Chandogya Upanishad
26
अध्याय 26 / 154

Adhyāya 26

प्रपाठक खण्ड 26

2 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ2 श्लोक

अध्याय 26

श्लोक 2.13.1

॥ उपमन्त्रयते स हिंकारो ज्ञपयते स प्रस्तावः स्त्रिया सह शेते स उद्गीथः प्रति स्त्रीं सह शेते स प्रतिहारः कालं गच्छति तन्निधनं पारं गच्छति तन्निधनमेतद्वामदेव्यं मिथुने प्रोतम्

|| upamantrayate sa hiṃkāro jñapayate sa prastāvaḥ striyā saha śete sa udgīthaḥ prati strīṃ saha śete sa pratihāraḥ kālaṃ gacchati tannidhanaṃ pāraṃ gacchati tannidhanametadvāmadevyaṃ mithune protam

हिन्दी अर्थ

पृथिवो हिकारोऽन्तरिक्षं भस्तावो योरु्रीथो दिशः प्रतिहारः समुद्रो निधनमेताः शक्यो छोकेषु घोताः एथिवी दकार है, अन्तरिक्ष प्रस्ताव है, धुरोक उद्गीथ है, दिशा तिहार दे ओर समुद्र निषन है-यह्‌ शकरी्ाम लोकम जनुस्यूतहै पृथिवी दकार इत्यादि पू- थिवी हिंकार” इत्यदि शतिक बत्‌ । शक्यं इति नित्यं बहु- अथ पूववत्‌ है । रेव” इस पदके समान शक्यः, यह पद्‌ सर्वदा

English

He whom one invites to sing, is the Hiṅkâra; he whom one informs, is the Prastâva; he who lies down with his wife, is the Udgîtha; he who lies down again with his wife, is the Pratihâra; he who approaches his time, that is the Nidhana; he who goes beyond, that is the Nidhana. This is the Vâmadevya Sâman, as interwoven in generation.

अध्याय 26

श्लोक 2.13.2

स य एवमेतद्वामदेव्यं मिथुने प्रोतं वेद मिथुनी भवति मिथुनान्मिथुनात्प्रजायते सर्वमायुरेति ज्योग्जीवति महान्प्रजया पशुभिर्भवति महान्कीर्त्या न कांचन परिहरेत्तद्व्रतम्

sa ya evametadvāmadevyaṃ mithune protaṃ veda mithunī bhavati mithunānmithunātprajāyate sarvamāyureti jyogjīvati mahānprajayā paśubhirbhavati mahānkīrtyā na kāṃcana pariharettadvratam

हिन्दी अर्थ

स य एवमेताः शक्यो छोकेषु पोता वेद लोकी भवति सवंमायुरेति ज्योग्जीवति महान्प्रजया पशुभि- भवति महान्की्या लोकान्न निन्देत्तद््तम्‌ -वह पुरुष, जो इस पकार इस ॒शकरीसामको रोको अनुस्यूत जानता हे, कोकवान्‌ होता द, वह सम्पूण आक प्रप्त होता है । ञ्ज्व जीवन व्यतीत करता है । प्रजा ओर पडुओकि कारण महान्‌ लोकी मवति रोकफलेन रोकी होता है अर्थात्‌ लोक- युज्यत इत्यथः । लोकान सम्बन्धी 1 1 दत है।

English

He who thus knows this Vâmadevya, as interwoven in generation, becomes one of a couple; he is born from couples, from couples; he reaches the full life, he lives long, becomes great with children and cattle, great by fame. His rule is, 'He shall not turn away any woman.'

स्रोत: https://sanskritdocuments.org/doc_upanishhat/chhandogya.itx · प्राप्त 3/6/2026

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शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।