अध्याय 215
श्लोक 1
श्रीरघुबीरकी यह बानि ।नीचहू सों करत नेह सुप्रीति मन अनुमानि
śrīraghubīrakī yaha bāni | nīcahū soṃ karata neha suprīti mana anumāni
अध्याय 215
श्रीरघुबीरकी यह बानि ।नीचहू सों करत नेह सुप्रीति मन अनुमानि
śrīraghubīrakī yaha bāni | nīcahū soṃ karata neha suprīti mana anumāni
अध्याय 215
परम अधम निषाद पाँवर, कौन ताकी कानि? ।लियो सो उर लाइ सुत ज्यों प्रेमको पहिचानि
parama adhama niṣāda pā~vara, kauna tākī kāni? | liyo so ura lāi suta jyoṃ premako pahicāni
अध्याय 215
गीध कौन दयालु, जो बिधि रच्यो हिंसा सानि? ।जनक ज्यों रघुनाथ ताकहँ दियो जल निज पानि
gīdha kauna dayālu, jo bidhi racyo hiṃsā sāni? | janaka jyoṃ raghunātha tākaha~ diyo jala nija pāni
अध्याय 215
प्रकृति-मलिन कुजाति सबरी सकल अवगुन-खानि ।खात ताके दिये फल अति रुचि बखानि बखानि
prakṛti-malina kujāti sabarī sakala avaguna-khāni | khāta tāke diye phala ati ruci bakhāni bakhāni
अध्याय 215
रजनिचर अरु रिपु बिभीषन सरन आयो जानि ।भरत ज्यों उठि ताहि भेंटत देह-दसा भुलानि
rajanicara aru ripu bibhīṣana sarana āyo jāni | bharata jyoṃ uṭhi tāhi bheṃṭata deha-dasā bhulāni
अध्याय 215
कौन सुभग सुसील बानर, जिन्हिं सुमिरत हानि ।किये ते सब सर्बदा, पूजे अजन आपने आनि
kauna subhaga susīla bānara, jinhiṃ sumirata hāni | kiye te saba sarbadā, pūje ajana āpane āni
अध्याय 215
राम सहज कृपालु कोमल दीनहित दिनदानि ।भजहि ऐसे प्रभुहि तुलसी कुटिल कपट न ठानि
rāma sahaja kṛpālu komala dīnahita dinadāni | bhajahi aise prabhuhi tulasī kuṭila kapaṭa na ṭhāni
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भाषा एवं सामग्री · Language and layers
स्रोत: local proofread transcription: Tulsidas's Vinaya Patrika (279 padas), read from page images of a printed edition and proofread. One chapter per pada, stanza numbers as printed. The editor's Hindi bhavartha is not reproduced. · प्राप्त 19/10/2026
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अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)
मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।
पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)
व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।
आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)
प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।
भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)
आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।
समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)
दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।
पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)
पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।
Collated against Kashi Nagari Pracharini Sabha critical edition.