Agni Purana
316
अध्याय 316 / 381

Adhyaya 317

21 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ21 श्लोक

अध्याय 316

श्लोक 1

गणपूजा इश्वर उवाच विश्वरूपं समुद्धृत्य तेजस्युपरि संस्थितम् ।नरसिंहं ततो ऽधस्तात् कृतान्तं तदधो न्यसेत्

gaṇapūjā iśvara uvāca viśvarūpaṃ samuddhṛtya tejasyupari saṃsthitam / narasiṃhaṃ tato 'dhastāt kṛtāntaṃ tadadho nyaset

हिन्दी अर्थ

वक्त्रनिर्मांसनासाग्रा । कन्यका वाक्यचपला लभते धूर्तसौभाग्यम् ॥ तीर्णो दशरथात्मजः । रक्षःक्षयकरीं पुनः प्रतिज्ञां स्वेन बाहुना॥ इसी प्रकार अन्य भी बहुत-से उदाहरण हो सकते हैं। “विपुला' छन्दके पादोंका चौथा अक्षर प्रायः गुरु ही होता है।

English

Tait. Sam. 4.5.10.2a.

अध्याय 316

श्लोक 2

प्रणवं तदधःकृत्वा ऊहकं तदधः पुनः ।अंशुमान् विश्वमूर्तिस्थं कण्ठोष्ठप्रणवादिकम्

praṇavaṃ tadadhaḥkṛtvā ūhakaṃ tadadhaḥ punaḥ / aṃśumān viśvamūrtisthaṃ kaṇṭhoṣṭhapraṇavādikam

हिन्दी अर्थ

जब प्रत्येक चरणमें क्रमशः चार-चार अक्षर बढ़ते जायँ तो “पदचतुरूर्ध्वः' नामक छन्द होता है। तात्पर्य यह कि इसके प्रथम पादमें आठ अक्षर, द्वितीय पादमें बारह, तृतीय पादमें

English

Tait. Sam. 4.5.2. 1.

अध्याय 316

श्लोक 3

नमो ऽन्तः स्याच्चतुर्वर्णो विश्वरूपञ्च कारणम् ।सूर्यमात्राहतं ब्रह्मण्यङ्गानीह तु पूर्ववत्(१)

namo 'ntaḥ syāccaturvarṇo viśvarūpañca kāraṇam / sūryamātrāhataṃ brahmaṇyaṅgānīha tu pūrvavat(1)

हिन्दी अर्थ

सोलह और चतुर्थ पादमें बीस अक्षर होते हैं। उक्त छन्दके चारों चरणोंमें अन्तिम दो अक्षर गुरु हों तो उसकी 'आपीड'' संज्ञा होती है। यहाँ अन्तिम अक्षरोंको गुरु बतलानेका यह अभिप्राय जान पड़ता है कि शेष लघु ही होते हैं। जब आदिके दो अक्षर गुरु और शेष सभी लघु हों तो उसका नाम 'प्रत्यापीड?' होता है। “पदचतुरूर्ध्व' नामक छन्दके प्रथम पादका

English

Tait. Sam. 4.5.9.2.

अध्याय 316

श्लोक 4

उद्धरेत् प्रणवं पूर्वं प्रस्फुरद्वयमुच्चरेत् ।घोरघोरतरं पश्चात् तत्र रूपमतः स्मरेत्

uddharet praṇavaṃ pūrvaṃ prasphuradvayamuccaret / ghoraghorataraṃ paścāt tatra rūpamataḥ smaret

हिन्दी अर्थ

द्वितीय आदि पादोंके साथ परिवर्तन होनेपर

English

Vaj. Sam. 16.48a.

अध्याय 316

श्लोक 5

चटशब्दं द्विधा कृत्वा ततः प्रवरमुच्चरेत् ।दहेति च द्विधा कार्यं वमेति च द्विधा गतम्(२)

caṭaśabdaṃ dvidhā kṛtvā tataḥ pravaramuccaret / daheti ca dvidhā kāryaṃ vameti ca dvidhā gatam(2)

हिन्दी अर्थ

नामक छन्द होते हैं। (अर्थात् जब प्रथम पादके स्थानमें द्वितीय पाद और द्वितीय पादके स्थानमें प्रथम पाद हों तो 'मञ्जरी' छन्द होता है। जब प्रथम पादके स्थानमें तृतीय पाद और तृतीय पादके स्थानमें प्रथम पाद हो तो “लवली' छन्द होता है और जब प्रथम पादके स्थानमें चतुर्थ पाद और चतुर्थ पादके स्थानमें

English

Tait. Sam. 4.6.4.1a.

अध्याय 316

श्लोक 6

घातयेति द्विधाकृत्य हूंफडन्तं समुच्चरेत् ।अघोरास्त्रन्तु नेत्रं स्याद् गायत्री चोच्यते ऽधुना तन्महेशाय विद्महे महादेवाय धीमहि ।तत्रः शिवः प्रचोदयात् गायत्री सर्वसाधनी

ghātayeti dvidhākṛtya hūṃphaḍantaṃ samuccaret / aghorāstrantu netraṃ syād gāyatrī cocyate 'dhunā tanmaheśāya vidmahe mahādevāya dhīmahi / tatraḥ śivaḥ pracodayāt gāyatrī sarvasādhanī

हिन्दी अर्थ

प्रथम पाद हो तो 'अमृतधारा' नामक छन्द होता है।) अब 'उद्गता' छन्दका प्रतिपादन किया जाता है। जहाँ प्रथम चरणमें सगण (।। 5),

English

Ck>uld not be traced.

अध्याय 316

श्लोक 7

यात्रायां विजयादौ च यजेत् पूर्वङ्गणं श्रिये ।तुर्यांशे तु पुरा क्षेत्रे समन्तादर्कभाजिते

yātrāyāṃ vijayādau ca yajet pūrvaṅgaṇaṃ śriye / turyāṃśe tu purā kṣetre samantādarkabhājite

हिन्दी अर्थ

ये दस अक्षर हों, द्वितीय पादमें भी नगण गुरु ये दस ही अक्षर हों, तृतीय पादमें भगण

English

Gould not be traced.

अध्याय 316

श्लोक 8

चतुष्पदं त्रिकोणे तु त्रिदलं कमलं लिखेत् ।१ सर्वत इति ख॥ २ द्विधाकृतमिति ख॥ :प् १५९ तत्पृष्ठे पदिकाविथीभागि त्रिदलमश्वयुक्

catuṣpadaṃ trikoṇe tu tridalaṃ kamalaṃ likhet / 1 sarvata iti kha.. 2 dvidhākṛtamiti kha.. :p 159 tatpṛṣṭhe padikāvithībhāgi tridalamaśvayuk

हिन्दी अर्थ

चरणमें सगण (।। 5), जगण (। 5।), सगण

English

In a triangle a four-footed (diagram), one should draw a three-petalled lotus; at its back the road-division, a three-petalled Ashvayuk;

अध्याय 316

श्लोक 9

वसुदेवसुतैः साब्जैस्तिदलैः पादपट्टिका ।तदूर्ध्वे वेदिका देया भगमात्रप्रमाणतः

vasudevasutaiḥ sābjaistidalaiḥ pādapaṭṭikā / tadūrdhve vedikā deyā bhagamātrapramāṇataḥ

हिन्दी अर्थ

ये तेरह अक्षर हों, वह 'उद्गता' नामवाला छन्द है। उद्गताके तृतीय चरणमें जब रगण (5।5), तो उसका नाम 'सौरभ“' होता है। उद्गताके तृतीय पादमें जब दो नगण और दो सगण हों और शेष चरण ज्यों-के-त्यों रहें तो उसकी “ललितः? संज्ञा होती है। जिसके प्रथम चरणमें

English

the foot-border with three-petalled lotuses by Vasudeva's sons; above it the altar should be given of a span's measure;

अध्याय 316

श्लोक 10

द्वारं पद्ममितं कोष्ठादुपद्वारं विवर्णितम् ।द्वारोपद्वाररचितं मण्डलं विघ्नसूदनम्

dvāraṃ padmamitaṃ koṣṭhādupadvāraṃ vivarṇitam / dvāropadvāraracitaṃ maṇḍalaṃ vighnasūdanam

हिन्दी अर्थ

--इसमें गुरु-लघुका विभाग नहीं होता। २. कुसुमितसहकारे हतहिममहिमशुचिशशाङ्के ।

English

the door a lotus in measure; the sub-door is described from the compartment; the mandala made of door and sub-door is the destroyer of obstacles.

अध्याय 316

श्लोक 11

आरक्तं कमलं मध्ये वाह्यपद्मानि तद्वहिः ।सिता तु वीथिका कार्या द्वाराणि तु यथेच्छया

āraktaṃ kamalaṃ madhye vāhyapadmāni tadvahiḥ / sitā tu vīthikā kāryā dvārāṇi tu yathecchayā

हिन्दी अर्थ

३. चित्तं मम रमयति, कान्तं वनमिदमुपगिरिनदि। कूजन्मधुकरकलरवकृतजनधूति, पुंस्कोकिलमुखरितसुरभिकुसुमचिततरुवति॥

English

A red lotus in the middle, outer lotuses beyond; a white path should be made, and doors as one wishes;

अध्याय 316

श्लोक 12

कर्णिका पीतवर्णा स्यात् केशराणि तथा पुनः ।मण्डलं विघ्नमर्दाख्यं मध्ये गणपतिं यजेत्

karṇikā pītavarṇā syāt keśarāṇi tathā punaḥ / maṇḍalaṃ vighnamardākhyaṃ madhye gaṇapatiṃ yajet

हिन्दी अर्थ

४. जनयति महतीं प्रीतिं हृदये, कामिनां चूतमञ्जरी।

English

the pericarp should be yellow-colored, likewise the filaments again. The mandala called Vighnamarda: in the middle one should worship Ganapati.

अध्याय 316

श्लोक 13

नामाद्यं सवराकं स्याद्देवाच्छक्रसमन्वितम् ।शिरो हतं तत्पुरुषेण ओमाद्यञ्च नमो ऽन्तकम्

nāmādyaṃ savarākaṃ syāddevācchakrasamanvitam / śiro hataṃ tatpuruṣeṇa omādyañca namo 'ntakam

हिन्दी अर्थ

मिलदलिचक्रचञ्ुपरिचुम्बितकेसरा, कोमलमलयवातपरिनर्तिततरुशिखरस्थिता॥ ५. विरहविधुरहूणकाङ्गनाकपोलोपमं, परिणतिधरं पीतपाण्डुच्छवि। लवलीफलं निदाघे, भवति जगति हिमकरशीतलमतिस्वादूष्णहरम्॥ ६. परिवाञ्छसि कर्णरसायनं सततममृतधाराभिर्यदि हृदि वा परमानन्दरसम्।

English

The name at the beginning with the boon, joined with Indra by the god; head struck by Tatpurusha; beginning with Om and ending with "namah";

अध्याय 316

श्लोक 14

गजाख्यं गजशीर्षञ्च गाङ्गेयं गणनायकम् ।त्रिरावर्तङ्गगनगङ्गोपतिं पूर्वपङ्क्तिगम्

gajākhyaṃ gajaśīrṣañca gāṅgeyaṃ gaṇanāyakam / trirāvartaṅgaganagaṅgopatiṃ pūrvapaṅktigam

हिन्दी अर्थ

तत्काव्यगुणभूषणम्॥

English

called Gaja, Gajashirsha, Gangeya, Ganayaka, Triravarta, lord of heavenly Ganga, in the east row;

अध्याय 316

श्लोक 15

विचित्रांशं महाकायं लम्बोष्ठं लम्बकर्णकम् ।लम्बोदरं महाभागं विकृतं पार्वतीप्रियम्

vicitrāṃśaṃ mahākāyaṃ lamboṣṭhaṃ lambakarṇakam / lambodaraṃ mahābhāgaṃ vikṛtaṃ pārvatīpriyam

हिन्दी अर्थ

एतदेव तव सौरभकं यदुदीरितार्थमपि नावबुद्धयसे ॥ चरणमें दो नगण और एक सगण (नौ अक्षर) हों तो वह “वर्धमान छन्द॒ नाम धारण करता हों तथा चतुर्थ चरणमें तीन नगण, एक जगण है। उसी छन्दमें तृतीय चरणके स्थानमें जब और एक भगण (पंद्रह अक्षर) हों, वह उपस्थित तगण, जगण और रगण (ये नौ अक्षर) हों तो “प्रचुपित नामक छन्द होता है। उक्त छन्दके वह “शुद्ध विराषभ” छन्द कहलाता है। अब

English

Vichitramsha, Mahakaya, Lambaushtha, Lambakarnaka, Lambodara, Mahabhaga, Vikrita, beloved of Parvati;

अध्याय 316

श्लोक 16

भयावहञ्च भद्रञ्च भगणं भयसूदनम् ।द्वादशैते दशपङ्क्तौ देवत्रासञ्च पश्चिमे

bhayāvahañca bhadrañca bhagaṇaṃ bhayasūdanam / dvādaśaite daśapaṅktau devatrāsañca paścime

हिन्दी अर्थ

तृतीय चरणमें जब क्रमशः दो नगण, एक सगण, अर्धसमवृत्तका वर्णन करूँगा॥ १--१०॥

English

Bhayavaha, Bhadra, Bhagana, Bhayasudana — these twelve in the ten rows, Devatrasa in the west;

अध्याय 316

श्लोक 17

महानादम्भास्वरञ्च विघ्नराजं गणाधिपम् ।उद्भटस्वानभश् चण्डौ महाशुण्डञ्च भीमकम्

mahānādambhāsvarañca vighnarājaṃ gaṇādhipam / udbhaṭasvānabhaś caṇḍau mahāśuṇḍañca bhīmakam

हिन्दी अर्थ

इस प्रकार आदि आग्रेय महापुराणमें 'विषमवृत्तका वर्णन” नामक तीन सौ बत्तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ अर्धसमवृत्तोंका वर्णन

English

Mahanada, Bhasvara, Vighnaraja, Ganadhipa; Udbhata, Svanabha, Chanda, Mahashunda, Bhimaka;

अध्याय 316

श्लोक 18

मन्मथं मधुसूदञ्च सुन्दरं भावपुष्टकम् ।सौम्ये ब्रह्मेश्वरं ब्राह्मं मनोवृत्तिञ्च संलयम्

manmathaṃ madhusūdañca sundaraṃ bhāvapuṣṭakam / saumye brahmeśvaraṃ brāhmaṃ manovṛttiñca saṃlayam

हिन्दी अर्थ

अग्निदेव कहते हैं-जिसके प्रथम चरणमें चरणमें तीन सगण और एक गुरु तथा द्वितीय तीन सगण, एक लघु और एक गुरु (कुल चरणमें तीन भगण एवं दो गुरु हों, उस छन्दका ग्यारह अक्षर) हों, दूसरे चरणमें तीन भगण एवं नाम “वेगवती है। जिसके पहले पादमें तगण

English

Manmatha, Madhusudana, Sundara, Bhavapushtaka; in the north Brahmeshvara, Brahma, Manovritti and Samlaya;

अध्याय 316

श्लोक 19

लयं दूत्यप्रियं लौल्यं विकर्णं वत्सलं तथा ।कृतान्तं कालदडण्च यजेत् कुम्भञ्च पूर्ववत्

layaṃ dūtyapriyaṃ laulyaṃ vikarṇaṃ vatsalaṃ tathā / kṛtāntaṃ kāladaḍaṇca yajet kumbhañca pūrvavat

हिन्दी अर्थ

हो, वह “उपचित्रक” नामक छन्द है। जिसके एक गुरु तथा दूसरे चरणमें मगण (555), सगण प्रथम पादमें तीन भगण एवं दो गुरु हों और (।।5), जगण (।5।) एवं दो गुरु हों, वह द्वितीय पादमें एक नगण (।॥।।), दो जगण ' भद्रविराट् नामक छन्द है। जिसके प्रथम (।5।) एवं एक जगण हो, वह “द्रुतमध्या पादमें सगण, जगण, सगण और एक गुरु तथा नामक छन्द होता है। यहाँ भी प्रथम पादके द्वितीय पादमें भगण, रगण, नगण और दो गुरु समान तृतीय पाद और द्वितीय पादके समान हों, उसका नाम केतुमती” है। जिसके पहले चतुर्थ पाद जानना चाहिए। यही बात आगेके चरणमें दो तगण, एक जगण और दो गुरु हों

English

Laya, Dutyapriya, Laulya, Vikarna, Vatsala; Kritanta and Kaladanda — one should worship, and the pot as before.

अध्याय 316

श्लोक 20

श्रयुतञ्च जपेन्मन्त्रं होमयेत्तु दशांशतः ।शेषाणान्तु दशाहुत्या जपाद्धोमन्तु कारयेत्

śrayutañca japenmantraṃ homayettu daśāṃśataḥ / śeṣāṇāntu daśāhutyā japāddhomantu kārayet

हिन्दी अर्थ

१. रामा कामकरेणुका मृगायतनेत्रा, हृदयं हरति पयोधरावनम्रा।

English

One should recite the mantra ten thousand times and offer a tenth; for the rest with ten oblations offer after recitation;

अध्याय 316

श्लोक 21

पूर्णां दत्वाभिषेकन्तु कुर्यात्सर्वन्तु सिध्यति ।भूगो ऽश्वगजवस्त्राद्यैर् गुरुपूजाञ्चरेन्नरः

pūrṇāṃ datvābhiṣekantu kuryātsarvantu sidhyati / bhūgo 'śvagajavastrādyair gurupūjāñcarennaraḥ

हिन्दी अर्थ

जनयति मम मनसि मुदं मदिराक्षी, मदकलकरिंगमना परिणतशशिवदना॥ ३. कन्येयं कनकोज्वला मनोहरदीप्तिः शशिनिर्मलवदना विशालनेत्रा। परपुष्टविघुष्टमनोहरं मन्मथकेलिनिकेतनमेतत् ॥

English

having given the full oblation one should perform the consecration, and all succeeds. A man should perform the teacher's worship with land, horses, elephants, cloth and the like.

स्रोत: https://gretil.sub.uni-goettingen.de/gretil/corpustei/transformations/plaintext/sa_agnipurANa.txt · प्राप्त 3/6/2026

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शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

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