Chandogya Upanishad
107
अध्याय 107 / 154

Adhyāya 107

प्रपाठक खण्ड 107

3 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ3 श्लोक

अध्याय 107

श्लोक 6.10.1

॥ इमाः सोम्य नद्यः पुरस्तात्प्राच्यः स्यन्दन्ते पश्चात्प्रतीच्यस्ताः समुद्रात्समुद्रमेवापियन्ति स समुद्र एव भवति ता यथा तत्र न विदुरियमहमस्मीयमहमस्मीति

|| imāḥ somya nadyaḥ purastātprācyaḥ syandante paścātpratīcyastāḥ samudrātsamudramevāpiyanti sa samudra eva bhavati tā yathā tatra na viduriyamahamasmīyamahamasmīti

हिन्दी अर्थ

फिर जिस समय उसकी वाणी मनम रन्‌ ध जाती ह तथा मन प्रणमे, पराण तेन जोर तेजन परदेवतामे लीन हो जाता है तब वह नहीं परस्यां देवतायां तेजसि सम्प- परदेवतां तेजके रीन हो जने- न्नेञ्थन जानाति । पर फिर यह नहीं पह चानता । कितु सत्सम्पततिक्रमः जो अविद्वान्‌ होता है वद तो सते आत्मा तत्वमसि उवेतकेतो इति भूय एव मा भगवा

English

'These rivers, my son, run, the eastern (like the Gangâ) toward the east, the western (like the Sindhu) toward the west. They go from sea to sea (i. e. the clouds lift up the water from the sea to the sky, and send it back as rain to the sea). They become indeed sea. And as those rivers, when they are in the sea, do not know, I am this or that river,

अध्याय 107

श्लोक 6.10.2

एवमेव खलु सोम्येमाः सर्वाः प्रजाः सत आगम्य न विदुः सत आगच्छामह इति त इह व्याघ्रो वा सिँहो वा वृको वा वराहो वा कीटो वा पतङ्गो वा दँशो वा मशको वा यद्यद्भवन्ति तदाभवन्ति

evameva khalu somyemāḥ sarvāḥ prajāḥ sata āgamya na viduḥ sata āgacchāmaha iti ta iha vyāghro vā sim̐ho vā vṛko vā varāho vā kīṭo vā pataṅgo vā dam̐śo vā maśako vā yadyadbhavanti tadābhavanti

हिन्दी अर्थ

वह जो यह अणिमा है एतद्रप ही यह सव है । वह सघ है, आसा है ओर दे श्वेतकेतो वही तू है । आरणिके इष प्रक कहनपर्‌ सेतकेतु बोला-- “भगवन्‌ सञ्च फिर समक्ञाद्ये ॥ न्ति कामाः” इत्याद्याथर्वणे त्यत्र कारणं दृष्टन्तेन भूय एव “स य” इत्यादि श्रुतिकरा अथ

English

'In the same manner, my son, all these creatures, when they have come back from the True, know not that they have come back from the True. Whatever these creatures are here, whether a lion, or a wolf, or a boar, or a worm, or a midge, or a gnat, or a musquito, that they become again and again.

अध्याय 107

श्लोक 6.10.3

स य एषोऽणिमैतदात्म्यमिदँ सर्वं तत्सत्यँ स आत्मा तत्त्वमसि श्वेतकेतो इति भूय एव मा भगवान्विज्ञापयत्विति तथा सोम्येति होवाच

sa ya eṣo'ṇimaitadātmyamidam̐ sarvaṃ tatsatyam̐ sa ātmā tattvamasi śvetaketo iti bhūya eva mā bhagavānvijñāpayatviti tathā somyeti hovāca

हिन्दी अर्थ

चोरके तप्त परशु घहणके दष्टान्तद्रारा उपदेश्च मकार्षीप्परशुमस्मे तपतेति स यदि तस्थ कर्ता भवति तत एवाचतमाल्ानं करते सोऽकताभिक्षन्धोऽनृते. है जोर कहते है “इसने धनकां भपहरण किया है, चोरी की है , इषके ल्यि परञ्च तपाभो ।' वह यदि उसका (चोरीका) करनेवास हेता , हे तो अपनेको मिथ्यावादी प्रमाणित करता है । वह मिथ्यामिनिवेशवाल सोम्य पुरुषं चोयंकरमणि सं- हे सोम्य निस पृरषके विषय चोरी करनेका संदेह शेत ट

English

'That which is that subtile essence, in it all that exists has its self. It is the True. It is the Self, and thou, O Svetaketu, art it.' 'Please, Sir, inform me still more,' said the son. 'Be it so, my child,' the father replied.

स्रोत: https://sanskritdocuments.org/doc_upanishhat/chhandogya.itx · प्राप्त 3/6/2026

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शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।