अध्याय 138
श्लोक 1
ब्रह्मदत्तस्य यज्ञे वसुदेवदेवकीभ्यामागमनं, दैत्यैः ब्रह्मदत्तस्य कन्यकानां अपहरणं , प्रद्युम्नेन तासां रक्षा, नारदस्य कथनेन दैत्येभिः क्षत्रियनरेशानां स्वपक्षे मेलनम्, श्रीकृष्णस्य षट्पुरे आगमनं एतस्मिन्नेव काले तु चतुर्वेदषडङ्गवित् ।ब्राह्मणो याज्ञवल्क्यस्य शिष्यो धर्मगुणान्वितः
brahmadattasya yajñe vasudevadevakībhyāmāgamanaṃ, daityaiḥ brahmadattasya kanyakānāṃ apaharaṇaṃ , pradyumnena tāsāṃ rakṣā, nāradasya kathanena daityebhiḥ kṣatriyanareśānāṃ svapakṣe melanam, śrīkṛṣṇasya ṣaṭpure āgamanaṃ etasminneva kāle tu caturvedaṣaḍaṅgavit | brāhmaṇo yājñavalkyasya śiṣyo dharmaguṇānvitaḥ
श्लोक 1–3 का हिन्दी अर्थ
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! इसी समय चारों वेदों और छहों अड्ञोंके ज्ञाता एक ब्राह्मण, जिनका नाम ब्रह्मदत्त था, एक वर्षतक चालू रहनेवाले यज्ञकी दीक्षामें दीक्षित हुए। ब्रह्मदत्त याज्ञवल्क्यके शिष्य, धर्मसम्बन्धी गुणोंसे सम्पन्न तथा शुक्ल यजुर्वेद—वाजसनेय संहिताके अध्येता थे। उनका घर भी षट्पुरमें ही था। उन्होंने कभी बुद्धिमान् वसुदेवजीका अश्वमेध यज्ञ कराया था। वे मुनिसेवित श्रेष्ठ नदी आवतकि पवित्र तटपर यज्ञ करते थे