अध्याय 263
श्लोक 1
नाथ नीके कै जानिबी ठीक जन-जीयकी ।रावरो भरोसो नाह कै सु-प्रेम-नेम लियो रुचिर रहनि रुचि मति गति तीयकी
nātha nīke kai jānibī ṭhīka jana-jīyakī | rāvaro bharoso nāha kai su-prema-nema liyo rucira rahani ruci mati gati tīyakī
अध्याय 263
नाथ नीके कै जानिबी ठीक जन-जीयकी ।रावरो भरोसो नाह कै सु-प्रेम-नेम लियो रुचिर रहनि रुचि मति गति तीयकी
nātha nīke kai jānibī ṭhīka jana-jīyakī | rāvaro bharoso nāha kai su-prema-nema liyo rucira rahani ruci mati gati tīyakī
अध्याय 263
कुकृत-सुकृत बस सब ही सों संग परयो, परखी पराई गति, आपने हूँ कीयकी ।मेरे भलेको गोसाईं! पोचको, न सोच-संक हौंहुँ किये कहौं सौंह साँची सीय-पीयकी
kukṛta-sukṛta basa saba hī soṃ saṃga parayo, parakhī parāī gati, āpane hū~ kīyakī | mere bhaleko gosāīṃ! pocako, na soca-saṃka hauṃhu~ kiye kahauṃ sauṃha sā~cī sīya-pīyakī
अध्याय 263
ग्यानहू-गिराके स्वामी, बाहर-अंतरजामी, यहाँ क्यों दुरैगी बात मुखकी औ हीयकी? ।तुलसी तिहारो, तुमहीं पै तुलसीके हित, राखि कहौं हौं तो जो पै ह्वैहौं माखी घीयकी
gyānahū-girāke svāmī, bāhara-aṃtarajāmī, yahā~ kyoṃ duraigī bāta mukhakī au hīyakī? | tulasī tihāro, tumahīṃ pai tulasīke hita, rākhi kahauṃ hauṃ to jo pai hvaihauṃ mākhī ghīyakī
पाठ सेटिंग्स · Reading settings
भाषा एवं सामग्री · Language and layers
स्रोत: local proofread transcription: Tulsidas's Vinaya Patrika (279 padas), read from page images of a printed edition and proofread. One chapter per pada, stanza numbers as printed. The editor's Hindi bhavartha is not reproduced. · प्राप्त 19/10/2026
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धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।
अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)
मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।
पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)
व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।
आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)
प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।
भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)
आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।
समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)
दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।
पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)
पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।
Collated against Kashi Nagari Pracharini Sabha critical edition.