Agni Purana
207
अध्याय 207 / 381

Adhyaya 207

6 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ6 श्लोक

अध्याय 207

श्लोक 1

कौमुदव्रतं अग्निर् उवाच कौमुदाख्यं मयोक्तञ्च चरेदाश्वयुजे सिते ।हरिं यजेत् मासमेकमेकादश्यामुपोषितः

kaumudavrataṃ agnir uvāca kaumudākhyaṃ mayoktañca caredāśvayuje site / hariṃ yajet māsamekamekādaśyāmupoṣitaḥ

हिन्दी अर्थ

मैं तुम्हारे सम्मुख सबसे उत्तम मासोपवास-

English

(One.should resolve as follows): "I shall practise the Kanmudavrata taking food only once (daily) in the brightfort night in divina after repeating (the name of) Hari for a month, for the sake of enjoyment and emancipation".

अध्याय 207

श्लोक 2

आश्विने शुक्लपक्षेहमेकाहारी हरिं जपन् ।मासमेकं भुक्तिमुक्त्यै करिष्ये कौमुदं व्रतं

āśvine śuklapakṣehamekāhārī hariṃ japan / māsamekaṃ bhuktimuktyai kariṣye kaumudaṃ vrataṃ

हिन्दी अर्थ

ब्रतका वर्णन करता हूँ। वैष्णव-यज्ञका अनुष्ठान एवं विधवा स्त्री-इनके लिये मासोपवास- करके, आचार्यको आज्ञा लेकर, कृच्छू आदि

English

obeisance to Vasudeva". Having made the offering

अध्याय 207

श्लोक 3

उपोष्य विष्णुं द्वादश्यां यजेद्देवं विलिप्य च ।चन्दनागुरुकाश्मीरैः कमलोत्पलपुष्पकैः

upoṣya viṣṇuṃ dvādaśyāṃ yajeddevaṃ vilipya ca / candanāgurukāśmīraiḥ kamalotpalapuṣpakaiḥ

हिन्दी अर्थ

अश्विनके शुक्ल पक्षको एकादशीको उपवास रखकर तीस दिनोंके लिये निम्नलिखित संकल्प करके मासोपवास-ब्रत ग्रहण करे--' श्रीविष्णो! मैं आजसे लेकर तीस दिनतक आपके

English

See Ch. 198 13-14.

अध्याय 207

श्लोक 4

कल्हारैर्वाथ मालत्या दीपं तैलेन वाग्यतः ।अहोरात्रं च नैवेद्यं पायसापूपमोदकैः

kalhārairvātha mālatyā dīpaṃ tailena vāgyataḥ / ahorātraṃ ca naivedyaṃ pāyasāpūpamodakaiḥ

हिन्दी अर्थ

उत्थानकालपर्यन्त निराहार रहकर आपका पूजन करूँगा। सर्वव्यापी श्रीहरे! आश्विन शुक्ल एकादशीसे आपके उत्थानकाल कार्तिक शुक्ल एकादशीके मध्यमें यदि मेरी मृत्यु हो जाय तो (आपकी कृपासे) मेरा व्रत भङ्ग न हो।' व्रत करनेवाला दिनमें तीन बार स्नान करके सुगन्धित द्रव्य और पुष्पोंद्वारा प्रातः, मध्याहृ एवं सायंकाल श्रीविष्णुका पूजन करे तथा विष्णु-सम्बन्धी गान, जप और

English

See Ch. 198 13-14.

अध्याय 207

श्लोक 5

ॐ नमो वासुदेवाय विज्ञाप्याथ क्षमापयेत् ।भोजनादि(१) द्विजे दद्याद्यावद् देवः प्रबुद्ध्यते

oṃ namo vāsudevāya vijñāpyātha kṣamāpayet / bhojanādi(1) dvije dadyādyāvad devaḥ prabuddhyate

हिन्दी अर्थ

ध्यान करे। व्रती पुरुष वकवादका परित्याग करे और धनकी इच्छा भी न करे। वह किसी भी व्रतहीन मनुष्यका स्पर्श न करे और शास्त्रनिषिद्ध कर्मामें लगे हुए लोगोंका चालक-5प्रेरक न

English

See Ch. 198 13-14.

अध्याय 207

श्लोक 6

तावन्मासोपवासः स्यादधिकं फलमप्यतः

tāvanmāsopavāsaḥ syādadhikaṃ phalamapyataḥ /

हिन्दी अर्थ

बने। उसे तीस दिनतक देवमन्दिरमें ही निवास करना चाहिए। व्रत करनेवाला मनुष्य कार्तिकके शुक्लपक्षकी द्वादशीको भगवान् श्रीविष्णुकी पूजा करके ब्राह्मणोंको भोजन करावे। तदनन्तर उन्हें दक्षिणा देकर और स्वयं पारण करके व्रतका विसर्जन करे। इस प्रकार तेरह पूर्ण मासोपवास- व्रतोंका अनुष्ठान करनेवाला भोग और मोक्ष दोनोंको प्राप्त कर लेता है

English

See Ch. 198 13-14.

स्रोत: https://gretil.sub.uni-goettingen.de/gretil/corpustei/transformations/plaintext/sa_agnipurANa.txt · प्राप्त 3/6/2026

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शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।