Vinaya Patrika
184
अध्याय 184 / 279

पद १८४

5 श्लोक

पूर्ण अध्याय पाठ5 श्लोक

अध्याय 184

श्लोक 1

राम-नामके जपे जाइ जियकी जरनि ।कलिकाल अपर उपाय ते अपाय भये, जैसे तम नासिबेको चित्रके तरनि

rāma-nāmake jape jāi jiyakī jarani | kalikāla apara upāya te apāya bhaye, jaise tama nāsibeko citrake tarani

अध्याय 184

श्लोक 2

करम-कलाप परिताप पाप-साने सब, ज्यों सुफूल फूले तरु फोकट फरनि ।दंभ, लोभ, लालच, उपासना बिनासि नीके, सुगति साधन भई उदर भरनि

karama-kalāpa paritāpa pāpa-sāne saba, jyoṃ suphūla phūle taru phokaṭa pharani | daṃbha, lobha, lālaca, upāsanā bināsi nīke, sugati sādhana bhaī udara bharani

अध्याय 184

श्लोक 3

जोग न समाधि निरुपाधि न बिराग-ग्यान, बचन बिशेष बेष, कहूँ न करनि ।कपट कुपथ कोटि, कहनि-रहनि खोटि, सकल सराहैं निज निज आचरनि

joga na samādhi nirupādhi na birāga-gyāna, bacana biśeṣa beṣa, kahū~ na karani | kapaṭa kupatha koṭi, kahani-rahani khoṭi, sakala sarāhaiṃ nija nija ācarani

अध्याय 184

श्लोक 4

मरत महेस उपदेस हैं कहा करत, सुरसरि-तीर कासी धरम-धरनि ।राम-नामको प्रताप हर कहैं, जपैं आप, जुग जुग जानैं जग, बेदहूँ बरनि

marata mahesa upadesa haiṃ kahā karata, surasari-tīra kāsī dharama-dharani | rāma-nāmako pratāpa hara kahaiṃ, japaiṃ āpa, juga juga jānaiṃ jaga, bedahū~ barani

अध्याय 184

श्लोक 5

मति राम-नाम ही सों, रति राम-नाम ही सों, गति राम-नाम ही की बिपति-हरनि ।राम-नामसों प्रतीति प्रीति राखे कबहुँक, तुलसी ढरैंगे राम आपनी ढरनि

mati rāma-nāma hī soṃ, rati rāma-nāma hī soṃ, gati rāma-nāma hī kī bipati-harani | rāma-nāmasoṃ pratīti prīti rākhe kabahu~ka, tulasī ḍharaiṃge rāma āpanī ḍharani

स्रोत: local proofread transcription: Tulsidas's Vinaya Patrika (279 padas), read from page images of a printed edition and proofread. One chapter per pada, stanza numbers as printed. The editor's Hindi bhavartha is not reproduced. · प्राप्त 19/10/2026

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शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पाठ-भेद एवं संशोधनVariants & corrections

पाठ-भेद टिप्पणी (Alternative Reading / Variant Notes):

Collated against Kashi Nagari Pracharini Sabha critical edition.