Harivamsha Purana
140
अध्याय 140 / 318

Parva 2, Adhyāya 85

78 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ78 श्लोक

अध्याय 140

श्लोक 1

निकुम्भस्य जयन्तात् पराजितं भूत्वा श्रीकृष्णेन सह युद्धं, श्रीकृष्णेन अर्जुनाय निकुम्भस्य चरित्रकथनं, आकाशवाण्याः प्रेरणया सुदर्शन चक्रेण निकुम्भस्य वधकरणं एवं ब्रह्मदत्ताय षट्पुरनगरं दत्त्वा द्वारकां प्रति प्रस्थानं रुद्धेषु भूमिपालेषु सानुगेषु विशाम्पते ।आविवेशासुरांश्चाथ कश्मलं जनमेजय

nikumbhasya jayantāt parājitaṃ bhūtvā śrīkṛṣṇena saha yuddhaṃ, śrīkṛṣṇena arjunāya nikumbhasya caritrakathanaṃ, ākāśavāṇyāḥ preraṇayā sudarśana cakreṇa nikumbhasya vadhakaraṇaṃ evaṃ brahmadattāya ṣaṭpuranagaraṃ dattvā dvārakāṃ prati prasthānaṃ ruddheṣu bhūmipāleṣu sānugeṣu viśāmpate | āviveśāsurāṃścātha kaśmalaṃ janamejaya

हिन्दी अर्थ

वैशम्पायनजी कहते हैं—प्रजानाथ! जनमेजय ! जब अनुचरोंसहित सब भूपाल गुफामें बंद कर दिये गये, बब॒ असुरोंपर मोह छा गया

अध्याय 140

श्लोक 2

दिशः प्रतस्थुस्ते वीरा वध्यमानाः समन्ततः ।कृष्णानन्तप्रभृतिभिर्यदुभिर्युद्धदुर्मदैः

diśaḥ pratasthuste vīrā vadhyamānāḥ samantataḥ | kṛṣṇānantaprabhṛtibhiryadubhiryuddhadurmadaiḥ

हिन्दी अर्थ

श्रीकृष्ण, बलराम भादि रणदुर्मद यादवोंद्वारा सब ओरसे मारे जाते हुए वीर असुर सम्पूर्ण दिशाओंकी ओर पलायन करने लगे

अध्याय 140

श्लोक 3

निकुम्भस्तानथोवाच रुषितो दानवोत्तमः ।भित्त्वा प्रतिज्ञां किं मोहाद्भयार्ता यात विह्वलाः

nikumbhastānathovāca ruṣito dānavottamaḥ | bhittvā pratijñāṃ kiṃ mohādbhayārtā yāta vihvalāḥ

हिन्दी अर्थ

यह रेख दानवश्रेष्ठ निकुम्भ रोषमें भरकर उनसे बोला—' ओरे! मलोग मोहवश अपनी प्रतिज्ञा तोड़कर भयसे पीड़ित और विह्वलल होकर क्यों भागे जा रहे हो ?

अध्याय 140

श्लोक 4

हीनप्रतिज्ञाः काँल्लोकान् प्रयास्यथ पलायिताः ।अगत्वापचितिं युद्धे ज्ञातीनां कृतनिश्चयाः

hīnapratijñāḥ kā~llokān prayāsyatha palāyitāḥ | agatvāpacitiṃ yuddhe jñātīnāṃ kṛtaniścayāḥ

हिन्दी अर्थ

प्रतिज्ञाहीन होकर भागे जानेवाले तथा पहले बदला लेनेका निश्चय करके भी युद्धमें अपने भाई-बन्धुओंका ऋण उतारे बिना गीठ दिखानेवाले तुमलोग किन लोकों में जाओगे 2

अध्याय 140

श्लोक 5

फलं जित्वेह भोक्तव्यं रिपून् समरकर्कशान् ।हतेन चापि शूरेण वस्तव्यं त्रिदिवे सुखम्

phalaṃ jitveha bhoktavyaṃ ripūn samarakarkaśān | hatena cāpi śūreṇa vastavyaṃ tridive sukham

हिन्दी अर्थ

पमराज़्णमें निर्दयतापूर्वक जूझनेवाले शत्रु ओंको जीतकर स लोकमें उत्तम फल (राज्य आदि)-का उपभोग प्राप्त गा अथवा रणमें मारे जानेपर शूरवीरको स्वर्गलोकमें गुखदायक निवास सुलभ होगा

अध्याय 140

श्लोक 6

पलायित्वा गृहं गत्वा कस्य द्रक्ष्यथ हे मुखम् ।दारान्वक्ष्यथ किं चापि धिग्धिक् किं किं न लज्जथ

palāyitvā gṛhaṃ gatvā kasya drakṣyatha he mukham | dārānvakṣyatha kiṃ cāpi dhigdhik kiṃ kiṃ na lajjatha

हिन्दी अर्थ

हे दैत्यो ! भागकर र जाकर किसका मुँह देखोगे (अथवा किसे मुँह देखाओगे) ? अपनी पत्नियोंसे क्या कहोगे ? धिक्कार , घिवकार है| क्यों ? क्यों तुम्हें लज्जा नहीं आती ? '

अध्याय 140

श्लोक 7

एवमुक्ता निवृत्तास्ते लज्जमाना नृपासुराः ।द्विगुणेन च वेगेन युयुधुर्यदुभिः सह

evamuktā nivṛttāste lajjamānā nṛpāsurāḥ | dviguṇena ca vegena yuyudhuryadubhiḥ saha

हिन्दी अर्थ

रेश्वर! निकुम्भके ऐसा कहनेपर वे असुर लज्जित होकर गौट पड़े और दुगुने वेगसे यादवोंके साथ युद्ध करने गे

अध्याय 140

श्लोक 8

उत्सवे युद्धशौण्डानां नानाप्रहरणैर्नृप ।ये यान्ति यज्ञवाटं तं तान् निहन्ति धनञ्जयः

utsave yuddhaśauṇḍānāṃ nānāpraharaṇairnṛpa | ye yānti yajñavāṭaṃ taṃ tān nihanti dhanañjayaḥ

श्लोक 8–9 का हिन्दी अर्थ

राजन्‌ ! नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्रोंद्वारा युद्धकुशल द्धाओंके उस समरोत्सवमें जो दैत्य यज्ञमण्डपकी ओर ते थे, उन्हें अर्जुन, भीम, नकुल, सहदेव तथा धर्मपुत्र जा युधिष्टिर मार डालते थे। जो लोग आकाशमें जाते , उन्हें इन्द्रकुमार जयन्त और द्विजश्रेष्ठ प्रवर कालके लमें भेज देते थे

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श्लोक 9

यमौ भीमश्च राजा च धर्मपुत्रो युधिष्ठिरः ।द्यां प्रयाताञ्जघानैन्द्रिः प्रवरश्च द्विजोत्तमः

yamau bhīmaśca rājā ca dharmaputro yudhiṣṭhiraḥ | dyāṃ prayātāñjaghānaindriḥ pravaraśca dvijottamaḥ

अर्थ श्लोक 8 के साथ

अध्याय 140

श्लोक 10

अथासुरासृक्तोयाढ्या केशशैवलशाद्वला ।चक्रकूर्मरथावर्ता गजशैलानुशोभिनी

athāsurāsṛktoyāḍhyā keśaśaivalaśādvalā | cakrakūrmarathāvartā gajaśailānuśobhinī

हिन्दी अर्थ

फिर तो वहाँ वर्षामें बढ़ी ई नदीके समान एक खूनकी नदी बह चली। असुरोंके क ही उसके जल थे। उनके सिरके केश ही उसमें वार और घासके समान प्रतीत होते थे। रथके पहिये समें कछुए-जैसे लगते थे और रथ भवैँरके समान तीत होते थे। हाथियोंकी लाशें पर्वतोंकी चट्टानोंके मान उसकी शोभा बढ़ाती थीं

अध्याय 140

श्लोक 11

ध्वजकुन्ततरुच्छन्ना स्तनितोत्क्रुष्टनादिनी ।गोविन्दशैलप्रभवा भीरुचित्तप्रमाथिनी

dhvajakuntatarucchannā stanitotkruṣṭanādinī | govindaśailaprabhavā bhīrucittapramāthinī

श्लोक 11–12 का हिन्दी अर्थ

ध्वज और भाले तटवर्ती वृक्षींके समान उसे आच्छादित किये हुए थे। योद्धाओंका गरजना और चीखना ही उसका कलकल नाद था। वह नदी श्रीकृष्णरूपी पर्वतसे प्रकट हुई थी और भीरु पुरुषोंके हृदयमें भय उत्पन्न करती थी। रक्तके बुलबुले ही उसमें फेन थे और तलबवारें ही मछलियों और तरंगोंकि समान प्रतीत होती थीं

अध्याय 140

श्लोक 12

असृग्बुद्बुदफेनाढ्या असिमत्स्यतरङ्गिणी ।सुस्राव शोणितनदी नदीव जलदागमे

asṛgbudbudaphenāḍhyā asimatsyataraṅgiṇī | susrāva śoṇitanadī nadīva jaladāgame

अर्थ श्लोक 11 के साथ

अध्याय 140

श्लोक 13

तान् दृष्ट्वैव निकुम्भस्तु वर्द्धमानांश्च शात्रवान् ।हतान् सर्वान् सहायांश्च वीर्यादेवात्पपात ह

tān dṛṣṭvaiva nikumbhastu varddhamānāṃśca śātravān | hatān sarvān sahāyāṃśca vīryādevātpapāta ha

हिन्दी अर्थ

निकुम्भ अपने उन शत्रुओंको बढ़ता हुआ और समस्त सहायकोंको मारा गया देख अपने बलसे ही ऊपरको उछला

अध्याय 140

श्लोक 14

स वारितो जयन्तेन प्रवरेण च भारत ।शरैः कुलिशसङ्काशैर्निकुम्भो रणकर्कशः

sa vārito jayantena pravareṇa ca bhārata | śaraiḥ kuliśasaṅkāśairnikumbho raṇakarkaśaḥ

श्लोक 14–15 का हिन्दी अर्थ

भारत! ऊपर गये हुए रणकर्कश निकुम्भको जयन्त और प्रवरने अपने वज्तुल्य बाणोंद्वारा रोका। तब दुर्जय वीर निकुम्भ दाँतोंसे ओठ दबाकर लौटा। उसने प्रवरपर परिघसे प्रहार किया। इससे वह पृथ्वीपर गिर पड़ा

अध्याय 140

श्लोक 15

सन्निवृत्याथ दष्टोष्ठः परिघेण दुरासदः ।प्रवरं ताडयामास स पपात महीतले

sannivṛtyātha daṣṭoṣṭhaḥ parigheṇa durāsadaḥ | pravaraṃ tāḍayāmāsa sa papāta mahītale

अर्थ श्लोक 14 के साथ

अध्याय 140

श्लोक 16

ऐन्द्रिस्तं पतितं भूमौ बाहुभ्यां परिषस्वजे ।विदित्वा चैव सप्राणं हित्वासुरमभिद्रुतः

aindristaṃ patitaṃ bhūmau bāhubhyāṃ pariṣasvaje | viditvā caiva saprāṇaṃ hitvāsuramabhidrutaḥ

हिन्दी अर्थ

पृथ्वीपर गिरे हुए इन प्रवरको इन्द्रकुमार जयन्तने अपनी दोनों भुजाओंसे उठाकर हृदयसे लगा लिया और जब उन्हें मालूम हुआ कि प्रवर जीवित हैं, तब वे उन्हें छोड़कर उस असुरकी ओर दौड़े

अध्याय 140

श्लोक 17

अभिद्रुत्य निकुम्भं च निस्त्रिंशेन जघान ह ।परिघेणापि दैतेयो जयन्तं समताडयत्

abhidrutya nikumbhaṃ ca nistriṃśena jaghāna ha | parigheṇāpi daiteyo jayantaṃ samatāḍayat

हिन्दी अर्थ

निकुम्भपर धावा करके जयन्तने उसे खड्गसे मारा। तब उस दैत्यने भी जयन्तपर परिघसे प्रहार किया

अध्याय 140

श्लोक 18

ततक्ष बहुलं गात्रं निकुम्भस्यैन्द्रिराहवे ।स चिन्तयामास तदा वध्यमानो महासुरः

tatakṣa bahulaṃ gātraṃ nikumbhasyaindrirāhave | sa cintayāmāsa tadā vadhyamāno mahāsuraḥ

श्लोक 18–19 का हिन्दी अर्थ

इन्द्रकुमारने युद्धस्थलमें निकुम्भके शरीरको प्राय: क्षत- विक्षत कर दिया। उनके द्वारा मारे जाते हुए उस महान्‌ असुरने उस समय मन-ही-मन सोचा कि मुझे श्रीकृष्णके साथ युद्ध करना चाहिये, क्योंकि वे मेरे बन्धु-बान्धवोंके घातक एवं वैरी हैं। मैं युद्धमें इन्द्रकुमारके साथ लड़कर अपने लिये कौन-सी ख्याति प्राप्त करूँगा

अध्याय 140

श्लोक 19

कृष्णेन सह योद्धव्यं वैरिणा ज्ञातिघातिना ।श्रावयामि किमात्मानमाहवे शक्रसूनुना

kṛṣṇena saha yoddhavyaṃ vairiṇā jñātighātinā | śrāvayāmi kimātmānamāhave śakrasūnunā

अर्थ श्लोक 18 के साथ

अध्याय 140

श्लोक 20

एवं स निश्चयं कृत्वा तत्रैवान्तरधीयत ।जगाम चैव युद्धार्थं यत्र कृष्णो महाबलः

evaṃ sa niścayaṃ kṛtvā tatraivāntaradhīyata | jagāma caiva yuddhārthaṃ yatra kṛṣṇo mahābalaḥ

हिन्दी अर्थ

ऐसा निश्चय करके वह महाबली असुर वहीं अन्तर्धान हो गया और युद्धके लिये उस स्थानपर गया, जहाँ महाबली श्रीकृष्ण विराजमान थे

अध्याय 140

श्लोक 21

तं दृष्ट्वैरावतस्कन्धमास्थितो बलनाशनः ।द्रष्टुमभ्यागतो युद्धं जहृषे सह दैवतैः

taṃ dṛṣṭvairāvataskandhamāsthito balanāśanaḥ | draṣṭumabhyāgato yuddhaṃ jahṛṣe saha daivataiḥ

हिन्दी अर्थ

उसे वहाँ गया हुआ देख बलनाशन इन्द्र ऐरावतकी पीठपर बैठकर वह युद्ध देखनेके लिये आये। उस समय वे देवताओंके साथ बहुत प्रसन्न थे

अध्याय 140

श्लोक 22

साधु साध्विति पुत्रं च परितुष्टः स सस्वजे ।प्रवरं चापि धर्मात्मा सस्वजे मोहवर्जितम्

sādhu sādhviti putraṃ ca parituṣṭaḥ sa sasvaje | pravaraṃ cāpi dharmātmā sasvaje mohavarjitam

हिन्दी अर्थ

धर्मात्मा इन्द्रने ' साधु-साधु (वाह-वाह) ' कहकर संतुष्ट हो अपने पुत्र जयन्तको हृदयसे लगा लिया और मूर्चछा दूर हो जानेपर प्रवरसे भी गले मिले

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श्लोक 23

देवदुन्दुभयश्चापि प्रणेदुर्वासवाज्ञया ।जयमानं रणे दृष्ट्वा जयन्तं रणदुर्जयम्

devadundubhayaścāpi praṇedurvāsavājñayā | jayamānaṃ raṇe dṛṣṭvā jayantaṃ raṇadurjayam

हिन्दी अर्थ

उस समय रणदुर्जय जयन्तकी युद्धमें विजय देखकर इन्द्रकी आज्ञासे देवताओंकी दुन्दुभियाँ बजने लगीं

अध्याय 140

श्लोक 24

ददर्शाथ निकुम्भस्तु केशवं रणदुर्जयम् ।अर्जुनेन स्थितं सार्धं यज्ञवाटाविदूरतः

dadarśātha nikumbhastu keśavaṃ raṇadurjayam | arjunena sthitaṃ sārdhaṃ yajñavāṭāvidūrataḥ

हिन्दी अर्थ

निकुम्भने देखा, युद्धमें जिनपर विजय पाना अत्यन्त कठिन है, वे श्रीकृष्ण यज्ञमण्डपसे थोड़ी ही दूरपर अर्जुनके साथ खड़े हैं

अध्याय 140

श्लोक 25

स नादं सुमहान् कृत्वा पक्षिराजमताडयत् ।परिघेण सुघोरेण बलं सत्यकमेव च

sa nādaṃ sumahān kṛtvā pakṣirājamatāḍayat | parigheṇa sughoreṇa balaṃ satyakameva ca

हिन्दी अर्थ

फिर तो उसने बड़े जोरसे सिंहनाद करके अत्यन्त भयंकर परिघद्वारा पक्षिराज गरुड़, बलराम और सात्यकिपर प्रहार किया

अध्याय 140

श्लोक 26

नारायणं चार्जुनं च भीमं चाथ युधिष्ठिरम् ।यमौ च वासुदेवं च साम्बं कामं च वीर्यवान्

nārāyaṇaṃ cārjunaṃ ca bhīmaṃ cātha yudhiṣṭhiram | yamau ca vāsudevaṃ ca sāmbaṃ kāmaṃ ca vīryavān

हिन्दी अर्थ

मोडध्याय: + द्९३ तत्पश्चात्‌ उस पराक्रमी असुरने श्रीकृष्ण, अर्जुन, भीम, युधिष्टिर, नकुल, सहदेव तथा श्रीकृष्णकुमार साम्ब और प्रद्युप्रपर भी प्रहार किया

अध्याय 140

श्लोक 27

युयुधे मायया दैत्यः शीघ्रकारी च भारत ।न चैनं ददृशुः सर्वे सर्वशस्त्रविशारदाः

yuyudhe māyayā daityaḥ śīghrakārī ca bhārata | na cainaṃ dadṛśuḥ sarve sarvaśastraviśāradāḥ

हिन्दी अर्थ

भरतनन्दन! वह शीघ्रकारी दैत्य मायाद्वारा युद्ध कर रहा था; इसलिये सम्पूर्ण शस्त्रोंके ज्ञानमें कुशल वे समस्त वीर उसे देख नहीं पाते थे

अध्याय 140

श्लोक 28

यदा तु नैवापश्यस्तं तदा बिल्वोदकेश्वरम् ।दध्यौ देवं हृषीकेशः प्रमथानां गणेश्वरम्

yadā tu naivāpaśyastaṃ tadā bilvodakeśvaram | dadhyau devaṃ hṛṣīkeśaḥ pramathānāṃ gaṇeśvaram

हिन्दी अर्थ

जब वे उस असुरको नहीं देख सके, तब भगवान्‌ श्रीकृष्णने प्रमथगणोंके स्वामी बिल्वोदकेश्वर देवका स्मरण किया

अध्याय 140

श्लोक 29

ततस्ते ददृशुः सर्वे प्रभावादतितेजसः ।बिल्वोदकेश्वरस्याशु निकुम्भं मायिनां वरम्

tataste dadṛśuḥ sarve prabhāvādatitejasaḥ | bilvodakeśvarasyāśu nikumbhaṃ māyināṃ varam

हिन्दी अर्थ

फिर तुरंत ही अत्यन्त तेजस्वी बिल्वोदकेश्वरके प्रभावसे उन सबने मायावियों में श्रेष्ठ निकुम्भको देखा

अध्याय 140

श्लोक 30

कैलासशिखराकारं ग्रसन्तमिव धिष्ठितम् ।आह्वयन्तं रणे कृष्णं वैरिणं ज्ञातिनाशनम्

kailāsaśikharākāraṃ grasantamiva dhiṣṭhitam | āhvayantaṃ raṇe kṛṣṇaṃ vairiṇaṃ jñātināśanam

श्लोक 30–31 का हिन्दी अर्थ

उसका शरीर कैलास- शिखरके समान विशाल था। वह इस प्रकार खड़ा था, मानो सबको ग्रस लेगा । वह अपने बन्धु-बान्धवोंका नाश करनेवाले वैरी श्रीकृष्णको युद्धके लिये ललकार रहा था। उस समय जिनके गाण्डीव धनुषपर प्रत्यज्ञा चढ़ी हुई थी, उन अआर्जुनने रथका भेदन करनेवाले बाणों- द्वारा उसके परिघ और अआज्ञॉपर बारम्बार प्रहार किया

अध्याय 140

श्लोक 31

सत्यगाण्डीव एवाद्य पार्थस्तस्य रथेषुभिः ।परिघं चैव गात्रेषु विव्याधैनमथासकृत्

satyagāṇḍīva evādya pārthastasya ratheṣubhiḥ | parighaṃ caiva gātreṣu vivyādhainamathāsakṛt

अर्थ श्लोक 30 के साथ

अध्याय 140

श्लोक 32

ते बाणास्तस्य गात्रेषु परिघे च जनाधिप ।भङ्गाः शिलाशिताः सर्वे निपेतुः कुञ्चिताः क्षितौ

te bāṇāstasya gātreṣu parighe ca janādhipa | bhaṅgāḥ śilāśitāḥ sarve nipetuḥ kuñcitāḥ kṣitau

हिन्दी अर्थ

नरेश्वर! अर्जुनके वे सभी बाण जो शिलापर तेज किये गये थे, उसके परिघ और अज़ोंसे 2कराकर टूटकर अथवा मुड़कर पृथ्वीपर गिर पड़े

अध्याय 140

श्लोक 33

विफलानस्त्रयुक्तांस्तान् दृष्ट्वा बाणान्धनञ्जयः ।पप्रच्छ केशवं वीरः किमेतदिति भारत

viphalānastrayuktāṃstān dṛṣṭvā bāṇāndhanañjayaḥ | papraccha keśavaṃ vīraḥ kimetaditi bhārata

हिन्दी अर्थ

भरतनन्दन! उन दिव्यास्त्रयुक्त बाणोंको निष्फल हुआ देख और अर्जुनने श्रीकृष्णसे पूछा—' यह क्या हुआ 2

अध्याय 140

श्लोक 34

पर्वतानपि भिन्दन्ति मम वज्रोपमाः शराः ।किमिदं देवकीपुत्र विस्मयोऽत्र महान् मम

parvatānapi bhindanti mama vajropamāḥ śarāḥ | kimidaṃ devakīputra vismayo'tra mahān mama

हिन्दी अर्थ

रैवकीनन्दन ! मेरे वज़तुल्य बाण पर्वतोंको भी विदीर्ण कर डालते हैं (परंतु यहाँ निष्फल हो गये) । यह क्या बात हे ? इस विषयमें मुझे महान्‌ आश्चर्य हो रहा है!

अध्याय 140

श्लोक 35

तमुवाच ततः कृप्णः प्रहसन्निव भारत ।महद्भूतं निकुम्भोऽयं कौन्तेय शृणु विस्तरात्

tamuvāca tataḥ kṛpṇaḥ prahasanniva bhārata | mahadbhūtaṃ nikumbho'yaṃ kaunteya śṛṇu vistarāt

हिन्दी अर्थ

परत! तब श्रीकृष्णने हँसते हुए-से कहा—' कुन्तीनन्दन ! हह निकुम्भ एक महान्‌ भूत है। इसका परिचय विस्तारपूर्वक पुनो

अध्याय 140

श्लोक 36

पुरा गत्वोत्तरकुरूंस्तपश्चक्रे महासुरः ।शतं वर्षसहस्राणां देवशत्रुर्दुरासदः

purā gatvottarakurūṃstapaścakre mahāsuraḥ | śataṃ varṣasahasrāṇāṃ devaśatrurdurāsadaḥ

हिन्दी अर्थ

पूर्वकालमें इस दुर्जय देवद्रोही महान्‌ असुरने त्तर-कुरुमें जाकर एक लाख वर्षोतक तपस्या की पी

अध्याय 140

श्लोक 37

अथैनं छन्दयामास वरेण भगवान् हरः ।स वव्रे त्रीणि रूपाणि न वध्यानि सुरासुरैः

athainaṃ chandayāmāsa vareṇa bhagavān haraḥ | sa vavre trīṇi rūpāṇi na vadhyāni surāsuraiḥ

हिन्दी अर्थ

तब भगवान्‌ शिवने इसे इच्छानुसार वर माँगनेके लिये आज्ञा दी । उस समय इसने महादेवजीसे तीन रूप ँगे, जो देवताओं और असुरोंके लिये अवध्य हो

अध्याय 140

श्लोक 38

तमुवाच महादेवो भगवान् वृषभध्वजः ।मम वा ब्राह्मणानां वा विष्णोर्वा प्रियमाचरन्

tamuvāca mahādevo bhagavān vṛṣabhadhvajaḥ | mama vā brāhmaṇānāṃ vā viṣṇorvā priyamācaran

श्लोक 38–39 का हिन्दी अर्थ

ब महान्‌ देव भगवान्‌ वृषभध्वजने इससे कहा—महान्‌ ससुर ! यदि तुम मेरा, ब्राह्मणोंका अथवा भगवान्‌ विष्णुका प्रिय करोगे तो श्रीहरिके हाथसे मारे जाओगे। दूसरे फैसीके द्वारा नहीं; क्योंकि मैं और विष्णु दोनों ब्राह्मणोंके हतैषी हैं । उनके परम आश्रय हैं

अध्याय 140

श्लोक 39

भविष्यसि हरेर्वध्यो न त्वन्यस्य महासुर ।ब्रह्मण्योऽहं च विष्णुश्च विप्राणां परमा गतिः

bhaviṣyasi harervadhyo na tvanyasya mahāsura | brahmaṇyo'haṃ ca viṣṇuśca viprāṇāṃ paramā gatiḥ

अर्थ श्लोक 38 के साथ

अध्याय 140

श्लोक 40

स एष सर्वशस्त्राणामवध्यः पाण्डुनन्दन ।त्रिदेहोऽतिप्रमाथी च वरमत्तश्च दानवः

sa eṣa sarvaśastrāṇāmavadhyaḥ pāṇḍunandana | trideho'tipramāthī ca varamattaśca dānavaḥ

हिन्दी अर्थ

पाण्डुनन्दन ! ही यह तीन शरीर धारण करनेवाला अत्यन्त प्रमथनशील [नव है, जो वरदान पाकर मदमत्त हो उठा है। यह म्पूर्ण शस्त्रोंद्वारा अवध्य है'

अध्याय 140

श्लोक 41

भानुमत्यापहरणे देहोऽस्यैको हतो मया ।अवध्यं षट्पुरं देहमिदमस्य दुरात्मनः

bhānumatyāpaharaṇe deho'syaiko hato mayā | avadhyaṃ ṣaṭpuraṃ dehamidamasya durātmanaḥ

हिन्दी अर्थ

शरीरको नष्ट कर दिया था। यह अवध्य षट्पुर इस दुरात्माका दूसरा शरीर है

अध्याय 140

श्लोक 42

दितिं शुश्रूषति न्येको देहोऽस्य तपसान्वितः ।अन्यस्तु देहो घोरोऽस्य येनावसति षट्पुरम्

ditiṃ śuśrūṣati nyeko deho'sya tapasānvitaḥ | anyastu deho ghoro'sya yenāvasati ṣaṭpuram

हिन्दी अर्थ

तथा इसका एक तपस्वी शरीर दितिदेवीकी सेवामें संलग्र रहता है। जिससे यह षट्पुरमें निवास करता है, वह इसका घोर शरीर दूसरा ही है

अध्याय 140

श्लोक 43

एतत् तु सर्वमाख्यातं निकुम्भचरितं मया ।त्वरयास्य वधे वीर कथा पश्चाद् भविष्यति

etat tu sarvamākhyātaṃ nikumbhacaritaṃ mayā | tvarayāsya vadhe vīra kathā paścād bhaviṣyati

हिन्दी अर्थ

वीर! यह सब निकुम्भका चरित्र मैंने कह सुनाया। अब तुम इसके वधके लिये जल्दी करो। यह कथा पीछे होती रहेगी'

अध्याय 140

श्लोक 44

तयोः कथयतोरेवं कृष्णयोरसुरस्तदा ।गुहां षट्पुरसंज्ञां तां विवेश रणदुर्जयः

tayoḥ kathayatorevaṃ kṛṣṇayorasurastadā | guhāṃ ṣaṭpurasaṃjñāṃ tāṃ viveśa raṇadurjayaḥ

हिन्दी अर्थ

श्रीकृष्ण और अर्जुन इस प्रकार बात कर ही रहे थे कि वह रणदुर्जय असुर उस षट्पुर नामवाली गुफामें जा घुसा

अध्याय 140

श्लोक 45

अन्विष्य तस्य भगवान् विवेश मधुसूदनः ।तां षट्पुरगुहां घोरां दुर्धर्षां कुरुनन्दन

anviṣya tasya bhagavān viveśa madhusūdanaḥ | tāṃ ṣaṭpuraguhāṃ ghorāṃ durdharṣāṃ kurunandana

हिन्दी अर्थ

कुरुनन्दन! उसके जानेके मार्गका अनुसंधान करके भगवान्‌ मधुसूदन भी उस घोर, दुर्जय षट्पुर नामवाली गुफामें घुस गये

अध्याय 140

श्लोक 46

चन्द्रसूर्यप्रभाहीनां ज्वलन्तीं स्वेन तेजसा ।सुखदुःखोष्णशीतानि प्रयच्छन्तीं यथेप्सितम्

candrasūryaprabhāhīnāṃ jvalantīṃ svena tejasā | sukhaduḥkhoṣṇaśītāni prayacchantīṃ yathepsitam

हिन्दी अर्थ

वहाँ चन्द्रमा और सूर्यका प्रकाश नहीं था। वह गुफा अपने ही तेजसे प्रकाशित होती और वहाँके निवासियोंको सुख-दुःख, गरमी-सर्दी आदि प्रदान करती थी

अध्याय 140

श्लोक 47

तत्र प्रविश्य भगवानपश्यत जनाधिपान् ।युयुधे सह घोरेण निकुम्भेन जनाधिप

tatra praviśya bhagavānapaśyata janādhipān | yuyudhe saha ghoreṇa nikumbhena janādhipa

हिन्दी अर्थ

नरेश्वर! उस गुफामें प्रवेश करके भगवान्‌ श्रीकृष्णने निकुम्भद्वारा बंदी बनाये गये यादवनरेशोंको देखा; फिर वे उस घोर असुर निकुम्भके साथ युद्ध करने लगे

अध्याय 140

श्लोक 48

कृष्णस्यानुप्रविष्टास्तु बलाद्या यादवास्तदा ।प्रविष्टाश्च तथा सर्वे पाण्डवास्ते महात्मनः

kṛṣṇasyānupraviṣṭāstu balādyā yādavāstadā | praviṣṭāśca tathā sarve pāṇḍavāste mahātmanaḥ

हिन्दी अर्थ

महात्मा श्रीकृष्णकी अनुमतिसे बलराम आदि समस्त यादववीर भी उस समय उनके पीछे-पीछे उस गुफामें जा घुसे तथा समस्त पाण्डब भी एक साथ ही उसमें घुस आये

अध्याय 140

श्लोक 49

समेतास्तु प्रविष्टास्ते कृष्णस्यानुमतेन वै ।युयुधे स तु कृष्णेन रौक्मिणेयः प्रचोदितः ।मानयद् यादवान्सर्वान्यानयं बद्धवान्पुरा

sametāstu praviṣṭāste kṛṣṇasyānumatena vai | yuyudhe sa tu kṛṣṇena raukmiṇeyaḥ pracoditaḥ | mānayad yādavānsarvānyānayaṃ baddhavānpurā

हिन्दी अर्थ

निकुम्भ तो श्रीकृष्णके साथ युद्ध करने लगा। इधर श्रीकृष्णकी आज्ञासे रुक्मिणीनन्दन प्रध्यु्न उन सब यादवोंको छुड़ा लाये, जिन्हें निकुम्भने पहले बंदी बना लिया था

अध्याय 140

श्लोक 50

ते मुक्ता रौक्मिणेयेन प्राप्ता यत्र जनार्दनः ।प्रहृष्टमनसः सर्वे निकुम्भवधकाङ्क्षिणः

te muktā raukmiṇeyena prāptā yatra janārdanaḥ | prahṛṣṭamanasaḥ sarve nikumbhavadhakāṅkṣiṇaḥ

हिन्दी अर्थ

प्रधयुम्नद्वारा छुड़ाये गये वे समस्त वीर प्रसन्नचित्त हो निकुम्भका वध करनेकी इच्छासे उस स्थानपर गये, जहाँ भगवान्‌ श्रीकृष्ण युद्ध कर रहे थे

अध्याय 140

श्लोक 51

राजानो वीर मुञ्चेति पुनः कामं यथाब्रुवन् ।मुमोच चाथ तान्वीरो रौक्मिणेयः प्रतापवान्

rājāno vīra muñceti punaḥ kāmaṃ yathābruvan | mumoca cātha tānvīro raukmiṇeyaḥ pratāpavān

हिन्दी अर्थ

तब वे राजा जो प्रद्युप्नद्वारा कैद किये गये थे, उन कामस्वरूप प्रद्युप्रसे बार-बार कहने लगे—"वीर! हमें मुक्त कर दो।' तब प्रतापी वीर रुक्मिणी- कुमारने उन सबको छोड़ दिया

अध्याय 140

श्लोक 52

अधोमुखमुखाः सर्वे बद्धमौना नराधिपाः ।लज्जयाभिप्लुता वीरास्तस्थुर्नष्टश्रियस्तदा

adhomukhamukhāḥ sarve baddhamaunā narādhipāḥ | lajjayābhiplutā vīrāstasthurnaṣṭaśriyastadā

हिन्दी अर्थ

वे समस्त वीर नरेश अपना मुँह नीचे किये चुपचाप खड़े थे। उनकी श्री नष्ट हो गयी थी। वे उस समय लज्जामें डूबे हुए थे

अध्याय 140

श्लोक 53

निकुम्भमपि गोविन्दः प्रयतन्तं जयं प्रति ।योधयामास भगवान् घोरमात्मरिपुं हरिः

nikumbhamapi govindaḥ prayatantaṃ jayaṃ prati | yodhayāmāsa bhagavān ghoramātmaripuṃ hariḥ

हिन्दी अर्थ

पापहारी भगवान्‌ गोविन्द विजयके लिये प्रयत्न करनेवाले अपने घोर शत्रु निकुम्भके साथ युद्ध कर रहे थे

अध्याय 140

श्लोक 54

परिघेनाहतः कृष्णो निकुम्भेन भृशं विभो ।गदया चापि कृष्णेन निकुम्भस्ताडितो भृशम्

parighenāhataḥ kṛṣṇo nikumbhena bhṛśaṃ vibho | gadayā cāpi kṛṣṇena nikumbhastāḍito bhṛśam

हिन्दी अर्थ

प्रभो! निकुम्भने परिघद्वारा भगवान्‌ श्रीकृष्णपर बड़े जोरका आघात किया तथा श्रीकृष्णने भी गदाद्वारा निकुम्भको बास्म्बार गहरी चोट पहुँचायी

अध्याय 140

श्लोक 55

तावुभौ मोहमापन्नौ सुप्रहारहतौ तदा ।ततः प्रव्यथितान्दृष्ट्वा पाण्डवांश्चाथ यादवान्

tāvubhau mohamāpannau suprahārahatau tadā | tataḥ pravyathitāndṛṣṭvā pāṇḍavāṃścātha yādavān

श्लोक 55–56 का हिन्दी अर्थ

घ९५ तब एक-दूसरेके द्वारा अच्छी तरह किये गये प्रहारोंसे आहत होकर वे दोनों ही मूर्च्छित हो गये। इससे पाण्डवों और यादवोंको अत्यन्त व्यथित हुआ देख वहाँ खड़े हुए मुनिगण श्रीकृष्णके हितकी कामनासे *जप' करने लगे तथा उन्होंने वेदोक्त स्तुतियोंद्वारा परमात्मा श्रीकृष्णका स्तवन किया

अध्याय 140

श्लोक 56

जेपुर्मुनिगणास्तत्र कृष्णस्य हितकाम्यया ।तुष्टुवुश्च महात्मानं वेदप्रोक्तैस्तथा स्तवैः

jepurmunigaṇāstatra kṛṣṇasya hitakāmyayā | tuṣṭuvuśca mahātmānaṃ vedaproktaistathā stavaiḥ

अर्थ श्लोक 55 के साथ

अध्याय 140

श्लोक 57

ततः प्रत्यागतप्राणो भगवान् केशवस्तदा ।दानवश्च पुनर्वीरावुद्यतौ समरं प्रति

tataḥ pratyāgataprāṇo bhagavān keśavastadā | dānavaśca punarvīrāvudyatau samaraṃ prati

हिन्दी अर्थ

तब भगवान्‌ केशव सजग हो उठे, मानो उनमें पुन; प्राण लौट आये हों। तदनन्तर वह दानव भी होशमें आ गया। फिर वे दोनों वीर युद्धके लिये उद्यत हो गये

अध्याय 140

श्लोक 58

वृषभाविव नर्दन्तौ गजाविव च भारत ।शालावृकाविव क्रुद्धौ प्रहरन्तौ रणोत्कटौ

vṛṣabhāviva nardantau gajāviva ca bhārata | śālāvṛkāviva kruddhau praharantau raṇotkaṭau

हिन्दी अर्थ

भारत! वे दोनों रणोन्मत्त वीर साँड़ोंके समान हँकड़ते, हाथियोंके समान चिग्घाड़ते और भेड़ियोंके समान दहाड़ते हुए क्रोधपूर्वक परस्पर प्रहार करने लगे

अध्याय 140

श्लोक 59

अथ कृष्णं तदोवाच नृप वागशरीरिणी ।चक्रेण शमयस्यैनं देवब्राह्मणकण्टकम्

atha kṛṣṇaṃ tadovāca nṛpa vāgaśarīriṇī | cakreṇa śamayasyainaṃ devabrāhmaṇakaṇṭakam

हिन्दी अर्थ

नरेश्वर! उस समय आकाशवाणीने भगवान्‌ श्रीकृष्णसे कहा—' जनार्दन! यह देवताओं और ब्राह्मणोंके लिये कण्टकरूप है। तुम अपने चक्रद्वारा इसको नष्ट कर दो'

अध्याय 140

श्लोक 60

इति होवाच भगवान् देवो बिल्वोदकेश्वरः ।धर्मं यशश्च विपुलं प्राप्नुहि त्वं महाबल

iti hovāca bhagavān devo bilvodakeśvaraḥ | dharmaṃ yaśaśca vipulaṃ prāpnuhi tvaṃ mahābala

हिन्दी अर्थ

यह बात स्वयं भगवान्‌ बिल्वोदकेश्वरदेवने कही थी। फिर उन्होंने इस प्रकार कहा—' महाबली श्रीकृष्ण ! तुम (इस दैत्यको मारकर) महान्‌ धर्म और विशाल यश प्राप्त करो '

अध्याय 140

श्लोक 61

तथेत्युक्त्वा नमस्कृत्वा लोकनाथः सतां गतिः ।सुदर्शनं मुमोचाथ चक्रं दैत्यकुलान्तकम्

tathetyuktvā namaskṛtvā lokanāthaḥ satāṃ gatiḥ | sudarśanaṃ mumocātha cakraṃ daityakulāntakam

हिन्दी अर्थ

तब ' जो आज्ञा' कहकर सत्पुरुषोंके आश्रयदाता जगदीश्वर श्रीकृष्णने भगवान्‌ बिल्वोदकेश्वरको नमस्कार किया और रैत्यकुलका विनाश करनेवाले सुदर्शन चक्रको निकुम्भपर छोड़ दिया

अध्याय 140

श्लोक 62

तन्निकुम्भस्य चिच्छेद शिरः प्रवरकुण्डलम् ।नारायणभुजोत्सृष्टं सूर्यमण्डलवर्चसम्

tannikumbhasya ciccheda śiraḥ pravarakuṇḍalam | nārāyaṇabhujotsṛṣṭaṃ sūryamaṇḍalavarcasam

हिन्दी अर्थ

श्रीकष्णके हाथसे छूटे हुए सूर्यमण्डलके समान तेजस्वी चक्रने उत्तम कुण्डलॉसे अलंकृत निकुम्भका मस्तक काट डाला

अध्याय 140

श्लोक 63

उत्पपात शिरस्तस्य भूमौ ज्वलितकुण्डलम् ।मेघमत्तो गिरेः शृङ्गान्मयूर इव भूतले

utpapāta śirastasya bhūmau jvalitakuṇḍalam | meghamatto gireḥ śṛṅgānmayūra iva bhūtale

हिन्दी अर्थ

कान्तिमान्‌ कुण्डलोंसे अलंकृत इसका वह मस्तक पृथ्वीपर गिर पड़ा, मानो मेघके र्शनसे उन्मत्त हुआ कोई मोर पर्वतके शिखरसे धरतीपर भा गिरा हो

अध्याय 140

श्लोक 64

निकुम्भे निहते तस्मिन् देवो बिल्वोदकेश्वरः ।तुतोष च नरव्याघ्र जगत्त्रासकरे विभुः

nikumbhe nihate tasmin devo bilvodakeśvaraḥ | tutoṣa ca naravyāghra jagattrāsakare vibhuḥ

हिन्दी अर्थ

नरव्याघ्र! जगत्‌को त्रास देनेवाले गस निकुम्भके मारे जानेपर सर्वव्यापी देव बिल्वोदकेश्वर हुत संतुष्ट हुए

अध्याय 140

श्लोक 66

पपात पुष्पवृष्टिश्च शक्रसृष्टा नभस्तलात् ।देवदुन्दुभयश्चैव प्रणेदुररिनाशने ६५॥ ननन्द च जगत्कृत्स्नं मुनयश्च विशेषतः ।दैत्यकन्याश्च भगवान् यदुभ्यः शतशो ददौ

papāta puṣpavṛṣṭiśca śakrasṛṣṭā nabhastalāt | devadundubhayaścaiva praṇedurarināśane 65|| nananda ca jagatkṛtsnaṃ munayaśca viśeṣataḥ | daityakanyāśca bhagavān yadubhyaḥ śataśo dadau

हिन्दी अर्थ

सम्पूर्ण जगत्‌ मानन्दमग्न हो गया। ऋषि-मुनियोंको विशेष प्रसन्नता ई ! भगवान्‌ श्रीकृष्णने यादववीरोंको सैकड़ों दैत्य- ननयाएँ दे दीं

अध्याय 140

श्लोक 67

क्षत्त्रियाणां च भगवान्सान्त्वयित्वा पुनः पुनः ।रत्नानि च विचित्राणि वासांसि प्रवराणि च

kṣattriyāṇāṃ ca bhagavānsāntvayitvā punaḥ punaḥ | ratnāni ca vicitrāṇi vāsāṃsi pravarāṇi ca

हिन्दी अर्थ

अन्य क्षत्रिय राजाओंको भी बारम्बार मान्‍्त्वना देकर भगवान्‌ने विचित्र रत्त और श्रेष्ठ वस्त्र दान किये

अध्याय 140

श्लोक 68

रथानां वाजियुक्तानां षट् सहस्राणि केशवः ।अददात् पाण्डवेभ्यश्च प्रीतात्मा गदपूर्वजः

rathānāṃ vājiyuktānāṃ ṣaṭ sahasrāṇi keśavaḥ | adadāt pāṇḍavebhyaśca prītātmā gadapūrvajaḥ

हिन्दी अर्थ

गदके बड़े भाई श्रीकृष्णने प्रसन्नचित्त कर पाण्डवोंको छ: हजार अधयुक्त रथ भेंट किये

अध्याय 140

श्लोक 69

तदेव चाथ प्रवरं षट्पुरं पुरवर्द्धनः ।द्विजाय ब्रह्मदत्ताय ददौ तार्क्ष्यवरध्वजः

tadeva cātha pravaraṃ ṣaṭpuraṃ puravarddhanaḥ | dvijāya brahmadattāya dadau tārkṣyavaradhvajaḥ

हिन्दी अर्थ

नगरकी वृद्धि करनेवाले भगवान्‌ गरुड़ध्वजने वह षट्पुर नामक श्रेष्ठ नगर ब्रह्मदत्त नामक ब्राह्मणको दे दिया

अध्याय 140

श्लोक 70

सत्रे समाप्ते च तदा शङ्खचक्रगदाधरः ।विसर्जयित्वा तत् क्षत्रं पाण्डवांश्च महाबलः

satre samāpte ca tadā śaṅkhacakragadādharaḥ | visarjayitvā tat kṣatraṃ pāṇḍavāṃśca mahābalaḥ

श्लोक 70–71 का हिन्दी अर्थ

यज्ञ समाप्त होनेपर शड्ड, चक्र और गदा धारण करनेवाले महाबली भगवान्‌ श्रीकृष्णने उन क्षत्रियों और पाण्डवोंको विदा करके श्रीबिल्वोदकेश्वरके लिये एक सामूहिक उत्सव किया, जिसमें फलोंके गूदे, दाल तथा अन्यान्य व्यज्ञनोंसे युक्त बहुत-सा अन्न लोगोंको खिलाया गया

अध्याय 140

श्लोक 71

बिल्वोदकेश्वरस्याथ समाजमकरोत् प्रभुः ।मांससूपसमाकीर्णं बह्वन्नं व्यञ्जनाकुलम्

bilvodakeśvarasyātha samājamakarot prabhuḥ | māṃsasūpasamākīrṇaṃ bahvannaṃ vyañjanākulam

अर्थ श्लोक 70 के साथ

अध्याय 140

श्लोक 72

नियुद्धकुशलान् मल्लान् देवो मल्लप्रियस्तदा ।योधयित्वा ददौ भूरि वित्तं वस्त्राणि चात्मवान्

niyuddhakuśalān mallān devo mallapriyastadā | yodhayitvā dadau bhūri vittaṃ vastrāṇi cātmavān

हिन्दी अर्थ

अपने मनको वशमें रखनेवाले मल्लप्रिय भगवान्‌ श्रीकृष्णने युद्धकुशल मल्लॉंको लड़वाकर उन्हें बहुत-सा धन और वस्त्र दिये

अध्याय 140

श्लोक 73

मातापितृभ्यां सहितो यदुभिश्च महाबलः ।अभिवाद्य ब्रह्मदत्तं ययौ द्वारवतीं पुरीम्

mātāpitṛbhyāṃ sahito yadubhiśca mahābalaḥ | abhivādya brahmadattaṃ yayau dvāravatīṃ purīm

हिन्दी अर्थ

तदनन्तर महाबली श्रीकृष्ण अपने माता-पिता तथा अन्य यादवोंके साथ ब्रह्मदत्तको प्रणाम करके द्वारकापुरीको चले गये

अध्याय 140

श्लोक 74

स विवेश पुरीं रम्यां हृष्टपुष्टजनाकुलाम् ।पुष्पचित्रपथां वीरो वन्द्यमानो नरैः पथि

sa viveśa purīṃ ramyāṃ hṛṣṭapuṣṭajanākulām | puṣpacitrapathāṃ vīro vandyamāno naraiḥ pathi

हिन्दी अर्थ

मार्गमें दूसरे लोगोंका प्रणाम स्वीकार करते हुए वीर श्रीकृष्णने हृष्ट-पुष्ठ मनुष्योंसे भरी हुई तथा पुष्पोंके बिछाये जानेसे विचित्र पथवाली रमणीय पुरी द्वारकामें प्रवेश किया॥ '

अध्याय 140

श्लोक 75

इमं यः षटपुरवधं विजयं चक्रपाणिनः ।शृणुयाद् वा पठेद् वापि युद्धे जयमवाप्नुयात्

imaṃ yaḥ ṣaṭapuravadhaṃ vijayaṃ cakrapāṇinaḥ | śṛṇuyād vā paṭhed vāpi yuddhe jayamavāpnuyāt

हिन्दी अर्थ

जो चक्रपाणि भगवान्‌ श्रीकृष्णके इस षट्पुरवधरूप विजयसूचक चरित्रको सुनता अथवा पढ़ता है, वह युद्धमें विजय पाता है

अध्याय 140

श्लोक 76

अपुत्रो लभते पुत्रमधनो लभते धनम् ।व्याधितो मुच्यते रोगी बद्धश्चाप्यथ बन्धनात्

aputro labhate putramadhano labhate dhanam | vyādhito mucyate rogī baddhaścāpyatha bandhanāt

हिन्दी अर्थ

(इसके श्रवण अथवा पठनसे) पुत्रहीनको पुत्र और निर्धनको धन मिलता है । रोगी रोगसे और बंदी बन्धनसे छुटकारा पाता है

अध्याय 140

श्लोक 77

इदं पुंसवनं प्रोक्तं गर्भाधानं च भारत ।श्राद्धेषु पठितं सम्यगक्षय्यकरणं स्मृतम्

idaṃ puṃsavanaṃ proktaṃ garbhādhānaṃ ca bhārata | śrāddheṣu paṭhitaṃ samyagakṣayyakaraṇaṃ smṛtam

हिन्दी अर्थ

भारत! यह प्रसंग पुंसवन और गर्भाधानमें सहायक कहा गया है (अर्थात्‌ इसके श्रवणसे पत्नीके गर्भाधान होता है और उस गर्भसे पुत्रकी उत्पत्ति होती है) । यदि श्राद्धोंमें इसका सम्यक्‌ रूपसे पाठ किया जाय तो यह उसके फलको अक्षय बनानेवाला माना गया है

अध्याय 140

श्लोक 78

इदममरवरस्य भारते प्रथितबलस्य जयं महात्मनः ।सततमिह हि यः पठेन्नरः सुगतिमितो व्रजते गतज्वरः

idamamaravarasya bhārate prathitabalasya jayaṃ mahātmanaḥ | satatamiha hi yaḥ paṭhennaraḥ sugatimito vrajate gatajvaraḥ

हिन्दी अर्थ

भारतमें जिनका बल विख्यात है तथा जो देवताओसे भी श्रेष्ठ हैं, उन महात्मा श्रीकृष्णकी इस विजयगाथाका जो मनुष्य यहाँ सदा पाठ करता है, वह रोग-शोकसे मुक्त हो यहाँसे परम गतिकों प्राप्त होता है

अध्याय 140

श्लोक 79

मणिकनकविचित्रपाणिपादो निरतिशयार्कगुणोऽरिहादिनाथः ।चतुरुदधिशयश्चतुर्विधात्मा जयति जगत्पुरुषः सहस्रनामा

maṇikanakavicitrapāṇipādo niratiśayārkaguṇo'rihādināthaḥ | caturudadhiśayaścaturvidhātmā jayati jagatpuruṣaḥ sahasranāmā

हिन्दी अर्थ

मणि और सुवर्णके आभूषण धारण करनेसे जिनके हाथ-पैरोंकी विचित्र शोभा होती है, जिनमें सूर्यके तेज आदि गुण उनसे भी बहुत अधिक मात्रामें विद्यमान हैं, जो शत्रु ओंके नाशक तथा सबके आदिरक्षक हैं, चारों समुद्र जिनके शयनागार हैं तथा जो वासुदेव, संकर्षण, प्रद्यु्म और अनिरुद्ध—इन चार व्यूहोंके रूपमें विद्यमान हैं, वे जगत्‌के अन्तर्यामी पुरुष सहस्तरों नामोंवाले श्रीकृष्ण नित्य विजयशील हैं

स्रोत: local proofread transcription: Sanskrit shlokas of the Harivamsa (Harivamsha, Vishnu and Bhavishya parvas) from sanskritdocuments.org. One chapter per adhyaya; verse numbers as printed in the source (restarting in each adhyaya). Appendix sections are not included. · प्राप्त 19/10/2026

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शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

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शोध टिप्पणीResearch note

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पाठ-भेद एवं संशोधनVariants & corrections

पाठ-भेद टिप्पणी (Alternative Reading / Variant Notes):

Collated with BORI Critical Edition of Mahabharata Khilaparvan.