Chandogya Upanishad
113
अध्याय 113 / 154

Adhyāya 113

प्रपाठक खण्ड 113

3 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ3 श्लोक

अध्याय 113

श्लोक 6.16.1

॥ पुरुषँ सोम्योत हस्तगृहीतमानयन्त्यपहार्षीत्स्तेयमकार्षीत्परशुमस्मै तपतेति स यदि तस्य कर्ता भवति तत एवानृतमात्मानं कुरुते सोऽनृताभिसंधोऽनृतेनात्मानमन्तर्धाय परशुं तप्तं प्रतिगृह्णाति स दह्यतेऽथ हन्यते

|| puruṣam̐ somyota hastagṛhītamānayantyapahārṣītsteyamakārṣītparaśumasmai tapateti sa yadi tasya kartā bhavati tata evānṛtamātmānaṃ kurute so'nṛtābhisaṃdho'nṛtenātmānamantardhāya paraśuṃ taptaṃ pratigṛhṇāti sa dahyate'tha hanyate

हिन्दी अर्थ

स यः संकल्पं ब्रह्मसयुपास्ते क्टृत्ान्‌ बै स खोकान्धुवान््रुवः प्रतिष्ठितान्‌ परतिष्ठितोऽग्यथमानान यथाकामचारो भवति यः संकःपं ब्रह्मेतयुपास्तेऽस्ति वह ज कि संकस्पश्टौ "यह त्रम है" इस प्रकार उपाघ्तना करता हे विघाताक्े रचे हुए भरुवरोकोको स्वयं रुव होकर, प्रतिष्ठित लोकौको स्वयं प्रतिष्ठित होकर तथा व्यथा न पनेवाछे रोनोको स्वयं स यः संकल्पं ब्रह्मेति बह्म- वह नो किं संकट्पकौ नह 2 अर्थात्‌ ऋ्षुद्धिसे उद्भासते कलप्तन्‌ वै भावरा- उतना करत ह बलद

English

'My child, they bring a man hither whom they have taken by the hand, and they say: "He has taken something, he has committed a theft." (When he denies, they say), "Heat the hatchet for him." If he committed the theft, then he makes himself to be what he is not. Then the false-minded, having covered his true Self by a falsehood, grasps the heated hatchet--he is burnt, and he is killed.

अध्याय 113

श्लोक 6.16.2

अथ यदि तस्याकर्ता भवति ततेव सत्यमात्मानं कुरुते स सत्याभिसन्धः सत्येनात्मानमन्तर्धाय परशुं तप्तं प्रतिगृह्णाति सन दह्यतेऽथ मुच्यते

atha yadi tasyākartā bhavati tateva satyamātmānaṃ kurute sa satyābhisandhaḥ satyenātmānamantardhāya paraśuṃ taptaṃ pratigṛhṇāti sana dahyate'tha mucyate

हिन्दी अर्थ

संकल्पकौ अपेक्षा चित्तकी प्रधानता यति नाम्नि मन्त्रा एकं भवन्ति मन्त्रेषु कर्माणि चित्त ही संकस्पसे उच्ृष्ट है । जिस समय पुरुष चेतनावान्‌ होता हे तभी वह सङ्कल्प करता है, फिर मनन करता दे, तलश्चात्‌ वाणीको रित करता है, उसे नाममे प्रवृत्त करता है । नाममे मन्त्र एकप होते

English

'But if he did not commit the theft, then he makes himself to be what he is. Then the true-minded, having covered his true Self by truth, grasps the heated hatchet--he is not burnt, and he is delivered. 'As that (truthful) man is not burnt, thus has all that exists its self in That. It is the True. It is the Self, and thou, O Svetaketu, art it.' He understood what he said, yea, he understood it.

अध्याय 113

श्लोक 6.16.3

स यथा तत्र नादाह्येतैतदात्म्यमिदँ सर्वं तत्सत्यँ स आत्मा तत्त्वमसि श्वेतकेतो इति तद्धास्य विजज्ञाविति विजज्ञाविति

sa yathā tatra nādāhyetaitadātmyamidam̐ sarvaṃ tatsatyam̐ sa ātmā tattvamasi śvetaketo iti taddhāsya vijajñāviti vijajñāviti

हिन्दी अर्थ

चित्तं चेतयितसवं प्राप्कालानु- कारके अनुरूप बोधयुक्त दोन 144 प्रयोजनका निरूपण करनेमे समध प्रयोजननिरपणसामर्थ्यं च तत्‌ होना--यह स्फी भष ध तानि ह वा एतानि चित्तेकायनानि चित्तात्मानि एवोत शुशरषन्ते चित्तदयवेषामेकायनं चित्तमारमा तथा चित्तम ही प्रतिष्ठित है । इसीसे ययपि कोई मनुष्य बहुज्ञ भी हो तो भी यदि वह भवित्त होता है तो रोग कहने र्गते है किं "यह तो कुक भी नहीं है, यदि यह कुछ जानता अथवा विद्वान्‌ होता तो रेस्ा अचित्त

English

'As that (truthful) man is not burnt, thus has all that exists its self in That. It is the True. It is the Self, and thou, O Śvetaketu, art it.' He understood what he said, yea, he understood it.

स्रोत: https://sanskritdocuments.org/doc_upanishhat/chhandogya.itx · प्राप्त 3/6/2026

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शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।