Chandogya Upanishad
126
अध्याय 126 / 154

Adhyāya 126

प्रपाठक खण्ड 126

2 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ2 श्लोक

अध्याय 126

श्लोक 7.13.1

॥ स्मरो वावाकाशाद्भूयस्तस्माद्यद्यपि बहव आसीरन्न स्मरन्तो नैव ते कंचन शृणुयुर्न मन्वीरन्न विजानीरन्यदा वाव ते स्मरेयुरथ शृणुयुरथ मन्वीरन्नथ विजानीरन्स्मरेण वै पुत्रान्विजानाति स्मरेण पशून्स्मरमुपास्स्वेति

|| smaro vāvākāśādbhūyastasmādyadyapi bahava āsīranna smaranto naiva te kaṃcana śṛṇuyurna manvīranna vijānīranyadā vāva te smareyuratha śṛṇuyuratha manvīrannatha vijānīransmareṇa vai putrānvijānāti smareṇa paśūnsmaramupāssveti

हिन्दी अर्थ

ब्रह्मादिस्तम्बपयंन्तस्य हि जगतः सत्य ह्ली जानने योग्य है नृतब्रह्मविज्ञानेन परितुष्टमकृताथं सनक्कमार-- जो सत्य ८ परमां सत्य भात्माके विज्ञान ) के कारण अतिवदन करता है वदी निश्चय अतिवदन करता है । नारद- भगवन्‌ य तो परमां सव्य विज्ञानके कारण ही अति- जिस समय पुरुष सत्यको विकेषरूपसे जानता है तभी वह स बोरुता है, बिना जाने सत्य नहीं बोरुता; अपितु विरोषषूपसे जानने- वाखा ही सत्यका फथन करता है । अतः विज्ञानकी ही विशेषषूपसे

English

'Memory (smara) is better than ether. Therefore where many are assembled together, if they have no memory, they would hear no one, they would not perceive, they would not understand. Through memory we know our sons, through memory our cattle. Meditate on memory.

अध्याय 126

श्लोक 7.13.2

स यः स्मरं ब्रह्मेत्युपास्ते यावत्स्मरस्य गतं तत्रास्य यथाकामचारो भवति यः स्मरं ब्रह्मेत्युपास्तेऽस्ति भगवः स्मराद्भूय इति स्मराद्वाव भूयोऽस्तीति तन्मे भगवान्ब्रवीत्विति

sa yaḥ smaraṃ brahmetyupāste yāvatsmarasya gataṃ tatrāsya yathākāmacāro bhavati yaḥ smaraṃ brahmetyupāste'sti bhagavaḥ smarādbhūya iti smarādvāva bhūyo'stīti tanme bhagavānbravītviti

हिन्दी अर्थ

यदा बै सत्यं परमाथतो जिस समय पष सको विजानाति । शदं परमाथत परमार्थतः जानता दे, अर्थात्‌ ह परमार्थतः सत्य है" एेता जानता है द अष्टम लण्डके प्रथम मन्त्रमे है परन्तु वर्श उस का तास्पयं केवल न्तम भी आया है । परन्व॒ याखलान है ओर यहाँ विशेष जान अर्थात्‌ वास्तविक शान ६।

English

'He who meditates on memory as Brahman, is, as it were, lord and master as far as memory reaches;--he who meditates on memory as Brahman.' 'Sir, is there something better than memory?' 'Yes, there is something better than memory.' 'Sir, tell it me.'

स्रोत: https://sanskritdocuments.org/doc_upanishhat/chhandogya.itx · प्राप्त 3/6/2026

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शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।