Agni Purana
352
अध्याय 352 / 381

Adhyaya 353

25 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ25 श्लोक

अध्याय 352

श्लोक 1

कारकं सुकन्द उवाच कारकं सम्प्रवक्ष्यामि विभक्त्यर्थसमन्वितं ।ग्रामो ऽस्ति हेमहार्केह नौमि विष्णुं श्रिया सह

kārakaṃ sukanda uvāca kārakaṃ sampravakṣyāmi vibhaktyarthasamanvitaṃ / grāmo 'sti hemahārkeha naumi viṣṇuṃ śriyā saha

हिन्दी अर्थ

सह।' (मैं यहाँ लक्ष्मीसहित भगवान् विष्णुका स्तवन करता हूँ।)--इस वाक्यमें विष्णु' शब्दकी कर्म-संज्ञा हुई है। और 'द्वितीया कर्मणि स्मृता'-- इस पूर्वकथित नियमके अनुसार कर्में द्वितीया हुई है। “श्रिया सह '--यहाँ ' श्री' शब्दमें 'सह 'का योग होनेसे तृतीया हुई है। सहार्थक और

English

The battle (fought) as the boar (was) the next one. The fourth one was for the churning of the nectar. The sixth one was the battle involving all the celestial bodies for the sake of resuscitation.

अध्याय 352

श्लोक 2

स्वतन्त्रः कर्ता विद्यान्तं कृतिनः समुपासते ।हेतुकर्तालम्भयते हितं वै कर्मकर्तरि

svatantraḥ kartā vidyāntaṃ kṛtinaḥ samupāsate / hetukartālambhayate hitaṃ vai karmakartari

हिन्दी अर्थ

सदूशार्थक शब्दोंका योग होनेपर तृतीया विभक्ति होती है, यह सर्वसम्मत मत है। क्रियामें जिसकी स्वतन्त्रता विवक्षित हो, वह 'कर्ता' या 'स्वतन्त्र कर्ता' कहलाता है। जो उसका प्रयोजक हो, वह

English

(The seventh one was the destruction of) the three cities. (The eighth one was for) the destruction of (the demon) Andhaka. The ninth one (was) the killing of (the demon) Vrtra. The deadly (poison of) halahala was conquered (in the tenth one). (The demom) Kolahala (was subdued in the next one).

अध्याय 352

श्लोक 3

स्वयं भिद्येत् प्राकृतधीः स्वयञ्च छिद्यते तरुः ।कर्ताभिहित उत्तमः कर्तानभिहितो ऽधमः

svayaṃ bhidyet prākṛtadhīḥ svayañca chidyate taruḥ / kartābhihita uttamaḥ kartānabhihito 'dhamaḥ

हिन्दी अर्थ

“प्रयोजक कर्ता' और 'हेतुकर्ता' भी कहलाता है। जहाँ कर्म ही कर्ताके रूपमें विवक्षित हो, वह अध्याय तीन सौ इक्यावनमें श्लोक बाईससे अट्ठाईसतक विभक्त्यर्थोके प्रयोगका नियम बताया गया है । वे सब श्लोक यहीं होने चाहिए थे; क्योंकि वहाँ जो नियम या विधान दिये गये हैं, उनके उदाहरण यहाँ मिलते हैं।

English

(The next one was) the form as the man-lion, the protector of the celestials in olden days, that pierced the chest of (the demon) Hiranyakafipu with his nails and made Prahlada the king.

अध्याय 352

श्लोक 4

कर्तानभिहितो धर्मः शिष्ये व्याख्यायते यथा ।कर्ता पञ्चविधः प्रोक्तः कर्म सप्तविधं शृणु

kartānabhihito dharmaḥ śiṣye vyākhyāyate yathā / kartā pañcavidhaḥ proktaḥ karma saptavidhaṃ śṛṇu

हिन्दी अर्थ

“कर्मकर्ता' कहलाता है । इनके सिवा 'अभिहित' और 'अनभिहित'--ये दो कर्ता और होते हैं।

English

In (the dispute between) the celestials and the demons, (the Lord) was bom of Kaiyapa and Aditi as a dwarf, deceived the powerful (demon) Bali and restored the kingdom to Indra.

अध्याय 352

श्लोक 5

ईप्सितं कर्म च यथा श्रद्दधाति हरिं यतिः ।अनीप्सितं कर्म यथा अहिं लङ्घयते भृशं

īpsitaṃ karma ca yathā śraddadhāti hariṃ yatiḥ / anīpsitaṃ karma yathā ahiṃ laṅghayate bhṛśaṃ

हिन्दी अर्थ

गया है। स्वतन्त्रकर्ताका उदाहरण--'कृतिनः तां विद्यां समुपासते।' (विद्वान् पुरुष उस विद्याकी उपासना करते हैं) यहाँ विद्याकी उपासनामें विद्वानोंकी स्वतन्त्रता विवक्षित है, इसलिये वे 'स्वतन्त्रकर्ता' हैं। हेतुकर्ताका उदाहरण-- चैत्रो मैत्रं हितं लम्भयते।' (चैत्र मैत्रको हितकी प्राप्ति कराता है।) 'मैत्रो हितं लभते तं चैत्रः प्रेरयति इति चैत्रो मैत्रं हितं लम्भयते।' (मैत्र हितको प्राप्त

English

The manifestation as a boar (was made by Lord Vifnu) and the demon Hiranyaksa was killed, protecting the celestials thus. He lifted up the earth that got submerged and was praised by the celestials.

अध्याय 352

श्लोक 6

नैवेप्सितं नानीप्सितं दुग्धं सम्भक्ष्यन्रजः ।भक्ष्येद्प्यकथितं गोपालो दोग्धि गां पयः

naivepsitaṃ nānīpsitaṃ dugdhaṃ sambhakṣyanrajaḥ / bhakṣyedpyakathitaṃ gopālo dogdhi gāṃ payaḥ

हिन्दी अर्थ

करता है और चैत्र उसे प्रेरणा देता है। अतः यह कहा जाता है कि “चैत्र मैत्रको हितकी प्राप्ति कराता है '--यहाँ 'चैत्र' प्रयोजककर्ता या हेतुकर्ता है। कर्मकर्ताका उदाहरण--'प्राकृतधीः स्वयं

English

(The mount) 'Mandara was made the churning rod, (the serpent) Vasuki as the string and (the ocean) was churned by the celestials and the demons. The ambrosia (that was obtained) was given to the celestials.

अध्याय 352

श्लोक 7

कर्तृकर्माथ गमयेच्छिष्यं ग्रामं गुरुर्यथा ।कर्म चाभिहितं पूजा क्रियते वै श्रिये हरेः

kartṛkarmātha gamayecchiṣyaṃ grāmaṃ gururyathā / karma cābhihitaṃ pūjā kriyate vai śriye hareḥ

हिन्दी अर्थ

जाता है।), “तरुः स्वयं छिद्यते।' (वृक्ष स्वयं कट जाता है) । यहाँ फोड्नेवाले और कारनेवाले कर्ताओंके व्यापारको विवक्षाका विषय नहीं बनाया गया। जहाँ कार्यके अतिशय सौकर्यको प्रकट करनेके लिये कर्तृव्यापार अविवक्षित हो, वहाँ कर्म आदि अन्य कारक भी कर्ता-जैसे हो जाते हैं और तदनुसार ही क्रिया होती है। इस दृष्टिसे यहाँ 'प्राकृतधी:' और 'तरुः' पद कर्मकर्ताके

English

The celestials were in the same way protected at the time of the battle of the stars after preventing Indra, Guru, the

अध्याय 352

श्लोक 8

कर्मानभिहितं स्तोत्रं हरेः कुर्यात् सर्वदं ।करणं द्विविधं प्रोक्तं वाह्यमभ्यन्तरं तथा

karmānabhihitaṃ stotraṃ hareḥ kuryāt sarvadaṃ / karaṇaṃ dvividhaṃ proktaṃ vāhyamabhyantaraṃ tathā

हिन्दी अर्थ

रूपमें प्रयुक्त हैं। अभिहित कर्ताका उदाहरण-- “रामो गच्छति।' (राम जाता है।) यहाँ 'कर्ता' अर्थमें तिडन्तका प्रयोग है, इसलिये कर्ता उक्त हुआ। जहाँ कर्ममें प्रत्यय हो, वहाँ 'कर्म' उक्त

English

(The sages) Vivamitra, Vasistha, Atri and Brahma protected the celestials in the battle after warding off the demons that were having infatuation and hatred.

अध्याय 352

श्लोक 9

चक्षुषा रूपं गृह्णीति वाह्यं दात्रेण तल्लुनेत् ।सम्प्रदानं त्रिधा प्रोक्तं प्रेरकं ब्राह्मणाय गां

cakṣuṣā rūpaṃ gṛhṇīti vāhyaṃ dātreṇa tallunet / sampradānaṃ tridhā proktaṃ prerakaṃ brāhmaṇāya gāṃ

हिन्दी अर्थ

और 'कर्ता' अनुक्त या अनभिहित हो जाता है। अनभिहित कर्ताका उदाहरण--'गुरुणा शिष्ये धर्मः व्याख्यायते।' (गुरुद्वारा शिष्यके निमित्त धर्मकी व्याख्या की जाती है।) यहाँ कर्ममें प्रत्यय होनेसे ' धर्म' की जगह 'धर्मः' हो गया; क्योंकि उक्त कर्में प्रथमा विभक्ति होनेका नियम

English

By the eye one takes form; the external one cuts it with a sickle. The dative is declared threefold: instigating (one gives a cow to a Brahmin),

अध्याय 352

श्लोक 10

नरो ददापि नृपतये दासन्तदनुमन्तृकं ।अनिराकर्तृकं भर्त्रे दद्यात् पुष्पाणि सज्जनः

naro dadāpi nṛpataye dāsantadanumantṛkaṃ / anirākartṛkaṃ bhartre dadyāt puṣpāṇi sajjanaḥ

हिन्दी अर्थ

है। अनभिहित कर्तामें पहले कथित नियमके अनुसार तृतीया विभक्ति होती है, इसीलिये 'गुरुणा' पदमें तृतीया विभक्ति प्रयुक्त हुई है। इस तरह पाँच प्रकारके ' कर्ता' बताये गये। अब सात

English

a man gives also to the king, a slave consenting; non-refusing, a good man would give flowers to his master.

अध्याय 352

श्लोक 11

अपदानं द्विधा प्रोक्तं चलमश्वात्तु धावतः ।पतितश्चाचलं ग्रामादागच्छति स वैष्णवः

apadānaṃ dvidhā proktaṃ calamaśvāttu dhāvataḥ / patitaścācalaṃ grāmādāgacchati sa vaiṣṇavaḥ

हिन्दी अर्थ

प्रकारके कर्मका वर्णन सुनो॥ १--४॥ १-ईप्सितकर्म, २-अनीप्सितकर्म, ३- इप्सितानीप्सित-कर्म, ४-अकथितकर्म, ५-कर्तृकर्म, ६-अभिहितकर्म तथा ७-अनभिहितकर्म। ईप्सितकर्मका उदाहरण-- यतिः हरिं श्रद्धधाति।' (विरक्त साधु या संन्यासी हरिमें श्रद्धा रखता है।) यहाँ कर्ता यतिको हरि अभीष्ट हैं, इसलिये वे “ईप्सितकर्म' हैं। अतएव हरिमें द्वितीया विभक्तिका

English

The ablative is declared twofold: movable, from a running horse; fallen, immovable, from the village — one comes, that Vaishnava.

अध्याय 352

श्लोक 12

चतुर्धा चाधिकरणं व्यापकन्दध्नि घृतम् ।तिलेषु तैलं देवार्थमौपश्लेषिकमुच्यते

caturdhā cādhikaraṇaṃ vyāpakandadhni ghṛtam / tileṣu tailaṃ devārthamaupaśleṣikamucyate

हिन्दी अर्थ

प्रयोग हुआ है। अनीप्सितकर्मकका उदाहरण 'अहिं लङ्घयते भृशम्।' (उससे सर्पको बहुधा लँघवाता है।) यहाँ 'अहिं' यह ' अनीप्सितकर्म' है। लाँघनेवाला सर्पको लाँघना नहीं चाहता। वह

English

The locative is fourfold: pervading — ghee in curd; oil in sesame; for the god, aupashleshika;

अध्याय 352

श्लोक 13

गृहे तिष्ठेत् कपिर्वृक्षे स्मृतं वैषयिकं यथा ।जले मत्स्यो वने सिंहः स्मृतं सामीप्यकं यथा

gṛhe tiṣṭhet kapirvṛkṣe smṛtaṃ vaiṣayikaṃ yathā / jale matsyo vane siṃhaḥ smṛtaṃ sāmīpyakaṃ yathā

हिन्दी अर्थ

किसीके हठ या प्रेरणासे सर्पलङ्कनमें प्रवृत्त होता है। ईप्सितानीप्सितकर्मका उदाहरण-' दुग्धं संभक्षयव्रजः भक्षयेत्।' (मनुष्य दूध पीता हुआ धूल भी पी जाता है।) यहाँ दुग्ध "ईप्सितकर्म' है और धूल अनीप्सितकर्म'। अकथितकर्म - जहाँ अपादान आदि विशेष नामोंसे कारकको व्यक्त करना अभीष्ट न हो, वहाँ वह कारक 'कर्मसंज्ञक' हो जाता है। यथा-गोपालः गां

English

"a monkey stays in the house, in the tree" is called vaishayika; "a fish in water, a lion in the forest" is remembered as samipyaka;

अध्याय 352

श्लोक 14

गङ्गायां घो षो वसति औपचारिकमीदृशं ।तृतीया वाथ वा षष्ठी स्मृतानभिहिते तथा

gaṅgāyāṃ gho ṣo vasati aupacārikamīdṛśaṃ / tṛtīyā vātha vā ṣaṣṭhī smṛtānabhihite tathā

हिन्दी अर्थ

पयः दोग्धि। (ग्वाला गायसे दूध दुहता है।) यहाँ “गाय' अपादान है, तथापि अपादानके रूपमें कथित न होनेसे अकथित हो गया और उसमें पञ्चमी विभक्ति न होकर द्वितीया विभक्ति हुई।

English

"a cowherd settlement lives on the Ganga" — aupacharika is of this kind. The third or sixth case is remembered in the non-expressed;

अध्याय 352

श्लोक 15

विष्णुः सम्पूज्यते लोकैर् गन्तव्यन्तेन तस्य वा ।प्रथमाभिहितकर्तृकर्मणोः प्रणमेद्धरिम्

viṣṇuḥ sampūjyate lokair gantavyantena tasya vā / prathamābhihitakartṛkarmaṇoḥ praṇameddharim

हिन्दी अर्थ

कर्तृकर्म-जहाँ प्रयोजक कर्ताका प्रयोग होता है, वहाँ प्रयोज्य कर्ता कर्मके रूपमें परिणत हो जाता है। यथा--“गुरु: शिष्यं ग्रामं गमयेत्।' (गुरु शिष्यको गाँव भेजें।) “शिष्यो ग्रामं गच्छेत् तं (शिष्य गाँवको जाय, इसके लिये गुरु उसे प्रेरित

English

"Vishnu is worshipped by people" or "to be gone to by him." With the agent and object expressed first, one should bow to Hari;

अध्याय 352

श्लोक 16

हेतौ तृतीया चान्नेन वसेद्वृक्षाय वै जलं ।चतुर्थी तादर्थ्ये ऽभिहिता पञ्चमी पर्युपाङ्मुखैः

hetau tṛtīyā cānnena vasedvṛkṣāya vai jalaṃ / caturthī tādarthye 'bhihitā pañcamī paryupāṅmukhaiḥ

हिन्दी अर्थ

करे, इस अर्थमें गुरु शिष्यको गाँव भेजें, यह वाक्य है।) यहाँ गुरु “प्रयोजक कर्ता' है, और शिष्य प्रयोज्य कर्ता या 'कर्मभूत कर्ता' है। अभिहितकर्म -' श्रियै हरेः पूजा क्रियते।'

English

in the sense of cause the third case: "he lives by food"; "water for the tree"; the fourth in the sense of purpose; the fifth by words with pari, upa, a, mukha;

अध्याय 352

श्लोक 17

योगे वृष्टः परि ग्रामाद्देवो ऽयं बलवत् पुरा ।पूर्वो ग्रामादृते विष्णोर्न मुक्तिरितरो हरेः

yoge vṛṣṭaḥ pari grāmāddevo 'yaṃ balavat purā / pūrvo grāmādṛte viṣṇorna muktiritaro hareḥ

हिन्दी अर्थ

(लक्ष्मीको प्राप्तिकि लिये श्रीहरिको पूजा की जाती है।) यहाँ कर्ममें प्रत्यय होनेसे पूजा “उक्त कर्म? है, इसीको “अभिहितकर्म' कहते हैं, अतएव इसमें प्रथमा विभक्ति हुई। अनभिहितकर्म -- जहाँ कर्तामें प्रत्यय होता है, वहाँ कर्म अनभिहित हो जाता है, अतएव उसमें द्वितीया विभक्ति होती है। उदाहरणके लिये यह वाक्य है--'हरेः सर्वदं स्तोत्रं कुर्यात्' ( श्रीहरिको सर्वमनोरथदायिनी स्तुति

English

"it has rained around the village"; "this god is mighty of old"; "the earlier from the village"; "without Vishnu no liberation, the other is of Hari" (usage examples).

अध्याय 352

श्लोक 18

पृथग्विनाद्यैस्तृतीया पञ्चमी च तथा भवेत् ।पृथग्ग्रामाद्विहारेण विना श्रीश् च श्रिया श्रियः

pṛthagvinādyaistṛtīyā pañcamī ca tathā bhavet / pṛthaggrāmādvihāreṇa vinā śrīś ca śriyā śriyaḥ

हिन्दी अर्थ

करे।) करण दो प्रकारका बताया गया है-- “बाह्य' और 'आभ्यन्तर'। “तृतीया करणे भवेत्।'--इस पूर्वोक्त नियमके अनुसार करणमें तृतीया होती है। आभ्यन्तर करणका उदाहरण

English

With "prithak," "vina" and the like, the third and fifth cases are possible: "apart from the village, without outing, Shri by Shri's" (usage).

अध्याय 352

श्लोक 19

कर्मप्रवचनीयाख्यैर् द्वितीया योगतो भवेत् ।अन्वर्जुनञ्च योद्धारो ह्य् अभितो ग्राममीरितं

karmapravacanīyākhyair dvitīyā yogato bhavet / anvarjunañca yoddhāro hy abhito grāmamīritaṃ

हिन्दी अर्थ

देते हैं-' चक्षुषा रूपं गृह्णाति।' (नेत्रसे रूपको ग्रहण करता है।) यहाँ नेत्र “आभ्यन्तर करण' हैं, अतः इसमें तृतीया विभक्ति हुई। ' बाह्य करण'का उदाहरण है--'दात्रेण तल्लुनेत्।' (हँसुआसे उसको काटे।) यहाँ दात्र “बाह्य करण' है। अतः उसमें तृतीया हुई है। सम्प्रदान तीन प्रकारका बताया गया है--प्रेरक, अनुमन्तृक और अनिराकर्तूक। जो दानके लिये प्रेरित करता हो, वह 'प्रेरक' है।

English

With the so-called karma-pravachaniyas the second case arises by connection: "the warriors after Arjuna"; "around the village" is said.

अध्याय 352

श्लोक 20

नमःस्वाहास्वधास्वस्तिवषडाद्यैश् चतुर्थ्यपि ।नमो देवाय ते स्वस्ति तुमर्थाद्भावाचिनः

namaḥsvāhāsvadhāsvastivaṣaḍādyaiś caturthyapi / namo devāya te svasti tumarthādbhāvācinaḥ

हिन्दी अर्थ

जो प्राप्त हुई किसी वस्तुके लिये अनुमति या अनुमोदनमात्र करता है, वह ' अनुमन्तृक' है। जो न “प्रेरक है, न अनुमन्तृक' है, अपितु किसीकी दी हुई वस्तुको स्वीकार कर लेता है, उसका

English

With namah, svaha, svadha, svasti, vashat and the like, also the fourth: "homage to the god; blessing to you"; and from the sense of an infinitive-noun.

अध्याय 352

श्लोक 21

पाकाय पक्तये याति तृतीया सहयोगके ।हेत्वर्थे कुत्सिते ऽङ्गे सा तृतीया च विशेषणे

pākāya paktaye yāti tṛtīyā sahayogake / hetvarthe kutsite 'ṅge sā tṛtīyā ca viśeṣaṇe

हिन्दी अर्थ

निराकरण नहीं करता, वह अनिराकर्तृक सम्प्रदान' है। “सम्प्रदाने चतुर्थी।'--इस पूर्वोक्त नियमके अनुसार सम्प्रदानमें चतुर्थी विभक्ति होती है। तीनों सम्प्रदानोंके क्रमशः उदाहरण दिये जाते हैं-९-'नरो ब्राह्मणाय गां ददाति।' (मनुष्य ब्राह्मणको गाय देता है।) यहाँ ब्राह्मण “प्रेरक

English

"For cooking, to cook"; the third case with connection (saha); in the sense of cause, in a blamed limb, and in qualifier:

अध्याय 352

श्लोक 22

पितागात्सह पुत्रेण काणो ऽक्ष्णा गदया हरिः ।अर्थेन निवसेद्भृत्यः काले भावे च सप्तमौ

pitāgātsaha putreṇa kāṇo 'kṣṇā gadayā hariḥ / arthena nivasedbhṛtyaḥ kāle bhāve ca saptamau

हिन्दी अर्थ

सम्प्रदान’ होनेके कारण उसमें चतुर्थी विभक्ति हुई है। ब्राह्मणलोग प्रायः यजमानको गोदानके लिये प्रेरित करते रहते हैं, अतः उन्हें “प्रेरक सम्प्रदान' की संज्ञा दी गयी है। २-' नरो नृपतये

English

"the father went with his son"; "one-eyed in the eye"; "Hari with a mace"; "the servant lives for the purpose"; the seventh in time and state;

अध्याय 352

श्लोक 23

विष्णौ नते भवेन्मुक्तिर्वसन्ते स गतो हरिम् ।नृणां स्वामी नृषु स्वामी नृणामीशःसताम्पतिः

viṣṇau nate bhavenmuktirvasante sa gato harim / nṛṇāṃ svāmī nṛṣu svāmī nṛṇāmīśaḥsatāmpatiḥ

हिन्दी अर्थ

दासं ददाति।' (मनुष्य राजाको दास अर्पित करता है।) यहाँ राजाने दास अर्पणके लिये कोई प्रेरणा नहीं दी है। केवल प्राप्त हुए दासको ग्रहण करके उसका अनुमोदनमात्र किया है, इसलिये वह “अनुमन्तृक सम्प्रदान’ है; अतएव ' नृपतये' में चतुर्थी विभक्ति प्रयुक्त हुई है। ३- सज्जनः भत्रे पुष्पाणि दद्यात्।' (सज्जन पुरुष स्वामीको पुष्प दे)-यहाँ स्वामीने पुष्पदानकी मनाही न

English

"to Vishnu bowed there would be liberation"; "in spring he went to Hari"; "master of men, among men master; lord of men, lord of the good" (usage).

अध्याय 352

श्लोक 24

नृणां साक्षी नृषु साक्षी गोषु नाथो गवाम्पतिः ।गोषु सूतो गवां सूतो राज्ञां दायादको ऽस्त्विह

nṛṇāṃ sākṣī nṛṣu sākṣī goṣu nātho gavāmpatiḥ / goṣu sūto gavāṃ sūto rājñāṃ dāyādako 'stviha

हिन्दी अर्थ

करके उसको अङ्गीकारमात्र कर लिया है, इसलिये ' भर्तृ? शब्द ' अनिराकर्तृक सम्प्रदान' है। सम्प्रदान होनेके कारण ही उसमें चतुर्थी विभक्ति हुई है। अपादान दो प्रकारका होता है-चल'

English

"Witness of men, among men witness; lord of cows, among cows lord; a charioteer among cows; among kings a co-heir here" (usage).

अध्याय 352

श्लोक 25

अन्नस्य(१) हेतोर्वसति षष्ठी स्मृत्यर्थकर्मणि ।मातुः स्मरति गोप्तारं नित्यं स्यात् कर्तृकर्मणोः ।अपां भेत्ता तव कृतिर्न निष्ठादिषु षष्ठ्यपि

annasya(1) hetorvasati ṣaṣṭhī smṛtyarthakarmaṇi / mātuḥ smarati goptāraṃ nityaṃ syāt kartṛkarmaṇoḥ / apāṃ bhettā tava kṛtirna niṣṭhādiṣu ṣaṣṭhyapi

हिन्दी अर्थ

और ' अचल'। कोई भी अपादान क्यों न हो, ' अपादाने पञ्चमी स्यात्।'- इस पूर्वकथित नियमके अनुसार उसमें पञ्चमी विभक्ति होती है । ' धावतः अश्वात् पतितः।' (दौड्ते हुए घोड़ेसे गिरा) यहाँ दौड़ता हुआ घोड़ा “चल अपादान' है। अतः धावतः अश्वात्' में पञ्चमी विभक्ति हुई है। 'स वैष्णवः ग्रामादायाति।' (वह वैष्णव गाँवसे आता है)--यहाँ ग्राम शब्द ' अचल अपादान' है,

English

"He lives for the sake of food" — the sixth case; in verbs of remembering with object: "he remembers the protector of his mother"; always in agent and object; "breaker of waters, your work" — the sixth also not in participial endings.

स्रोत: https://gretil.sub.uni-goettingen.de/gretil/corpustei/transformations/plaintext/sa_agnipurANa.txt · प्राप्त 3/6/2026

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शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

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आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

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सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

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शोध टिप्पणीResearch note

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