Chandogya Upanishad
101
अध्याय 101 / 154

Adhyāya 101

प्रपाठक खण्ड 101

7 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ7 श्लोक

अध्याय 101

श्लोक 6.4.1

॥ यदग्ने रोहितँरूपं तेजसस्तद्रूपं यच्छुक्लं तदपां यत्कृष्णं तदन्नस्यापागादग्नेरग्नित्वं वाचारम्भणं विकारो नामधेयं त्रीणि रूपाणीत्येव सत्यम्

|| yadagne rohitam̐rūpaṃ tejasastadrūpaṃ yacchuklaṃ tadapāṃ yatkṛṣṇaṃ tadannasyāpāgādagneragnitvaṃ vācārambhaṇaṃ vikāro nāmadheyaṃ trīṇi rūpāṇītyeva satyam

हिन्दी अर्थ

एवं सोम्य ते पोडशानामन्न- ₹सी भकार है सोभ्य । कलानां सामथ्य॑रूपाणामेका तेरी सामथ्येलपा अत्रक सोह पश्चदशाषान्यथक्तवत एकेके- घुषृपिकालमें जीवकी स्थितिका उपदेश्च यस्मिन्मनसि जीवेनात्म- जीवो मननदशेनश्रबणादिव्यव-

English

'The red colour of burning fire (agni) is the colour of fire, the white colour of fire is the colour of water, the black colour of fire the colour of earth. Thus vanishes what we call fire, as a mere variety, being a name, arising from speech. What is true (satya) are the three colours (or forms).

अध्याय 101

श्लोक 6.4.2

यदादित्यस्य रोहितँरूपं तेजसस्तद्रूपं यच्छुक्लं तदपां यत्कृष्णं तदन्नस्यापागादादित्यादादित्यत्वं वाचारम्भणं विकारो नामधेयं त्रीणि रूपाणीत्येव सत्यम्

yadādityasya rohitam̐rūpaṃ tejasastadrūpaṃ yacchuklaṃ tadapāṃ yatkṛṣṇaṃ tadannasyāpāgādādityādādityatvaṃ vācārambhaṇaṃ vikāro nāmadheyaṃ trīṇi rūpāṇītyeva satyam

हिन्दी अर्थ

उदालकके नामसे प्रसिद्ध अरुणके पुतन अपने तर उवेतकेतसे कटा- ८हे सोम्य तु पेरेदयारा स्वरान्त ( सुषुप्ति अथवा स्वप्नके स्वरूप ) को विरेषरूपसे समश्च ठे; जिस अवस्थामं यह पुरुष सोता है" एसा कहा उदालको ह किलारूणिः उदारक नामसे प्रसिद्ध अरुणके व पत्रने अपने पुत्र शवेतकेतुसे कदा- रवेतकेतुं पत्रठवाचोक्तवान्‌-- स्वमान्त--सवपनका। मध्य, श्वपन सब भोर उहकर थक जनेपर" इत्यादि श्रुतिसे भी सिद्ध होती है।

English

'The red colour of the sun (âditya) is the colour of fire, the white of water, the black of earth. Thus vanishes what we call the sun, as a mere variety, being a name, arising from speech. What is true are the three colours.

अध्याय 101

श्लोक 6.4.3

यच्छन्द्रमसो रोहितँरूपं तेजसस्तद्रूपं यच्छुक्लं तदपां यत्कृष्णं तदन्नस्यापागाच्चन्द्राच्चन्द्रत्वं वाचारम्भणं विकारो नामधेयं त्रीणि रूपाणीत्येव सत्यम्

yacchandramaso rohitam̐rūpaṃ tejasastadrūpaṃ yacchuklaṃ tadapāṃ yatkṛṣṇaṃ tadannasyāpāgāccandrāccandratvaṃ vācārambhaṇaṃ vikāro nāmadheyaṃ trīṇi rūpāṇītyeva satyam

हिन्दी अर्थ

तत्रायं दृष्टान्तो यथोक्तेऽथे-- उस उपयुक्त अर्थम यह द्टन्त निप प्रकार डोरीमे वेषा हुभा पक्षी दिशा-विदिशाभोमि उद़कर अन्यत्र स्थान न मिलनेपर णपने बन्धनस्थानका ही आश्रय लेता है इसी भकार निश्चय ही है सोभ्य यह मन दिशचा-विदिशामं उड़कर अन्यतर

English

'The red colour of the moon is the colour of fire, the white of water, the black of earth. Thus vanishes what we call the moon, as a mere variety, being a name, arising from speech. What is true are the three colours.

अध्याय 101

श्लोक 6.4.4

यद्विद्युतो रोहितँरूपं तेजसस्तद्रूपं यच्छुक्लं तदपां यत्कृष्णं तदन्नस्यापागाद्विद्युतो विद्युत्त्वं वाचारम्भणं विकारो नामधेयं त्रीणि रूपाणीत्येव सत्यम्

yadvidyuto rohitam̐rūpaṃ tejasastadrūpaṃ yacchuklaṃ tadapāṃ yatkṛṣṇaṃ tadannasyāpāgādvidyuto vidyuttvaṃ vācārambhaṇaṃ vikāro nāmadheyaṃ trīṇi rūpāṇītyeva satyam

हिन्दी अर्थ

स यथा शनिः पक्षी शङ्खनि- निस प्रकार ॒चिद्रोमारके हाथमे घातकस्य इस्तगतेन इतरेण पी हुई शोरीसे भधा इना ्रबद्धः पाशितो दिशे दिं बन्धनसे मुक्त होनेकी इच्छते एवं स्वपितिनामभ्रसिद्धिदारेण इस प्रकार 'स्वपिति' इस नामकी जी ) लौ परसिद्धिद्टारा जीवका जो सत्यसव 8 रूप जगत्‌का मूक है उसे पुत्रको लंण्डे ८ शाङ्करमाष्याथं ६४९ को जान । निस समथ यह पुरुष अरिरिषति ८ खाना चा्ता है ) पेसे नामवाला होता है, उस समय जरु ही इसके भक्षण करिये हुए

English

'The red colour of the lightning is the colour of fire, the white of water, the black of earth. Thus vanishes what we call the lightning, as a mere variety, being a name, arising from speech. What is true are the three colours.

अध्याय 101

श्लोक 6.4.5

एतद्ध स्म वै तद्विद्वाँस आहुः पूर्वे महाशाला महाश्रोत्रिया न नोऽद्य कश्चनाश्रुतममतमविज्ञातमुदाहरिष्यतीति ह्येभ्यो विदांचक्रुः

etaddha sma vai tadvidvām̐sa āhuḥ pūrve mahāśālā mahāśrotriyā na no'dya kaścanāśrutamamatamavijñātamudāhariṣyatīti hyebhyo vidāṃcakruḥ

हिन्दी अर्थ

अशनापिपासे अशितमिच्छा- पिपासा ते अशनापिपासे अश- दीत्येतत्‌ । यत्र॒ यस्मिन्काल इत्युक्त आह ॒शवेतकेतः- आठणिदवारा इस भकार कदे यदेवं समूखमिदं शरीरं वटा- जनेपर श्वेतकेतु बोला “यदि इस प्रकार वटादिके अल्छुरके समान

English

'Great householders and great theologians of olden times who knew this, have declared the same, saying, "No one can henceforth mention to us anything which we have not heard, perceived, or known ." Out of these (three colours or forms) they knew all.

अध्याय 101

श्लोक 6.4.6

यदु रोहितमिवाभूदिति तेजसस्तद्रूपमिति तद्विदांचक्रुर्यदु शुक्लमिवाभूदित्यपाँरूपमिति तद्विदांचक्रुर्यदु कृष्णमिवाभूदित्यन्नस्य रूपमिति तद्विदांचक्रुः

yadu rohitamivābhūditi tejasastadrūpamiti tadvidāṃcakruryadu śuklamivābhūdityapām̐rūpamiti tadvidāṃcakruryadu kṛṣṇamivābhūdityannasya rūpamiti tadvidāṃcakruḥ

हिन्दी अर्थ

खनको छोद़कर इका मूर ओर कों हो सकता है ! इसी प्रकार दे सोम्य तू अन्नरूप श्ंगके दवारा जरह्प मूको लोन जर है सोम्य जकरूप शुनके द्वारा तेनोरूप मूरको सोन तथा तेजोरूप शुकगके दारा सोणिताभ्यामन्नकार्याभ्णां संयु- क्ताभ्यामन्नेनैवं प्रत्यहं सुज्य- मृत्पिण्डः प्रत्यहयुपचीयमानोऽ- ( णाश्रय ) है वह प्रजा घदायत। है तथा अन्तम ससहिष्ठा ै- ही जिसकी प्रतिषठा- हयस्मान-

English

'Whatever they thought looked red, they knew was the colour of fire. Whatever they thought looked white, they knew was the colour of water. Whatever they thought looked black, they knew was the colour of earth.

अध्याय 101

श्लोक 6.4.7

यद्वविज्ञातमिवाभूदित्येतासामेव देवतानाँसमास इति तद्विदांचक्रुर्यथा तु खलु सोम्येमास्तिस्रो देवताः पुरुषं प्राप्य त्रिवृत्त्रिवृदेकैका भवति तन्मे विजानीहीति

yadvavijñātamivābhūdityetāsāmeva devatānām̐samāsa iti tadvidāṃcakruryathā tu khalu somyemāstisro devatāḥ puruṣaṃ prāpya trivṛttrivṛdekaikā bhavati tanme vijānīhīti

हिन्दी अर्थ

अव; जप्त समय यह पुष "पिपासति ८ पीना चाहता है ) एसे नामवाला होता है तो उसके पीये हुए जल्को तेन ही ठे जाता द । अतः जि प्रकार गोनाय, अश्चनाय एवं पुरुषनाय कहलति है उती जल, यदि उसे तेजके द्वारा शोषित न किया जाता तो भपनौ बहुकूताके कारण अन्तके अद्कुरम्‌त हैहको

English

'Whatever they thought was altogether unknown, they knew was some combination of those three beings (devatâ). 'Now learn from me, my friend, how those three beings, when they reach man, become each of them tripartite.

स्रोत: https://sanskritdocuments.org/doc_upanishhat/chhandogya.itx · प्राप्त 3/6/2026

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शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।