Agni Purana
317
अध्याय 317 / 381

Adhyaya 318

10 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ10 श्लोक

अध्याय 317

श्लोक 1

वागीश्वरीपूजा ईश्वर उवाच वागीश्वरीपूजनञ्च प्रवदामि समण्डलम् ।ऊहकं कालसंयुक्तं मनुं वर्णसमायुतम्(१)

vāgīśvarīpūjā īśvara uvāca vāgīśvarīpūjanañca pravadāmi samaṇḍalam / ūhakaṃ kālasaṃyuktaṃ manuṃ varṇasamāyutam(1)

हिन्दी अर्थ

- तव मुञ्ज नराधिपसेनां वेगवतीं सहते समरेषु। प्रलयोर्मिमिवाभिमुखीं तां कः सकलक्षितिभृन्निवहेषु॥ ७. यत्पादतले चकास्ति चक्रं हस्ते वा कुलिशं सरोरुहं वा। राजा जगदेकचक्रवर्ती स्याच्छं भद्रविराट् समश्रुतेऽसौ॥

English

One will gain victory by the oblation of fried paddy (with the hymn) aparhrpheruP, He who has defect! veense-organs will get sound ones by the repetition of (the hynm) bhadrSP.

अध्याय 317

श्लोक 2

निषाद ईश्वरं कार्यं मनुना चन्द्रसूर्यवत् ।अक्षरन्न हि देयं स्यात् ध्यायेत् कुन्देन्दुसन्निभां

niṣāda īśvaraṃ kāryaṃ manunā candrasūryavat / akṣaranna hi deyaṃ syāt dhyāyet kundendusannibhāṃ

हिन्दी अर्थ

सहते न कोऽपि वसुधायां केतुमतीं नरेन्द्र तव सेनाम्॥ गुरु हों, उसे “आख्यानिकी” कहते हैं। इसके विपरीत यदि प्रथम चरणमें जगण, तगण, जगण एवं दो गुरु हों और द्वितीय चरणमें दो तगण, एक जगण तथा दो गुरु हों तो उसकी

English

(The hymn) agniica pjrthim ceP (is) an excellent charm. One who repeats the hymn adhoma will be victorious in litigation.

अध्याय 317

श्लोक 3

पञ्चाशद्वर्णमालान्तु मुक्तास्रग्दामभूषिताम् ।वरदाभयाक्षसूत्रपुस्तकाढ्यां त्रिलोचनां

pañcāśadvarṇamālāntu muktāsragdāmabhūṣitām / varadābhayākṣasūtrapustakāḍhyāṃ trilocanāṃ

हिन्दी अर्थ

“विपरीताख्यानकी' संज्ञा होती है। जिसके पहले पादमें तीन सगण, एक लघु और एक गुरु हों तथा दूसरेमें नगण, भगण, भगण एवं रगण मौजूद हों, उस छन्दका नाम 'हरिणप्लुता? है।

English

(The hymn) brahma rdjanyarh accomplishes the task (when repeated) at its commencement. One will be free from disease by the oblation of ghee a lakh times (with the repetition of the hymn) sarfa)atsaro*sP.

अध्याय 317

श्लोक 4

लक्षं जपेन्मस्तकान्तं स्कन्धान्तं वर्णमालिकां ।अकारादिक्षकारान्तां विशन्तीं मानवत् स्मरेत्

lakṣaṃ japenmastakāntaṃ skandhāntaṃ varṇamālikāṃ / akārādikṣakārāntāṃ viśantīṃ mānavat smaret

हिन्दी अर्थ

जिसके प्रथम चरणमें दो नगण, एक रगण, एक लघु और एक गुरु हो तथा दूसरे चरणमें एक नगण, दो जगण और एक रगण हो, वह तथा दूसरेमें एक नगण, दो जगण, एक रगण और एक गुरु हो, उसका नाम ' पुष्पिताग्रा" है। जिसके पहले चरणमें रगण, जगण, रगण, जगण हो तथा दूसरेमें जगण, रगण, जगण, रगण और

English

One should recite a lakh; the garland of letters from head to shoulders, from "a" to "ksha," one should remember as entering like a human.

अध्याय 317

श्लोक 5

कुर्याद् गुरुश् च दीक्षार्थं मन्त्रग्राहे तु मण्डलम् ।सूर्याग्रमिन्दुभक्तन्तु भागाभ्यां कमलं हितं(२)

kuryād guruś ca dīkṣārthaṃ mantragrāhe tu maṇḍalam / sūryāgramindubhaktantu bhāgābhyāṃ kamalaṃ hitaṃ(2)

हिन्दी अर्थ

एक गुरु हो उसे “यवमती कहते हैं। जिसके प्रथम और तृतीय चरणोंमें अट्ठाईस लघु और अन्तमें एक गुरु हो तथा दूसरे एवं चौथे चरणोंमें तीस लघु एवं एक गुरु हो तो उसका नाम

English

The teacher should make a mandala for the sake of initiation and for taking a mantra; a lotus with the front sunlike and the moon-divided, in two parts, is beneficial.

अध्याय 317

श्लोक 6

१ चन्द्रमसायुतमिति ञ॥ २ कृतमिति ख॥ :प् १६१ वीथिका पदिका कर्या पद्मान्यष्टौ चतुष्पदे ।वीथिका पदिका वाह्ये द्वाराणि द्विपदानि तु

1 candramasāyutamiti ña.. 2 kṛtamiti kha.. :p 161 vīthikā padikā karyā padmānyaṣṭau catuṣpade / vīthikā padikā vāhye dvārāṇi dvipadāni tu

हिन्दी अर्थ

“शिखा” होता है। इसके विपरीत यदि प्रथम और तृतीय चरणोंमें तीस लघु और एक गुरु हो तथा द्वितीय एवं चतुर्थ चरणोंमें अट्टाईस लघुके ' अपरवक्त्र“ नामक छन्द है। जिसके प्रथम साथ एक गुरु हो तो उसे खञ्जा“ कहते हैं। अब पादमें दो नगण, एक रगण और एक यगण हो 'समवृत्त'का दिग्दर्शन कराया जाता है

English

A path and a border should be made; eight lotuses in a four-square; the path and border outside; the doors two-square;

अध्याय 317

श्लोक 7

उपद्वाराणित द्वच्च कोणबान्धं द्विपट्टिकम्(१) ।सिदानि नव पद्मानि कर्णिका कनकप्रभा

upadvārāṇita dvacca koṇabāndhaṃ dvipaṭṭikam(1) / sidāni nava padmāni karṇikā kanakaprabhā

हिन्दी अर्थ

इस प्रकार आदि आग्रेय महापुराणमें “अर्धसमवृत्तका वर्णन” नामक तीन सौ तैंतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ

English

and two sub-doors, a corner-bond, double border; nine white lotuses; the pericarp gold-bright;

अध्याय 317

श्लोक 8

केशराणि विचित्राणि कोणान्रक्तेन पूरयेत् ।व्योमरेखान्तरं कृष्णं द्वाराणीन्द्रेभमानतः

keśarāṇi vicitrāṇi koṇānraktena pūrayet / vyomarekhāntaraṃ kṛṣṇaṃ dvārāṇīndrebhamānataḥ

हिन्दी अर्थ

अग्निदेव कहते हैं--'यति' नाम है विच्छेद होनेपर तथा कहीं-कहीं पादके मध्यमें भी या विरामका। पादके अन्तमें श्लोकार्ध पूरा यति' होती है। जिसके प्रत्येक चरणमें क्रमशः १. भृङ्गावलीमङ्गलगीतनाहैर्जनस्य चित्ते मुदमादधाति। आख्यानिकी च स्मरजन्मपाशमहोत्सवस्याश्रवणे क्कणन्ती ॥ २. अलं तवालीकवचोभिरेभिः स्वार्थ प्रिये साधय कार्यमन्यत्। कथं कथावर्णनकौतुकं स्यादाख्यानिकी चेद् विपरीतवृत्तिः ॥

English

the filaments various; one should fill the corners with red; the space between the sky-lines black; the doors by the elephant measure.

अध्याय 317

श्लोक 9

मध्ये सरस्वतीं पद्मे वागीशी पूर्वपद्मके ।हृल्लेखा चित्रवागीशी गायत्री विश्वरूपया

madhye sarasvatīṃ padme vāgīśī pūrvapadmake / hṛllekhā citravāgīśī gāyatrī viśvarūpayā

हिन्दी अर्थ

आख्यानिकीके दोनों भेद उपजातिके अन्तर्गत हैं। यहाँ विशेष संज्ञा-विधानके लिये पढ़े गये हैं। ३. तव मुञ्ज नराधिप विद्विषां भयविवर्जितकेतुलघीयसाम्।

English

In the middle lotus Sarasvati; Vagishi in the east lotus; Hrillekha, Chitra-Vagishi, Gayatri, Vishvarupa;

अध्याय 317

श्लोक 10

शाङ्करी मतिर्धृतिश् च पूर्वाद्या ह्रीं स्ववीजकाः ।ध्येया सरस्वतीवच्च कपिलाज्येन होमकः ।संस्कृतप्राकृतकविः काव्यशास्त्रादिविद्भवेत्

śāṅkarī matirdhṛtiś ca pūrvādyā hrīṃ svavījakāḥ / dhyeyā sarasvatīvacca kapilājyena homakaḥ / saṃskṛtaprākṛtakaviḥ kāvyaśāstrādividbhavet

हिन्दी अर्थ

४. ' अपरवक्त्र' नामक छन्द ' वैतालीय' छन्दके अन्तर्गत है; फिर भी विशेष संज्ञा-विधानके लिये यहाँ पढ़ा गया है। उदाहरण- ५. यह छन्द 'औपच्छन्दसक 'के अन्तर्गत है, तो भी विशेष संज्ञा देनेके लिये इस प्रकरणमें इसका पाठ किया गया है। उदाहरण

English

Shankari, Mati and Dhriti from the east, with the "hrim" seed of their own, to be meditated like Sarasvati; an oblation with tawny-cow ghee; he becomes a poet in Sanskrit and Prakrit, a knower of poetics and the sciences.

स्रोत: https://gretil.sub.uni-goettingen.de/gretil/corpustei/transformations/plaintext/sa_agnipurANa.txt · प्राप्त 3/6/2026

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शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।