छान्दोग्योपनिषद्

Prapathaka 1 · Khanda 3 — The Sun, the Breaths (Vyana), and the Syllables of Udgithaश्लोक 1.3.2/1217%

Chandogya Upanishad 3.1.3.2

मूल पाठSource scriptureOriginal Sanskritमूल संस्कृत

समान उ एवायं चासौ चोष्णोऽयमुष्णोऽसौ स्वर इतीममाचक्षते स्वर इति प्रत्यास्वर इत्यमुं तस्माद्वा एतमिमममुं चोद्गीथमुपासीत

अर्थMeaning
अनुवादTranslationLiteral Hindi Translationमूल हिन्दी अनुवाद (अक्षरशः)मूलानुवाद · Literal

यह (शरीरस्थ प्राण) और वह (सूर्य) दोनों समान हैं; यह भी उष्ण है और वह भी उष्ण है। इसे स्वर कहते हैं और उसे स्वर तथा प्रत्यास्वर कहते हैं।

अक्षरशः अनुवाद — मूल संस्कृत श्लोक के प्रत्येक पद का प्रत्यक्ष अर्थ।

अनुवादTranslationLiteral English TranslationLiteral Text

This (the breath in the mouth) and that (the sun) are the same. This is hot and that is hot. This they call svara (sound), and that they call pratyâsvara (reflected sound). Therefore let a man meditate on the udgîtha (Om) as this and that (as breath and as sun).

Direct literal rendering preserving Sanskrit philosophical terminology.

व्याख्याVyakhya
संपादकीय व्याख्याEditorial explanationVyakhya (व्याख्या)व्याख्या

भूमा-विद्या के लक्षण को स्पष्ट करते हुए महर्षि सनत्कुमार कहते हैं: "यत्र नान्यत् पश्यति नान्यच्छृणोति नान्यद्विजानाति स भूमा। अथ यत्रान्यत् पश्यत्यन्यच्छृणोत्यन्यद्विजानाति तदल्पम्। यो वै भूमा तदमृतमथ यदल्पं तन्मर्त्यम्।" जहाँ साधक अपने से भिन्न किसी अन्य को नहीं देखता, किसी अन्य को नहीं सुनता, और किसी अन्य को नहीं जानता—वह 'भूमा' (अनंत) है। और जहाँ वह किसी अन्य को देखता है, अन्य को सुनता है, अन्य को जानता है—वह 'अल्प' (सीमित) है। जो भूमा है वह अमृत (अविनाशी) है, और जो अल्प है वह मरणधर्मा (नाशवान) है। नारद इस पर विनम्रतापूर्वक पूछते हैं: "स भगवः कस्मिन् प्रतिष्ठित इति?" (हे भगवान! वह भूमा किस पर प्रतिष्ठित है?)। सनत्कुमार उत्तर देते हैं: "स स्वे महिनि" (वह अपनी ही महिमा में प्रतिष्ठित है, उसे किसी अन्य आधार की आवश्यकता नहीं)।

विज्ञान एवं आधुनिक उपयोगScience & Modern Application
आधुनिक चिंतनModern reflection · not scriptureContemplative Reflection & Actionआधुनिक चिंतन
आधुनिक संदर्भ · Modern Context
मानव समाज का संपूर्ण तनाव, ईर्ष्या, असुरक्षा और संघर्ष 'दूसरे' (The Other) की उपस्थिति से पैदा होता है। जब तक हम संसार को 'मैं बनाम वे', 'मेरा हित बनाम उनका हित', या 'मेरी तुलना में दूसरा कितना आगे है' के चश्मे से देखते हैं, तब तक भय और अशांति से मुक्ति असंभव है। तुलना (Comparison) ही जीवन के आनंद की सबसे बड़ी चोर है। सनत्कुमार का यह सूत्र हमें द्वैत के कारागार से निकालकर अद्वैत के मुक्ति-धाम में ले जाता है। जहाँ कोई 'दूसरा' नहीं है, वहाँ प्रतिस्पर्धा कैसी? वहाँ ईर्ष्या किससे? वहाँ असुरक्षा का क्या स्थान? जब व्यक्ति यह अनुभव करता है कि जो सत्ता मेरे भीतर है, वही सामने वाले में भी प्रकट हो रही है, तो सारा संघर्ष प्रेम और सहकारिता में बदल जाता है। यह बोध जीवन को आंतरिक शांति की सर्वोच्च ऊंचाई पर स्थापित कर देता है।
आज के जीवन में प्रयोग · Practical Application
- **तुलना के जाल से मुक्ति (Freedom from Comparison)**: सोशल मीडिया पर दूसरों की जीवनशैली, उपलब्धियों या धन को देखकर स्वयं को हीन या श्रेष्ठ समझने की आदत छोड़ें; स्मरण करें कि बाह्य तुलना केवल 'अल्प' का खेल है। - **अद्वैत अवलोकन का अभ्यास (Non-Dual Perception)**: जब भी किसी सहकर्मी या संबंधी से विरोध का भाव जगे, तो एक क्षण रुककर विचार करें—"यदि हम दोनों एक ही चैतन्य सत्ता के रूप हैं, तो यह शत्रुता किसके विरुद्ध है?" - **आत्म-प्रतिष्ठा का विकास (Resting in Your True Glory)**: अपनी गरिमा और आत्म-मूल्य के लिए दूसरों के अनुमोदन, तालियों या प्रमाण-पत्रों पर निर्भर रहना बंद करें; 'स्वे महिनि' की तरह अपनी आंतरिक दिव्यता में प्रतिष्ठित होना सीखें।
चिंतन प्रश्न · Self-Reflection

“क्या आप हर समय दूसरों से अपनी तुलना करके अपनी शांति खो रहे हैं, या उस अद्वैत बोध की ओर कदम बढ़ाना चाहते हैं जहाँ कोई दूसरा है ही नहीं?”

शोध संदर्भResearch context · not scriptureComparative Research Noteशोध टिप्पणी

संज्ञानात्मक न्यूरोसाइंस (Cognitive Neuroscience) में 'फ्लो स्टेट' (Flow State - Csikszentmihalyi) और अद्वैत अनुभवात्मक अवस्थाओं (Non-Dual Awareness) पर हुए शोध दर्शाते हैं कि जब विषय (Subject) और विषय-वस्तु (Object) के बीच का कृत्रिम द्वैत समाप्त हो जाता है, तो मस्तिष्क में आत्म-संशय, समय का तनाव और भय उत्पन्न करने वाले क्षेत्र शांत हो जाते हैं। जब 'दूसरा' (The Other) का बोध ही नहीं रहता, तो भय का कोई कारण शेष नहीं बचता—जैसा कि उपनिषद कहते हैं: "द्वितीयाद्वै भयं भवति" (भय सदा दूसरे से ही उत्पन्न होता है)।

A modern parallel offered for reflection. It is not part of the scripture, and it has not been checked against the original sources it may allude to.

स्रोतSources and editionSources and editionस्रोत एवं संस्करण

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Sanskrit edition
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Last updated
2026-10-24
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श्लोक सम्बन्ध एवं पार-ग्रंथ संदर्भ

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Chandogya Upanishad 3.1.3.2Current VerseBhagavadBhagavad Gita Bh…BhagavadBhagavad Gita Bh…
🟣Cross-Scriptural Linkपार-ग्रंथ सम्बन्ध (गीता ↔ उपनिषद् ↔ रामायण)

Bhagavad Gita 8.13

Bhagavad Gita (श्रीमद्भगवद्गीता)

Sanskrit Text (मूल श्लोक / मंत्र)

ओमित्येकाक्षरं ब्रह्म व्याहरन्मामनुस्मरन्

Translation / Meaning (भावार्थ)

Uttering the single syllable Om, the sound of Brahman, and remembering Me — one who departs leaving the body attains the supreme goal.

Why This is Connected (सम्बन्ध का आधार)

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आगे क्या · What next