अध्याय 245
श्लोक 1
मोहि मूढ़ मन बहुत बिगोयो ।याके लिये सुनहु करुनामय, मैं जग जनमि-जनमि दुख रोयो
mohi mūḍha़ mana bahuta bigoyo | yāke liye sunahu karunāmaya, maiṃ jaga janami-janami dukha royo
अध्याय 245
मोहि मूढ़ मन बहुत बिगोयो ।याके लिये सुनहु करुनामय, मैं जग जनमि-जनमि दुख रोयो
mohi mūḍha़ mana bahuta bigoyo | yāke liye sunahu karunāmaya, maiṃ jaga janami-janami dukha royo
अध्याय 245
सीतल मधुर पियूष सहज सुख निकटहि रहत दूरि जन खोयो ।बहु भाँतिन श्रम करत मोहबस, बृथहि मंदमति बारि बिलोयो
sītala madhura piyūṣa sahaja sukha nikaṭahi rahata dūri jana khoyo | bahu bhā~tina śrama karata mohabasa, bṛthahi maṃdamati bāri biloyo
अध्याय 245
करम-कीच जिय जानि, सानि चित, चाहत कुटिल मलहि मल धोयो ।तृषावंत सुरसरि बिहाय सठ फिरि-फिरि बिकल अकास निचोयो
karama-kīca jiya jāni, sāni cita, cāhata kuṭila malahi mala dhoyo | tṛṣāvaṃta surasari bihāya saṭha phiri-phiri bikala akāsa nicoyo
अध्याय 245
तुलसिदास प्रभु! कृपा करहु अब, मैं निज दोष कछू नहिं गोयो ।डासत ही गइ बीति निसा सब, कबहुँ न नाथ! नींद भरि सोयो
tulasidāsa prabhu! kṛpā karahu aba, maiṃ nija doṣa kachū nahiṃ goyo | ḍāsata hī gai bīti nisā saba, kabahu~ na nātha! nīṃda bhari soyo
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भाषा एवं सामग्री · Language and layers
स्रोत: local proofread transcription: Tulsidas's Vinaya Patrika (279 padas), read from page images of a printed edition and proofread. One chapter per pada, stanza numbers as printed. The editor's Hindi bhavartha is not reproduced. · प्राप्त 19/10/2026
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धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।
अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)
मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।
पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)
व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।
आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)
प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।
भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)
आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।
समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)
दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।
पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)
पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।
Collated against Kashi Nagari Pracharini Sabha critical edition.