Harivamsha Purana
137
अध्याय 137 / 318

Parva 2, Adhyāya 82

35 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ35 श्लोक

अध्याय 137

श्लोक 1

षट्पुरवासिनां असुराणां सङ्क्षेपेण परिचयः, तेभ्यः ब्रह्मणा शिवेन च वरदानं वैशम्पायन धर्मज्ञ व्यासशिष्य तपोधन ।पारिजातस्य हरणे षट्पुरं परिकीर्तितम्

ṣaṭpuravāsināṃ asurāṇāṃ saṅkṣepeṇa paricayaḥ, tebhyaḥ brahmaṇā śivena ca varadānaṃ vaiśampāyana dharmajña vyāsaśiṣya tapodhana | pārijātasya haraṇe ṣaṭpuraṃ parikīrtitam

हिन्दी अर्थ

ध्याय: व ाााण हैं ब्रह्मा और भगवान्‌ शिवका वरदान जनमेजयने कहा—धर्मज्ञ ! व्यासशिष्य ! तपोधन ! ैशम्पायनजी ! आपने पारिजातहरणके प्रसंगमें * षट्पुर ' की चर्चा की थी

अध्याय 137

श्लोक 2

निवासोऽसुरमुख्यानां दारुणानां तपोधन ।तेषां वधं मुनिश्रेष्ठ कीर्तयस्वान्धकस्य च

nivāso'suramukhyānāṃ dāruṇānāṃ tapodhana | teṣāṃ vadhaṃ muniśreṣṭha kīrtayasvāndhakasya ca

हिन्दी अर्थ

तपोधन! आपने कहा था कि तरह नगर बड़े-बड़े भयंकर असुरोंका स्थान था। मुनिश्रेष्ठ ! आप उन षट्पुरनिवासी दैत्यों तथा अन्धकासुरके वधका त्र्णन कीजिये

अध्याय 137

श्लोक 3

त्रिपुरे निहते वीर रुद्रेणाक्लिष्टकर्मणा ।तत्र प्रधाना बहवो बभूवुरसुरोत्तमाः

tripure nihate vīra rudreṇākliṣṭakarmaṇā | tatra pradhānā bahavo babhūvurasurottamāḥ

श्लोक 3–4 का हिन्दी अर्थ

मानते हैं और आगेके ग्रन्थको उत्तरार्धके अन्तर्गत बताते हैं । उत्तरार्ध भाग आरम्भ होता है। वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! वीर! अनायास ही समस्त कर्म करनेवाले रुद्रदेवके द्वारा जब दैत्योंके तीनों पुरोंका विनाश किया गया, उस समय वहाँ बहुत- से प्रधान-प्रधान असुर-शिरोमणि शेष रह गये। वे त्रिपुरनिवासी होनेपर भी रुद्रदेवके बाणोंकी आगसे दग्ध न हो सके। उनकी संख्या लगभग साठ लाख थी

अध्याय 137

श्लोक 4

शराग्निना न दग्धास्ते रुद्रेण त्रिपुरालयाः ।षष्टिः शतसहस्राणि न न्यूनान्यधिकानि च

śarāgninā na dagdhāste rudreṇa tripurālayāḥ | ṣaṣṭiḥ śatasahasrāṇi na nyūnānyadhikāni ca

अर्थ श्लोक 3 के साथ

अध्याय 137

श्लोक 5

ते ज्ञातिवधसन्तप्ताश्चक्रुर्वीराः पुरा तपः ।जम्बूमार्गे सतामिष्टे महर्षिगणसेविते

te jñātivadhasantaptāścakrurvīrāḥ purā tapaḥ | jambūmārge satāmiṣṭe maharṣigaṇasevite

हिन्दी अर्थ

उन असुर वीरोंने पूर्वकालमें अपने बन्धु- बान्धवोंके वधसे संतप्त होकर महर्षिगणोंसे सेवित तथा सत्पुरुषोंके प्रिय जम्बूमार्गमें जाकर तपस्या आरम्भ की

अध्याय 137

श्लोक 6

आदित्याभिमुखा वीराः सहस्राणां शतं समाः ।वायुभक्षा नृपश्रेष्ठ स्तुवन्तः पद्मसम्भवम्

ādityābhimukhā vīrāḥ sahasrāṇāṃ śataṃ samāḥ | vāyubhakṣā nṛpaśreṣṭha stuvantaḥ padmasambhavam

हिन्दी अर्थ

नृपश्रेष्ठ! वे वीर दैत्य सूर्यकी ओर मुँह करके वायुके आहारपर रहकर एक लाख वर्षोतक कमलयोनि ब्रह्माजीकी स्तुति करते रहे

अध्याय 137

श्लोक 7

तेषामुदुम्बरं राजन् गण एकः समाश्रितः ।वृक्षं तत्रावसन् वीरास्ते कुर्वन्तो महत्तपः

teṣāmudumbaraṃ rājan gaṇa ekaḥ samāśritaḥ | vṛkṣaṃ tatrāvasan vīrāste kurvanto mahattapaḥ

हिन्दी अर्थ

राजन्‌ ! उन दैत्योंमें एक दल ऐसा था, जो गूलरके वृक्षका आश्रय लेकर रहता था। वे वीर दैत्य वहाँ महानू तप करते हुए निवास करते थे

अध्याय 137

श्लोक 8

कपित्थवृक्षमाश्रित्य केचित्तत्रोषिताः पुरा ।सृगालवाटीस्त्वपरे चेरुरुग्रं तथा तपः

kapitthavṛkṣamāśritya kecittatroṣitāḥ purā | sṛgālavāṭīstvapare cerurugraṃ tathā tapaḥ

हिन्दी अर्थ

पूर्वकालमें उन दैत्योंमेंसे कुछ लोग कपित्थ (कैथ) वृक्षका आश्रय लेकर वहाँ रहते थे और दूसरे सियारोंकी माँदोंमें रहकर वहाँ उग्र तपस्या करते थे (अथवा सृगाल नामक वृक्ष-विशेषकी वाटिकाओंमें रहकर तपस्या करते थे)

अध्याय 137

श्लोक 9

वटमूले तथा चेरुस्तपः कौरवनन्दन ।अधीयन्तो परं ब्रह्म वटं गत्वासुरात्मजाः

vaṭamūle tathā cerustapaḥ kauravanandana | adhīyanto paraṃ brahma vaṭaṃ gatvāsurātmajāḥ

हिन्दी अर्थ

कौरवनन्दन! कुछ असुरकुमार वट-वृक्षकी जड़में रहते और उस वृक्षपर चढ़कर परब्रह्मका चिन्तन करते हुए तपस्या करते थे

अध्याय 137

श्लोक 10

तेषां तुष्टः प्रजाकर्ता नरदेव पितामहः ।वरं दातुं सुरश्रेष्ठः प्राप्तो धर्मभृतां वरः

teṣāṃ tuṣṭaḥ prajākartā naradeva pitāmahaḥ | varaṃ dātuṃ suraśreṣṭhaḥ prāpto dharmabhṛtāṃ varaḥ

हिन्दी अर्थ

नरदेव! कुछ कालके अनन्तर धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ प्रजास्रष्टा देवशिरोमणि पितामह ब्रह्माजी उनपर संतुष्ट हो उन्हें वर देनेके लिये वहाँ आये

अध्याय 137

श्लोक 11

वरं वरयतेत्युक्तास्ते राजन् पद्मयोनिना ।नेषुस्तद्वरदानं तु द्विषन्तस्त्र्यम्बकं विभुम्

varaṃ varayatetyuktāste rājan padmayoninā | neṣustadvaradānaṃ tu dviṣantastryambakaṃ vibhum

हिन्दी अर्थ

राजन्‌ ! कमलयोनि ब्रह्माने उनसे कहा—“वर माँगो'। तब उन्होंने भगवान्‌ त्रिनेत्रधारी रुद्रसे द्वेष रखनेके कारण वरदान लेनेकी इच्छा नहीं की

अध्याय 137

श्लोक 12

इच्छन्तोऽपचितिं गन्तुं ज्ञातीनां कुरुनन्दन ।तानुवाच ततो ब्रह्मा सर्वशः कुरुनन्दन

icchanto'pacitiṃ gantuṃ jñātīnāṃ kurunandana | tānuvāca tato brahmā sarvaśaḥ kurunandana

हिन्दी अर्थ

कुरुकुलको आनन्द प्रदान करनेवाले कुरुनन्दन ! वे रुद्रदेवसे बदला लेकर उनके द्वारा मारे गये अपने भाई-बन्धुओंके ऋणसे उऋण होना चाहते थे। तब सर्वज्ञ ब्रह्माजीने उनसे कहा—

अध्याय 137

श्लोक 13

विश्वस्य जगतः कर्तुः संहर्तुश्च महात्मनः ।कः शक्तोऽपचितिं गन्तुं मास्तु वोऽत्र वृथा श्रमः

viśvasya jagataḥ kartuḥ saṃhartuśca mahātmanaḥ | kaḥ śakto'pacitiṃ gantuṃ māstu vo'tra vṛthā śramaḥ

हिन्दी अर्थ

जो सम्पूर्ण जगत्‌के कर्ता और संहर्ता हैं, उन महात्मा भगवान्‌ शड्टरसे बदला लेनेमें कौन समर्थ है? इस विषयमें तुम्हें व्यर्थ श्रम नहीं उठाना चाहिये

अध्याय 137

श्लोक 14

अनादिमध्यनिधनः सोमो देवो महेश्वरः ।तमासूय सुखं स्वर्गे वस्तुमिच्छन्ति येऽसुराः

anādimadhyanidhanaḥ somo devo maheśvaraḥ | tamāsūya sukhaṃ svarge vastumicchanti ye'surāḥ

श्लोक 14–15 का हिन्दी अर्थ

उमासहित महेश्वर देव आदि, मध्य और अन्तसे रहित हैं। उनसे द्रोह रखकर जो असुर स्वर्गमें सुखपूर्वक रहना चाहते थे; उन दुणत्मा महान्‌ असुरोंन तो वर लेनेकी इच्छा नहीं की; परंतु राजन्‌! जो दूसरे असुर भव्य भावनासे सम्पन्न (दूरदर्शी) अथवा भगवान्‌ शिवकी महिमाके ज्ञाता थे, उन्होंने वर लेनेकी अभिलाषा व्यक्त की

अध्याय 137

श्लोक 15

ते नेषुस्तत्र केचित् तु दुरात्मानो महासुराः ।अथेषुरपरे राजन्नसुरा भव्यभावनाः

te neṣustatra kecit tu durātmāno mahāsurāḥ | atheṣurapare rājannasurā bhavyabhāvanāḥ

अर्थ श्लोक 14 के साथ

अध्याय 137

श्लोक 16

नेषुर्ये सुदुरात्मानस्तानुवाच पितामहः ।वरयध्वं वरं वीरा रुद्रक्रोधमृतेऽसुराः

neṣurye sudurātmānastānuvāca pitāmahaḥ | varayadhvaṃ varaṃ vīrā rudrakrodhamṛte'surāḥ

हिन्दी अर्थ

जिन दुरात्माओंने वर लेनेकी इच्छा नहीं की, उनसे पितामह ब्रह्माने फिर कहा-* वीर असुरो! तुम भगवान्‌ रुद्रपर क्रोध प्रकट करनेके सिवा दूसरा कोई भी वर माँग लो

अध्याय 137

श्लोक 17

ते ऊचुः सर्वदेवानामवध्याः स्याम हे विभो ।पुराणि षट् च नो देव भवन्त्यन्तर्महीतले

te ūcuḥ sarvadevānāmavadhyāḥ syāma he vibho | purāṇi ṣaṭ ca no deva bhavantyantarmahītale

श्लोक 17–18 का हिन्दी अर्थ

तब उन्होंने कहा-विभो! हम सब देवताओंके लिये अवध्य हों । देव ! पृथ्वीके भीतर हमारे छः पुर हों। प्रभो! हमारे वे छहों पुर सम्पूर्ण मनोवाज्छित पदार्थोंकी समृद्धिसे सम्पन्न हों। भगवन्‌! हम षट्पुरमें जाकर सुखपूर्वक निवास करें

अध्याय 137

श्लोक 18

सर्वकामसमृद्धार्थं षटपुरं चास्तु नः प्रभो ।वयं च षट्पुरं गत्वा वसेम च सुखं विभो

sarvakāmasamṛddhārthaṃ ṣaṭapuraṃ cāstu naḥ prabho | vayaṃ ca ṣaṭpuraṃ gatvā vasema ca sukhaṃ vibho

अर्थ श्लोक 17 के साथ

अध्याय 137

श्लोक 19

रुद्रादुग्रं भयं न स्याद् येन नो ज्ञातयो हताः ।निहतं त्रिपुरं दृष्ट्वा भीताः स्म तपसां निधे

rudrādugraṃ bhayaṃ na syād yena no jñātayo hatāḥ | nihataṃ tripuraṃ dṛṣṭvā bhītāḥ sma tapasāṃ nidhe

हिन्दी अर्थ

तपोनिधे ! जिन्होंने हमारे बन्धु-बान्धवोंको मार डाला है, उन रुद्रदेवसे हमें उग्र भय प्राप्त न हो; क्योंकि त्रिपुरोंका विनाश देखकर हम भयभीत हो गये हैं'

अध्याय 137

श्लोक 20

असुरा भवतावध्या देवानां शङ्करस्य च ।न बाधिष्यथ चेद्विप्रान् सत्पथस्थान्सतां प्रियान्

asurā bhavatāvadhyā devānāṃ śaṅkarasya ca | na bādhiṣyatha cedviprān satpathasthānsatāṃ priyān

हिन्दी अर्थ

पितामह बोले—असुरो! तुम देवताओं तथा भगवान्‌ शड्टरके लिये अवध्य हो जाओगे। परंतु ऐसा तभी होगा, जब तुम सन्मार्गपर सुस्थिर रहनेवाले सत्पुरुषोंके प्रिय ब्राह्मणोंको बाधा नहीं पहुँचाओगे

अध्याय 137

श्लोक 21

विप्रोपघातं मोहाच्चेत् करिष्यथ कथञ्चन ।नाशं यास्यथ विप्रा हि जगतः परमा गतिः

vipropaghātaṃ mohāccet kariṣyatha kathañcana | nāśaṃ yāsyatha viprā hi jagataḥ paramā gatiḥ

हिन्दी अर्थ

यदि मोहवश किसी तरह ब्राह्मणोंकी हत्या करोगे तो नष्ट हो जाओगे, क्योंकि ब्राह्मण जगत्‌के परम आश्रय हैं

अध्याय 137

श्लोक 22

नारायणाद् बिभेतव्यं कुर्वद्भिर्ब्राह्मणाहितम् ।सर्वभूतेषु भगवान् हितं धत्ते जनार्दनः

nārāyaṇād bibhetavyaṃ kurvadbhirbrāhmaṇāhitam | sarvabhūteṣu bhagavān hitaṃ dhatte janārdanaḥ

हिन्दी अर्थ

ब्राह्मणोंका अहित करनेवाले पुरुषोंको भगवान्‌ नारायणसे डरना चाहिये। क्योंकि वे भगवान्‌ जनार्दन समस्त भूतोंके प्रति हेत-बुद्धि रखते हैं

अध्याय 137

श्लोक 23

ते गता असुरा राजन् ब्रह्मणाथ विसर्जिताः ।येऽपि भक्ता महादेवमसुरा धर्मचारिणः

te gatā asurā rājan brahmaṇātha visarjitāḥ | ye'pi bhaktā mahādevamasurā dharmacāriṇaḥ

श्लोक 23–25 का हिन्दी अर्थ

असुरशिरोमणियो ! तुमने वैर, दम्भ और हिंसाका परित्याग करके जो केवल मेरा ही आश्रय लिया है, इससे मैं तुम्हारे लिये श्रेष्ठ वर प्रदान करता हूँ

अध्याय 137

श्लोक 24

स्वयं हि दर्शनं तेषां ददौ त्रिपुरनाशनः ।श्वेतं वृषभमारुह्य सोमः सप्रवरः प्रभुः ।उवाचेदं च भगवानसुरान् स सतां गतिः

svayaṃ hi darśanaṃ teṣāṃ dadau tripuranāśanaḥ | śvetaṃ vṛṣabhamāruhya somaḥ sapravaraḥ prabhuḥ | uvācedaṃ ca bhagavānasurān sa satāṃ gatiḥ

अर्थ श्लोक 23 के साथ

अध्याय 137

श्लोक 25

वैरमुत्सृज्य दम्भं च हिंसां चासुरसत्तमाः ।मामेव चाश्रितास्तस्माद् वरं साधु ददामि वः

vairamutsṛjya dambhaṃ ca hiṃsāṃ cāsurasattamāḥ | māmeva cāśritāstasmād varaṃ sādhu dadāmi vaḥ

अर्थ श्लोक 23 के साथ

अध्याय 137

श्लोक 26

यैर्दीक्षिताः स्थ मुनिभिः सत्क्रियापरमैर्द्विजैः ।सह तैर्गम्यतां स्वर्गः प्रीतोऽहं वः सुकर्मणा

yairdīkṣitāḥ stha munibhiḥ satkriyāparamairdvijaiḥ | saha tairgamyatāṃ svargaḥ prīto'haṃ vaḥ sukarmaṇā

हिन्दी अर्थ

जिन पत्कर्मपरायण ब्रह्मर्षियोंने तुम्हें मेरी भक्तिकी दीक्षा दी दे, उनके साथ ही तुम सब लोग स्वर्गलोकमें चले जाओ। मैं तुम्हारे सत्कर्मसे बहुत प्रसन्न हूँ

अध्याय 137

श्लोक 27

इह ये चैव वत्स्यन्ति तापसा ब्रह्मवादिनः ।अपि कापित्थिका वृक्षे तेषां लोको यथा मम

iha ye caiva vatsyanti tāpasā brahmavādinaḥ | api kāpitthikā vṛkṣe teṣāṃ loko yathā mama

हिन्दी अर्थ

जो ब्रह्मवादी तापस इस कपित्थ वृक्षके पास निवास करेंगे, वे कापित्थिक फहलायेंगे और उन्हें मेरे समान लोक प्राप्त होगा

अध्याय 137

श्लोक 28

इह मासान्तपक्षान्तौ यः करिष्यति मानवः ।वानप्रस्थेन विधिना पूजयन् मां तपोधनाः

iha māsāntapakṣāntau yaḥ kariṣyati mānavaḥ | vānaprasthena vidhinā pūjayan māṃ tapodhanāḥ

श्लोक 28–29 का हिन्दी अर्थ

तपोधनो ! जो मनुष्य अमावास्या और पूर्णिमाके दिन त्रानप्रस्थ विधिसे मेरी पूजा करता हुआ यहाँ निवास करेगा, वह सहस्त्र वर्षोतंक तपस्या करनेका फल पा नेगा तथा विधिपूर्वक तीन राततक निवास करनेसे उसको मनोवाज्छित गतिकी प्राप्ति होगी'

अध्याय 137

श्लोक 29

वर्षाणां स सहस्रं तु तपसां प्राप्स्यते फलम् ।कृत्वा त्रिरात्रं विधिवल्लप्स्यते चेप्सितां गतिम्

varṣāṇāṃ sa sahasraṃ tu tapasāṃ prāpsyate phalam | kṛtvā trirātraṃ vidhivallapsyate cepsitāṃ gatim

अर्थ श्लोक 28 के साथ

अध्याय 137

श्लोक 30

अर्कद्वीपे निवसतो द्विगुणं तद् भविष्यति ।न विदेशे च भद्रं वो वरमेतद् ददाम्यहम्

arkadvīpe nivasato dviguṇaṃ tad bhaviṣyati | na videśe ca bhadraṃ vo varametad dadāmyaham

हिन्दी अर्थ

अर्कद्वीपमें निवास करनेवालेको उससे दूना फल मिलेगा। परंतु दूर देशमें निवास करनेपर तुम्हारा भला नहीं होगा। यह वर मैं दे रहा हूँ

अध्याय 137

श्लोक 31

श्वेतवाहननामानं यश्च मां पूजयिष्यति ।सर्वतो भयचित्तोऽपि गतिं स मम यास्यति

śvetavāhananāmānaṃ yaśca māṃ pūjayiṣyati | sarvato bhayacitto'pi gatiṃ sa mama yāsyati

हिन्दी अर्थ

जो श्वेतवाहन नामसे मेरी पूजा करेगा, वह सब ओरसे भयभीत- चित्त होनेपर भी मेरी ही गतिको प्राप्त होगा

अध्याय 137

श्लोक 32

औदुम्बरान् वाटमूलान् द्विजान् कापित्थिकानपि ।तथा सृगालवाटीयान् धर्मात्मानो दृढव्रतान्

audumbarān vāṭamūlān dvijān kāpitthikānapi | tathā sṛgālavāṭīyān dharmātmāno dṛḍhavratān

श्लोक 32–33 का हिन्दी अर्थ

जो मनुष्य औदुम्बर*, बाटमूल *, कापित्थिकरे, सृगाल- वाटीयर, धर्मात्मा दृढ़ब्रत एवं ब्रह्मवादी मुनियोंका सदा विशेष-रूपसे पूजन करेंगे, वे मनोवाज्छित गतिको प्राप्त होंगे

अध्याय 137

श्लोक 33

मुनींश्च ब्रह्मवादीयान् सविशेषेण ये नराः ।पूजयिष्यन्ति सततं ते यास्यन्तीप्सितां गतिम्

munīṃśca brahmavādīyān saviśeṣeṇa ye narāḥ | pūjayiṣyanti satataṃ te yāsyantīpsitāṃ gatim

अर्थ श्लोक 32 के साथ

अध्याय 137

श्लोक 34

इत्युक्त्वाथ महादेवो भगवाञ्छ्वेतवाहनः ।तैरेव सहितः सर्वै रुद्रलोकं जगाम वै

ityuktvātha mahādevo bhagavāñchvetavāhanaḥ | taireva sahitaḥ sarvai rudralokaṃ jagāma vai

हिन्दी अर्थ

ऐसा कहकर भगवान्‌ श्वेतवाहन महादेव उन सबके साथ रुद्रलोकमें चले गये

अध्याय 137

श्लोक 35

जम्बूमार्गं गमिष्यामि जम्बूमार्गे वसाम्यहम् ।एवं सङ्कल्पमानोऽपि रुद्रलोके महीयते

jambūmārgaṃ gamiṣyāmi jambūmārge vasāmyaham | evaṃ saṅkalpamāno'pi rudraloke mahīyate

हिन्दी अर्थ

मैं जम्बू-मार्गको जाऊँगा, मैं जम्बू-मार्गपर निवास करूँगा' इस तरह मनमें संकल्प करनेवाला मनुष्य भी रुद्रलोकमें प्रतिष्ठित होता है

स्रोत: local proofread transcription: Sanskrit shlokas of the Harivamsa (Harivamsha, Vishnu and Bhavishya parvas) from sanskritdocuments.org. One chapter per adhyaya; verse numbers as printed in the source (restarting in each adhyaya). Appendix sections are not included. · प्राप्त 19/10/2026

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शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

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आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

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आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

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शोध टिप्पणीResearch note

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Collated with BORI Critical Edition of Mahabharata Khilaparvan.