Chandogya Upanishad
106
अध्याय 106 / 154

Adhyāya 106

प्रपाठक खण्ड 106

4 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ4 श्लोक

अध्याय 106

श्लोक 6.9.1

॥ यथा सोम्य मधु मधुकृतो निस्तिष्ठन्ति नानात्ययानां वृक्षाणाँरसान्समवहारमेकताँरसं गमयन्ति

|| yathā somya madhu madhukṛto nistiṣṭhanti nānātyayānāṃ vṛkṣāṇām̐rasānsamavahāramekatām̐rasaṃ gamayanti

हिन्दी अर्थ

उस पुरुषके बन्धनको खोखकर जैसे कोर कहे कि “गान्धार देश इस दिशामे हे, अतः इसी दिशाको जा, तो वह बुद्धिमान्‌ ओर समदा पुरुष एक प्रामसे दूसरा ग्राम पूता हआ गान्धारे ही पर्व तस्य यथामिनहनं यथा बन्धनं उस ॒पुरुषके अभिनदन-- अष्ुच्य मुक्त्वा कारुणिकः बन्धनको खोलकर निस प्रकार कंविदेतां दिशणत्तरतो गन्धारा को कृपा पुरुष कदे क इस कर्मोक्रा फरोपभोग॒ अवदय होना हे इसलिये छोदे हुए वाणक्रे समान “उसे सत्री प्रा्िमे तभीतक्र

English

'As the bees , my son, make honey by collecting the juices of distant trees, and reduce the juice into one form,

अध्याय 106

श्लोक 6.9.2

ते यथा तत्र न विवेकं लभन्तेऽमुष्याहं वृक्षस्य रसोऽस्म्यमुष्याहं वृक्षस्य रसोऽस्मीत्येवमेव खलु सोम्येमाः सर्वाः प्रजाः सति सम्पद्य न विदुः सति सम्पद्यामह इति

te yathā tatra na vivekaṃ labhante'muṣyāhaṃ vṛkṣasya raso'smyamuṣyāhaṃ vṛkṣasya raso'smītyevameva khalu somyemāḥ sarvāḥ prajāḥ sati sampadya na viduḥ sati sampadyāmaha iti

हिन्दी अर्थ

आत्मा तच्छमसि खेतकेतो इति भूय एव मा भग वह जो यह अणिमा है एतद्रूप दी यहं सव है । वह सव्य है, वह आसमा है ओर है खेतकेतो । वही तु है । आरुणिके इस रकार कृहनेपर उवेतकेतु बोा-- भगवन्‌ सुञ्षे एर समञ्ञादये ॥ तव

English

'And as these juices have no discrimination, so that they might say, I am the juice of this tree or that, in the same manner, my son, all these creatures, when they have become merged in the True (either in deep sleep or in death), know not that they are merged in the True.

अध्याय 106

श्लोक 6.9.3

त इह व्यघ्रो वा सिँहो वा वृको वा वराहो वा कीटो वा पतङ्गो वा दँशो वा मशको वा यद्यद्भवन्ति तदाभवन्ति

ta iha vyaghro vā sim̐ho vā vṛko vā varāho vā kīṭo vā pataṅgo vā dam̐śo vā maśako vā yadyadbhavanti tadābhavanti

हिन्दी अर्थ

चा्यवान्विद्ान्येन करमेण सस्स- (स यः इत्यादि मनका अर्थ पटे कहा जा चुका है । ह भगवन्‌ ! आचार्यवान्‌ विद्वान्‌ जिस॒क्मसे हे सोम्य ज्वरादिसे संतप्त मुम्‌ ष पुरषको चारौ भरसे वेरकर उसके बान्धवगण पूछा करते है क्या तु भुञ्े जानता है ! क्या त्‌ मुञ्चे पटहचानता है ® जवतक उसकी वाणी मनमे लोन नहीं होती

English

'Whatever these creatures are here, whether a lion, or a wolf, or a boar, or a worm, or a midge, or a gnat, or a musquito, that they become again and again.

अध्याय 106

श्लोक 6.9.4

स य एषोऽणिमैतदात्म्यमिदँ सर्वं तत्सत्यँ स आत्मा तत्त्वमसि श्वेतकेतो इति भूय एव मा भगवान्विज्ञापयत्विति तथा सोम्येति होवाच

sa ya eṣo'ṇimaitadātmyamidam̐ sarvaṃ tatsatyam̐ sa ātmā tattvamasi śvetaketo iti bhūya eva mā bhagavānvijñāpayatviti tathā somyeti hovāca

हिन्दी अर्थ

पुरुषं है सोम्योतोपतापिनं है सोम्य उपतापी--ज्वरादि- ञ्वराद्युपतापवन्तं ज्ञातयो बा- से ; अव्यन्त॒संतघ्त 4 ११ न्धा ज्ञातिजन-वान्धवगण धेरकर्‌ च्ड १५ शाङ्करभाष्यं ६९५ संसारिणो यो मरणक्रमः स । संघारी जीवका जो मरणक्रम ४. १ ह वही विदरानूकी सत्सम्पत्तिका करम

English

'Now that which is that subtile essence, in it all that exists has its self. It is the True. It is the Self, and thou, O Svetaketu, art it.' 'Please, Sir, inform me still more,' said the son. 'Be it so, my child,' the father replied.

स्रोत: https://sanskritdocuments.org/doc_upanishhat/chhandogya.itx · प्राप्त 3/6/2026

धर्म ग्रंथ निःशुल्क और विज्ञापन-रहित है। Dharma Granth is free and has no ads. इसे ऐसा बनाए रखने में सहयोग करेंHelp keep it that way → How it is funded

शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।