Chandogya Upanishad
127
अध्याय 127 / 154

Adhyāya 127

प्रपाठक खण्ड 127

2 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ2 श्लोक

अध्याय 127

श्लोक 7.14.1

॥ आशा वाव स्मराद्भूयस्याशेद्धो वै स्मरो मन्त्रानधीते कर्माणि कुरुते पुत्राँश्च पशूँश्चेच्छत इमं च लोकममुं चेच्छत आशामुपास्स्वेति

|| āśā vāva smarādbhūyasyāśeddho vai smaro mantrānadhīte karmāṇi kurute putrām̐śca paśūm̐ścecchata imaṃ ca lokamamuṃ cecchata āśāmupāssveti

हिन्दी अर्थ

घनलछुमार-- “जिख॒ समय मनुष्य मनन करता है तभी वह किरोषरूपसे जानता है; बिना मनन क्य कोद नदी जानता, णप्तु मनन करनेपर्‌ ही जानता है । अतः मतिकरी दी विरोषरूपसे जिजञाघा . यदा बै भुत इति । सति- जिस समय मन करता है तक्--मन्तन्य विषयके प्रति भाद्र।

English

'Hope (âsâ) is better than memory. Fired by hope does memory read the sacred hymns, perform sacrifices, desire sons and cattle, desire this world and the other. Meditate on hope.

अध्याय 127

श्लोक 7.14.2

स य आशां ब्रह्मेत्युपास्त आशयास्य सर्वे कामाः समृध्यन्त्यमोघा हास्याशिषो भवन्ति यावदाशाया गतं तत्रास्य यथाकामचारो भवति य आशां ब्रह्मेत्युपास्तेऽस्ति भगव आशाया भूय इत्याशाया वाव भूयोऽस्तीति तन्मे भगवान्ब्रवीत्विति

sa ya āśāṃ brahmetyupāsta āśayāsya sarve kāmāḥ samṛdhyantyamoghā hāsyāśiṣo bhavanti yāvadāśāyā gataṃ tatrāsya yathākāmacāro bhavati ya āśāṃ brahmetyupāste'sti bhagava āśāyā bhūya ityāśāyā vāva bhūyo'stīti tanme bhagavānbravītviti

हिन्दी अर्थ

सनक्कृमार-- “निस समय मनुष्य श्रद्धा रता है पमौ वह मनन करता है; बिना द्धा कयि कोई मनन नहीं करता । णपितु श्द करनेवाला ही मनन करता है । अतः श्रद्धाको दी विललेषरूपसे जिज्ञप्ा सन्कुमार-- निष समय पुरपक निष्ठा होती है तभी वह शरद्धा करता षै; विना निष्ठके कोई श्रद्धा नही कता) भपितु निष्ठा करनेवाखा ही श्रद्धा छता है । मतः निषठाको दी विशेषरूपे

English

'He who meditates on hope as Brahman, all his desires are fulfilled by hope, his prayers are not in vain; he is, as it were, lord and master as far as hope reaches--he who meditates on hope as Brahman.' 'Sir, is there something better than hope?' 'Yes, there is something better than hope.' 'Sir, tell it me.' Next: VII, 15 Sacred Texts | Hinduism

स्रोत: https://sanskritdocuments.org/doc_upanishhat/chhandogya.itx · प्राप्त 3/6/2026

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शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।