्दनम् ।अभिशापभयाद् भीतो बाढमेवं भविष्यति

athābravīt samudrastu punareva janārdanam | abhiśāpabhayād bhīto bāḍhamevaṃ bhaviṣyati

हिन्दी अर्थ

तब शापके डरसे डरे हुए समुद्रने पुन: जनार्दनसे कहा-'बहुत अच्छा, ऐसा ही होगा

अध्याय 168

श्लोक 9

शोषयाम्येष मार्गं ते येन त्वं कृष्ण यास्यसि ।रथेन सह सूतेन सध्वजेन तु केशव

śoṣayāmyeṣa mārgaṃ te yena tvaṃ kṛṣṇa yāsyasi | rathena saha sūtena sadhvajena tu keśava

हिन्दी अर्थ

श्रीकृष्ण ! केशव! यह लीजिये, मैं आपके मार्गको सुखाये देता हूँ, जिससे कि आप सारथि और ध्वजसहित रथके द्वारा यात्रा करेंगे

अध्याय 168

श्लोक 10

मया दत्तो वरः पूर्वं न शोषं यास्यसीति ह ।मानुषास्ते न जानीयुर्विविधान् रत्नसञ्चयान

mayā datto varaḥ pūrvaṃ na śoṣaṃ yāsyasīti ha | mānuṣāste na jānīyurvividhān ratnasañcayāna

श्लोक 10–11 का हिन्दी अर्थ

भगवान्‌ श्रीकृष्ण बोले—सरित्पते ! मैंने पूर्वकालमें तुम्हें वर दिया है कि तुम कभी सूखोगे नहीं। मनुष्य तुम्हारे भीतर रखे हुए नाना प्रकारके रल्नोंके ढेरोंको न जान सकें, इसके लिये तुम केवल अपने जलको _स्तम्भित कर लो। साधो! ऐसा करनेसे मैं रथपर बैठा हुआ तुम्हारे ऊपरसे चला जाऊँगा और कोई मनुष्य तुम्हारे रत्नोंका प्रमाण नहीं जान सकेगा

अध्याय 168

श्लोक 11

जलं स्तम्भय साधो त्वं ततो यास्याम्यहं रथी ।न च कश्चित् प्रमाणं ते रत्नानां वेत्स्यते नरः

jalaṃ stambhaya sādho tvaṃ tato yāsyāmyahaṃ rathī | na ca kaścit pramāṇaṃ te ratnānāṃ vetsyate naraḥ

अर्थ श्लोक 10 के साथ

अध्याय 168

श्लोक 12

सागरेण तथेत्युक्ते प्रस्थिताः स्मो जलेन वै ।स्तम्भितेन पथा भूमौ मणिवर्णेन भास्वता

sāgareṇa tathetyukte prasthitāḥ smo jalena vai | stambhitena pathā bhūmau maṇivarṇena bhāsvatā

हिन्दी अर्थ

तब समुद्रने 'तथास्तु' कहकर उनकी बात स्वीकार कर ली। फिर हम सब लोग स्तम्भित हुए जलके मार्गसे चले। वह मार्ग भूमिपर स्थित प्रकाशमान मणियोंकी प्रभासे उद्भासित हो रहा था

अध्याय 168

श्लोक 13

ततोऽर्णवं समुत्तीर्य कुरूनप्युत्तरान् वयम् ।क्षणेन समतिक्रान्ता गन्धमादनमेव च

tato'rṇavaṃ samuttīrya kurūnapyuttarān vayam | kṣaṇena samatikrāntā gandhamādanameva ca

हिन्दी अर्थ

तत्पश्चात्‌ समुद्रको पार करके हम उत्तर कुरुमें जा पहुँचे। फिर एक ही क्षणमें गन्धमादन पर्वतको भी लाँघ गये

अध्याय 168

श्लोक 14

ततस्तु पर्वताः सप्त केशवं समुपस्थिताः ।जयन्तो वैजयन्तश्च नीलो रजतपर्वतः

tatastu parvatāḥ sapta keśavaṃ samupasthitāḥ | jayanto vaijayantaśca nīlo rajataparvataḥ

श्लोक 14–15 का हिन्दी अर्थ

तदनन्तर जयन्त, वैजयन्त, नील, रजतपर्वत, महामेरु, कैलास और इन्द्रकूट नामवाले सात पर्वत भगवान्‌ श्रीकृष्णकी सेवामें उपस्थित हुए। उन्होंने नाना प्रकारके अद्भुत रूप-रज़ धारण किये थे

English

Janamejaya said:—What is this all-expanding ocean which thou hast described? Who is this Purusha? What is Yoga? who is a Yogin? (20).

अध्याय 168

श्लोक 15

महामेरुः सकैलास इन्द्रकूटश्च नामतः ।बिभ्राणा वर्णरूपाणि विविधान्यद्भुतानि च

mahāmeruḥ sakailāsa indrakūṭaśca nāmataḥ | bibhrāṇā varṇarūpāṇi vividhānyadbhutāni ca

अर्थ श्लोक 14 के साथ

अध्याय 168

श्लोक 16

उपस्थाय च गोविन्दं किं कुर्मेत्यब्रुवंस्तदा ।तांश्चैव प्रतिजग्राह विधिवन्मधुसूदनः

upasthāya ca govindaṃ kiṃ kurmetyabruvaṃstadā | tāṃścaiva pratijagrāha vidhivanmadhusūdanaḥ

हिन्दी अर्थ

उस समय गोविन्दकी सेवामें उपस्थित हो वे सब-के-सब कहने लगे- विधिपूर्वक उन सबका सत्कार ग्रहण किया

अध्याय 168

श्लोक 17

तानुवाच हृषीकेशः प्रणामावनतान् स्थितान् ।विवरं गच्छतो मेऽद्य रथमार्गः प्रदीयताम्

tānuvāca hṛṣīkeśaḥ praṇāmāvanatān sthitān | vivaraṃ gacchato me'dya rathamārgaḥ pradīyatām

हिन्दी अर्थ

प्रणाम करके विनीत भावसे खड़े हुए उन पर्वतोंसे हषीकेशने इस प्रकार कहा-'पर्वतो! मैं एक गूढ़- स्थानमें जा रहा हूँ। वहाँ जानेके लिये आज मेरे रथको मार्ग प्रदान करो

English

Janamejaya said:—What is this all-expanding ocean which thou hast described? Who is this Purusha? What is Yoga? who is a Yogin? (20).

अध्याय 168

श्लोक 18

ते कृष्णस्य वचः श्रुत्वा प्रतिगृह्य च पर्वताः ।प्रददुः कामतो मार्गं गच्छतो भरतर्षभ

te kṛṣṇasya vacaḥ śrutvā pratigṛhya ca parvatāḥ | pradaduḥ kāmato mārgaṃ gacchato bharatarṣabha

हिन्दी अर्थ

भरतश्रेष्ठ ! भगवान्‌ श्रीकृष्णका यह वचन सुनकर उनकी आज्ञा शिरोधार्य करके उन पर्वतोंने जाते समय उन्हें इच्छानुसार मार्ग दे दिया

English

Janamejaya said:—What is this all-expanding ocean which thou hast described? Who is this Purusha? What is Yoga? who is a Yogin? (20).

अध्याय 168

श्लोक 19

तत्रैवान्तर्हिताः सर्वे तदाश्चर्यतरं मम ।असक्तं च रथो याति मेघज्ञालेष्विवांशुमान्

tatraivāntarhitāḥ sarve tadāścaryataraṃ mama | asaktaṃ ca ratho yāti meghajñāleṣvivāṃśumān

हिन्दी अर्थ

फिर वे सब- के-सब वहीं अन्तर्धान हो गये। वह मेरे लिये परम आश्चर्यकी बात थी। रथ बिना किसी अटक या रुकावटके आगे बढ़ता जा रहा था, मानो अंशुमाली सूर्य मेघोंकी घटाओंमें अनासक्त भावसे चले जा रहे हों

अध्याय 168

श्लोक 20

सप्त द्वीपान् ससिन्धुश्च सप्त सप्त गिरीनथ ।लोकालोकं तथातीत्य विवेश सुमहत्तमः

sapta dvīpān sasindhuśca sapta sapta girīnatha | lokālokaṃ tathātītya viveśa sumahattamaḥ

हिन्दी अर्थ

सात द्वीपों, सातों समुद्रों तथा प्रत्येक द्वीपके सात-सात कुलपर्वतोंको लाँघकर लोकालोक पर्वतको भी पार करके वह रथ बड़े भारी अन्धकारमें प्रविष्ठ हुआ

अध्याय 168

श्लोक 21

ततः कदाचिद् दुःखेन रथमूहुस्तुरङ्गमाः ।पङ्कभूतं हि तिमिरं स्पर्शाद् विज्ञायते नृप

tataḥ kadācid duḥkhena rathamūhusturaṅgamāḥ | paṅkabhūtaṃ hi timiraṃ sparśād vijñāyate nṛpa

हिन्दी अर्थ

तब घोड़े कभी-कभी बड़े कष्टसे रथ खींचते थे। नरेश्वर! वह अन्धकार कीचड़के रूपमें उपलब्ध हुआ, जो स्पर्श करनेसे ज्ञात होता था

अध्याय 168

श्लोक 22

अथ पर्वतभूतं तत् तिमिरं समपद्यत ।तदासाद्य महाराज निष्प्रयत्ना हयाः स्थिताः

atha parvatabhūtaṃ tat timiraṃ samapadyata | tadāsādya mahārāja niṣprayatnā hayāḥ sthitāḥ

हिन्दी अर्थ

तत्पश्चात्‌ वह अन्धकार पर्वतके रूपमें प्राप्त हुआ। महाराज! उसके पास पहुँचकर रथके घोड़े निश्चेष् होकर खड़े हो गये

अध्याय 168

श्लोक 23

ततश्चक्रेण गोविन्दः पाटयित्वा तमस्तदा ।आकाशं दर्शयामास रथपन्थानमुत्तमम्

tataścakreṇa govindaḥ pāṭayitvā tamastadā | ākāśaṃ darśayāmāsa rathapanthānamuttamam

हिन्दी अर्थ

तब गोविन्दने अपने चक्रसे उस अन्धकारको विदीर्ण करके आकाश दिखाया, जो रथके लिये उत्तम मार्ग था

अध्याय 168

श्लोक 24

निष्क्रम्य तमसस्तस्मादाकाशे दर्शिते तदा ।भविष्यामीति संज्ञा मे भयं च विगतं मम

niṣkramya tamasastasmādākāśe darśite tadā | bhaviṣyāmīti saṃjñā me bhayaṃ ca vigataṃ mama

हिन्दी अर्थ

उस अन्धकारसे निकलकर आकाशका दर्शन करनेपर मुझे यह ज्ञान हुआ कि अब मैं जी जाऊँगा, फिर तो मेरा सारा भय दूर हो गया

English

Janamejaya said:—What is this all-expanding ocean which thou hast described? Who is this Purusha? What is Yoga? who is a Yogin? (20).

अध्याय 168

श्लोक 25

ततस्तेजः प्रज्वलितमपश्यं तत् तदाम्बरे ।सर्वलोकं समाविश्य स्थितं पुरुषविग्रहम्

tatastejaḥ prajvalitamapaśyaṃ tat tadāmbare | sarvalokaṃ samāviśya sthitaṃ puruṣavigraham

हिन्दी अर्थ

इसके बाद मैंने आकाशमें एक प्रज्वलित तेजका दर्शन किया, जो पुरुषके आकारमें स्थित था। वह सम्पूर्ण लोकोंमें व्याप्त जान पड़ता था

अध्याय 168

श्लोक 26

तं प्रविष्टो हृषीकेशो दीप्तं तेजोनिधिं तदा ।रथ एव स्थितश्चाहं स च ब्राह्मणसत्तमः

taṃ praviṣṭo hṛṣīkeśo dīptaṃ tejonidhiṃ tadā | ratha eva sthitaścāhaṃ sa ca brāhmaṇasattamaḥ

हिन्दी अर्थ

उस समय भगवान्‌ हषीकेश उस प्रज्वलित तेजकी राशिमें समा गये, किंतु मैं और वह श्रेष्ठ ब्राह्मण रथपर ही बैठे रहे

English

Janamejaya said:—What is this all-expanding ocean which thou hast described? Who is this Purusha? What is Yoga? who is a Yogin? (20).

अध्याय 168

श्लोक 27

स मुहूर्तात् ततः कृष्णो निश्चक्राम तदा प्रभुः ।चतुरो बालकान् गृह्य ब्राह्मणस्यात्मजांस्तदा

sa muhūrtāt tataḥ kṛṣṇo niścakrāma tadā prabhuḥ | caturo bālakān gṛhya brāhmaṇasyātmajāṃstadā

हिन्दी अर्थ

फिर दो ही घड़ीमें भगवान्‌ श्रीकृष्ण ब्राह्मणके चारों बालकोंको साथमें लेकर वहाँसे निकले

English

Janamejaya said:—What is this all-expanding ocean which thou hast described? Who is this Purusha? What is Yoga? who is a Yogin? (20).

अध्याय 168

श्लोक 28

प्रददौ ब्राह्मणायाथ पुत्रान् सर्वाञ्जनार्दनः ।त्रयः पूर्वं हृता ये च सद्योजातश्च बालकः

pradadau brāhmaṇāyātha putrān sarvāñjanārdanaḥ | trayaḥ pūrvaṃ hṛtā ye ca sadyojātaśca bālakaḥ

हिन्दी अर्थ

तीन तो वे बालक थे, जिनका पहले अपहरण हुआ था और चौथा वह नवजात बालक था। भगवान्‌ जनार्दनने वे सब पुत्र ब्राह्मणको दे दिये

English

Janamejaya said:—What is this all-expanding ocean which thou hast described? Who is this Purusha? What is Yoga? who is a Yogin? (20).

अध्याय 168

श्लोक 29

प्रहृष्टो ब्राह्मणस्तत्र पुत्रान् दृष्ट्वा पुनः प्रभो ।अहं च परमप्रीतो विस्मितश्चाभवं तदा

prahṛṣṭo brāhmaṇastatra putrān dṛṣṭvā punaḥ prabho | ahaṃ ca paramaprīto vismitaścābhavaṃ tadā

हिन्दी अर्थ

प्रभो ! वहाँ अपने पुत्रोंको पुन: देखकर ब्राह्मणको बड़ा हर्ष हुआ। मुझे भी बड़ी प्रसन्नता हुई। मैं तो उस समय आश्चर्यचकित हो गया था

अध्याय 168

श्लोक 30

ततो वयं पुनः सर्वे ब्राह्मणस्य च ते सुताः ।यथा गता निवृत्ताः स्म तथैव भरतर्षभ

tato vayaṃ punaḥ sarve brāhmaṇasya ca te sutāḥ | yathā gatā nivṛttāḥ sma tathaiva bharatarṣabha

हिन्दी अर्थ

भरतश्रेष्ठ ! तदनन्तर हम सब लोग और वे ब्राह्मण-बालक पुन: जैसे गये थे, वैसे ही लौट आये

English

Janamejaya said:—What is this all-expanding ocean which thou hast described? Who is this Purusha? What is Yoga? who is a Yogin? (20).

अध्याय 168

श्लोक 31

ततः स्म द्वारकां प्राप्ताः क्षणेन नृपसत्तं असम्प्राप्तेऽर्धदिवसे विस्मितोऽहं पुनः पुनः

tataḥ sma dvārakāṃ prāptāḥ kṣaṇena nṛpasattaṃ asamprāpte'rdhadivase vismito'haṃ punaḥ punaḥ

हिन्दी अर्थ

नृपश्रेष्ठ! अभी दोपहरी भी नहीं हुई थी तभी हमलोग एक क्षणमें द्वारका आ पहुँचे। मैं तो बारम्बार विस्मित हो रहा था

अध्याय 168

श्लोक 32

सपुत्रं भोजयित्वा तु द्विजं कृष्णो महायशाः ।धनेन वर्धयित्वा च गृहं प्रास्थापयत् तदा

saputraṃ bhojayitvā tu dvijaṃ kṛṣṇo mahāyaśāḥ | dhanena vardhayitvā ca gṛhaṃ prāsthāpayat tadā

हिन्दी अर्थ

शततमो इसके बाद महायशस्वी श्रीकृष्णने पुत्रोंसहित ब्राह्मणको भोजन कराकर उसके लिये धनकी वर्षा करके उसे तत्काल घर भेज दिया

स्रोत: local proofread transcription: Sanskrit shlokas of the Harivamsa (Harivamsha, Vishnu and Bhavishya parvas) from sanskritdocuments.org. One chapter per adhyaya; verse numbers as printed in the source (restarting in each adhyaya). Appendix sections are not included. · प्राप्त 19/10/2026

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शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

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सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
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अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

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Collated with BORI Critical Edition of Mahabharata Khilaparvan.