Harivamsha Purana
104
अध्याय 104 / 318

Parva 2, Adhyāya 49

67 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ67 श्लोक

अध्याय 104

श्लोक 1

दन्तवक्त्रशाल्वयोः भाषणं श्रुत्वा भीष्मकेण श्रीकृष्णस्य प्रभावं वर्णयित्वा तं प्रसन्नकर्तुमेव निश्चयकरणं इत्येवमुक्ते वचने सुनीथेन महात्मना ।करूषाधिपतिर्वीरो दन्तवक्त्रोऽभ्यभाषत

dantavaktraśālvayoḥ bhāṣaṇaṃ śrutvā bhīṣmakeṇa śrīkṛṣṇasya prabhāvaṃ varṇayitvā taṃ prasannakartumeva niścayakaraṇaṃ ityevamukte vacane sunīthena mahātmanā | karūṣādhipatirvīro dantavaktro'bhyabhāṣata

हिन्दी अर्थ

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! महामना सुनीथके ऐसा कहनेपर करूषदेशके वीर राजा दन्तवकक्‍्त्रने भाषण देना आरम्भ किया

अध्याय 104

श्लोक 2

यदुक्तं मागधेनात्र सुनीथेन नराधिपाः ।युक्तपूर्वमहं मन्ये यदस्माकं वचो हितम्

yaduktaṃ māgadhenātra sunīthena narādhipāḥ | yuktapūrvamahaṃ manye yadasmākaṃ vaco hitam

हिन्दी अर्थ

दन्तबकक्‍्त्र बोला—राजाओ ! यहाँ मगधराजने और राजा सुनीथने जो कुछ कहा है, उसे मैं युक्तिसंगत मानता हूँ; क्योंकि इनका प्रवचन हमलोगोंके लिये हितकर है

अध्याय 104

श्लोक 3

न च विद्वेषणेनाहं न चाहङ्कारवादिना ।न चात्मविजिगीषुत्वाद् दूषयामि वचोऽमृतम्

na ca vidveṣaṇenāhaṃ na cāhaṅkāravādinā | na cātmavijigīṣutvād dūṣayāmi vaco'mṛtam

हिन्दी अर्थ

मैं न तो विद्वेषके कारण, न अहंकारवादी होनेके कारण और न अपनी विजयकी अभिलाषा रखनेके ही कारण आप दोनोंके अमृतमय वचनोंको सदोष बता रहा हूँ

अध्याय 104

श्लोक 4

वाक्यार्णवं महागाधं नीतिशास्त्रार्थबृंहितम् ।क एष निखिलं वक्तुं शक्तो वै राजसंसदि

vākyārṇavaṃ mahāgādhaṃ nītiśāstrārthabṛṃhitam | ka eṣa nikhilaṃ vaktuṃ śakto vai rājasaṃsadi

हिन्दी अर्थ

इस राजसभामें कौन ऐसा पुरुष है जो इस प्रकार समुद्रके समान अत्यन्त अगाध एवं नीतिशास्त्रके अनुकूल सर्वगुणसम्पन्न बात कह सके

अध्याय 104

श्लोक 5

किं त्वनुस्मरणार्थेऽहं यद् ब्रवीमि शृणुष्व मे ।आगतो वासुदेवेति किमाश्चर्यं नराधिपाः

kiṃ tvanusmaraṇārthe'haṃ yad bravīmi śṛṇuṣva me | āgato vāsudeveti kimāścaryaṃ narādhipāḥ

हिन्दी अर्थ

परंतु आपलोगोंको एक कर्तव्य याद दिलानेके लिये मैं जो कुछ कहता हूँ, मेरी यह बात सुन लीजिये। नरेश्वरो! यदि वसुदेवनन्दन भगवान्‌ श्रीकृष्ण यहाँ पधारे हैं तो इसमें आश्चर्यकी क्या बात है

अध्याय 104

श्लोक 6

यथाऽऽगता वयं सर्वे कृष्णोऽपीह तथाऽऽगतः ।किमत्र दोषो गौण्यो वा कन्याहेतोः समागताः

yathā''gatā vayaṃ sarve kṛṣṇo'pīha tathā''gataḥ | kimatra doṣo gauṇyo vā kanyāhetoḥ samāgatāḥ

श्लोक 6–7 का हिन्दी अर्थ

जैसे हम सब लोग यहाँ आये हैं, उसी तरह श्रीकृष्ण भी चले आये हैं। इसमें क्या दोष है और क्या गुण। हम सब लोगोंके आगमनका एक उद्देश्य है—राज- कन्याकी प्रात्ति। हमलोगोंने एक साथ मिलकर आपसमें एकता स्थापित करके जो गोमन्तपर्वतपर घेरा डाल रखा था, उस दशामें यदि वहाँ युद्ध हुआ तो उसे आपलोग दोष कैसे बता रहे हैं

अध्याय 104

श्लोक 7

यदस्माभिः समेत्यैक्यात् कृतं गोमन्तरोधनम् ।तत्र युद्धकृतं दोषं कथं वै वक्तुमर्हथ

yadasmābhiḥ sametyaikyāt kṛtaṃ gomantarodhanam | tatra yuddhakṛtaṃ doṣaṃ kathaṃ vai vaktumarhatha

अर्थ श्लोक 6 के साथ

अध्याय 104

श्लोक 8

वनवासे स्थितौ वीरौ कंसव्यामोहद्वेतुना ।देवर्षिवचनाद् राजन् वृन्दावनतटे स्थितौ

vanavāse sthitau vīrau kaṃsavyāmohadvetunā | devarṣivacanād rājan vṛndāvanataṭe sthitau

श्लोक 8–11 का हिन्दी अर्थ

राजन्‌ ! वीर बलराम और श्रीकृष्ण कंसको मोहमें डालनेके लिये वनवास कर रहे थे। वृन्दावनके किनारे रहते थे; परंतु देवर्षि नारदके कहनेसे उन दोनों भाई बलराम और श्रीकृष्णको कंसने उनका वध करनेके लिये बुलवाया और कुबलयापीड हाथीके द्वारा आक्रमण कराकर उन दोनों वीरोंके क्रोधको उद्दीपित किया। उस दशामें वे दोनों उस हाथीको मारकर समुद्रके समान विशाल रंगशालामें प्रविष्ट हुए; फिर उन्होंने अपने बाहुबलका आश्रय लेकर मुर्देके समान बैठे हुए मथुरानरेशको यदि उसके साथियोंसहित मार डाला तो इसमें उनके द्वारा क्या दोष बन गया। राजन्‌ ! इसी तरह कंसका वध करके यदि श्रीकृष्ण और बलरामने हम वयोवृद्ध नरेशोंके साथ विरोध किया और उस दशामें यदि हम सब लोगोंने वहाँ पहुँचकर मथुरापुरीपर घेरा डाल दिया तो उसमें भी क्या दोष था

अध्याय 104

श्लोक 9

तावाहूय वधार्थेन उभौ रामजनार्दनौ ।नागेनोद्दीपितौ वीरौ हत्वा नागं विवेशतुः

tāvāhūya vadhārthena ubhau rāmajanārdanau | nāgenoddīpitau vīrau hatvā nāgaṃ viveśatuḥ

अर्थ श्लोक 8 के साथ

अध्याय 104

श्लोक 10

ततः स्ववीर्यमाश्रित्य निहतो रङ्गसागरे ।गतासुरिव चासीनो मथुरेशः सहानुगः

tataḥ svavīryamāśritya nihato raṅgasāgare | gatāsuriva cāsīno mathureśaḥ sahānugaḥ

अर्थ श्लोक 8 के साथ

अध्याय 104

श्लोक 11

किमत्र विहितो दोषो येनास्माभिर्वयेऽधिकैः ।उपरोधपरा राजन् वयं सर्वे समागताः

kimatra vihito doṣo yenāsmābhirvaye'dhikaiḥ | uparodhaparā rājan vayaṃ sarve samāgatāḥ

अर्थ श्लोक 8 के साथ

अध्याय 104

श्लोक 12

सेनातिबलमालोक्य वित्रस्तौ रामकेशवौ ।पुरं बलं समुत्सृज्य गोमन्ते च गतावुभौ

senātibalamālokya vitrastau rāmakeśavau | puraṃ balaṃ samutsṛjya gomante ca gatāvubhau

हिन्दी अर्थ

हमारी सेनाका महान्‌ बल देखकर बलराम और कृष्ण डर गये और अपने नगर तथा सेनाको छोड़कर दोनों भाई गोमन्तपर्वतपर चले गये

अध्याय 104

श्लोक 13

तत्रापि गतमस्माभिर्हन्तुं समरयोधिभिः ।अप्राप्तयौवनाभ्यां च पदातिभ्यां रणाजिरे

tatrāpi gatamasmābhirhantuṃ samarayodhibhiḥ | aprāptayauvanābhyāṃ ca padātibhyāṃ raṇājire

श्लोक 13–14 का हिन्दी अर्थ

तत्पश्चात्‌ हम समराड्णमें युद्ध करनेवाले योद्धाओंने उन्हें मार डालनेके लिये वहाँ भी धावा किया। वे दोनों अभी जवान नहीं हुए थे और रणभूमिमें पैदल ही लड़ते थे, इसलिये हमने हाथी, घोड़े, रथ और पैदल सैनिकोंकी चतुरड्िंणी सेनाद्वारा उनके साथ युद्ध नहीं किया; अपितु क्षत्रिय- धर्मके अनुसार गोमन्तपर्वतपर घेरा डालकर उसमें आग लगा दी थी

अध्याय 104

श्लोक 14

रथाश्वनरनागेन नास्माभिर्विग्रहः कृतः ।कृत्वोपरोधं शैलस्य क्षत्रधर्मेण दीपितः

rathāśvanaranāgena nāsmābhirvigrahaḥ kṛtaḥ | kṛtvoparodhaṃ śailasya kṣatradharmeṇa dīpitaḥ

अर्थ श्लोक 13 के साथ

अध्याय 104

श्लोक 15

दावाग्निमुखमाविश्य दुर्विनीततपस्विनौ ।विनीत इति मन्यामः सर्वे क्षत्रियपुङ्गवाः ।प्रतियुद्धे कृते त्वेवं दूषयाम जनार्दनम्

dāvāgnimukhamāviśya durvinītatapasvinau | vinīta iti manyāmaḥ sarve kṣatriyapuṅgavāḥ | pratiyuddhe kṛte tvevaṃ dūṣayāma janārdanam

हिन्दी अर्थ

हम सभी क्षत्रिय-पुज्नव यह समझते थे कि ये दोनों उद्दण्ड तपस्वी बालक दावानलके मुखमें पड़कर सीख जायँगे (अपने कियेका फल पा जायँगे) । ऐसी दशामें उन दोनों भाइयोंने यदि प्रतिशोधात्मक युद्ध किया तो हम जनार्दनको इस तरह दोष क्यों दें (उन्होंने जो कुछ किया, ठीक ही किया)

अध्याय 104

श्लोक 16

यत्र यत्र प्रयास्यामो वयं तत्र भवेत् कलिः ।प्रीत्यर्थं प्रयतिष्यामः कृष्णेन सह भूमिपाः

yatra yatra prayāsyāmo vayaṃ tatra bhavet kaliḥ | prītyarthaṃ prayatiṣyāmaḥ kṛṣṇena saha bhūmipāḥ

हिन्दी अर्थ

( श्रीकृष्णसे वैर रखनेपर) हमलोग जहाँ- जहाँ जायेँगे, वहीं-वहीं कलह हो सकता है। अतः राजाओ ! आजसे हम श्रीकृष्णके साथ प्रेम बढ़ानेका प्रयत्र करेंगे

अध्याय 104

श्लोक 17

इदं कुण्डिनपुरं कृष्णो नागतः कलिहेतुना ।कन्यानिमित्तागमने कस्य युद्धं प्रयच्छति

idaṃ kuṇḍinapuraṃ kṛṣṇo nāgataḥ kalihetunā | kanyānimittāgamane kasya yuddhaṃ prayacchati

हिन्दी अर्थ

इस कुण्डिनपुरमें श्रीकृष्ण युद्धके लिये नहीं आये हैं । यदि राजकन्याके निमित्त ही उनका आगमन हुआ है, तब किसके साथ युद्ध करेंगे

अध्याय 104

श्लोक 18

मर्त्येऽस्मिन् पुरुषेन्द्रोऽसौ न कश्चित् प्राकृतो नरः ।देवलोकेषु देवेषु प्रवरः पुरुषोत्तमः

martye'smin puruṣendro'sau na kaścit prākṛto naraḥ | devalokeṣu deveṣu pravaraḥ puruṣottamaḥ

हिन्दी अर्थ

वे कोई प्राकृत मनुष्य नहीं हैं। इस मर्त्यलोकमें श्रेष्ठ पुरुष हैं। देवलोकवासी देवताओंगें भी सर्वश्रेष्ठ पुरुषोत्तम हैं

अध्याय 104

श्लोक 19

देवानामपि कर्तासौ लोकानां च विशेषतः ।न चैव बालिशा बुद्धिर्न चेर्ष्या नापि मत्सरः

devānāmapi kartāsau lokānāṃ ca viśeṣataḥ | na caiva bāliśā buddhirna cerṣyā nāpi matsaraḥ

हिन्दी अर्थ

वे देवताओंके भी कर्ता हैं और विशेषत: सम्पूर्ण लोकोंके ख्रष्टा भी वे ही हैं। उनकी बुद्धि गँवारों-जैसी नहीं है। उनके मनमें न ईर्ष्या है, न मात्सर्य

अध्याय 104

श्लोक 20

न स्तब्धो न कृशो नार्तः प्रणतार्तिहरः सदा ।एष विष्णुः प्रभुर्देवो देवानामपि दैवतम्

na stabdho na kṛśo nārtaḥ praṇatārtiharaḥ sadā | eṣa viṣṇuḥ prabhurdevo devānāmapi daivatam

हिन्दी अर्थ

ये न तो कठोर हैं, न दुर्बल हैं और न रोग-शोकसे पीड़ित ही हैं। ये तो सदा शरणागतोंका दुःख दूर करते रहते हैं । ये श्रीकृष्ण साक्षात्‌ भगवान्‌ विष्णु तथा देवताओंके भी देवता हैं

अध्याय 104

श्लोक 21

आगतो गरुडेनेहच्छद्मप्राकाश्यहेतुना ।नानास्त्रसहितो याति कृष्णः शत्रुविनाशने

āgato garuḍenehacchadmaprākāśyahetunā | nānāstrasahito yāti kṛṣṇaḥ śatruvināśane

श्लोक 21–22 का हिन्दी अर्थ

इस समय ये अपने छद्मरूपको प्रकाशित करनेके लिये गरुड़के द्वारा यहाँ पधारे हैं। श्रीकृष्ण शत्रुओंका विनाश करनेके लिये नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्रोंकें साथ यात्रा करते हैं। परंतु उनकी इस यात्राको वैसा न समझों। इस समय तो ये श्रीहरि भोज, वृष्णि, अन्धक आदि यादवेन्द्रोंके साथ यहाँ प्रीति बढ़ानेके लिये ही आये हैं

अध्याय 104

श्लोक 22

इमां यात्रां विजानीध्वं प्रीत्यर्थं ह्यागतो हरिः ।सहितो यादवेन्द्रैश्च भोजवृष्ण्यन्धकैरिह

imāṃ yātrāṃ vijānīdhvaṃ prītyarthaṃ hyāgato hariḥ | sahito yādavendraiśca bhojavṛṣṇyandhakairiha

अर्थ श्लोक 21 के साथ

अध्याय 104

श्लोक 23

अर्घ्यमाचमनं दत्त्वा आतिथ्यं च नराधिपाः ।करिष्यामो वयं सर्वे केशवाय महात्मने

arghyamācamanaṃ dattvā ātithyaṃ ca narādhipāḥ | kariṣyāmo vayaṃ sarve keśavāya mahātmane

हिन्दी अर्थ

अत: नरेश्वरो! हम सब लोग यहाँ महात्मा केशवको अर्ध्य और आचमन आदि देकर उनका आतिथध्य-सत्कार करेंगे

अध्याय 104

श्लोक 24

एवं सन्धानतः कृत्वा कृष्णेन सहिता वयम् ।वसामो विगतोद्वेगा निर्भया विगतज्वराः

evaṃ sandhānataḥ kṛtvā kṛṣṇena sahitā vayam | vasāmo vigatodvegā nirbhayā vigatajvarāḥ

हिन्दी अर्थ

इस प्रकार सन्धि करके हमलोग श्रीकृष्णके साथ उद्ेग, भय और चिन्तासे रहित होकर निवास करेंगे

अध्याय 104

श्लोक 25

तस्य तद वचनं श्रुत्वा दन्तवक्त्रस्य धीमतः ।शाल्वः प्रवदतां श्रेष्ठस्तानुवाच नराधिपान्

tasya tada vacanaṃ śrutvā dantavaktrasya dhīmataḥ | śālvaḥ pravadatāṃ śreṣṭhastānuvāca narādhipān

हिन्दी अर्थ

बुद्धिमानू दन्तवक्‍्त्रका यह वचन सुनकर वक्ताओंमें श्रेष्ठ शाल्वने उन नरेशोंसे कहा—

अध्याय 104

श्लोक 26

किं भयेनास्य नः सर्वे न्यस्तशस्त्रा भवामहे ।सन्धानकरणाद्धेतोः कृष्णस्य भयकम्पिताः

kiṃ bhayenāsya naḥ sarve nyastaśastrā bhavāmahe | sandhānakaraṇāddhetoḥ kṛṣṇasya bhayakampitāḥ

हिन्दी अर्थ

शाल्व बोला—राजाओ! यदि ऐसी बात है तो क्या हमलोग श्रीकृष्णके भयसे अब अपने अस्त्र- शस्त्र नीचे डालकर निहत्थे हो जायँँ। सन्धि करनेके हेतुसे तो यही पता लगता है कि सब नरेश श्रीकृष्णके भयसे काँप रहे हैं

अध्याय 104

श्लोक 27

परस्तवेन किं कार्यं विनिन्द्य बलमात्मनः ।नैष धर्मो नरेन्द्राणां क्षात्रे धर्मे च तिष्ठताम्

parastavena kiṃ kāryaṃ vinindya balamātmanaḥ | naiṣa dharmo narendrāṇāṃ kṣātre dharme ca tiṣṭhatām

हिन्दी अर्थ

अपने बलकी निन्‍्दा करके दूसरेकी स्तुति करनेसे क्या प्रयोजन। क्षत्रिय-धर्ममें स्थित रहनेवाले नरेशोंका यह धर्म नहीं है

अध्याय 104

श्लोक 28

महत्सु राजवंशेषु सम्भूताः कुलवर्द्धनाः ।तेषां कापुरुषा बुद्धिः कथं भवितुमर्हति

mahatsu rājavaṃśeṣu sambhūtāḥ kulavarddhanāḥ | teṣāṃ kāpuruṣā buddhiḥ kathaṃ bhavitumarhati

हिन्दी अर्थ

जो महान्‌ राजवंशोंमें उत्पन्न होकर अपने कुलकी कीर्ति बढ़ानेवाले हैं, उन राजाओंकी बुद्धिमें ऐसे कायरता- पूर्ण विचारका उदय कैसे हो सकता है

अध्याय 104

श्लोक 29

अहं जानामि वै कृष्णमादिदेवं सनातनम् ।प्रभुं सर्वामरेन्द्राणां नारायणपरायणम्

ahaṃ jānāmi vai kṛṣṇamādidevaṃ sanātanam | prabhuṃ sarvāmarendrāṇāṃ nārāyaṇaparāyaṇam

हिन्दी अर्थ

मैं जानता हूँ, श्रीकृष्ण समस्त अमरेश्वरोंके स्वामी आदिदेव सनातन पुरुष हैं। नारायण ही इनके महान्‌ आश्रय (स्वरूप) हैं

अध्याय 104

श्लोक 30

वैकुण्ठमजयं लोके चराचरगुरुं हरिम् ।सम्भूतं देवकीगर्भे विष्णुं लोकनमस्कृतम्

vaikuṇṭhamajayaṃ loke carācaraguruṃ harim | sambhūtaṃ devakīgarbhe viṣṇuṃ lokanamaskṛtam

श्लोक 30–35 का हिन्दी अर्थ

लोकमें अजेय, वैकुण्ठधामके अधिपति, चराचरगुरु, पापहारी विश्ववन्दित भगवान्‌ विष्णु ही पृथ्वीका भार उतारने, कंसराजको मारने तथा हमारा विनाश और सम्पूर्ण लोकोंकी रक्षा करनेके लिये देवकीके गर्भसे प्रकट हुए हैं। अपने अंशसहित भगवान्‌ विष्णुके इस पूर्ण अवतारमें जो-जो कार्य होनेवाला है, वह सब मैं अच्छी तरह जानता हूँ। अत: भूमिपालो ! हमलोग इन भगवान्‌ विष्णुके साथ अनुपम संग्राम करके इनकी चक्राग्निसे दग्ध हो यमलोकमें जा पहुँचेंगे। राजेन्द्रगण! मैं इस तत्त्वको जानता हूँ कि कालसे ही आयु क्षीण होती है। जबतक काल न आया हो कोई नहीं मरता है और काल आ जानेपर कोई जीवित नहीं रहता। अपने मनमें ऐसा दृढ़ निश्चय रखकर कभी किसीसे भय नहीं रखना चाहिये। वे ही योगवेत्ता भगवान्‌ विष्णु दैत्यराजोंकी तपस्या क्षीण हुई देख यथासमय उनका संहार करते हैं

अध्याय 104

श्लोक 31

कंसराजवधार्थाय भारावतरणाय च ।अस्माकं च विनाशाय लोकसंरक्षणाय च

kaṃsarājavadhārthāya bhārāvataraṇāya ca | asmākaṃ ca vināśāya lokasaṃrakṣaṇāya ca

अर्थ श्लोक 30 के साथ

अध्याय 104

श्लोक 32

अंशावतरणे कृत्स्नं जाने विष्णोर्विचेष्टितम् ।सङ्ग्राममतुलं कृत्वा विष्णुना सह भूमिपाः

aṃśāvataraṇe kṛtsnaṃ jāne viṣṇorviceṣṭitam | saṅgrāmamatulaṃ kṛtvā viṣṇunā saha bhūmipāḥ

अर्थ श्लोक 30 के साथ

अध्याय 104

श्लोक 33

चक्रानलविनिर्दग्धा यास्यामो यमसादनम् ।तत्त्वं जानामि राजेन्द्राः कालेनायुःक्षयो भवेत्

cakrānalavinirdagdhā yāsyāmo yamasādanam | tattvaṃ jānāmi rājendrāḥ kālenāyuḥkṣayo bhavet

अर्थ श्लोक 30 के साथ

अध्याय 104

श्लोक 34

नाकाले म्रियते कश्चित् प्राप्ते काले न जीवति ।एवं विनिश्चयं कृत्वा न कुर्यात्कस्यचिद्भयम्

nākāle mriyate kaścit prāpte kāle na jīvati | evaṃ viniścayaṃ kṛtvā na kuryātkasyacidbhayam

अर्थ श्लोक 30 के साथ

अध्याय 104

श्लोक 35

स एव भगवान् विष्णुरालोक्य तपसः क्षयम् ।निहन्ता दितिजेन्द्राणां यथाकालेन योगवित्

sa eva bhagavān viṣṇurālokya tapasaḥ kṣayam | nihantā ditijendrāṇāṃ yathākālena yogavit

अर्थ श्लोक 30 के साथ

अध्याय 104

श्लोक 36

बलिं वैरोचनिं चैवं बद्ध्वावध्यं महाबलम् ।कृतवान् देवदेवेशः पातालतलवासिनम्

baliṃ vairocaniṃ caivaṃ baddhvāvadhyaṃ mahābalam | kṛtavān devadeveśaḥ pātālatalavāsinam

हिन्दी अर्थ

उन्हीं देवदेवेश्वरने महाबली विरोचनकुमार बलिको, जो किसीके हाथसे मारे जानेवाले नहीं हैं, बाँधकर उन्हें पाताल- लोकका निवासी बना दिया है

अध्याय 104

श्लोक 37

एवमादीनि वै विष्णोश्चेष्टानि च नराधिपाः ।तस्मादयुक्तं भवतां विग्रहार्थं विचारणम्

evamādīni vai viṣṇośceṣṭāni ca narādhipāḥ | tasmādayuktaṃ bhavatāṃ vigrahārthaṃ vicāraṇam

हिन्दी अर्थ

नरेधरो! भगवान्‌ विष्णुकी ऐसी ही चेष्टाएँ हुआ करती हैं। अत: आप लोगोंका युद्धके लिये विचार करना अनुचित है

अध्याय 104

श्लोक 38

न च सङ्ग्रामहेतोर्हि कृष्णस्यागमनं त्विह ।यस्य वा कस्य वा कन्या वरयिष्यति तस्य सा ।किमत्र विग्रहो राज्ञां प्रीतिर्भवतु वै ध्रुवम्

na ca saṅgrāmahetorhi kṛṣṇasyāgamanaṃ tviha | yasya vā kasya vā kanyā varayiṣyati tasya sā | kimatra vigraho rājñāṃ prītirbhavatu vai dhruvam

हिन्दी अर्थ

श्रीकृष्णका यहाँ आना युद्धके लिये नहीं हुआ है। राजकन्या जिस किसीका भी वरण करेगी, उसीकी पत्नी होगी। इसमें झगड़ेकी कौन-सी बात है। राजाओंें सदा अटल प्रीति बनी रहनी चाहिये

अध्याय 104

श्लोक 39

एवं कथयमानानां नृपाणां बुद्धिशालिनाम् ।न किञ्चिदब्रवीद् राजा भीष्मकः पुत्रकारणात्

evaṃ kathayamānānāṃ nṛpāṇāṃ buddhiśālinām | na kiñcidabravīd rājā bhīṣmakaḥ putrakāraṇāt

हिन्दी अर्थ

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! उन बुद्धिशाली नरेशोंके इस प्रकार कहनेपर भी राजा भीष्मक अपने पुत्रके कारण कुछ बोल न सके

अध्याय 104

श्लोक 40

महावीर्यमदोत्सिक्तं भार्गवास्त्राभिरक्षितम् ।रणप्रचण्डातिरथं विचिन्त्य मनसा सुतम्

mahāvīryamadotsiktaṃ bhārgavāstrābhirakṣitam | raṇapracaṇḍātirathaṃ vicintya manasā sutam

हिन्दी अर्थ

वह अपने महान्‌ बलके घमंडमें भरा रहता था। भार्गवास्त्रसे सुरक्षित था और रणभूमिमें प्रचण्ड पराक्रम प्रकट करनेवाला अतिरथी वीर था। भीष्मकने मन-ही-मन अपने उस पुत्रका चिन्तन करके इस प्रकार कहा—

अध्याय 104

श्लोक 41

कृष्णं न सहते नित्यं पुत्रो मे बलदर्पितः ॥ नित्याभिमानी च रणे न बिभेति च कस्यचित्

kṛṣṇaṃ na sahate nityaṃ putro me baladarpitaḥ || nityābhimānī ca raṇe na bibheti ca kasyacit

हिन्दी अर्थ

भीष्मक बोले—मेरा पुत्र सदा बलके घमंडमें भरा रहनेवाला और अभिमानी है। वह श्रीकृष्ण और उनके प्रभावको सहन नहीं कर पाता है तथा युद्धमें किसीसे डरता नहीं है

अध्याय 104

श्लोक 42

कृष्णस्य भुजवीर्येण ह्रियते नात्र संशयः ।भविष्यति ततो युद्धं महापुरुषविग्रहम्

kṛṣṇasya bhujavīryeṇa hriyate nātra saṃśayaḥ | bhaviṣyati tato yuddhaṃ mahāpuruṣavigraham

हिन्दी अर्थ

इसमें सन्देह नहीं कि श्रीकृष्णकी भुजाओंके बलसे कन्याका अपहरण होगा। उस अवसरपर महापुरुषके साथ महान्‌ विग्रह एवं युद्ध होकर ही रहेगा

अध्याय 104

श्लोक 43

द्वेषी चैवाभिमानी च कुतो जीवति मे सुतः ।जीवितं नात्र पश्यामि मम पुत्रस्य केशवात्

dveṣī caivābhimānī ca kuto jīvati me sutaḥ | jīvitaṃ nātra paśyāmi mama putrasya keśavāt

हिन्दी अर्थ

उस अवस्थामें श्रीकृष्णसे द्वेष रखनेवाला मेरा अभिमानी पुत्र कैसे जीवित रह सकता है। अत: मुझे श्रीकृष्णके हाथसे यहाँ अपने पुत्रकी रक्षा होती नहीं दिखायी देती

अध्याय 104

श्लोक 44

कन्याहेतोः सुतं ज्येष्ठं पितॄणां नन्दिवर्द्धनम् ।कारयिष्ये कथं युद्धं पुत्रेण सह केशवम्

kanyāhetoḥ sutaṃ jyeṣṭhaṃ pitṝṇāṃ nandivarddhanam | kārayiṣye kathaṃ yuddhaṃ putreṇa saha keśavam

हिन्दी अर्थ

कन्याके लिये पितरोंका आनन्द बढ़ानेवाले अपने ज्येष्ठ पुत्रको केशवके साथ और केशवको अपने पुत्रके साथ युद्ध करनेका अवसर कैसे दूँगा

अध्याय 104

श्लोक 45

न च नारायणं देवं वरमिच्छति रुक्मवान् ।मूढभावो मदोन्मत्तः सङ्ग्रामेष्वनिवर्तकः ।नियतं भस्मसाद् याति तूलराशिर्यथानलात्

na ca nārāyaṇaṃ devaṃ varamicchati rukmavān | mūḍhabhāvo madonmattaḥ saṅgrāmeṣvanivartakaḥ | niyataṃ bhasmasād yāti tūlarāśiryathānalāt

हिन्दी अर्थ

तत्तमो रुक्मीका मनोभाव मूढ़तासे भरा हुआ है। अत: वह भगवान्‌ नारायणको रुक्मिणीका वर बनाना नहीं चाहता। वह बलके मदसे उन्मत्त रहता और युद्धसे कभी मुँह नहीं मोड़ता है। अत: जैसे आग लगनेसे रूईका ढेर जल जाता है, उसी प्रकार वह श्रीकृष्णसे भिड़कर निश्चय ही भस्म हो जायगा

अध्याय 104

श्लोक 46

करवीरेश्वरः शूरः शृगालश्चित्रयोधिना ।क्षणेन भस्मसान्नीतः केशवेन बलीयसा

karavīreśvaraḥ śūraḥ śṛgālaścitrayodhinā | kṣaṇena bhasmasānnītaḥ keśavena balīyasā

हिन्दी अर्थ

विचित्र प्रकारसे युद्ध करनेवाले अत्यन्त बलवान्‌ केशवने करवीरपुरके शूरवीर राजा श्रुगालको क्षणभरमें धूलमें मिला दिया

अध्याय 104

श्लोक 47

वृन्दावनेऽवसच्छ्रीमान् केशवो बलिनां वरः ।उद्धृत्यैकेन हस्तेन सप्ताहं धृतवान् गिरिम्

vṛndāvane'vasacchrīmān keśavo balināṃ varaḥ | uddhṛtyaikena hastena saptāhaṃ dhṛtavān girim

श्लोक 47–48 का हिन्दी अर्थ

जब बलवानोंमें श्रेष्ठ श्रीमान्‌ केशव वृन्दावनमें रहते थे, उस समय उन्होंने गोवर्धनपर्वतको उठाकर सात दिनोंतक उसे एक ही हाथसे धारण कर रखा था। उनके उस दुष्कर कर्मको याद करके मेरा हृदय अत्यन्त शिथिल हो जाता है

अध्याय 104

श्लोक 48

दुष्करं कर्म संस्मृत्य मनः सीदति मे भृशम्

duṣkaraṃ karma saṃsmṛtya manaḥ sīdati me bhṛśam

अर्थ श्लोक 47 के साथ

अध्याय 104

श्लोक 49

नगेन्द्रे सहसाऽऽगम्य दैवतैः सह वृत्रहा ।अभिषिच्याब्रवीत् कृष्णमुपेन्द्रेति शचीपतिः

nagendre sahasā''gamya daivataiḥ saha vṛtrahā | abhiṣicyābravīt kṛṣṇamupendreti śacīpatiḥ

हिन्दी अर्थ

उस समय देवताओंके साथ वृत्रासुरविनाशक शचीपति इन्द्रने सहसा गिरिराज गोवर्धनपर आकर श्रीकृष्णका गौओंके | इन्द्रके पदपर अभिषेक किया और उन्हें उपेन्द्र कहकर पुकारा

अध्याय 104

श्लोक 50

यथा वै दमितो नागः कालियो यमुनाह्रदे ।विषाग्निज्वलितो घोरः कालान्तकसमप्रभः

yathā vai damito nāgaḥ kāliyo yamunāhrade | viṣāgnijvalito ghoraḥ kālāntakasamaprabhaḥ

हिन्दी अर्थ

यमुनाके कुण्डमें निवास करनेवाले घोर कालिय नाग अपनी विषाग्निसे प्रज्वलित हो काल और अन्तकके समान प्रतीत होता था, किंतु इन श्रीकृष्णने उसका भी जिस प्रकार दमन किया (वह सबको विदित है)

अध्याय 104

श्लोक 51

केशी चापि महावीर्यो दानवो हयविग्रहः ।निहतो वासुदेवेन देवैरपि दुरासदः

keśī cāpi mahāvīryo dānavo hayavigrahaḥ | nihato vāsudevena devairapi durāsadaḥ

हिन्दी अर्थ

महापराक्रमी केशी नामक दानव घोड़ेका शरीर धारण करके रहता था। उसको जीतना देवताओंके लिये भी अत्यन्त कठिन था; परंतु इन भगवान्‌ वासुदेवने उसको भी मार डाला

अध्याय 104

श्लोक 52

सान्दीपनिसुतश्चैव चिरनष्टो हि सागरे ।दैत्यं पञ्चजनं हत्वा आनीतो यममन्दिरात्

sāndīpanisutaścaiva ciranaṣṭo hi sāgare | daityaṃ pañcajanaṃ hatvā ānīto yamamandirāt

हिन्दी अर्थ

इन्होंने समुद्रमें चिरकालसे नष्ट हुए सान्दीपनिके पुत्रको पश्नजन दैत्यका वध करके यमलोकसे ला दिया था

अध्याय 104

श्लोक 53

गोमन्ते सुमहद् युद्धे बहुभिर्वेष्टितावुभौ ।कृत्वा वित्रासजननं नागाश्वरथसङ्क्षयम्

gomante sumahad yuddhe bahubhirveṣṭitāvubhau | kṛtvā vitrāsajananaṃ nāgāśvarathasaṅkṣayam

श्लोक 53–54 का हिन्दी अर्थ

गोमन्तपर्वतपर जो महान्‌ युद्ध हुआ था, उसमें बहुत-से राजाओंद्वारा ये दोनों भाई घिर गये थे। परंतु वसुदेवके उन दोनों महापराक्रमी पुत्रोंने हाथी, घोड़े तथा रथोंका संहाररूप अत्यन्त भयदायक पराक्रम कर दिखाया। हाथीसे हाथियोंके समूहोंको, रथसे रथारूढ़ योद्धाओंको, घुड़सवारसे ही घुड़सवारोंको और पैदल योद्धासे ही पैदलॉंको मारकर यमलोक पहुँचा दिया

अध्याय 104

श्लोक 54

गजेन गजवृन्दानि रथेन रथयोधिनः ।सादिनश्चाश्वयोधेन नरेण च पदातिनः ।जघ्नतुस्तौ महावीर्यौ वसुदेवसुतावुभौ

gajena gajavṛndāni rathena rathayodhinaḥ | sādinaścāśvayodhena nareṇa ca padātinaḥ | jaghnatustau mahāvīryau vasudevasutāvubhau

अर्थ श्लोक 53 के साथ

अध्याय 104

श्लोक 55

न देवासुरगन्धर्वा न यक्षोरगराक्षसाः ।न नागा न च दैत्येन्द्रा न पिशाचा न गुह्यकाः

na devāsuragandharvā na yakṣoragarākṣasāḥ | na nāgā na ca daityendrā na piśācā na guhyakāḥ

श्लोक 55–56 का हिन्दी अर्थ

देवताओं, असुरों, गन्धर्वों, यक्षों, सर्प, राक्षसों, नागों, दैत्यराजों, पिशाचों और गुह्मकोंने भी कभी हाथी, घोड़े और रथोंका ऐसा घोर संहार नहीं मचाया था। उस संग्रामको बार्म्बार याद करके मेरा मन शिथिल होता जा रहा है

अध्याय 104

श्लोक 56

कृतवन्तस्तथा घोरं गजाश्वरथसङ्क्षयम् ।तमनुस्मृत्य सङ्ग्रामं भृशं सदिति मे मनः

kṛtavantastathā ghoraṃ gajāśvarathasaṅkṣayam | tamanusmṛtya saṅgrāmaṃ bhṛśaṃ saditi me manaḥ

अर्थ श्लोक 55 के साथ

अध्याय 104

श्लोक 57

न मया श्रुतपूर्वो वा दृष्टपूर्वः कुतोऽपि वा ।तादृशो भुवि मर्त्योऽन्यो वासुदेवात्सुरोत्तमात्

na mayā śrutapūrvo vā dṛṣṭapūrvaḥ kuto'pi vā | tādṛśo bhuvi martyo'nyo vāsudevātsurottamāt

हिन्दी अर्थ

मैंने पहले कभी भूतलपर सुस्त्रेषठ भगवान्‌ वासुदेवको छोड़कर दूसरे किसी वैसे मनुष्यका होना न तो देखा है और न सुना ही है

अध्याय 104

श्लोक 58

सम्यगाह महाबाहुर्दन्तवक्त्रो महीपतिः ।सान्त्वयित्वा महावीर्यं संविधास्याम यत्क्षमम्

samyagāha mahābāhurdantavaktro mahīpatiḥ | sāntvayitvā mahāvīryaṃ saṃvidhāsyāma yatkṣamam

हिन्दी अर्थ

महाबाहु राजा दन्तवक्‍्त्र ठीक कहते हैं। हम पहले महापराक्रमी श्रीकृष्णको सान्त्वनाद्वारा शान्त करके फिर जैसा उचित हो वैसा करें

अध्याय 104

श्लोक 59

इति सञ्चिन्त्य मनसा बलाबलविनिश्चयम् ।गमनाय मतिं चक्रे प्रसादयितुमच्युतम्

iti sañcintya manasā balābalaviniścayam | gamanāya matiṃ cakre prasādayitumacyutam

हिन्दी अर्थ

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! इस प्रकार मन-ही-मन अपने बलाबलका निश्चय करके राजा भीष्मकने भगवान्‌ श्रीकृष्णको प्रसन्न करनेके लिये उनके पास जानेका विचार किया

अध्याय 104

श्लोक 60

चिन्तयानो नरेन्द्रस्तु बहुभिर्नयशालिभिः ।सूतमागधबन्दिभ्यो बोधितः स्तुतिमङ्गलैः

cintayāno narendrastu bahubhirnayaśālibhiḥ | sūtamāgadhabandibhyo bodhitaḥ stutimaṅgalaiḥ

हिन्दी अर्थ

बहुत-से नीतिशाली विद्वान्‌ मस्त्रियोंके साथ विचार करते हुए राजा भीष्मक जब रातमें सो गये, तब सबेरा होनेके समय सूतों, मागधों और बन्दियोंके मुखसे स्तुति एवं मड़्ल-पाठ सुनकर जगे

अध्याय 104

श्लोक 61

प्रभातायां रजन्यां तु कृतपूर्वाह्णिकक्रियाः ।उपविष्टा नृपाः सर्वे स्वेषु विश्रामवेश्मसु

prabhātāyāṃ rajanyāṃ tu kṛtapūrvāhṇikakriyāḥ | upaviṣṭā nṛpāḥ sarve sveṣu viśrāmaveśmasu

हिन्दी अर्थ

जब रात बीतनेपर प्रभातकाल आया, तब सब नरेश पूर्वाह्ककालके नित्यकर्म पूर्ण करके अपने- अपने विश्राम-भवनोंमें बैठे

अध्याय 104

श्लोक 62

ये विसृष्टास्तु राजानो विदर्भायां नराधिपैः ।तैरागम्य स्वभूपेषु रहो गत्वा निवेदितम्

ye visṛṣṭāstu rājāno vidarbhāyāṃ narādhipaiḥ | tairāgamya svabhūpeṣu raho gatvā niveditam

हिन्दी अर्थ

राजाओंने अपनी ओरसे जिन-जिन राजकुमारोंको विदर्भपुरीमें भेजा था, उन्होंने लौटकर अपने-अपने राजाओंके पास एकान्तमें जाकर वहाँका समाचार निवेदन किया

अध्याय 104

श्लोक 63

श्रुत्वा कृष्णाभिषेकं तु केचिद् धृष्टा नराधिपाः ।केचिद् दीनतरा भीता उदासीनास्तथा परे

śrutvā kṛṣṇābhiṣekaṃ tu kecid dhṛṣṭā narādhipāḥ | kecid dīnatarā bhītā udāsīnāstathā pare

हिन्दी अर्थ

श्रीकृष्णके अभिषेकका समाचार सुनकर कुछ नरेश तो बहुत ही प्रसन्न हुए, कुछ लोग अत्यन्त दीन, भयभीत हो गये और दूसरे राजा उदासीन (तटस्थ) बने रहे

अध्याय 104

श्लोक 64

त्रिधा प्रभिन्ना सा सेना नरनागाश्वमालिनी ।महार्णव इव क्षुब्धा अभिषेकेण चालिता

tridhā prabhinnā sā senā naranāgāśvamālinī | mahārṇava iva kṣubdhā abhiṣekeṇa cālitā

हिन्दी अर्थ

इस प्रकार श्रीकृष्णके अभिषेकसे चालित हुई मनुष्यों, हाथियों और घोड़ोंसे भरी हुई वह सेना तीन भागोंमें बँट गयी और महासागरके समान विश्षुब्ध हो उठी

अध्याय 104

श्लोक 65

नृपाणां भेदमालोक्य भीष्मको राजसत्तमः ।व्यतिक्रममचिन्त्यं च कृतं नृपतिना स्वयम्

nṛpāṇāṃ bhedamālokya bhīṣmako rājasattamaḥ | vyatikramamacintyaṃ ca kṛtaṃ nṛpatinā svayam

श्लोक 65–66 का हिन्दी अर्थ

राजाओंमें श्रेष्ठ भीष्मक उन नरेशोंमें भेद हुआ देखकर और स्वयं अपने ही किये हुए अचिन्त्य अपराधका विचार करके मन-ही-मन चिन्तासे दग्ध होते हुए उन नरदेवोंके समाजमें उन्हें समझानेके लिये गये

अध्याय 104

श्लोक 66

विचिन्त्य मनसा राजा दह्यमानेन चेतसा ।जगाम नरदेवानां समाजे प्रतिबोधितुम्

vicintya manasā rājā dahyamānena cetasā | jagāma naradevānāṃ samāje pratibodhitum

अर्थ श्लोक 65 के साथ

अध्याय 104

श्लोक 67

एतस्मिन्नन्तरे दूताः सम्प्राप्ताः क्रथकैशिकौ ।लेखमुद्धृत्य शिरसा विविशुस्ते नृपार्णवम्

etasminnantare dūtāḥ samprāptāḥ krathakaiśikau | lekhamuddhṛtya śirasā viviśuste nṛpārṇavam

हिन्दी अर्थ

इसी बीचमें इन्द्रके दूत राजा क्रथ और कैशिकके पास जा पहुँचे और सिर झुका एक पत्र निकालकर उन्हें दिया; फिर वे राजाओंके समुद्र-जैसे समाजमें घुस गये

स्रोत: local proofread transcription: Sanskrit shlokas of the Harivamsa (Harivamsha, Vishnu and Bhavishya parvas) from sanskritdocuments.org. One chapter per adhyaya; verse numbers as printed in the source (restarting in each adhyaya). Appendix sections are not included. · प्राप्त 19/10/2026

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शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

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भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

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शोध टिप्पणीResearch note

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Collated with BORI Critical Edition of Mahabharata Khilaparvan.