Harivamsha Purana
138
अध्याय 138 / 318

Parva 2, Adhyāya 83

56 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ56 श्लोक

अध्याय 138

श्लोक 1

ब्रह्मदत्तस्य यज्ञे वसुदेवदेवकीभ्यामागमनं, दैत्यैः ब्रह्मदत्तस्य कन्यकानां अपहरणं , प्रद्युम्नेन तासां रक्षा, नारदस्य कथनेन दैत्येभिः क्षत्रियनरेशानां स्वपक्षे मेलनम्, श्रीकृष्णस्य षट्पुरे आगमनं एतस्मिन्नेव काले तु चतुर्वेदषडङ्गवित् ।ब्राह्मणो याज्ञवल्क्यस्य शिष्यो धर्मगुणान्वितः

brahmadattasya yajñe vasudevadevakībhyāmāgamanaṃ, daityaiḥ brahmadattasya kanyakānāṃ apaharaṇaṃ , pradyumnena tāsāṃ rakṣā, nāradasya kathanena daityebhiḥ kṣatriyanareśānāṃ svapakṣe melanam, śrīkṛṣṇasya ṣaṭpure āgamanaṃ etasminneva kāle tu caturvedaṣaḍaṅgavit | brāhmaṇo yājñavalkyasya śiṣyo dharmaguṇānvitaḥ

श्लोक 1–3 का हिन्दी अर्थ

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! इसी समय चारों वेदों और छहों अड्ञोंके ज्ञाता एक ब्राह्मण, जिनका नाम ब्रह्मदत्त था, एक वर्षतक चालू रहनेवाले यज्ञकी दीक्षामें दीक्षित हुए। ब्रह्मदत्त याज्ञवल्क्यके शिष्य, धर्मसम्बन्धी गुणोंसे सम्पन्न तथा शुक्ल यजुर्वेद—वाजसनेय संहिताके अध्येता थे। उनका घर भी षट्पुरमें ही था। उन्होंने कभी बुद्धिमान्‌ वसुदेवजीका अश्वमेध यज्ञ कराया था। वे मुनिसेवित श्रेष्ठ नदी आवतकि पवित्र तटपर यज्ञ करते थे

अध्याय 138

श्लोक 2

ब्रह्मदत्तेति विख्यातो विप्रो वाजसनेयिवान् ।अश्वमेधः कृतस्तेन वसुदेवस्य धीमतः

brahmadatteti vikhyāto vipro vājasaneyivān | aśvamedhaḥ kṛtastena vasudevasya dhīmataḥ

अर्थ श्लोक 1 के साथ

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श्लोक 3

स संवत्सरदीक्षायां दीक्षितः षट्पुरालयः ।आवर्तायाः शुभे तीरे सुनद्या मुनिजुष्ट्या

sa saṃvatsaradīkṣāyāṃ dīkṣitaḥ ṣaṭpurālayaḥ | āvartāyāḥ śubhe tīre sunadyā munijuṣṭyā

अर्थ श्लोक 1 के साथ

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श्लोक 4

सखा च वसुदेवस्य सहाध्यायी द्विजोत्तमः ।उपाध्यायश्च कौरव्य क्षीरहोता महात्मनः

sakhā ca vasudevasya sahādhyāyī dvijottamaḥ | upādhyāyaśca kauravya kṣīrahotā mahātmanaḥ

हिन्दी अर्थ

कुरुनन्दन! द्विजश्रेष्ठ ब्रह्मदत्त महात्मा वसुदेवजीके सहपाठी, सखा, उपाध्याय और अध्वर्यु भी थे

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श्लोक 5

वसुदेवस्तत्र यातो देवक्या सहितः प्रभो ।यजमानं षट्पुरस्थं यथा शक्रो बृहस्पतिम्

vasudevastatra yāto devakyā sahitaḥ prabho | yajamānaṃ ṣaṭpurasthaṃ yathā śakro bṛhaspatim

हिन्दी अर्थ

की औदुम्बर संज्ञा है। २. वटवृक्षकी जड़में निवास करनेवालोंको पत्थिक कहलाते हैं। ४. सृगाल नामक वृक्षकी वाटिकामें वास प्रभो! इसीलिये जैसे इन्द्र बृहस्पतिके यहाँ जाते हैं, उसी प्रकार देवकीसहित वसुदेवजी वहाँ षट्पुरमें रहकर यज्ञ करनेवाले ब्रह्मदत्तके यहाँ नि्मन्त्रति होकर गये थे

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श्लोक 6

तत् सत्रं ब्रह्मदत्तस्य बह्वन्नं बहुदक्षिणम् ।उपासन्ति मुनिश्रेष्ठा महात्मानो दृढव्रताः

tat satraṃ brahmadattasya bahvannaṃ bahudakṣiṇam | upāsanti muniśreṣṭhā mahātmāno dṛḍhavratāḥ

हिन्दी अर्थ

ब्रह्मदत्तका वह यज्ञ बहुत-से अन्न और प्रचुर दक्षिणासे सम्पन्न था। दृढ़तापूर्वक उत्तम ब्रतका पालन करनेवाले मुनिश्रेष्ठ महात्मा उस यज्ञका सेवन करते थे

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श्लोक 7

व्यासोऽहं याज्ञवल्क्यश्च सुमन्तुर्जैमिनिस्तथा ।धृतिमाञ्जाबलिश्चैव देवलाद्याश्च भारत

vyāso'haṃ yājñavalkyaśca sumanturjaiministathā | dhṛtimāñjābaliścaiva devalādyāśca bhārata

श्लोक 7–10 का हिन्दी अर्थ

भरतनन्दन! वह यज्ञ बुद्धिमानू वसुदेवजीके अनुरूप समृद्धिसे युक्त था। उसमें मैं, मेरे गुरु व्यासजी, याज्ञजल्क्य मुनि, सुमन्तु, जैमिनि, धैर्यशील जाबलि (या जाबालि) तथा देवल आदि महर्षि भी उपस्थित थे। उस पजमें धर्मपरायणा देवकी देवी जगत्स्रष्टा भगवान्‌ वासुदेवके प्रभावसे इस पृथ्वीपर सबको मनोवाज्छित पदार्थ दान करती थीं। जब वह यज्ञ चलने लगा, उस समय ट्पुरमें रहनेवाले निकुम्भ आदि दैत्य, जो वर पाकर अ्रमंडमें भरे रहते थे, वहाँ आकर ब्रह्मदत्तसे बोले—। हमारे लिये भी यज्ञका भाग निकाला जाय, हमलोग इस पज्ञमें सोमरसका पान करेंगे। यजमान ब्रह्मदत्त हमें अपनी कन्याएँ दें

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श्लोक 8

ऋद्ध्यानुरूपया युक्तं वसुदेवस्य धीमतः ।यत्रेप्सितान्ददौ कामान्देवकी धर्मचारिणी

ṛddhyānurūpayā yuktaṃ vasudevasya dhīmataḥ | yatrepsitāndadau kāmāndevakī dharmacāriṇī

अर्थ श्लोक 7 के साथ

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श्लोक 9

वासुदेवप्रभावेण जगत्स्रष्टुर्महीतले ।तस्मिन् सत्रे वर्तमाने दैत्याः षट्पुरवासिनः

vāsudevaprabhāveṇa jagatsraṣṭurmahītale | tasmin satre vartamāne daityāḥ ṣaṭpuravāsinaḥ

अर्थ श्लोक 7 के साथ

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श्लोक 10

निकुम्भाद्याः समागम्य तमूचुर्वरदर्पिताः ।कार्यतां यज्ञभागो नः सोमं पास्यामहे वयम् ।कन्याश्च ब्रह्मदत्तो नो यजमानः प्रयच्छतु

nikumbhādyāḥ samāgamya tamūcurvaradarpitāḥ | kāryatāṃ yajñabhāgo naḥ somaṃ pāsyāmahe vayam | kanyāśca brahmadatto no yajamānaḥ prayacchatu

अर्थ श्लोक 7 के साथ

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श्लोक 11

बह्व्यः सन्त्यस्य कन्याश्च रूपवत्यो महात्मनः ।आहूय ताः प्रदातव्याः सर्वथैव हि नः श्रुतम्

bahvyaḥ santyasya kanyāśca rūpavatyo mahātmanaḥ | āhūya tāḥ pradātavyāḥ sarvathaiva hi naḥ śrutam

श्लोक 11–12 का हिन्दी अर्थ

हमने सुना है कि इन पहात्माके बहुत-सी रूपवती कन्याएँ हैं। उन सबको बुलाकर सब प्रकारसे हमारे लिये दान कर देना चाहिये। ्रह्मदत्तजी हमें उत्तमोत्तम रत्र प्रदान करें। (तभी ये यहाँ पज्ञ कर सकते हैं) अन्यथा इन्हें यज्ञ नहीं करना चाहिये। पह हम आज़ देते हैं '

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श्लोक 12

रत्नानि च ब्रह्मदत्तो विशिष्टानि ददातु नः ।अन्यथा तु न यष्टव्यं वयमाज्ञापयामहे

ratnāni ca brahmadatto viśiṣṭāni dadātu naḥ | anyathā tu na yaṣṭavyaṃ vayamājñāpayāmahe

अर्थ श्लोक 11 के साथ

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श्लोक 13

एतच्छ्रुत्वा ब्रह्मदत्तस्तानुवाच महासुरान् ।यज्ञभागो न विहितः पुराणेऽसुरसत्तमाः

etacchrutvā brahmadattastānuvāca mahāsurān | yajñabhāgo na vihitaḥ purāṇe'surasattamāḥ

श्लोक 13–14 का हिन्दी अर्थ

यह सुनकर ब्रह्मदत्तने उन बड़े-बड़े असुरोंसे कहा—' असुरशिरोमणियो ! पुरातन तरेदमें असुरोंके लिये यज्ञभाग देनेका विधान नहीं है; फेर मैं यज्ञमें आपलोगोंको सोमरस कैसे दे सकता हूँ? हाँ वेदके विस्तृत अर्थको जाननेवाले श्रेष्ठ मुनि बैठे हैं, नसे पूछ लीजिये

अध्याय 138

श्लोक 14

कथं सत्रे सोमपानं शक्यं दातुं मया हि वः ।पृच्छतेह मुनिश्रेष्ठान् वेदभाष्यार्थकोविदान्

kathaṃ satre somapānaṃ śakyaṃ dātuṃ mayā hi vaḥ | pṛcchateha muniśreṣṭhān vedabhāṣyārthakovidān

अर्थ श्लोक 13 के साथ

अध्याय 138

श्लोक 15

कन्या हि मम या देयास्ताश्च सङ्कल्पिता मया ।अन्तर्वेद्यां प्रदातव्याः सदृशानामसंशयम्

kanyā hi mama yā deyāstāśca saṅkalpitā mayā | antarvedyāṃ pradātavyāḥ sadṛśānāmasaṃśayam

हिन्दी अर्थ

मुझे अपनी जिन कन्याओंका गन करना था, उनका मानसिक संकल्प मैंने कर दिया वे दूसरोंको दी जा चुकी हैं), अब उन्हें अन्तर्वेदीमें गोग्य वरोंके हाथमें सौंप देना है। इसमें संशय नहीं

अध्याय 138

श्लोक 16

रत्नानि तु प्रयच्छामि सान्त्वेनाहं विचिन्त्यताम् ।बलान्नैव प्रदास्यामि देवकीपुत्रमाश्रितः

ratnāni tu prayacchāmi sāntvenāhaṃ vicintyatām | balānnaiva pradāsyāmi devakīputramāśritaḥ

हिन्दी अर्थ

अब रही रल्लोंकी बात, उन्हें मैं आपलोगोंको भी दूँगा, जब आप सान्त्वनापूर्वक बात करें, इस शतको आप अच्छी तरह सोच-समझ लें। बलपूर्वक ँगनेपर मैं कुछ नहीं दूँगा; क्योंकि भगवान्‌ देवकीनन्दनकी रण ले चुका हूँ (वे ही मेरी रक्षा करेंगे) '

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श्लोक 17

निकुम्भाद्यास्तु रुषिताः पापाः षट्पुरवासिनः ।यक्षवाटं विलुलुठुर्जह्रुः कन्याश्च तास्तथा

nikumbhādyāstu ruṣitāḥ pāpāḥ ṣaṭpuravāsinaḥ | yakṣavāṭaṃ viluluṭhurjahruḥ kanyāśca tāstathā

हिन्दी अर्थ

द्८्दे यह उत्तर सुनकर षट्पुरमें निवास करनेवाले निकुम्भ आदि पापी असुर रोषमें भर गये। उन्होंने यज्ञमण्डपको तहस-नहस कर दिया और ब्रह्मदत्तकी कन्यायोंको हर लिया

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श्लोक 18

तद्दृष्ट्वा सम्प्रवृत्तं तु दध्यावानकदुन्दुभिः ।वासुदेवं महात्मानं बलभद्रं गदं तथा

taddṛṣṭvā sampravṛttaṃ tu dadhyāvānakadundubhiḥ | vāsudevaṃ mahātmānaṃ balabhadraṃ gadaṃ tathā

हिन्दी अर्थ

यज्ञमण्डपमें वह लूट मची हुई देख वसुदेवने महात्मा श्रीकृष्ण, बलदेव और गदका चिन्तन किया

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श्लोक 19

विदितार्थस्ततः कृष्णः प्रद्युम्नमिदमब्रवीत् ।गच्छ कन्यापरित्राणं कुरु पुत्राशु मायया

viditārthastataḥ kṛṣṇaḥ pradyumnamidamabravīt | gaccha kanyāparitrāṇaṃ kuru putrāśu māyayā

श्लोक 19–21 का हिन्दी अर्थ

श्रीकृष्णको तो सब बात ज्ञात ही थी। उन्होंने प्र्ुम्नसे कहा—' बेटा! जाओ और मायाद्वारा ब्रह्मदत्तकी कन्याओंकी शीघ्र रक्षा करो । प्रभो ! तबतक मैं यादव वीरोंकी सेनाके साथ षट्पुरको चल रहा हूँ'। महाबली कामस्वरूप वीर प्रद्युम्न पिताकी आज्ञाका पालन करनेवाले थे। वे तत्काल षट्पुरकी ओर चल दिये और पलक मारते-मारते वहाँ पहुँचकर उन महाबली बुद्धिमान्‌ वीरने उन कन्याओंका मायाद्वारा अपहरण कर लिया

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श्लोक 20

यावद् यादवसैन्येन षट्पुरं याम्यहं प्रभो ।स ययौ षट्पुरं वीरः पितुराशाकरस्तदा

yāvad yādavasainyena ṣaṭpuraṃ yāmyahaṃ prabho | sa yayau ṣaṭpuraṃ vīraḥ piturāśākarastadā

अर्थ श्लोक 19 के साथ

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श्लोक 21

निमेषान्तरमात्रेण गत्वा कामो महाबलः ।कन्यास्ता मायया धीमानपजह्रे महाबलः

nimeṣāntaramātreṇa gatvā kāmo mahābalaḥ | kanyāstā māyayā dhīmānapajahre mahābalaḥ

अर्थ श्लोक 19 के साथ

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श्लोक 22

मायामयीश्च कृत्वाऽन्या न्यस्तवान्रुक्मिणीसुतः ।मा भैरिति च धर्मात्मा देवकीमुक्तवांस्तदा

māyāmayīśca kṛtvā'nyā nyastavānrukmiṇīsutaḥ | mā bhairiti ca dharmātmā devakīmuktavāṃstadā

हिन्दी अर्थ

रुक्मिणीनन्दन प्र्युम्नने मायामयी दूसरी कन्याओंका निर्माण करके उन्हें असुरोंके पास छोड़ दिया था। फिर उन धर्मत्माने अपनी पितामही देवकीसे कहा-'दादीजी! आप भय न करें'

अध्याय 138

श्लोक 23

मायामयीस्ततो हृत्वा सुता ह्यस्य दुरासदाः ।षट्पुरं विविशुर्दैत्याः परितुष्टा नराधिप

māyāmayīstato hṛtvā sutā hyasya durāsadāḥ | ṣaṭpuraṃ viviśurdaityāḥ parituṣṭā narādhipa

हिन्दी अर्थ

नरेधर! ब्रह्मदत्तकी पुत्रियाँ दैत्योंके लिये दुष्प्राप्य थीं। वे मायामयी कन्याओंका ही अपहरण करके षट्पुरमें जा घुसे और अपनी सफलतापर संतुष्ट हुए

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श्लोक 24

कर्म चासार्य ते तत्र विधिदृष्टेन कर्मणा ।यद् विशिष्टं बहुगुणं तदभूच्च नराधिप

karma cāsārya te tatra vidhidṛṣṭena karmaṇā | yad viśiṣṭaṃ bahuguṇaṃ tadabhūcca narādhipa

हिन्दी अर्थ

राजन्‌! इधर शास्त्रीय विधिके अनुसार वहाँ यज्ञकर्मका सम्पादन होने लगा। जो विशिष्ट एवं बहुगुण सम्पन्न कार्य था, वह सब सम्पन्न हुआ

अध्याय 138

श्लोक 25

एतस्मिन्नन्तरे प्राप्ता राजानस्तत्र भारत ।सत्रे निमन्त्रिताः पूर्वं ब्रह्मदत्तेन धीमता

etasminnantare prāptā rājānastatra bhārata | satre nimantritāḥ pūrvaṃ brahmadattena dhīmatā

हिन्दी अर्थ

भारत! इसी बीचमें वहाँ बहुत-से राजा आये, जिन्हें बुद्धिमान्‌ ब्रह्मदत्तने पहलेसे ही यज्में पधारनेके लिये निमन्त्रण दे रखा था

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श्लोक 26

जरासन्धो दन्तवक्त्रः शिशुपालस्तथैव च ।पाण्डवा धार्तराष्ट्राश्च मालवाः सगणास्तथा

jarāsandho dantavaktraḥ śiśupālastathaiva ca | pāṇḍavā dhārtarāṣṭrāśca mālavāḥ sagaṇāstathā

श्लोक 26–28 का हिन्दी अर्थ

जरासंध, दन्तवक्‍्त्र, शिशुपाल, पाण्डव, धृतराष्ट्रके सभी पुत्र, अपने ग्णोंसहित मालवनरेश, रुवमी, आह्ववृति, नील, धर्म, अवन्तीके विन्द और अनुविन्द, शल्य, शकुनि, दूसरे वीर नरेश, सुदृढ़ आयुध धारण करनेवाले दूसरे महामनस्वी वीर नरेश वहाँ पधारे थे। भरतनन्दन! उन्हें षट्पुरसे थोड़ी ही दूरपर ठहराया गया

अध्याय 138

श्लोक 27

रुक्मी चैवाह्वृतिश्चैव नीलो वा धर्म एव च ।विन्दानुविन्दावावन्त्यौ शल्यः शकुनिरेव च

rukmī caivāhvṛtiścaiva nīlo vā dharma eva ca | vindānuvindāvāvantyau śalyaḥ śakunireva ca

अर्थ श्लोक 26 के साथ

अध्याय 138

श्लोक 28

राजानश्चापरे वीरा महात्मानो दृढायुधाः ।आवासिता नातिदूरे षट्पुरस्य च भारत

rājānaścāpare vīrā mahātmāno dṛḍhāyudhāḥ | āvāsitā nātidūre ṣaṭpurasya ca bhārata

अर्थ श्लोक 26 के साथ

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श्लोक 29

तान् दृष्ट्वा नारदः श्रीमानचिन्तयदनिन्दितः ।क्षत्त्रस्य यादवानां च भविष्यति समागमः

tān dṛṣṭvā nāradaḥ śrīmānacintayadaninditaḥ | kṣattrasya yādavānāṃ ca bhaviṣyati samāgamaḥ

हिन्दी अर्थ

उन सबको वहाँ उपस्थित देख साधु-महात्मा श्रीमान्‌ नारदजीने सोचा, यहाँ यादवों तथा दूसरे क्षत्रियोंमें संघर्ष होगा

अध्याय 138

श्लोक 30

अत्र हेतुरहं युद्धे तस्मात् तत् प्रयताम्यहम् ।एवं सञ्चिन्तयित्वाथ निकुम्भभवनं गतः

atra heturahaṃ yuddhe tasmāt tat prayatāmyaham | evaṃ sañcintayitvātha nikumbhabhavanaṃ gataḥ

हिन्दी अर्थ

इस युद्धमें मैं ही कारण बनूँगा; अत: उसके लिये अभीसे प्रयत्न आरम्भ करता हूँ। ऐसा सोचकर वे निकुम्भके घरमें गये

अध्याय 138

श्लोक 31

पूजितः स निकुम्भेन दानवैश्च तथापरैः ।उपविष्टः स धर्मात्मा निकुम्भमिदमब्रवीत्

pūjitaḥ sa nikumbhena dānavaiśca tathāparaiḥ | upaviṣṭaḥ sa dharmātmā nikumbhamidamabravīt

हिन्दी अर्थ

निकुम्भ तथा दूसरे-दूसरे दानवोंने वहाँ इनकी बड़ी आवभगत की। धर्मात्मा नारदजी वहाँ एक आसनपर बैठकर निकुम्भसे इस प्रकार बोले—

अध्याय 138

श्लोक 32

कथं विरोधं यदुभिः कृत्वा स्वस्थैरिहास्यते ।यो ब्रह्मदत्तः स हरिः स हि तस्य पितुः सखा

kathaṃ virodhaṃ yadubhiḥ kṛtvā svasthairihāsyate | yo brahmadattaḥ sa hariḥ sa hi tasya pituḥ sakhā

हिन्दी अर्थ

तुमलोग यादवोंके साथ विरोध करके यहाँ कैसे निश्चिन्त बैठे हुए हो। अरे भाई! जो ब्रह्मदत्त हैं, वे ही श्रीकृष्ण हैं; क्योंकि वे ब्रह्मदत्त उन श्रीकृष्णके पिता वसुदेवके मित्र हैं

अध्याय 138

श्लोक 33

शतानि पञ्च भार्याणां ब्रह्मदत्तस्य धीमतः ।आनीता वसुदेवस्य सुतस्य प्रियकाम्यया

śatāni pañca bhāryāṇāṃ brahmadattasya dhīmataḥ | ānītā vasudevasya sutasya priyakāmyayā

हिन्दी अर्थ

बुद्धिमान्‌ ब्रह्मदत्तके पाँच सौ भार्याएँ हैं, जिन्हें वे वसुदेवनन्दन श्रीकृष्णकी प्रसन्नताके लिये उनकी आराधना करके प्राप्त कर सके थे

अध्याय 138

श्लोक 34

शतद्वयं ब्राह्मणीनां राजन्यानां शतं तथा ।वैश्यानां शतमेकं च शूद्राणां शतमेव च

śatadvayaṃ brāhmaṇīnāṃ rājanyānāṃ śataṃ tathā | vaiśyānāṃ śatamekaṃ ca śūdrāṇāṃ śatameva ca

हिन्दी अर्थ

उनकी स्त्रियोंमें दो सौ तो ब्राह्मणियाँ थीं, एक सौ क्षत्रिय-कन्याएँ, एक सौ वैश्य-कन्याएँ और एक सौ शूद्रॉंकी कन्याएँ थीं

अध्याय 138

श्लोक 35

ताभिः शुश्रूषितो धीमान् दुर्वासा धर्मवित्तमः ।तेन तासां वरो दत्तो मुनिना पुण्यकर्मणा

tābhiḥ śuśrūṣito dhīmān durvāsā dharmavittamaḥ | tena tāsāṃ varo datto muninā puṇyakarmaṇā

हिन्दी अर्थ

उन सबने धर्मजोंमें प्रेष्ठ बुद्धिमान्‌ दुर्वासाकी सेवा की थी। उससे प्रसन्न होकर उन पुण्यकर्मा मुनिने उन्हें वर दिया

अध्याय 138

श्लोक 36

एकैकस्तनयो राजन्नेकैका दुहिता तथा ।रूपेणानुपमाः सर्वा वरदानेन धीमतः

ekaikastanayo rājannekaikā duhitā tathā | rūpeṇānupamāḥ sarvā varadānena dhīmataḥ

हिन्दी अर्थ

जन्‌! उन बुद्धिमान्‌ मुनिके वरदानसे ब्रह्मदत्तकी प्रत्येक प््रीके एक-एक पुत्र और एक-एक कन्या हुई। उनकी रे सारी कन्याएँ अनुपम रूपवती हैं

अध्याय 138

श्लोक 37

कन्या भवन्ति तनयास्तस्यासुर पुनः पुनः ।सङ्गमे सङ्गमे वीर भर्तृभिः शयने सह

kanyā bhavanti tanayāstasyāsura punaḥ punaḥ | saṅgame saṅgame vīra bhartṛbhiḥ śayane saha

हिन्दी अर्थ

वीर असुर ! उनकी वे कन्याएँ पतियोंके साथ शयन करते समय अत्येक संगमके अवसरपर कुमारी कन्याओंके समान क्रमनीय हो जाती हैं

अध्याय 138

श्लोक 38

सर्वपुष्पमयं गन्धं प्रस्रवन्ति वराङ्गनाः ।सर्वदा यौवने न्यस्ताः सर्वाश्चैव पतिव्रताः

sarvapuṣpamayaṃ gandhaṃ prasravanti varāṅganāḥ | sarvadā yauvane nyastāḥ sarvāścaiva pativratāḥ

हिन्दी अर्थ

वे परम सुन्दरी कन्याएँ भपने शरीरसे सब प्रकारके फूलोंकी सुगन्ध प्रकट क्ररती हैं, सदा युवावस्थामें ही स्थित रहती हैं और सब-की-सब पतिब्रताएँ हैं

अध्याय 138

श्लोक 39

सर्वा गुणैरप्सरसां गीतनृत्यगुणोदयम् ।जानन्ति सर्वा दैतेय वरदानेन धीमतः

sarvā guṇairapsarasāṃ gītanṛtyaguṇodayam | jānanti sarvā daiteya varadānena dhīmataḥ

हिन्दी अर्थ

दैत्यकुमार! वे सब अप्सराओंके समान गुणवती हैं और बुद्धिमान्‌ दुर्वासाके त्ररदानसे संगीत और नृत्यके गुणोंको प्रकट करना जानती हैं

अध्याय 138

श्लोक 40

पुत्राश्च रूपसम्पन्नाः शास्त्रार्थकुशलास्तथा ।स्वे स्वे स्थिता वर्णधर्मे यथावदनुपूर्वशः

putrāśca rūpasampannāḥ śāstrārthakuśalāstathā | sve sve sthitā varṇadharme yathāvadanupūrvaśaḥ

हिन्दी अर्थ

उनके सभी पुत्र रूप-सौन्दर्यसे सम्पन्न था शास्त्रार्थमें कुशल हैं और क्रमश: सभी यथावत्रूपसे अपने-अपने वर्णधर्ममें स्थित रहते हैं

अध्याय 138

श्लोक 41

ताः कन्या भैममुख्यानां दत्ताः प्रायेण धीमता ।अवशेषं शतं त्वेकं यदानीतं किल त्वया

tāḥ kanyā bhaimamukhyānāṃ dattāḥ prāyeṇa dhīmatā | avaśeṣaṃ śataṃ tvekaṃ yadānītaṃ kila tvayā

हिन्दी अर्थ

बुद्धिमान्‌ ह्मदत्तने प्राय: उन सब कन्याओंका विवाह मुख्य- मुख्य यदुवंशियोंके साथ कर दिया है। केवल एक गौ शेष रह गयी थीं, जिन्हें तुम हर लाये हो

अध्याय 138

श्लोक 42

तदर्थे यादवान् वीर योधयिष्यसि सर्वथा ।सहायार्थं तु राजानो ध्रियन्तां हेतुपूर्वकम्

tadarthe yādavān vīra yodhayiṣyasi sarvathā | sahāyārthaṃ tu rājāno dhriyantāṃ hetupūrvakam

हिन्दी अर्थ

बर! उनके लिये भी तुम्हें सर्वथा यादवोंके साथ युद्ध करना होगा। अत: तुम अपनी सहायताके लिये युक्तिपूर्वक हाँ आये हुए राजाओंको अपने पक्षमें कर लो

अध्याय 138

श्लोक 43

ब्रह्मदत्तसुतार्थं च रत्नानि विविधानि च ।दीयन्तां भूमिपालानां सहायार्थे महात्मनाम्

brahmadattasutārthaṃ ca ratnāni vividhāni ca | dīyantāṃ bhūmipālānāṃ sahāyārthe mahātmanām

श्लोक 43–45 का हिन्दी अर्थ

हादत्तकी पुत्रियोंक लिये उन महामनस्वी नरेशोंकी पहायता प्राप्त करनेके उद्देश्यसे तुम उन्हें नाना प्रकारके त्र भेंट करो। जो राजा यहाँ आयें, उन सबका मातिथ्य-सत्कार करो' । नारदजीके ऐसा कहनेपर असुरोंने मत्यन्त प्रसन्न होकर वैसा ही किया। उन भक्तवत्सल रेशोंने पाँच सौ कन्याएँ और नाना प्रकारके रत्न पाकर न्हें यथोचित रीतिसे आपसमें बाँट लिया

अध्याय 138

श्लोक 44

आतिथ्यं क्रियतां चैव यै समेष्यन्ति वै नृपाः ।एवमुक्ते तथा चक्रुरसुरास्तेऽतिहृष्टवत्

ātithyaṃ kriyatāṃ caiva yai sameṣyanti vai nṛpāḥ | evamukte tathā cakrurasurāste'tihṛṣṭavat

अर्थ श्लोक 43 के साथ

अध्याय 138

श्लोक 45

लब्ध्वा पञ्चशतं कन्या रत्नानि विविधानि च ।यथार्हेण नरेन्द्रैस्ता विभक्ता भक्तवत्सलैः

labdhvā pañcaśataṃ kanyā ratnāni vividhāni ca | yathārheṇa narendraistā vibhaktā bhaktavatsalaiḥ

अर्थ श्लोक 43 के साथ

अध्याय 138

श्लोक 46

ऋते पाण्डुसुतान् वीरान् वारिता नारदेन ते ।निमेषान्तरमात्रेण तत्र गत्वा महात्मना

ṛte pāṇḍusutān vīrān vāritā nāradena te | nimeṣāntaramātreṇa tatra gatvā mahātmanā

हिन्दी अर्थ

मो5ध्याय: + ८५ केवल पाँचों पाण्डवॉंको छोड़कर और सबने कन्याओं और रत्नोंका भाग ग्रहण किया था। महात्मा नारदजीने पलक मारते-मारते वहाँ पहुँचकर वीर पाण्डवोंको उनका भाग लेनेसे रोक लिया था

अध्याय 138

श्लोक 47

तुष्टैस्तैरसुरा ह्युक्ता राजन् भूमिपसत्तमैः ।सर्वकामसमृद्धार्थैर्भवद्भिः खगमैः स्वयम्

tuṣṭaistairasurā hyuktā rājan bhūmipasattamaiḥ | sarvakāmasamṛddhārthairbhavadbhiḥ khagamaiḥ svayam

श्लोक 47–48 का हिन्दी अर्थ

राजन्‌ ! रत्र और कन्या पाकर वे भूपालशिरोमणि बहुत संतुष्ट हुए। उन्होंने असुरोंसे कहा-' आपलोग समस्त मनोवाज्छित भोगोंसे सम्पन्न तथा स्वयं आकाशमें विचरनेवाले हैं तो भी आपने न्यायोचित रीतिसे हमारा सत्कार किया है; अतः बताइये, यह क्षत्रियसमूह आपलोगोंको क्या दे ? आप- जैसे दिव्य वीरोंने पहले-पहल क्षत्रिय-समाजका पूजन किया है '

अध्याय 138

श्लोक 48

अर्चिताः स्म यथान्यायं क्षत्रं किं वः प्रयच्छतु ।क्षत्रं चार्चितपूर्वं हि दिव्यैर्वीरैर्भवद्विधैः

arcitāḥ sma yathānyāyaṃ kṣatraṃ kiṃ vaḥ prayacchatu | kṣatraṃ cārcitapūrvaṃ hi divyairvīrairbhavadvidhaiḥ

अर्थ श्लोक 47 के साथ

अध्याय 138

श्लोक 49

निकुम्भोऽथाब्रवीद् धृष्टः क्षत्रं सुररिपुस्तदा ।अनुवर्णयित्वा क्षत्रस्य माहात्म्यं सत्यमेव च

nikumbho'thābravīd dhṛṣṭaḥ kṣatraṃ suraripustadā | anuvarṇayitvā kṣatrasya māhātmyaṃ satyameva ca

हिन्दी अर्थ

यह सुनकर हर्षमें भरे हुए देववैरी निकुम्भने क्षत्रियोंके यथार्थ माहात्म्यका बारम्बार वर्णन करके उस समय उनसे इस प्रकार कहा—

अध्याय 138

श्लोक 50

युद्धं नो रिपुभिः सार्द्धं भविष्यति नृपोत्तमाः ।साहाय्यं दातुमिच्छामो भवद्भिस्तत्र सर्वथा

yuddhaṃ no ripubhiḥ sārddhaṃ bhaviṣyati nṛpottamāḥ | sāhāyyaṃ dātumicchāmo bhavadbhistatra sarvathā

हिन्दी अर्थ

श्रेष्ठ नरेशो! हमारा अपने शत्रुओंके साथ युद्ध होनेवाला है। उसमें आपलोग सब प्रकारसे हमें सहायता प्रदान करें, यह हमारी इच्छा है'

अध्याय 138

श्लोक 51

एवमस्त्विति तानूचुः क्षत्त्रियाः क्षीणकिल्बिषाः ।पाण्डवेयानृते धीराञ्छ्रुतार्थान्नारदाद् विभो

evamastviti tānūcuḥ kṣattriyāḥ kṣīṇakilbiṣāḥ | pāṇḍaveyānṛte dhīrāñchrutārthānnāradād vibho

हिन्दी अर्थ

प्रभो! जिनके पाप क्षीण हो गये थे, उन क्षत्रियोंमेंसे वीर पाण्डवोंको छोड़कर अन्य सबने 'एवमस्तु' कहकर उनकी प्रार्थना स्वीकार कर ली। पाण्डव नारदजीसे सारी बात सुन चुके थे, इसलिये वे उनसे अलग रहे

अध्याय 138

श्लोक 52

क्षत्रियाः सन्निविष्टास्ते युद्धार्थं कुरुनन्दन ।पत्न्यस्तु ब्रह्मदत्तस्य यज्ञवाटं गता अपि

kṣatriyāḥ sanniviṣṭāste yuddhārthaṃ kurunandana | patnyastu brahmadattasya yajñavāṭaṃ gatā api

श्लोक 52–55 का हिन्दी अर्थ

कुरुनन्दन! वे सब क्षत्रिय _ युद्धके लिये उद्यत हो वहीं डेरा डालकर डटे रहे। इधर ब्रह्मदत्तकी पत्रियाँ यज्ञशालामें प्रविष्ट हुई और उधरसे सेनासहित भगवान्‌ श्रीकृष्ण भी षट्पुरमें आ पहुँचे । नरेध्वर ! महादेवजीके वचनको मन-ही-मन स्मरण करके द्वारकामें राजा उग्रसेनको बिठाकर भगवान्‌ श्रीकृष्ण वहाँ आये थे। भगवान्‌ जनार्दनदेव उस सेनाके साथ आकर षट्पुरवासियोंके हितकी कामनासे यज्ञमण्डपसे थोड़ी ही दूरपर उत्तम कल्याणमय प्रदेशमें वसुदेवकी आज्ञासे छावनी डालकर ठहर गये

अध्याय 138

श्लोक 53

कृष्णोऽपि सेनया सार्द्धं प्रययौ षट् पुरं विभुः ।महादेवस्य वचनमुद्वहन् मनसा नृप

kṛṣṇo'pi senayā sārddhaṃ prayayau ṣaṭ puraṃ vibhuḥ | mahādevasya vacanamudvahan manasā nṛpa

अर्थ श्लोक 52 के साथ

अध्याय 138

श्लोक 54

स्थापयित्वा द्वारवत्यामाहुकं पार्थिवं तदा ।स तया सेनया सार्द्धं पौराणां हितकाम्यया

sthāpayitvā dvāravatyāmāhukaṃ pārthivaṃ tadā | sa tayā senayā sārddhaṃ paurāṇāṃ hitakāmyayā

अर्थ श्लोक 52 के साथ

अध्याय 138

श्लोक 55

यज्ञवाटस्याविदूरे देवो निविविशे विभुः ।देशे प्रवरकल्याणे वसुदेवप्रचोदितः

yajñavāṭasyāvidūre devo niviviśe vibhuḥ | deśe pravarakalyāṇe vasudevapracoditaḥ

अर्थ श्लोक 52 के साथ

अध्याय 138

श्लोक 56

दत्तगुल्माप्रतिसरं कृत्वा तं विधिवत्प्रभुः ।प्रद्युम्नमटने श्रीमान् रक्षार्थं विनियुज्य च

dattagulmāpratisaraṃ kṛtvā taṃ vidhivatprabhuḥ | pradyumnamaṭane śrīmān rakṣārthaṃ viniyujya ca

हिन्दी अर्थ

श्रीमान्‌ भगवान्‌ श्रीकृष्णने वहाँ विधिपूर्वक रक्षक सैनिकोंके दल तैनात कर दिये, जिसके कारण किसी अवाउ्छनीय व्यक्तिको उधरसे आनेके लिये मार्ग नहीं मिल पाता था। साथ ही उन्होंने अपने पुत्र प्रद्युम्मको सब ओरसे घूम-फिरकर सेनाकी देखभाल करनेके लिये नियुक्त कर दिया था

स्रोत: local proofread transcription: Sanskrit shlokas of the Harivamsa (Harivamsha, Vishnu and Bhavishya parvas) from sanskritdocuments.org. One chapter per adhyaya; verse numbers as printed in the source (restarting in each adhyaya). Appendix sections are not included. · प्राप्त 19/10/2026

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शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पाठ-भेद एवं संशोधनVariants & corrections

पाठ-भेद टिप्पणी (Alternative Reading / Variant Notes):

Collated with BORI Critical Edition of Mahabharata Khilaparvan.