अध्याय 239
श्लोक 1
जाको हरि दृढ़ करि अंग करयो ।सोइ सुसील, पुनीत, बेदबिद, बिद्या-गुननि भरयो
jāko hari dṛḍha़ kari aṃga karayo | soi susīla, punīta, bedabida, bidyā-gunani bharayo
अध्याय 239
जाको हरि दृढ़ करि अंग करयो ।सोइ सुसील, पुनीत, बेदबिद, बिद्या-गुननि भरयो
jāko hari dṛḍha़ kari aṃga karayo | soi susīla, punīta, bedabida, bidyā-gunani bharayo
अध्याय 239
उतपति पांडु-सुतनकी करनी सुनि सतपंथ डरयो ।ते त्रैलोक्य-पूज्य, पावन जस सुनि-सुनि लोक तरयो
utapati pāṃḍu-sutanakī karanī suni satapaṃtha ḍarayo | te trailokya-pūjya, pāvana jasa suni-suni loka tarayo
अध्याय 239
जो निज धरम बेदबोधित सो करत न कछु बिसरयो ।बिनु अवगुन निरकलंक नृग मज्जित कर गहि उधरयो
jo nija dharama bedabodhita so karata na kachu bisarayo | binu avaguna nirakalaṃka nṛga majjita kara gahi udharayo
अध्याय 239
ब्रह्म बिसिख ब्रह्मांड दहन छम गर्भ न नृपति जरयो ।अजर-अमर, कुलिसहुँ नाहिं बध, सो पुनि फेन मरयो
brahma bisikha brahmāṃḍa dahana chama garbha na nṛpati jarayo | ajara-amara, kulisahu~ nāhiṃ badha, so puni phena marayo
अध्याय 239
बिप्र अजामिल अरु सुरपति तें कहा जो नहिं बिगरयो ।उनको कियो सहाय बहुत, उरको संताप हरयो
bipra ajāmila aru surapati teṃ kahā jo nahiṃ bigarayo | unako kiyo sahāya bahuta, urako saṃtāpa harayo
अध्याय 239
गनिका अरु कंदरपतें जगमहँ अघ न करत उबरयो ।तिनको चरित पवित्र जानि हरि निज हृदि-भवन धरयो
ganikā aru kaṃdarapateṃ jagamaha~ agha na karata ubarayo | tinako carita pavitra jāni hari nija hṛdi-bhavana dharayo
अध्याय 239
केहि आचरन भलो मानैं प्रभु सो तौ न जानि परयो ।तुलसिदास रघुनाथ-कृपाको जोवत पंथ खरयो
kehi ācarana bhalo mānaiṃ prabhu so tau na jāni parayo | tulasidāsa raghunātha-kṛpāko jovata paṃtha kharayo
पाठ सेटिंग्स · Reading settings
भाषा एवं सामग्री · Language and layers
स्रोत: local proofread transcription: Tulsidas's Vinaya Patrika (279 padas), read from page images of a printed edition and proofread. One chapter per pada, stanza numbers as printed. The editor's Hindi bhavartha is not reproduced. · प्राप्त 19/10/2026
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धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।
अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)
मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।
पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)
व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।
आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)
प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।
भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)
आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।
समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)
दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।
पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)
पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।
Collated against Kashi Nagari Pracharini Sabha critical edition.