अध्याय 68
श्लोक 4.12.1
॥ अथ हैनमन्वाहार्यपचनोऽनुशशासापो दिशो नक्षत्राणि चन्द्रमा इति य एष चन्द्रमसि पुरुषो दृश्यते सोऽहमस्मि स एवाहमस्मीति
|| atha hainamanvāhāryapacano'nuśaśāsāpo diśo nakṣatrāṇi candramā iti ya eṣa candramasi puruṣo dṛśyate so'hamasmi sa evāhamasmīti
हिन्दी अर्थ
योह संपदं वेद तस्मा नो कोई सम्पदो जानता है अस्म हैवाश्च मानुषाश्च कामाः उसे देव ओर मानुष भग सम्यक् स प्कारसे प्राप्त होते है । अच्छा तो लो आयतनको जानता है वह स्वजाति्योका जायतन ( धर होता है । निरुचय ही मन आयतन हे योह वां आयतनं वेदायतनं जो आयतनको जानता है दह , स्वन्नौका आयतन होता ह अर्थ् ह ती 9 उनका भाश्रय वन जाता है ।
English
Then the Anvâhârya fire taught him: Water, the quarters, the stars, the moon (these are my forms). The person that is seen in the moon, I am he, I am he indeed.