Harivamsha Purana
103
अध्याय 103 / 318

Parva 2, Adhyāya 48

51 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ51 श्लोक

अध्याय 103

श्लोक 1

श्रीकृष्णस्य आगमनेन चिन्तितानां राजानां सभायां जरासन्धसुनीथानां भाषणं ते कृष्णमागतं दृष्ट्वा वैनतेयसहाच्युतम् ।बभूवुश्चिन्तयाविष्टाः सर्वे नृपतिसत्तमाः

śrīkṛṣṇasya āgamanena cintitānāṃ rājānāṃ sabhāyāṃ jarāsandhasunīthānāṃ bhāṣaṇaṃ te kṛṣṇamāgataṃ dṛṣṭvā vainateyasahācyutam | babhūvuścintayāviṣṭāḥ sarve nṛpatisattamāḥ

हिन्दी अर्थ

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! अपनी महिमासे कभी च्युत न होनेवाले श्रीकृष्णको गरुड़के साथ आया देख सभी श्रेष्ठ नरपति चिन्तामग्न हो गये

अध्याय 103

श्लोक 2

ते समेत्य सभां राजन् राजानो भीमविक्रमाः ।मन्त्राय मन्त्रकुशला नीतिशास्त्रार्थवित्तमाः

te sametya sabhāṃ rājan rājāno bhīmavikramāḥ | mantrāya mantrakuśalā nītiśāstrārthavittamāḥ

हिन्दी अर्थ

राजन्‌ ! वे भयानक पराक्रमी राजा नीतिशास्त्रके भी अच्छे ज्ञाता तथा मन्त्रणा करनेमें कुशल थे। उन्होंने परस्पर मन्त्रणा करनेके लिये एक सभामें एकत्र होनेका विचार किया

अध्याय 103

श्लोक 3

भीष्मकस्य सभां गत्वा रम्यां हेमपरिष्कृताम् ।सिंहासनेषु चित्रेषु विचित्रास्तरणेषु च ।निषेदुस्ते नृपवरा देवा देवसभामिव

bhīṣmakasya sabhāṃ gatvā ramyāṃ hemapariṣkṛtām | siṃhāsaneṣu citreṣu vicitrāstaraṇeṣu ca | niṣeduste nṛpavarā devā devasabhāmiva

हिन्दी अर्थ

फिर जैसे देवता देवसभामें विराजमान होते हैं, उसी प्रकार वे श्रेष्ठ नरेशगण राजा भीष्मककी सुवर्णभूषित रमणीय सभामें जाकर विचित्र बिछौनोंसे युक्त भाँति- भाँतिके सिंहासनोंपर बैठे

अध्याय 103

श्लोक 4

तेषां मध्ये महाबाहुर्जरासन्धो महाबलः ।वभाषे स महातेजा देवान् देवेश्वरो यथा

teṣāṃ madhye mahābāhurjarāsandho mahābalaḥ | vabhāṣe sa mahātejā devān deveśvaro yathā

हिन्दी अर्थ

उनके बीचमें महाबली, महातेजस्वी और महाबाहु जरासंधने उसी तरह भाषण देना आरम्भ किया, जैसे देवराज इन्द्र देवताओंके समक्ष प्रवचन करते हैं

अध्याय 103

श्लोक 5

श्रूयतां भो नृपश्रेष्ठा भीष्मकश्च महामतिः ।कथ्यमानं मया बुद्ध्या वचनं वदतां वराः

śrūyatāṃ bho nṛpaśreṣṭhā bhīṣmakaśca mahāmatiḥ | kathyamānaṃ mayā buddhyā vacanaṃ vadatāṃ varāḥ

हिन्दी अर्थ

जरासंध बोला—इस सभामें उपस्थित हुए वक्ताओंमं श्रेष्ठ नरेशो! मैं यहाँ अपनी बुद्धिकि अनुसार जो कुछ कह रहा हूँ, उसे आपलोग तथा परम बुद्धिमान राजा भीष्मक भी सुनें

अध्याय 103

श्लोक 6

योऽसौ कृष्ण इति ख्यातो वसुदेवसुतो बली ।वैनतेयसहायेन सम्प्राप्तः कुण्डिनं त्विह

yo'sau kṛṣṇa iti khyāto vasudevasuto balī | vainateyasahāyena samprāptaḥ kuṇḍinaṃ tviha

श्लोक 6–7 का हिन्दी अर्थ

वे जो कृष्ण नामसे विख्यात बलवान्‌ वसुदेवपुत्र इस कुण्डिनपुरमें गरुड़के साथ पधारे हैं, बड़े तेजस्वी हैं। यहाँकी राजकन्याको प्राप्त करनेके लिये ही वे यादवोंसे घिरे हुए यहाँतक आये हैं। जिस तरह भी कन्याकी प्रासि हो सके वैसा ही प्रयत्न वे अवश्य करेंगे

अध्याय 103

श्लोक 7

कन्याहेतोर्महातेजा यादवैरभिसंवृतः ।अवश्यं कुरुते यत्नं कन्यावाप्तिर्यथा भवेत्

kanyāhetormahātejā yādavairabhisaṃvṛtaḥ | avaśyaṃ kurute yatnaṃ kanyāvāptiryathā bhavet

अर्थ श्लोक 6 के साथ

अध्याय 103

श्लोक 8

यदत्र कारणं कार्यं सुनयोपेतमृद्धितम् ।कुरुध्वं नृपशार्दूला विनिश्चित्य बलाबलम्

yadatra kāraṇaṃ kāryaṃ sunayopetamṛddhitam | kurudhvaṃ nṛpaśārdūlā viniścitya balābalam

हिन्दी अर्थ

श्रेष्ठ नरपतियो! यहाँ जो सुनीतिसे युक्त तथा समृद्धिका हेतुभूत कारण (उपाय) काममें लाने योग्य है, उसे अपने बलाबलका विचार करके आपलोग करें

अध्याय 103

श्लोक 9

पदातिनौ महावीर्यौ वसुदेवसुतावुभौ ।वैनतेयं विना तस्मिन् गोमन्ते पर्वतोत्तमे ।कृतवन्तौ महाघोरं भवद्भिर्विदितं हि तत्

padātinau mahāvīryau vasudevasutāvubhau | vainateyaṃ vinā tasmin gomante parvatottame | kṛtavantau mahāghoraṃ bhavadbhirviditaṃ hi tat

हिन्दी अर्थ

वसुदेवके ये दोनों पुत्र महान पराक्रमी हैं। ये लोग पर्वतोंमें श्रेष्ठ गोमन्तपर गरुड़को साथ लिये बिना पैदल आये थे तो भी इन्होंने जो घोर महायुद्ध किया था, वह आपलोगोंको विदित ही है

अध्याय 103

श्लोक 10

वृष्णिभिर्यादवैश्चैव भोजान्धकमहारथैः ।समेत्य युद्धमानस्य कीदृशो विग्रहो भवेत्

vṛṣṇibhiryādavaiścaiva bhojāndhakamahārathaiḥ | sametya yuddhamānasya kīdṛśo vigraho bhavet

हिन्दी अर्थ

इस समय जब ये यदुवंशी, वृष्णिवंशी, भोजवंशी तथा अन्धकवंशी महारथियोंके साथ मिलकर युद्ध करेंगे, तब इनका संग्राम कैसा होगा—(यह आपलोग स्वयं अनुमान कर सकते हैं)

अध्याय 103

श्लोक 11

कन्यार्थे यततानेन गरुडस्थेन विष्णुना ।कः स्थास्यति रणे तस्मिन्नपि शक्रः सुरैः सह

kanyārthe yatatānena garuḍasthena viṣṇunā | kaḥ sthāsyati raṇe tasminnapi śakraḥ suraiḥ saha

हिन्दी अर्थ

राजकन्याके लिये यत्र करते हुए इन गरुडवाहन भगवान्‌ विष्णुके साथ युद्धमें देवताओं - सहित इन्द्र ही क्यों न हों, कौन ठहर सकेगा

अध्याय 103

श्लोक 12

यदा चास्मै नापि सुता कदाचित् सम्प्रदीयते ।ततो ह्ययं बलादेनां नेतुं शक्तः सुरैः सह

yadā cāsmai nāpi sutā kadācit sampradīyate | tato hyayaṃ balādenāṃ netuṃ śaktaḥ suraiḥ saha

हिन्दी अर्थ

यदि कदाचित्‌ इन्हें कन्या न भी दी जाय तो ये देवताओंके साथ उपस्थित हो बलपूर्वक इसे ले जानेमें समर्थ हैं

अध्याय 103

श्लोक 13

पुरा एकार्णवे घोरे श्रूयते मेदिनी त्वियम् ।पातालतलसम्मग्ना विष्णुना प्रभविष्णुना

purā ekārṇave ghore śrūyate medinī tviyam | pātālatalasammagnā viṣṇunā prabhaviṣṇunā

श्लोक 13–14 का हिन्दी अर्थ

सुना जाता है कि प्राचीन कालमें यह पृथ्वी भयंकर एकार्णवमें निमग्न हो रसातलमें जा पहुँची थी। उस समय जगत्‌के आदिकारण इन्हीं प्रभावशाली विष्णुने वाराहरूप धारण करके इसका उद्धार किया था। उस समय दैत्यराज हिरण्याक्षको भी वाराहरूपसे ही मार गिराया था

अध्याय 103

श्लोक 14

वाराहं रूपमास्थाय उद्धृता जगदादिना ।हिरण्याक्षश्च दैत्येन्द्रो वराहेण निपातितः

vārāhaṃ rūpamāsthāya uddhṛtā jagadādinā | hiraṇyākṣaśca daityendro varāheṇa nipātitaḥ

अर्थ श्लोक 13 के साथ

अध्याय 103

श्लोक 15

हिरण्यकशिपुश्चैव महाबलपराक्रमः ।अवध्योऽमरदैत्यानामृषिगन्धर्वकिन्नरैः

hiraṇyakaśipuścaiva mahābalaparākramaḥ | avadhyo'maradaityānāmṛṣigandharvakinnaraiḥ

श्लोक 15–16 का हिन्दी अर्थ

महानू बल और पराक्रमसे सम्पन्न दैत्यराज हिरण्यकशिपु देवताओं और दैत्योंके लिये भी अवध्य था। ऋषि, गन्धर्व और किन्नर भी उसे मार नहीं सकते थे। यक्ष, राक्षस और नागोंके लिये भी वह अजेय था। वह न तो आकाशमें मर सकता था, न पृथ्वीपर | न रातमें न दिनमें और न सूखे अस्त्रसे न गीले अस्त्रसे ही

अध्याय 103

श्लोक 16

यक्षराक्षसनागानां नाकाशे नावनिस्थले ।न चाभ्यन्तररात्र्यह्नोर्न शुष्केणार्द्रकेण च

yakṣarākṣasanāgānāṃ nākāśe nāvanisthale | na cābhyantararātryahnorna śuṣkeṇārdrakeṇa ca

अर्थ श्लोक 15 के साथ

अध्याय 103

श्लोक 17

अवध्यस्त्रिषु लोकेषु दैत्येन्द्रस्त्वपराजितः ।नरसिंहेन रूपेण निहतो विष्णुना पुरा

avadhyastriṣu lokeṣu daityendrastvaparājitaḥ | narasiṃhena rūpeṇa nihato viṣṇunā purā

हिन्दी अर्थ

तीनों लोकोंमें अवध्य वह दैत्यराज किसीसे पराजित होनेवाला नहीं था तो भी पूर्वकालमें भगवान्‌ विष्णुने नरसिंहरूप धारण करके उसे मार डाला

अध्याय 103

श्लोक 18

वामनेन तु रूपेण कश्यपस्यात्मजो बली ।अदित्या गर्भसम्भूतो बलिर्बद्धोऽसुरोत्तमः

vāmanena tu rūpeṇa kaśyapasyātmajo balī | adityā garbhasambhūto balirbaddho'surottamaḥ

श्लोक 18–21 का हिन्दी अर्थ

फिर किसी समय बलवान्‌ विष्णु महर्षि कश्यपके पुत्ररूपमें देवी अदितिके गर्भसे प्रकट हुए। उस समय उन्होंने वामनरूप धारण करके असुरराज बलिको सत्यकी रस्सीसे बनाये गये पाशोंद्वारा बाँध लिया और उसे पाताललोकका निवासी बना दिया। कृतवीर्यका पुत्र महापराक्रमी अर्जुनका शरीर दत्तात्रेयजीकी कृपासे सहस्र भुजाओंसे सुशोभित होता था। वह राज्यमदसे उन्मत्त हो गया था। (उसके दमनके लिये भगवान्‌ विष्णु) त्रेता और द्वापरकी सन्धिके समय रेणुकाके गर्भसे प्रकट हुए। वे शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ महातेजस्वी जमदग्निकुमार परशुरामके नामसे प्रसिद्ध हुए। इस तरह पुन: छदूम- रूपधारी भगवान्‌ विष्णुने हैहयबंशमें उत्पन्न राजा कार्तवीर्यका, जो सातों द्वीपॉंका स्वामी था, अपने वज़तुल्य फरसेसे मार डाला

अध्याय 103

श्लोक 19

सत्यरज्जुमयैः पाशैः कृतः पातालसंश्रयः ।कार्तवीर्यो महावीर्यः सहस्रभुजविग्रहः

satyarajjumayaiḥ pāśaiḥ kṛtaḥ pātālasaṃśrayaḥ | kārtavīryo mahāvīryaḥ sahasrabhujavigrahaḥ

अर्थ श्लोक 18 के साथ

अध्याय 103

श्लोक 20

दत्तात्रेयप्रसादेन मत्तो राज्यमदेन च ।जामदग्न्यो महातेजा रेणुकागर्भसम्भवः

dattātreyaprasādena matto rājyamadena ca | jāmadagnyo mahātejā reṇukāgarbhasambhavaḥ

अर्थ श्लोक 18 के साथ

अध्याय 103

श्लोक 21

त्रेताद्वापरयोः सन्धौ रामः शस्त्रभृतां वरः ।पर्शुना वज्रकल्पेन सप्तद्वीपेश्वरो नृपः ।विष्णुना निहतो भूयः छद्मरूपेण हैहयः

tretādvāparayoḥ sandhau rāmaḥ śastrabhṛtāṃ varaḥ | parśunā vajrakalpena saptadvīpeśvaro nṛpaḥ | viṣṇunā nihato bhūyaḥ chadmarūpeṇa haihayaḥ

अर्थ श्लोक 18 के साथ

अध्याय 103

श्लोक 22

इक्ष्वाकुकुलसम्भूतो रामो दाशरथिः पुरा ।त्रिलोकविजयं वीरं रावणं संन्यपातयत्

ikṣvākukulasambhūto rāmo dāśarathiḥ purā | trilokavijayaṃ vīraṃ rāvaṇaṃ saṃnyapātayat

हिन्दी अर्थ

तत्पश्चात्‌ इक्ष्वाकुकुलमें दशरथनन्दन श्रीरामके रूपमें प्रकट हुए। उन्होंने पूर्व- कालमें त्रिलोकविजयी रावणको मार गिराया था

अध्याय 103

श्लोक 23

पुरा कृतूयुगे विष्णुः सङ्ग्रामे तारकामये ।षोडशार्द्धभुजो भूत्वा गरुडस्थो हि वीर्यवान्

purā kṛtūyuge viṣṇuḥ saṅgrāme tārakāmaye | ṣoḍaśārddhabhujo bhūtvā garuḍastho hi vīryavān

श्लोक 23–24 का हिन्दी अर्थ

प्राचीन कालकी बात है—सत्ययुगमें जब तारकामय संग्राम हुआ था, उस समय पराक्रमी विष्णु आठ भुजाओंसे पुक्त हो गरुडपर बैठकर वहाँ पधारे। वहाँ उन्होंने तरदानसे गर्वित हुए असुरोंको युद्धमें मार डाला तथा देवताओंको भय देनेवाले कालनेमि नामक दैत्यका भी त्ध कर दिया

अध्याय 103

श्लोक 24

निजघानासुरान् युद्धे वरदानेन गर्वितान् ।कालनेमिश्च दैतेयो देवानां च भयप्रदः

nijaghānāsurān yuddhe varadānena garvitān | kālanemiśca daiteyo devānāṃ ca bhayapradaḥ

अर्थ श्लोक 23 के साथ

अध्याय 103

श्लोक 25

सहस्रकिरणाभेन चक्रेण निहतो युधि ।महायोगबलेनाजौ विश्वरूपेण विष्णुना

sahasrakiraṇābhena cakreṇa nihato yudhi | mahāyogabalenājau viśvarūpeṇa viṣṇunā

हिन्दी अर्थ

शो + ५०५ यह सम्पूर्ण विश्व जिनका रूप है, उन भगवान्‌ विष्णुने युद्धमें महान्‌ योगबलसे सूर्यतुल्य तेजस्वी चक्रद्वारा उस दैत्यका संहार किया था

अध्याय 103

श्लोक 26

अनेन प्राप्तकालास्ते निहता बहवोऽसुराः ।वने वनचरा दैत्या महाबलपराक्रमाः

anena prāptakālāste nihatā bahavo'surāḥ | vane vanacarā daityā mahābalaparākramāḥ

श्लोक 26–35 का हिन्दी अर्थ

इस श्रीकृष्णने ऐसे बहुतसे असुरोंको मार डाला है, जिनका काल आ पहुँचा था। वनमें विचरनेवाले महानू बल और पराक्रमसे सम्पन्न प्रलम्ब और धेनुक नामक दैत्योंको इन्होंने बाल्यावस्थामें ही वनके भीतर मार गिराया था। पूतना, केशी, यमलार्जुन, कुवलयापीड हाथी, चाणूर, मुष्टिक तथा बलवानोंमें श्रेष्ठ कंसको उसके गणोंसहित इन देवकीपुत्र केशवने नष्ट कर दिया है। उस समय ये गोपवेशमें क्रीडा करते थे। इन प्रभावशाली चक्रधारी विष्णुने ये तथा और भी इसी तरहके बहुत-से दिव्य छदूमरूप समय-समयपर धारण किये हैं। इसलिये मैं आपलोगोंके हितकी इच्छासे कह रहा हूँ कि श्रीकृष्ण देवताओंके आदि कारण एवं असुर-विनाशक विष्णु हैं । मैं उन्हें ऐसा ही समझता हूँ। वे जगत्‌की उत्पत्तिके स्थानभूत पुराणपुरुष अविनाशी भगवान्‌ नारायण हैं । वे ही समस्त भूतोंकी सृष्टि करनेवाले तथा व्यक्ताव्यक्तस्वरूप सनातन परमात्मा हैं। सम्पूर्ण लोक मिलकर भी उनको पराजित नहीं कर सकते। सारा संसार उनके चरणों में मस्तक झुकाता है। वे आदि, मध्य और अन्तसे रहित, क्षर(सर्वभूतमय), अक्षर (कूटस्थ) और अविकारी हैं । वे ही स्वयंभू, अजन्मा, सदा स्थिर रहनेवाले तथा चराचर प्राणियोंके लिये अजेय हैं । उन्हींको मैं देवेन्द्रके शत्रु ओंका विनाशक, त्रिलोकीनाथ, त्रिविक्रमरूपधारी विष्णु मानता हूँ। यह मेरी बुद्धिका निश्चय है। ये विष्णु ही मधुरामें चक्रवर्ती राजाओंके महान्‌ एवं विशाल कुलमें प्रकट हुए हैं। अन्यथा दूसरे किसी मनुष्यका वाहन गरुड़ कैसे हो सकते हैं

अध्याय 103

श्लोक 27

निहता बालभावेन प्रलम्बारिष्टधेनुकाः ।शकुनीं केशिनं चैव यमलार्जुनकावपि

nihatā bālabhāvena pralambāriṣṭadhenukāḥ | śakunīṃ keśinaṃ caiva yamalārjunakāvapi

अर्थ श्लोक 26 के साथ

अध्याय 103

श्लोक 28

नागं कुवलयापीडं चाणूरं मुष्टिकं तथा ।कंसं च बलिनां श्रेष्ठं सगणं देवकीसुतः

nāgaṃ kuvalayāpīḍaṃ cāṇūraṃ muṣṭikaṃ tathā | kaṃsaṃ ca balināṃ śreṣṭhaṃ sagaṇaṃ devakīsutaḥ

अर्थ श्लोक 26 के साथ

अध्याय 103

श्लोक 29

न्यहनद् गोपवेषेण क्रीडमानो हि केशवः ।एवमादीनि दिव्यानि छद्मरूपाणि चक्रिणा

nyahanad gopaveṣeṇa krīḍamāno hi keśavaḥ | evamādīni divyāni chadmarūpāṇi cakriṇā

अर्थ श्लोक 26 के साथ

अध्याय 103

श्लोक 30

कृतानि दिव्यरूपाणि विष्णुना प्रभविष्णुना ।तेनाहं वः प्रवक्ष्यामि भवतां हितकाम्यया

kṛtāni divyarūpāṇi viṣṇunā prabhaviṣṇunā | tenāhaṃ vaḥ pravakṣyāmi bhavatāṃ hitakāmyayā

अर्थ श्लोक 26 के साथ

अध्याय 103

श्लोक 31

तं मन्ये केशवं विष्णुं सुराद्यमसुरान्तकम् ।नारायणं जगद्योनिं पुराणं पुरुषं ध्रुवम्

taṃ manye keśavaṃ viṣṇuṃ surādyamasurāntakam | nārāyaṇaṃ jagadyoniṃ purāṇaṃ puruṣaṃ dhruvam

अर्थ श्लोक 26 के साथ

अध्याय 103

श्लोक 32

स्रष्टारं सर्वभूतानां व्यक्ताव्यक्तं सनातनम् ।अधृष्यं सर्वलोकानां सर्वलोकनमस्कृतम्

sraṣṭāraṃ sarvabhūtānāṃ vyaktāvyaktaṃ sanātanam | adhṛṣyaṃ sarvalokānāṃ sarvalokanamaskṛtam

अर्थ श्लोक 26 के साथ

अध्याय 103

श्लोक 33

अनादिमध्यनिधनं क्षरमक्षरमव्ययम् ।स्वयम्भुवमजं स्थाणुमजेयं सचराचरैः

anādimadhyanidhanaṃ kṣaramakṣaramavyayam | svayambhuvamajaṃ sthāṇumajeyaṃ sacarācaraiḥ

अर्थ श्लोक 26 के साथ

अध्याय 103

श्लोक 34

त्रिविक्रमं त्रिलोकेशं त्रिदशेन्द्रारिनाशनम् ।इति मे निश्चिता बुद्धिर्जातोऽयं मथुरामधि

trivikramaṃ trilokeśaṃ tridaśendrārināśanam | iti me niścitā buddhirjāto'yaṃ mathurāmadhi

अर्थ श्लोक 26 के साथ

अध्याय 103

श्लोक 35

कुले महति वै राज्ञां विपुले चक्रवर्तिनाम् ।कथमन्यस्य मर्त्यस्य गरुडो वाहनं भवेत्

kule mahati vai rājñāṃ vipule cakravartinām | kathamanyasya martyasya garuḍo vāhanaṃ bhavet

अर्थ श्लोक 26 के साथ

अध्याय 103

श्लोक 36

विशेषेण तु कन्यार्थे विक्रमस्थे जनार्दने ।कः स्थास्यति पुमानद्य गरुडस्याग्रतो बली

viśeṣeṇa tu kanyārthe vikramasthe janārdane | kaḥ sthāsyati pumānadya garuḍasyāgrato balī

हिन्दी अर्थ

विशेषत: जब भगवान्‌ जनार्दन राजकन्याकी प्राप्तिक लिये पराक्रम प्रकट करनेपर तुल जायेँगे, तब कौन ऐसा बलवान्‌ पुरुष है, जो आज गरुड़के सामने खड़ा हो सकेगा

अध्याय 103

श्लोक 37

स्वयंवरकृतेनासौ विष्णुः स्वयमिहागतः ।विष्णोरागमने चैव महान् दोषः प्रकीर्तितः

svayaṃvarakṛtenāsau viṣṇuḥ svayamihāgataḥ | viṣṇorāgamane caiva mahān doṣaḥ prakīrtitaḥ

श्लोक 37–40 का हिन्दी अर्थ

इस स्वयंवरके लिये साक्षात्‌ विष्णु यहाँ पधारे हैं। विष्णुका आगमन होनेपर हमारे लिये जो महान्‌ दोष (बाधा) उपस्थित है, उसे मैंने बताया। आपलोग भी इसपर विचार करके आगे जो कुछ करना हो, वह करें ॥ ३७ ड ॥। वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! मगधदेशका राजा इस प्रकार भाषण दे चुका, तब महाबुद्धिमान्‌ सुनीथने इस प्रकार कहा ॥ ३८ हु ॥ सुनीथ बोले—महाबाहु मगधराज ठीक कहते हैं। गोमन्त पर्वतके समीप महासमरमें जैसी घटना घटित हुई थी तथा बलराम और श्रीकृष्णने जो अत्यन्त दुष्कर कर्म कर दिखाया था, वह इन समस्त नरेशोंने अपनी आँखों देखा था

अध्याय 103

श्लोक 38

भवद्भिरनुचिन्त्येदं क्रियतां यदनन्तरम् ।एवं विब्रुवमाणे तु मगधानां जनेश्वरे

bhavadbhiranucintyedaṃ kriyatāṃ yadanantaram | evaṃ vibruvamāṇe tu magadhānāṃ janeśvare

अर्थ श्लोक 37 के साथ

अध्याय 103

श्लोक 39

सम्यगाह महाबाहुर्मगधाधिपतिर्नृपः

samyagāha mahābāhurmagadhādhipatirnṛpaḥ

अर्थ श्लोक 37 के साथ

अध्याय 103

श्लोक 40

समक्षं नरदेवानां यथावृत्तं महाहवे ।गोमन्ते रामकृष्णाभ्यां कृतं कर्म सुदुष्करम्

samakṣaṃ naradevānāṃ yathāvṛttaṃ mahāhave | gomante rāmakṛṣṇābhyāṃ kṛtaṃ karma suduṣkaram

अर्थ श्लोक 37 के साथ

अध्याय 103

श्लोक 41

गजाश्वरथसम्बाधा पत्तिध्वजसमाकुला ।निर्दग्धा महती सेना चक्रलाङ्गलवह्निना

gajāśvarathasambādhā pattidhvajasamākulā | nirdagdhā mahatī senā cakralāṅgalavahninā

हिन्दी अर्थ

हाथी, घोड़े और रथोंसे भरी तथा पैदलों और ध्वजोंसे व्याप्त हुई राजाओंकी वह विशाल सेना चक्र और हलरूपी अग्निसे जलकर भस्म हो गयी

अध्याय 103

श्लोक 42

तेनायं मागधः श्रीमाननागतमचिन्तयत् ।ब्रुवते राजसेनायामनुस्मृत्य सुदारुणम्

tenāyaṃ māgadhaḥ śrīmānanāgatamacintayat | bruvate rājasenāyāmanusmṛtya sudāruṇam

श्लोक 42–44 का हिन्दी अर्थ

श्रेष्ठ नरपतियो ! गरुड़के आते समय यहाँ जो प्रभाव पड़ा था, उसे आपलोग अच्छी तरह जानते हैं। उनके पंखोंके वेगसे जो वायु उठी थी, उसका झोंका खाकर आकाशचारी प्राणी चक्कर काटने लगे थे

अध्याय 103

श्लोक 43

पदात्योर्युध्यतोस्तत्र बलकेशवयोर्युधि ।दुर्निवार्यतरो घोरो ह्यभवद् वाहिनीक्षयः

padātyoryudhyatostatra balakeśavayoryudhi | durnivāryataro ghoro hyabhavad vāhinīkṣayaḥ

अर्थ श्लोक 42 के साथ

अध्याय 103

श्लोक 44

विदितं वः सुपर्णस्य स्वागतस्य नृपोत्तमाः ।पक्षवेगानिलोद्धूता बभ्रमुर्गगनेचराः

viditaṃ vaḥ suparṇasya svāgatasya nṛpottamāḥ | pakṣavegāniloddhūtā babhramurgaganecarāḥ

अर्थ श्लोक 42 के साथ

अध्याय 103

श्लोक 45

समुद्राः क्षुभिताः सर्वे चचालाद्रिर्मही मुहुः ।वयं सर्वे सुसन्त्रस्ताः किमुत्पातेति विक्लवाः

samudrāḥ kṣubhitāḥ sarve cacālādrirmahī muhuḥ | vayaṃ sarve susantrastāḥ kimutpāteti viklavāḥ

हिन्दी अर्थ

सारे समुद्र क्ुब्ध हो उठे थे। पर्वत काँपने लगे थे और धरती भी बार- बार डोलने लगी थी। हम सब यह सोचकर भयभीत एवं व्याकुल हो गये थे कि यह कैसा उत्पात खड़ा हो गया

अध्याय 103

श्लोक 46

यदा सन्नह्य युध्येत आरूढः केशवः खगम् ।कथमस्मद्विधः शक्तः प्रतिस्थातुं रणाजिरे

yadā sannahya yudhyeta ārūḍhaḥ keśavaḥ khagam | kathamasmadvidhaḥ śaktaḥ pratisthātuṃ raṇājire

हिन्दी अर्थ

जब केशव कवच बाँधकर गरुड़की पीठपर आरूढ़ हो युद्ध करेंगे, उस समय हमारे-जैसा पुरुष समराज़णमें कैसे ठहर सकता है

अध्याय 103

श्लोक 47

राज्ञां स्वयंवरो नाम सुमहान् हर्षवर्धनः ।कृतो नरवरैराद्यैर्यशोधर्मस्य वै विधिः

rājñāṃ svayaṃvaro nāma sumahān harṣavardhanaḥ | kṛto naravarairādyairyaśodharmasya vai vidhiḥ

हिन्दी अर्थ

स्वयंवर राजाओंके लिये महान्‌ आनन्दवर्धक उत्सव है। पूर्वकालके श्रेष्ठ नरेशोंने इसे सुयश और धर्मकी सिद्धिके लिये प्रचलित किया था

अध्याय 103

श्लोक 48

इदं तु कुण्डिनगरमासाद्य मनुजेश्वराः ।पुनरेवैष्यते क्षिप्रं महापुरुषविग्रहम्

idaṃ tu kuṇḍinagaramāsādya manujeśvarāḥ | punarevaiṣyate kṣipraṃ mahāpuruṣavigraham

हिन्दी अर्थ

परंतु मनुजेश्वरो! इस कुण्डिनपुरमें आकर हमारे सामने पुन: शीघ्र ही महापुरुषके साथ महान्‌ युद्धका अवसर आना चाहता है

अध्याय 103

श्लोक 49

यदि सा वरयेदन्यं राज्ञां मध्ये नृपात्मजा ।कृष्णस्य भुजयोर्वीर्यं कः पुमान् प्रसहिष्यति

yadi sā varayedanyaṃ rājñāṃ madhye nṛpātmajā | kṛṣṇasya bhujayorvīryaṃ kaḥ pumān prasahiṣyati

हिन्दी अर्थ

यदि राजकुमारी रुक्मिणी राजाओंके बीचमें किसी दूसरे नरेशका वरण कर ले, तब कौन ऐसा पुरुष है—जो श्रीकृष्णकी भुजाओंका पराक्रम सह सकेगा

अध्याय 103

श्लोक 50

विज्ञापितमिदं दोषं स्वयंवरमहोत्सवे ।तदर्थमागतः कृष्णो वयं चैव नराधिपाः

vijñāpitamidaṃ doṣaṃ svayaṃvaramahotsave | tadarthamāgataḥ kṛṣṇo vayaṃ caiva narādhipāḥ

श्लोक 50–51 का हिन्दी अर्थ

इस स्वयंबर-महोत्सवमें यह युद्धकी सम्भावना ही महान्‌ दोष है, जिसे सूचित कर दिया गया। श्रीकृष्ण तथा हम सब नरेश भी स्वयंवरके लिये ही यहाँ पधारे हैं। त्तिमोइध्याय: + ५०७ राजकन्याके उद्देश्यसे श्रीकृष्णका आगमन हम सब नरेशोंके लिये अत्यन्त गर्हित सिद्ध हो रहा है—जैसा कि मगधराजका कथन है

अध्याय 103

श्लोक 51

कृष्णस्यागमनं चैव नृपाणामतिगर्हितम् ।कन्याहेतोर्नरेन्द्राणां यथा वदति मागधः

kṛṣṇasyāgamanaṃ caiva nṛpāṇāmatigarhitam | kanyāhetornarendrāṇāṃ yathā vadati māgadhaḥ

अर्थ श्लोक 50 के साथ

स्रोत: local proofread transcription: Sanskrit shlokas of the Harivamsa (Harivamsha, Vishnu and Bhavishya parvas) from sanskritdocuments.org. One chapter per adhyaya; verse numbers as printed in the source (restarting in each adhyaya). Appendix sections are not included. · प्राप्त 19/10/2026

धर्म ग्रंथ निःशुल्क और विज्ञापन-रहित है। Dharma Granth is free and has no ads. इसे ऐसा बनाए रखने में सहयोग करेंHelp keep it that way → How it is funded

शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पाठ-भेद एवं संशोधनVariants & corrections

पाठ-भेद टिप्पणी (Alternative Reading / Variant Notes):

Collated with BORI Critical Edition of Mahabharata Khilaparvan.