Chandogya Upanishad
112
अध्याय 112 / 154

Adhyāya 112

प्रपाठक खण्ड 112

3 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ3 श्लोक

अध्याय 112

श्लोक 6.15.1

॥ पुरुषँ सोम्योतोपतापिनं ज्ञातयः पर्युपासते जानासि मां जानासि मामिति तस्य यावन्न वाङ्मनसि सम्पद्यते मनः प्राणे प्राणस्तेजसि तेजः परस्यां देवतायां तावज्जानाति

|| puruṣam̐ somyotopatāpinaṃ jñātayaḥ paryupāsate jānāsi māṃ jānāsi māmiti tasya yāvanna vāṅmanasi sampadyate manaḥ prāṇe prāṇastejasi tejaḥ parasyāṃ devatāyāṃ tāvajjānāti

हिन्दी अर्थ

स यो मनो ब्रह्मस्युपास्ते यावन्मनसो गतं तत्रास्य यथाकामचारो भवति यो मनो बरहमस्युपास्तेऽस्ति वह जो किं मनकी यह ब्रह है" इ प्रकार उपाघना कता ट उसको जहांतक मनकी गति है वहोतकं स्वेच्छागति हो जाती है, मनकी “वंह ब्रह है' देसी उपासना. करता है । नारद-- "भगव,

English

'If a man is ill, his relatives assemble round him and ask: "Dost thou know me? Dost thou know me?" Now as long as his speech is not merged in his mind, his mind in breath, breath in heat (fire), heat in the Highest Being (devatâ), he knows them.

अध्याय 112

श्लोक 6.15.2

अथ यदास्य वाङ्मनसि सम्पद्यते मनः प्राणे प्राणस्तेजसि तेजः परस्यां देवतायामथ न जानाति

atha yadāsya vāṅmanasi sampadyate manaḥ prāṇe prāṇastejasi tejaḥ parasyāṃ devatāyāmatha na jānāti

हिन्दी अर्थ

संकल्प ही मनसे बढ़कर ह । निस समय पुरूष संकरप करता हे तभी बह मन्यन ८ बोरनेकी इच्छा ) करता है ओर फिर वाणी परित करता । वह उसे नामके प्रति प्रवृत्त करता है; नाममे सब मन्त्र संकल्पो वाव मनसो भूयान्‌ । संक ही मनते वद़कर दे । संकन्पोऽपि मनस्यनवदन्तःकर- गन अन्तःकरणङी वृत्ति ही है, यानी तानि ह वा एतानि संकश्पेकायनानि संकरपात्म- कानि संकष्पे प्रतिष्ठितानि समव्छपतां दावाएथिवी समकस्पेतां वायुश्चाकाशं च समकस्पन्तापश्च तेजश्च

English

'But when his speech is merged in his mind, his mind in breath, breath in heat (fire), heat in the Highest Being, then he knows them not. 'That which is the subtile essence, in it all that exists has its self. It is the True. It is the Self, and thou, O Svetaketu, art it.' 'Please, Sir, inform me still more,' said the son.' 'Be it so, my child,' the father replied.

अध्याय 112

श्लोक 6.15.3

स य एषोऽणिमैतदात्म्यमिदँ सर्वं तत् सत्यँ स आत्मा तत्त्वमसि श्वेतकेतो इति भूय एव मा भगवान्विज्ञापयत्विति तथा सोम्येति होवाच

sa ya eṣo'ṇimaitadātmyamidam̐ sarvaṃ tat satyam̐ sa ātmā tattvamasi śvetaketo iti bhūya eva mā bhagavānvijñāpayatviti tathā somyeti hovāca

हिन्दी अर्थ

वे ये ( मन भादि ) एकान्न संकट्पशूप लग्ने, संकृरपमय भौर संकल्पम दी प्रतिष्ठित है । धुरोकं ओर पृथिवीन माने संकट्प क्षिया हे । वायु जोर जाकाशाने संकल्प फिया है; नर ओर तेजने संकल्प क्रिया आदीनि संकल्पेकायनानि है--संकस्प ही है एक अयन- संकल्प एकोऽयनं गमनं प्रयो गमन अत पस्यस्थान नित येषां तानि संकल्पैकायनानि । पस संक्यकायन है । वे उपप

English

'That which is the subtile essence, in it all that exists has its self. It is the True. It is the Self, and thou, O Śvetaketu, art it.'

स्रोत: https://sanskritdocuments.org/doc_upanishhat/chhandogya.itx · प्राप्त 3/6/2026

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शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।