Vinaya Patrika
239
अध्याय 239 / 279

पद २३९

7 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ7 श्लोक

अध्याय 239

श्लोक 1

जाको हरि दृढ़ करि अंग करयो ।सोइ सुसील, पुनीत, बेदबिद, बिद्या-गुननि भरयो

jāko hari dṛḍha़ kari aṃga karayo | soi susīla, punīta, bedabida, bidyā-gunani bharayo

अध्याय 239

श्लोक 2

उतपति पांडु-सुतनकी करनी सुनि सतपंथ डरयो ।ते त्रैलोक्य-पूज्य, पावन जस सुनि-सुनि लोक तरयो

utapati pāṃḍu-sutanakī karanī suni satapaṃtha ḍarayo | te trailokya-pūjya, pāvana jasa suni-suni loka tarayo

अध्याय 239

श्लोक 3

जो निज धरम बेदबोधित सो करत न कछु बिसरयो ।बिनु अवगुन निरकलंक नृग मज्जित कर गहि उधरयो

jo nija dharama bedabodhita so karata na kachu bisarayo | binu avaguna nirakalaṃka nṛga majjita kara gahi udharayo

अध्याय 239

श्लोक 4

ब्रह्म बिसिख ब्रह्मांड दहन छम गर्भ न नृपति जरयो ।अजर-अमर, कुलिसहुँ नाहिं बध, सो पुनि फेन मरयो

brahma bisikha brahmāṃḍa dahana chama garbha na nṛpati jarayo | ajara-amara, kulisahu~ nāhiṃ badha, so puni phena marayo

अध्याय 239

श्लोक 5

बिप्र अजामिल अरु सुरपति तें कहा जो नहिं बिगरयो ।उनको कियो सहाय बहुत, उरको संताप हरयो

bipra ajāmila aru surapati teṃ kahā jo nahiṃ bigarayo | unako kiyo sahāya bahuta, urako saṃtāpa harayo

अध्याय 239

श्लोक 6

गनिका अरु कंदरपतें जगमहँ अघ न करत उबरयो ।तिनको चरित पवित्र जानि हरि निज हृदि-भवन धरयो

ganikā aru kaṃdarapateṃ jagamaha~ agha na karata ubarayo | tinako carita pavitra jāni hari nija hṛdi-bhavana dharayo

अध्याय 239

श्लोक 7

केहि आचरन भलो मानैं प्रभु सो तौ न जानि परयो ।तुलसिदास रघुनाथ-कृपाको जोवत पंथ खरयो

kehi ācarana bhalo mānaiṃ prabhu so tau na jāni parayo | tulasidāsa raghunātha-kṛpāko jovata paṃtha kharayo

स्रोत: local proofread transcription: Tulsidas's Vinaya Patrika (279 padas), read from page images of a printed edition and proofread. One chapter per pada, stanza numbers as printed. The editor's Hindi bhavartha is not reproduced. · प्राप्त 19/10/2026

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शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पाठ-भेद एवं संशोधनVariants & corrections

पाठ-भेद टिप्पणी (Alternative Reading / Variant Notes):

Collated against Kashi Nagari Pracharini Sabha critical edition.