Chandogya Upanishad
99
अध्याय 99 / 154

Adhyāya 99

प्रपाठक खण्ड 99

4 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ4 श्लोक

अध्याय 99

श्लोक 6.2.1

॥ सदेव सोम्येदमग्र आसीदेकमेवाद्वितीयम् ।तद्धैक आहुरसदेवेदमग्र आसीदेकमेवाद्वितीयं तस्मादसतः सज्जायत

|| sadeva somyedamagra āsīdekamevādvitīyam | taddhaika āhurasadevedamagra āsīdekamevādvitīyaṃ tasmādasataḥ sajjāyata

हिन्दी अर्थ

एवमेव खलु-- । ठीक इसी पकार-- ह हे सोम्य मक्षण कयि हुए तेजका जो सूक्ष्म भाग होता वह इकट्ठा होकर उपर मा जाता ष जोर वह वाणी होता है

English

'In the beginning,' my dear, 'there was that only which is (τὸ ὄν), one only, without a second. Others say, in the beginning there was that only which is not (τὸ μὴ ὄν), one only, without a second; and from that which is not, that which is was born.

अध्याय 99

श्लोक 6.2.2

कुतस्तु खलु सोम्यैवँस्यादिति होवाच कथमसतः सज्जायेतेति।सत्त्वेव सोम्येदमग्र आसीदेकमेवाद्वितीयम्

kutastu khalu somyaivam̐syāditi hovāca kathamasataḥ sajjāyeteti| sattveva somyedamagra āsīdekamevādvitīyam

हिन्दी अर्थ

सोम्य तेजसोऽश्यमानस्व है सोम्य मक्षण सि योऽणिजा ष उर्व, समुदीषति तेनका नो सूक्ष्म अश ष बह इकटा कर ऊपर भा नता इस प्रकार है सोम्य मन॒ अन्नमय है, प्राण जलमय है ओर वाणी तेनोमयौ है-रेसा आरणिने कंहा । तब खेतकेतु बोला-- "भगवन्‌ सुञ्े फिर समञ्ादये' इसपर आरुणिने कदा-- हे सोम्य मन अन्नमय है, प्राण जकमय है ओर वाक्‌ तेजोमयो है-द्स प्रकार मेरा यह कथन

English

'But how could it be thus, my dear?' the father continued. 'How could that which is, be born of that which is not? No, my dear, only that which is, was in the beginning, one only, without a second.

अध्याय 99

श्लोक 6.2.3

तदैक्षत बहु स्यां प्रजायेयेति तत्तेजोऽसृजत तत्तेज ऐक्षत बहु स्यां प्रजायेयेति तदपोऽसृजत ।तस्माद्यत्र क्वच शोचति स्वेदते वा पुरुषस्तेजस एव तदध्यापो जायन्ते

tadaikṣata bahu syāṃ prajāyeyeti tattejo'sṛjata tatteja aikṣata bahu syāṃ prajāyeyeti tadapo'sṛjata | tasmādyatra kvaca śocati svedate vā puruṣastejasa eva tadadhyāpo jāyante

हिन्दी अर्थ

षोडशञकलाविधथिष्ट पुरुषका उपदेश दवान्काय॑करणसंधातलक्षणो जीव सर्वस्य कार्यकरणस्य सामथ्यं हे सोम्य । पुरुष सोर्ह कलाभोवारा है । तु प्रह दिन भोजन मत कर, केवर येच्छ जकपान कर्‌ । प्राण॒ ज्म हे; इसलियि जल पीते रहनेसे उसका नाश नदीं होगा

English

'It thought , may I be many, may I grow forth. It sent forth fire . 'That fire thought, may I be many, may I grow forth. It sent forth water . 'And therefore whenever anybody anywhere is hot and perspires, water is produced on him from fire alone.

अध्याय 99

श्लोक 6.2.4

ता आप ऐक्षन्त बह्व्यः स्याम प्रजायेमहीति ता अन्नमसृजन्त तस्माद्यत्र क्व च वर्षति तदेव भूयिष्ठमन्नं भवत्यद्भ्य एव तदध्यन्नाद्यं जायते

tā āpa aikṣanta bahvyaḥ syāma prajāyemahīti tā annamasṛjanta tasmādyatra kva ca varṣati tadeva bhūyiṣṭhamannaṃ bhavatyadbhya eva tadadhyannādyaṃ jāyate

हिन्दी अर्थ

पोडश् कला यस्य पूरुषस्य सोऽयं सोद कल जिस पुरषकी है वह पुष्प सोर कलामाला है । षोडशकलः पुरुषः; एतच्चेसपरतयक्षी वदि तू इस बात भ्रलक्ष करना स॒ह पञ्चदशाहानि ना्ञाथ हैनसुपल्साद कि उसने प्रह दिन भोजन न्ट क्रिया । तत्वात्‌ वह्‌ क: ( जारुणि ) के पात आया जर बोका-- "भगवन्‌ क्या बो ¢ पितने कहा-- है सोभ्य ऋक्, यजुः ओर सामका पाठ करो--

English

'Water thought, may I be many, may I grow forth. It sent forth earth (food). 'Therefore whenever it rains anywhere, most food is then produced. From water alone is eatable food produced.

स्रोत: https://sanskritdocuments.org/doc_upanishhat/chhandogya.itx · प्राप्त 3/6/2026

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शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।