Agni Purana
363
अध्याय 363 / 381

Adhyaya 364

11 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ11 श्लोक

अध्याय 363

श्लोक 1

ब्रह्मवर्गः अग्निर् उवाच वंशो ऽन्ववायो गोत्रं स्यात् कुलान्यभिजनान्वयौ ।मन्त्रव्याख्याकृदाचार्य आदेष्टा त्वध्वरे व्रती

brahmavargaḥ agnir uvāca vaṃśo 'nvavāyo gotraṃ syāt kulānyabhijanānvayau / mantravyākhyākṛdācārya ādeṣṭā tvadhvare vratī

हिन्दी अर्थ

और कुवलय-ये कमल और कुमुद आदिके साधारण नाम हैं। श्वेत उत्पलको कुमुद और कैरव कहते हैं। कुमुदकी जड़का नाम शालूक (सेरुकी) है। पद्म, तामरस और कञ्जये कमलके पर्याय हैं। नील उत्पलका नाम कुवलय और रक्त उत्पलका नाम कोकनद बताया गया है। पद्मकंद अर्थात् कमलकी जड़का नाम करहाट और शिफाकंद है। कमलके केसरको किञ्जल्क

English

The dafamUliy chinnaruhdy mustard, d&rUy pmamavdy Hgru and dry ginger are beneficial for (remedying) fevers, abscess and swelling.

अध्याय 363

श्लोक 2

यष्टा च यजमानः स्यात् ज्ञात्वारम्भ उपक्रमः ।सतीर्थ्याश् चैकगुरवः सभ्याः सामाजिकास् तथा

yaṣṭā ca yajamānaḥ syāt jñātvārambha upakramaḥ / satīrthyāś caikaguravaḥ sabhyāḥ sāmājikās tathā

हिन्दी अर्थ

और केसर कहते हैं। ये दोनों शब्द स्त्रीलिङ्गके सिवा अन्य लिङ्गोंमें प्रयुक्त होते हैं। स्त्रीलिङ्ग खनिशब्द और आकर-ये खानके वाचक हैं। बड़े-बड़े पर्वतोंके आसपास जो छोटे-छोटे पर्वत

English

Besmearing with a paste (made up) of dh&lakiy sandal, baldy mang&y madhukay blue lotus, darvi and meda mixed with clarified butter would heal a wound.

अध्याय 363

श्लोक 3

सभासदः सभास्तारा ऋत्विजो याजकाश् च ते ।अध्वर्यूद्गातृहोतारो यजुःसामर्ग्विदः क्रमात्

sabhāsadaḥ sabhāstārā ṛtvijo yājakāś ca te / adhvaryūdgātṛhotāro yajuḥsāmargvidaḥ kramāt

हिन्दी अर्थ

होते हैं, उन्हें पाद और प्रत्यन्तपर्वत कहते हैं। पर्वतके निकटकी नीची भूमि (तराई)-को उपत्यका तथा पहाड़के ऊपरको जमीनको अधित्यका कहते हैं। इस प्रकार मैंने स्वर्ग और पाताल आदि वर्गोका वर्णन किया। अब अनेक अर्थवाले शब्दोंको श्रवण कोजिये

English

Gugguluy the three myrobalans, dry ginger, pepper and long pepper in equal proportions mixed with ghee would heal wounds due to affected arteries and painful fistula.

अध्याय 363

श्लोक 4

चषालो यूपकटकः समे स्थण्डिलचत्वरे ।आमिक्षा सा शृतोष्णे या क्षीरे स्याद्दधियोगतः

caṣālo yūpakaṭakaḥ same sthaṇḍilacatvare / āmikṣā sā śṛtoṣṇe yā kṣīre syāddadhiyogataḥ

हिन्दी अर्थ

इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें कोशविषयक “स्वर्ग-पाताल आदि वर्गोका वर्णन” नामक तीन सौ साठवाँ अध्याय पूरा हुआ

English

"Chashala" is the sacrificial post's ring; "sthandila" and "chatvara" are the ground for sacrifice; "amiksha" is curd formed when hot milk is mixed with curds.

अध्याय 363

श्लोक 5

पृषदाज्यं सदध्याज्ये परमान्नन्तु पायसम् ।उपाकृतः पशुरसौ यो ऽभिमन्त्र्य क्रतौ हतः

pṛṣadājyaṃ sadadhyājye paramānnantu pāyasam / upākṛtaḥ paśurasau yo 'bhimantrya kratau hataḥ

हिन्दी अर्थ

अग्निदेव कहते हैं--वसिष्ठजी ' आङ्' अव्यय अर्थमें प्रयुक्त होता है। साथ ही धातुसे उसका संयोग होनेपर जो विभिन्न अर्थ प्रकाशित होते हैं, उन सभी अर्थोमें उसका प्रयोग समझना चाहिए। 'आ! प्रगृह्मसंज़्क अव्यय है। इसका वाक्य और

English

"Prishadajya" is ghee with curds; "paramanna" is "payasa" (milk-rice); "upakrita" is the animal consecrated by mantra and slain in the sacrifice.

अध्याय 363

श्लोक 6

परम्पराकं समनं प्रोक्षणञ्च बधार्थकम् ।पूजा नमस्यापिचितिः सपर्यार्चार्हणाः समाः

paramparākaṃ samanaṃ prokṣaṇañca badhārthakam / pūjā namasyāpicitiḥ saparyārcārhaṇāḥ samāḥ

हिन्दी अर्थ

स्मरण अर्थमें प्रयोग होता है। 'आ:' अव्यय कोप और पीडाका भाव द्योतित करनेके लिये प्रयुक्त होता है। “कु' पाप, कुत्सा (घृणा) और ईषत् अर्थमें तथा 'धिक्' फटकार और निन्दाके

English

"Paramparaka", "samana", "prokshana" (sprinkling) have the sense of slaying; "puja, namasya, apachiti, saparya, archa, arhana" are alike (worship).

अध्याय 363

श्लोक 7

वरिवस्या तु शुश्रूषा परिचर्याप्युपासनम् ।नियमो ब्रतमस्त्री तच्चोपवासादि पुण्यकम्

varivasyā tu śuśrūṣā paricaryāpyupāsanam / niyamo bratamastrī taccopavāsādi puṇyakam

हिन्दी अर्थ

अर्थमें आता है। 'च' अव्ययका प्रयोग समुच्चय, समाहार अर्थमें होता है । अन्वाचयः, इतरेतरयोग“ और 'स्वस्ति' आशीर्वाद, क्षेम और पुण्य आदिके अर्थमें तथा “अति!” अधिकता एवं उल्लङ्घनके अर्थमें आता है। 'स्वित्' प्रश्न और वितर्कका भाव व्यक्त करनेमें तथा 'तु' भेद और निश्चयके अर्थमें प्रयुक्त होता है। “सकृत्'का एक ही साथ और एक बारके अर्थमें तथा 'आरात् का दूर

English

"Parivasya", "shushrusha", "paricharya", "upasana" (service, attendance); "niyama", "vrata" (vow); fasting and the like is merit-producing.

अध्याय 363

श्लोक 8

मुख्यः स्यात् प्रथमः कल्पो ऽनुकल्पस्तु ततो ऽधमः ।कल्पे विधिक्रमौ ज्ञेयौ विवेकः पृथगात्मता

mukhyaḥ syāt prathamaḥ kalpo 'nukalpastu tato 'dhamaḥ / kalpe vidhikramau jñeyau vivekaḥ pṛthagātmatā

हिन्दी अर्थ

और समीपके अर्थमें प्रयोग होता है। 'पश्चात्' अव्यय पश्चिम दिशा और पीछेके अर्थमें तथा 'उत' शब्द 'अपि'के अर्थ (समुच्चय और प्रश्न) -में एवं विकल्प अर्थमें आता है। ' शश्चत्'

English

The first "kalpa" is the primary rule; the "anukalpa" is the lesser substitute; in a "kalpa" know the procedure and order; "viveka" is discernment, separateness of self.

अध्याय 363

श्लोक 9

संस्कारपूर्वं ग्रहणं स्यादुपाकरणं श्रुतेः ।भिक्षुः परिव्राट् कर्मन्दी पाराशर्यपि मस्करी

saṃskārapūrvaṃ grahaṇaṃ syādupākaraṇaṃ śruteḥ / bhikṣuḥ parivrāṭ karmandī pārāśaryapi maskarī

हिन्दी अर्थ

पुनः और सदाके अर्थमें तथा 'साक्षात्' प्रत्यक्ष एवं तुल्यके अर्थमें प्रयुक्त होता है। 'बत' अव्ययका प्रयोग खेद, दया, संतोष, विस्मय और सम्बोधनका भाव व्यक्त करनेमें होता है। 'हन्त' पद हर्ष, अनुकम्पा, वाक्यके आरम्भ और विषादके अर्थमें आता है। “प्रति” का प्रतिनिधि, वीप्सा एवं लक्षण आदिके अर्थमें प्रयोग किया जाता है। इति' शब्द हेतु, प्रकरण, प्रकाश आदि

English

"Upakarana" is taking up scripture after a purifying rite; "bhikshu", "parivrat", "karmandi", "parasharya", "maskari" are names of ascetics.

अध्याय 363

श्लोक 10

ऋषयः सत्यवचसःस्नातकश्चाप्लुतव्रती ।ये निर्जितेन्द्रियग्रामा यतिनो यतयश् च ते

ṛṣayaḥ satyavacasaḥsnātakaścāplutavratī / ye nirjitendriyagrāmā yatino yatayaś ca te

हिन्दी अर्थ

और समासिके अर्थमें प्रयुक्त होता है। ' पुरस्तात् ' पद पूर्व दिशा, प्रथम और पुरा (पूर्वकाल)-के अर्थमें आता है। ' अग्रतः ' (आगे)-के अर्थमें भी इसका प्रयोग होता है। 'यावत्’ और 'तावत्'

English

"Rishi" are those of true speech; "snataka" and "aplutavrati"; those who have conquered the host of senses are "yatis" and "yatayas".

अध्याय 363

श्लोक 11

शरीरसाधनापेक्षं नित्यं यत् कर्म तद्यमः ।नियमस्तु स यत् कर्मानित्यमागन्तुसाधनम् ।स्याद् ब्रह्मभूयं ब्रह्मत्वं ब्रह्मसायुज्यमित्यपि

śarīrasādhanāpekṣaṃ nityaṃ yat karma tadyamaḥ / niyamastu sa yat karmānityamāgantusādhanam / syād brahmabhūyaṃ brahmatvaṃ brahmasāyujyamityapi

हिन्दी अर्थ

पद समग्र, अवधि (सीमा), माप और अवधारणके अर्थमें आते हैं। 'अथो' एवं 'अथ' शब्दका समग्रताके अर्थमें होता है। 'वृथा' शब्द निरर्थक और अविधि अर्थका द्योतक है। 'नाना' शब्द अनेक और उभय अर्थमें आता है। 'नु' प्रश्न और विकल्पमें तथा 'अनु' पश्चात् एवं सादृश्यके

English

"Yama" is the regular duty that depends on bodily means; "niyama" is an occasional duty requiring an extraneous means; "brahmabhuya", "brahmatva", "brahmasayujya" (union with Brahman).

स्रोत: https://gretil.sub.uni-goettingen.de/gretil/corpustei/transformations/plaintext/sa_agnipurANa.txt · प्राप्त 3/6/2026

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शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।